गजानन अवतार और लोभासुर संहार क्या?

By पं. अभिषेक शर्मा

कुबेर का मान मर्दन लोभासुर संहार और बुध गुरु के दुर्लभ समन्वय का संपूर्ण वैदिक रहस्य

भगवान गजानन अवतार कथा और लोभासुर संहार

गजानन पूजन मुहूर्त और शास्त्रीय विधान

सनातन वैदिक परंपरा और गणेश पुराण के पावन दर्शन में आद्यावतार के रूप में पूजित भगवान श्री गणेश का गजानन स्वरूप मानव चेतना के सबसे कपटी विकार अर्थात लोभ और असीमित लालच के समूल नाश तथा परम संतोष की पुनर्स्थापना का सर्वोच्च शिखर है। वैदिक ज्योतिष तथा तत्व विज्ञान के अंतर्गत व्यापार गणना और बुद्धि के अधिपति बुध देव के तीक्ष्ण ज्ञान तथा धर्म विस्तार और सात्विक संतोष के अधिपति देवगुरु बृहस्पति के दुर्लभ समन्वय को जाग्रत करने के लिए भगवान गजानन की उपासना को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जब जातक की जन्म कुंडली में द्वितीय भाव धन कोष भाव अथवा एकादश भाव लाभ भाव पाप ग्रहों से पीड़ित होकर व्यक्ति को अंधी तृष्णा असंतोष जमाखोरी अथवा सट्टेबाजी के दलदल में धकेल रहा हो तब गजमुख धारी भगवान गजानन की शरण में जाने से अमोघ संतुष्टि और स्थायी समृद्धि की प्राप्ति होती है। भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी गणेश चतुर्थी पौष संकष्टी चतुर्थी अथवा प्रत्येक मास के शुक्ल पक्ष के बुधवार और गुरुवार के पावन अनुष्ठान का संपूर्ण शास्त्रीय विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।

शास्त्रीय आयाम अनुष्ठान विवरण और ज्योतिषीय मान्यता
प्रमुख पावन तिथि भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी अथवा प्रत्येक बुधवार व गुरुवार
दैनिक पूजन समय प्रातः कालीन सूर्योदय वेला अथवा मध्याह्न काल
अधिष्ठाता स्वरूप विशाल गज मस्तक वाले मूषक पर विराजमान पाश अंकुश मोदक और अभय मुद्रा धारी गजानन
ज्योतिषीय ग्रह व भाव संबंध द्वितीय भाव एकादश भाव द्वादश भाव वाणी व व्यापार कारक बुध और संतोष कारक गुरु
मुख्य पूजन सामग्री 21 दूर्वा दल पीले पुष्प शुद्ध पीला चंदन भुने हुए धान बेसन के मोदक और गाय का घी
प्रधान वैदिक अनुष्ठान गजानन स्तोत्र पाठ गणेश अथर्वशीर्ष और ॐ गं गजाननाय नमः जप
अपेक्षित फल लोभ व असीमित तृष्णा का नाश बुध गुरु दोष शांति आर्थिक स्थिरता और आत्मिक संतोष

कुबेर का धन मद और लोभासुर का प्राकट्य

गणेश पुराण के क्रीड़ा खंड में वर्णित अत्यंत पावन इतिहास के अनुसार प्राचीन काल में देवाधिदेव भगवान शिव की कृपा से यक्षराज कुबेर को संपूर्ण ब्रह्मांड की धन संपदा निधियों और रत्नों का अधिपति बनाया गया था। समस्त लोकों का कोषाध्यक्ष बनने के पश्चात कुबेर के अंतःकरण में धीरे धीरे अपनी अकूत संपदा का सूक्ष्म अहंकार जाग्रत होने लगा। कुबेर विचार करने लगे कि स्वर्ग के देवता और पृथ्वी के समस्त प्राणी उनके धन के बिना एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकते।

कुबेर के अंतःकरण में उपजे उस धन मद और अधिक से अधिक संपदा बटोरने के लोभ की तरंगों से एकाएक एक अत्यंत भयानक काले वर्ण का दैत्य प्रकट हुआ। चूंकि वह दैत्य धन के देवता के लोभ और असंतोष की अग्नि से उत्पन्न हुआ था अतः उसका नाम लोभासुर रखा गया। सनातन तत्व दर्शन में लोभ का अर्थ होता है प्राप्त वस्तुओं से कभी संतुष्ट न होना और दूसरों की संपदा को हड़पने की निरंतर जलने वाली अंधी भूख।

लोभासुर जन्म लेते ही दैत्यगुरु शुक्राचार्य की शरण में पहुंचा। दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने उसके भीतर जल रही लालच की तीव्र ज्वाला को देखकर उसे देवाधिदेव भगवान शिव की कठोर तपस्या करने का निर्देश दिया। लोभासुर ने घने वन में जाकर सहस्रों वर्षों तक निराहार रहकर पंचाग्नि तप किया।

उसकी दुष्कर साधना से संतुष्ट होकर जब भगवान शिव प्रकट हुए तब लोभासुर ने अत्यंत धूर्तता पूर्वक यह वरदान मांग लिया कि वह तीनों लोकों में किसी भी देवता दानव यक्ष गंधर्व अथवा अस्त्र शस्त्र से कभी पराजित न हो सके। भगवान शिव से अजेयता का वरदान प्राप्त करते ही लोभासुर का लालच अनियंत्रित हो गया।

  • लोभासुर ने एक विशाल आसुरी सेना एकत्र की और सर्वप्रथम स्वर्ग लोक पर आक्रमण कर दिया।
  • देवराज इंद्र वरुण यम और सूर्य जैसे लोकपाल उसके वरदान जनित बल के सम्मुख टिक न सके और स्वर्ग छोड़कर भाग खड़े हुए।
  • लोभासुर ने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया और संपूर्ण ब्रह्मांड में लालच और असंतोष की महामारी फैला दी।
  • संसार के मनुष्य अपने नैतिक मूल्यों को भूलकर केवल धन संपदा और स्वर्ण के संचय में अंधे हो गए।
  • व्यापारियों ने छल कपट आरंभ कर दिया राजाओं ने प्रजा का शोषण शुरू किया और संपूर्ण पृथ्वी से संतोष धर्म और दान की भावना पूरी तरह लुप्त हो गई।

ऋषियों की पुकार और गजानन अवतार का प्राकट्य

जब लोभासुर के आतंक से संपूर्ण चराचर जगत में त्राहिमाम मच गया और मनुष्य अपनी भूख शांत करने के लिए एक दूसरे के प्राण लेने लगे तब समस्त देवता और ऋषि मुनि महर्षि रैभ्य की शरण में पहुंचे। महर्षि रैभ्य ने दिव्य दृष्टि से देखा कि लोभासुर वास्तव में मनुष्य के अंतःकरण का वह लालच है जिसे तलवार अथवा बाण से नहीं काटा जा सकता क्योंकि लोभ केवल परम ज्ञान और विवेक द्वारा ही शांत किया जा सकता है।

महर्षि रैभ्य ने समस्त देवताओं को उपदेश दिया कि केवल साक्षात आदिदेव भगवान श्री गणेश ही अपने गजानन अवतार द्वारा इस दैत्य का मान मर्दन कर सकते हैं। महर्षि ने देवताओं को गजानन के