एकदंत अवतार और मदासुर रहस्य क्या है?

By पं. सुव्रत शर्मा

महर्षि च्यवन का तपोबल परशुराम फरसा आख्यान मूषक वाहन और बुध गुरु समन्वय का संपूर्ण वैदिक रहस्य

भगवान एकदंत अवतार कथा और मदासुर संहार

एकदंत पूजन मुहूर्त और शास्त्रीय विधान

सनातन वैदिक परंपरा और गणेश पुराण के पावन दर्शन में आद्यावतार के रूप में पूजित भगवान गणेश का एकदंत स्वरूप मानव चेतना के सबसे जटिल और विनाशकारी विकार अर्थात बौद्धिक अहंकार के शमन विनम्रता की पुनर्स्थापना और परम ज्ञान का सर्वोच्च शिखर है। वैदिक ज्योतिष तथा तत्व विज्ञान के अंतर्गत वाणी बुद्धि तर्क और संवाद के अधिपति बुध देव के तीक्ष्ण ज्ञान तथा धर्म विवेक और आत्मिक विस्तार के अधिपति देवगुरु बृहस्पति के सात्विक प्रभाव के दुर्लभ समन्वय को जाग्रत करने के लिए भगवान एकदंत की आराधना को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जब जातक की जन्म कुंडली में बुध और गुरु का संबंध दूषित होकर कुतर्क विद्या का अहंकार अथवा दूसरों को हीन समझने की प्रवृत्ति उत्पन्न कर रहा हो तब मूषक वाहिनी भगवान एकदंत की शरण में जाने से अमोघ सद्बुद्धि और आंतरिक शांति की प्राप्ति होती है। माघ मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी गणेश जयंती संकष्टी चतुर्थी अथवा प्रत्येक मास के शुक्ल पक्ष के बुधवार और गुरुवार के पावन अनुष्ठान का संपूर्ण शास्त्रीय विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।

शास्त्रीय आयाम अनुष्ठान विवरण और ज्योतिषीय मान्यता
प्रमुख पावन तिथि माघ मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी गणेश जयंती अथवा प्रत्येक बुधवार व गुरुवार
दैनिक पूजन समय प्रातः कालीन सूर्योदय वेला अथवा मध्याह्न काल
अधिष्ठाता स्वरूप एक टूटे दांत वाले मूषक पर आरूढ़ परशु पाश मोदक और अभय मुद्रा धारी भगवान एकदंत
ज्योतिषीय ग्रह व भाव संबंध प्रथम भाव पंचम भाव नवम भाव वाणी कारक बुध देव और ज्ञान कारक देवगुरु बृहस्पति
मुख्य पूजन सामग्री 21 दूर्वा दल पीले पुष्प शुद्ध पीला चंदन बेसन के मोदक और गाय का घी
प्रधान वैदिक अनुष्ठान एकदंत स्तोत्र पाठ गणेश अथर्वशीर्ष और ॐ एकदंताय विद्महे वक्रतुंडाय धीमहि तन्नो दंती प्रचोदयात् जप
अपेक्षित फल बौद्धिक अहंकार का नाश विवेक जागृति बुध गुरु दोष शांति और विद्या सिद्धि

महर्षि च्यवन का तपोबल और मदासुर का प्राकट्य

गणेश पुराण के उपासना खंड में वर्णित अत्यंत पावन इतिहास के अनुसार प्राचीन काल में भृगु वंश के परम तपस्वी महर्षि च्यवन ने संपूर्ण जगत में अपने तपोबल का विस्तार करने हेतु एक अत्यंत दुष्कर तपस्या आरंभ की। महर्षि च्यवन का तप इतना उग्र और प्रखर था कि उनके शरीर से एक प्रचंड तेज प्रस्फुटित होने लगा।

उस तीव्र तपोबल के प्रभाव से महर्षि के अंतःकरण में एक क्षण के लिए यह सूक्ष्म विचार आया कि इस चराचर जगत में मेरे समान कोई दूसरा तपस्वी नहीं है। महर्षि के मन में आए उस क्षणिक अहंकार और तपस्या के घमंड की तरंगों से एकाएक एक अत्यंत विशाल काले वर्ण का दैत्य प्रकट हुआ।

चूंकि वह दैत्य तपोबल के मद अर्थात अहंकार से उत्पन्न हुआ था अतः उसका नाम मदासुर पड़ा। सनातन तत्व ज्ञान में मद का अर्थ होता है ज्ञान रूप कुल अथवा धन का वह अंधा घमंड जो मनुष्य की विवेक दृष्टि को पूरी तरह नष्ट कर देता है।

मदासुर जन्म लेते ही दैत्यगुरु शुक्राचार्य के आश्रम पहुंचा। दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने उसकी तीव्र आसुरी महत्वाकांक्षा को देखकर उसे देवाधिदेव भगवान शिव की आराधना करने का आदेश दिया। मदासुर ने घने वन में जाकर सहस्रों वर्षों तक निराहार रहकर पंचाग्नि तप किया।

उसकी कठोर साधना से संतुष्ट होकर जब भगवान शिव प्रकट हुए तब मदासुर ने बड़ी चतुराई से यह वरदान मांग लिया कि वह त्रिलोकी के किसी भी देवता दानव यक्ष गंधर्व अथवा अस्त्र शस्त्र से कभी पराजित न हो सके। भगवान शिव से अजेयता का वरदान प्राप्त करते ही मदासुर का घमंड संपूर्ण सीमाओं को लांघ गया।

  • मदासुर ने एक विशाल आसुरी सेना का गठन किया और सर्वप्रथम देवराज इंद्र की अमरावती पर आक्रमण कर दिया।
  • देवराज इंद्र वरुण कुबेर और यम जैसे लोकपाल उसके सम्मुख पराजित होकर स्वर्ग छोड़कर भाग खड़े हुए।
  • मदासुर ने तीनों लोकों पर अपना एकछत्र आधिपत्य स्थापित कर लिया।
  • उसने पृथ्वी पर संतों के आश्रमों को नष्ट करना और यज्ञों को रोकना आरंभ कर दिया।
  • मदासुर के प्रभाव से संपूर्ण संसार के मनुष्यों में अहंकार का ऐसा विष फैल गया कि विद्वान अपने ज्ञान पर धनी अपने धन पर और राजा अपने बल पर घमंड करके निर्बलों का अपमान करने लगे।

देवों का रुदन और एकदंत प्राकट्य

जब मदासुर के अत्याचार से संपूर्ण चराचर जगत त्राहिमाम करने लगा और धर्म का अस्तित्व समाप्त होने की कगार पर पहुंच गया तब समस्त देवता और ऋषि मुनि महर्षि कश्यप और सनत्कुमारों की शरण में पहुंचे। ऋषियों ने ध्यान लगाकर देखा कि मदासुर वास्तव में घमंड का साकार रूप है और घमंड का संहार किसी भौतिक अस्त्र से नहीं हो सकता क्योंकि घमंड को केवल विशुद्ध ज्ञान और परम विनम्रता द्वारा ही परास्त किया जा सकता है।

समस्त देवताओं ने आदिदेव भगवान श्री गणेश के उस स्वरूप का स्तवन आरंभ किया जो माया के समस्त बंधनों को काटने वाले हैं। देवताओं की उस निष्कपट प्रार्थना से संतुष्ट होकर भगवान गणेश ने अपने द्वितीय प्रमुख अवतार के रूप में एकदंत स्वरूप धारण किया।

भगवान एकदंत का स्वरूप अत्यंत भव्य और तेजोमय था। उनके चार हाथ थे जिनमें उन्होंने तीक्ष्ण परशु पाश मोदक का पात्र और अभय मुद्रा धारण कर रखी थी। उनके मुख पर एक दिव्य शांत मुस्कान थी और उनके दोनों दांतों में से एक दांत खंडित था।

वे किसी विशाल गज अथवा सिंह पर नहीं अपितु एक अत्यंत छोटे और शांत मूषक अर्थात चूहे पर सवार होकर प्रकट हुए। भगवान एकदंत के प्राकट्य के साथ ही अंतरिक्ष में देव दुंदुभियां बजने लगीं और देवताओं ने पुष्प वर्षा कर उनका स्वागत किया।

क्या परशुराम के फरसे से खंडित हुआ दांत?

भगवान गणेश के एकदंत होने के संबंध में ब्रह्मवैवर्त पुराण के गणपति खंड में एक अत्यंत पावन और शिक्षाप्रद कथा का विस्तार मिलता है जो भगवान के अगाध शील और मर्यादा का प्रमाण है।

एक बार भगवान विष्णु के अंशावतार परम प्रतापी महर्षि परशुराम क्षत्रियों का संहार करने के पश्चात देवाधिदेव भगवान शिव के दर्शन हेतु कैलास पर्वत पर पहुंचे। उस समय भगवान शिव और माता पार्वती एकांत में विश्राम कर रहे थे और उन्होंने अपने पुत्र गणेश को द्वार पर पहरा देने का आदेश दिया था ताकि कोई भी भीतर प्रवेश न कर सके।

जब परशुराम जी ने भीतर जाने का प्रयास किया तब बालक गणेश ने विनम्रता पूर्वक उनका मार्ग रोक दिया और निवेदन किया कि प्रभु अभी विश्राम में हैं अतः कुछ क्षण प्रतीक्षा करें। क्षत्रिय संहारक परशुराम जी अपने क्रोधी स्वभाव के कारण इस साधारण अवरोध को सहन न कर सके। उन्होंने इसे अपना अपमान समझा और वे क्रोध में भरकर बालक गणेश के साथ युद्ध करने लगे।

  • बालक गणेश ने अपनी सूंड से परशुराम जी को उठाकर हवा में घुमा दिया और पृथ्वी पर पटक दिया।
  • अत्यंत लज्जित और क्रोधित होकर परशुराम जी ने उस अमोघ परशु अर्थात फरसे का संधान किया जो उन्हें स्वयं देवाधिदेव भगवान शिव ने उपहार में दिया था।
  • बालक गणेश उस फरसे के प्रहार को एक ही क्षण में निष्फल कर सकते थे।
  • किंतु गणेश जी ने विचार किया कि यह फरसा मेरे परम पूज्य पिता भगवान शिव का दिव्य अस्त्र है और यदि मैंने इस परशु का वार रोक दिया तो मेरे पिता के अस्त्र की महिमा खंडित हो जाएगी।
  • पिता के अस्त्र का मान रखने और बड़ों के प्रति परम विनम्रता प्रकट करने हेतु बालक गणेश ने उस फरसे का वार अपने बाएं दांत पर झेल लिया।
  • फरसे के तीव्र प्रहार से उनका बायां दांत टूटकर भूमि पर गिर गया और वे संपूर्ण ब्रह्मांड में सदा के लिए एकदंत कहलाए।

यह घटना सनातन संस्कृति का सर्वोच्च दर्शन सिखाती है कि सच्चा बलवान वही है जो अपने सामर्थ्य का प्रदर्शन करने के स्थान पर पिता और गुरु के अस्त्र की मर्यादा हेतु स्वयं का एक अंग भी न्योछावर करने का साहस रखता हो।

मूषक की सवारी और एकदंत स्वरूप का तात्विक मर्म

शाक्त और गाणपत्य तत्व दर्शन में भगवान एकदंत का विग्रह अद्वैत वेदांत का साक्षात रूपक है। सामान्य हाथी के दो दांत होते हैं जो बाह्य जगत में द्वैत के प्रतीक माने जाते हैं।

द्वैत का अर्थ होता है सुख और दुख लाभ और हानि मान और अपमान तथा मित्र और शत्रु का भेद। जब तक मनुष्य का मन इन दो दांतों अर्थात द्वैत में अटका रहता है तब तक वह सत्य का साक्षात्कार नहीं कर सकता। भगवान गणेश का एक दांत खंडित होना यह संदेश देता है कि साधक को समस्त द्वैतों को समाप्त करके केवल एक अखंड ब्रह्म तत्व अर्थात अद्वैत में स्थित होना चाहिए।

  • भगवान का वाहन मूषक अर्थात चूहा है जो निरंतर अंधेरे में रहता है और हर वस्तु को कुतरता रहता है।
  • चूहा मनुष्य के चंचल मन और तार्किक बुद्धि का प्रतीक है जो अकारण हर बात में छिद्रान्वेषण करती है।
  • भगवान एकदंत द्वारा मूषक की सवारी करना यह सिद्ध करता है कि सच्चा ज्ञानी वही है जो अपनी कुतर्की बुद्धि और चंचल वृत्तियों को पूर्णतः नियंत्रित करके उन्हें परमात्मा के चरणों का सेवक बना दे।
  • विशालकाय गजमुख का एक नन्हें मूषक पर सवार होना परम विनम्रता का वह शिखर है जो यह सिखाता है कि व्यक्ति चाहे कितना भी महान बन जाए उसे अपने आचरण में सदा धरती से जुड़े रहना चाहिए।

मदासुर का अहंकार मर्दन और शरणागति

जब मदासुर को ज्ञात हुआ कि देवता एकदंत नामक महाशक्ति के साथ उसके विनाश हेतु आगे बढ़ रहे हैं तब उसने अपने समस्त आसुरी बल के साथ युद्ध भूमि में प्रवेश किया। मदासुर ने भगवान एकदंत पर प्रलयंकारी मायावी बाणों और शूलों की वर्षा आरंभ कर दी।

भगवान एकदंत ने मंद मुस्कान के साथ अपने पाश को अंतरिक्ष में उछाला। वह पाश विद्युत की गति से घूमता हुआ सीधे मदासुर के कंठ में जाकर लिपट गया। जैसे ही भगवान के दिव्य पाश का स्पर्श हुआ मदासुर के शरीर और चित्त से तपोबल का समस्त नशा और घमंड एक ही क्षण में उतर गया।

  • मदासुर ने देखा कि भगवान एकदंत के मुख में संपूर्ण ब्रह्मांड वेदों की ऋचाएं और काल का चक्र घूम रहा है।
  • दैत्य को यह बोध हुआ कि जिसके बल पर वह घमंड कर रहा था वह बल भी ईश्वर की ही एक छोटी सी माया थी।
  • मदासुर का अहंकार चूर चूर हो गया और उसने अपने अस्त्र शस्त्र त्याग दिए।
  • वह कांपते हुए भगवान एकदंत के पावन चरणों में साष्टांग गिर पड़ा और अश्रु बहाते हुए क्षमा मांगने लगा।
  • दया के सागर भगवान एकदंत ने उसे अभय दान दिया और उसे पाताल लोक में जाकर केवल धर्म और सत्य के मार्ग पर चलने का आदेश दिया।

बुध और गुरु का ज्योतिषीय समन्वय

वैदिक ज्योतिष के महान आधार ग्रंथ बृहत् पराशर होरा शास्त्र में ग्रहों के बौद्धिक और आत्मिक प्रभाव का अत्यंत सूक्ष्म विवेचन मिलता है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से भगवान एकदंत का पावन स्वरूप सीधे तौर पर बुध देव और देवगुरु बृहस्पति के अत्यंत दुर्लभ और शुभ समन्वय का प्रतिनिधित्व करता है।

बुध ग्रह को ज्योतिष में बुद्धि तर्क स्मरण शक्ति गणित वाणी और व्यापार का कारक माना गया है। वहीं दूसरी ओर देवगुरु बृहस्पति ज्ञान धर्म नीति विवेक और आध्यात्मिक उत्थान के अधिपति हैं। जब किसी जातक की जन्म कुंडली में बुध बली होता है किंतु गुरु निर्बल होता है तो व्यक्ति के भीतर कुतर्क करने और अपनी बुद्धि का घमंड करने का दोष आ जाता है। ऐसा व्यक्ति दूसरों को मूर्ख समझता है और अपने ज्ञान के दंभ में अपनों का ही अपमान कर बैठता है।

  • जन्म कुंडली का प्रथम भाव व्यक्ति के समग्र स्वभाव और मस्तक का स्थान होता है।
  • जन्म कुंडली का पंचम भाव बुद्धि विद्या और पूर्व जन्म के पुण्यों का केंद्र होता है।
  • जन्म कुंडली का नवम भाव धर्म भाग्य और गुरु कृपा का स्थान माना जाता है।
  • जब बुध और गुरु का शुभ योग बनता है तो व्यक्ति प्रकांड विद्वान होने के साथ साथ अत्यंत विनम्र और दयालु बनता है।
  • भगवान एकदंत की साधना बुध के तर्क को गुरु के विवेक से जोड़ देती है जिससे जातक का बौद्धिक अहंकार समाप्त होकर वास्तविक ज्ञान का उदय होता है।

क्या एकदंत साधना से बौद्धिक अहंकार मिटता है?

आधुनिक युग में मानव समाज की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि लोग थोड़ी सी शिक्षा उच्च पद अथवा तकनीकी ज्ञान प्राप्त करते ही स्वयं को सर्वज्ञाता समझने की भूल कर बैठते हैं। यह बौद्धिक अहंकार मनुष्य को एकाकी बना देता है और उसके संबंधों में कटुता घोल देता है।

भगवान एकदंत साक्षात उस दिव्य औषधि के रूप में पूजित हैं जो अंतःकरण के इस मदासुर को समूल नष्ट कर देते हैं। जिस प्रकार भगवान ने परशुराम के फरसे का वार सहकर विनम्रता की रक्षा की थी उसी प्रकार जो साधक नित्य एकदंत स्तोत्र का पाठ करता है उसके भीतर क्षमा धैर्य और बड़ों के प्रति आदर भाव स्वतः जाग्रत हो जाता है। यह साधना मनुष्य को समाज में एक आदरणीय विद्यावान और लोकप्रिय व्यक्तित्व प्रदान करती है।

बुध गुरु दोष शांति और विद्या प्राप्ति के अचूक उपाय

यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में बुध और गुरु पीड़ित हों शिक्षा में निरंतर रुकावटें आ रही हों वाणी में कटुता रहती हो अथवा मन में अकारण घमंड उत्पन्न होता हो तो शास्त्रों में भगवान एकदंत की प्रसन्नता हेतु अत्यंत प्रामाणिक वैदिक उपाय बताए गए हैं।

  • प्रत्येक बुधवार अथवा गुरुवार के दिन प्रातः काल स्नान के उपरांत पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें और भगवान एकदंत के चित्र अथवा विग्रह के सम्मुख शुद्ध गाय के घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  • भगवान एकदंत को 21 दूर्वा दल गंगाजल से धोकर अर्पित करें और पीले कनेर अथवा गेंदे के पुष्प चढ़ाएं तथा पावन बीज मंत्र ॐ गं एकदंताय नमः अथवा ॐ एकदंताय विद्महे वक्रतुंडाय धीमहि तन्नो दंती प्रचोदयात् का कम से कम 108 बार शांत मन से जाप करें।
  • अपनी बुद्धि को निर्मल और अहंकार मुक्त बनाने हेतु प्रतिदिन प्रातः काल स्नान के उपरांत महर्षि व्यास विरचित एकदंत स्तोत्र अथवा पावन गणेश अथर्वशीर्ष का शुद्ध उच्चारण के साथ पाठ करें।
  • प्रत्येक बुधवार को भगवान गणेश को बेसन के मोदक अथवा शुद्ध घी में बने लड्डुओं का भोग लगाएं और उस प्रसाद को स्वयं ग्रहण करने से पूर्व छोटे बालकों में आदरपूर्वक वितरित करें।
  • जातक को अपनी शारीरिक अवस्था और योग्य ज्योतिर्विद के परामर्श के अनुसार चार मुखी अथवा पांच मुखी नेपाली रुद्राक्ष पीले रेशमी धागे में पिरोकर बुधवार अथवा गुरुवार को धारण करना चाहिए।
  • प्रत्येक बुधवार को किसी निर्धन विद्यार्थी अथवा अनाथालय में पुस्तकें कलम और पठन पाठन की सामग्री का दान करें तथा गाय को हरी घास व भीगे हुए चने खिलाएं।

एकदंत साधना और विद्या अर्जन के शास्त्रीय नियम

क्या अवश्य करें किन गलतियों से सर्वथा दूर रहें
प्रतिदिन प्रातः काल उठकर अपने माता पिता और शिक्षकों का आदरपूर्वक नमन करें अपने ज्ञान बुद्धि पद अथवा परीक्षा परिणामों का कभी भी घमंड न करें
भगवान एकदंत को सदैव ताजी हरी दूर्वा पीले पुष्प और शुद्ध मोदक अर्पित करें किसी भी निर्बल मंदबुद्धि अथवा अज्ञानी व्यक्ति का कभी उपहास न उड़ाएं
बुधवार और गुरुवार के दिन पूर्ण स्वच्छता ब्रह्मचर्य और सात्विक आहार लें तामसिक भोजन मदिरा और किसी भी प्रकार के नशीले पदार्थों से सर्वथा दूर रहें
अपनी विद्या और ज्ञान का उपयोग सदैव समाज की भलाई और सेवा में करें किसी के साथ व्यर्थ कुतर्क करने अथवा असत्य बोलने से सर्वथा बचें
पूजा में शुद्ध पीले चंदन तांबे अथवा पीतल के बर्तन और गाय के घी का प्रयोग करें बिना स्नान किए अथवा अशुद्ध अवस्था में पुस्तकों अथवा कलम को पैर न लगाएं

परम विनम्रता और आध्यात्मिक चेतना का प्रकाश

भगवान एकदंत का पावन अवतार संपूर्ण मानव जाति को यह सनातन शिक्षा प्रदान करता है कि सच्चा ज्ञान वही है जो मनुष्य को विनीत बनाए। विद्या ददाति विनयं की अमर उक्ति भगवान एकदंत के चरित्र में साक्षात साकार होती है। मदासुर का वध यह सिद्ध करता है कि घमंड चाहे तपस्या का हो धन का हो अथवा विद्या का हो उसका अंत अत्यंत लज्जाजनक होता है। अपने एक दांत का बलिदान देकर परशुराम के अस्त्र का मान रखना हमें सिखाता है कि पारिवारिक मर्यादा और बड़ों का आदर अपने व्यक्तिगत अभिमान से कहीं अधिक मूल्यवान होता है। बुध की तीक्ष्ण बुद्धि जब गुरु के पावन विवेक में विलीन हो जाती है तब मनुष्य इस संसार में रहते हुए भी जीवनमुक्त हो जाता है। भगवान एकदंत का नित्य स्मरण मनुष्य के जीवन से समस्त बौद्धिक अहंकार ग्रह दोषों और अज्ञान को समाप्त करके उसे एक तेजस्वी विनम्र और ज्ञानी व्यक्तित्व बनाकर अंततः परम शांति की प्राप्ति कराता है।

FAQ

भगवान गणेश ने एकदंत अवतार किस मुख्य असुर के संहार हेतु लिया था? भगवान गणेश ने महर्षि च्यवन के तपोबल के मद से उत्पन्न दैत्य मदासुर के अहंकार को तोड़ने और उसका दमन करने हेतु एकदंत अवतार धारण किया था।

भगवान गणेश का एक दांत किस महान ऋषि के अस्त्र से खंडित हुआ था? भगवान गणेश का बायां दांत महर्षि परशुराम द्वारा चलाए गए भगवान शिव के पावन अस्त्र फरसे का मान रखने हेतु प्रहार झेलने से खंडित हुआ था।

भगवान एकदंत का वाहन मूषक किस आध्यात्मिक सत्य का प्रतीक है? मूषक निरंतर कुतरने वाली चंचल तार्किक बुद्धि का प्रतीक है जिसे भगवान ने अपने नियंत्रण में रखकर परम विनम्रता का संदेश दिया है।

ज्योतिष में भगवान एकदंत का संबंध किन प्रमुख ग्रहों से माना जाता है? वैदिक ज्योतिष में भगवान एकदंत का सीधा संबंध बुद्धि के कारक बुध ग्रह और ज्ञान व विवेक के अधिपति देवगुरु बृहस्पति के समन्वय से माना जाता है।

बौद्धिक अहंकार को समाप्त कर विद्या सिद्धि पाने हेतु किस पाठ को सर्वोत्तम माना गया है? बौद्धिक अहंकार से मुक्ति पाने और विद्या में सफलता हेतु प्रतिदिन प्रातः काल पावन एकदंत स्तोत्र और गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

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लेखक

पं. सुव्रत शर्मा

पं. सुव्रत शर्मा (63)


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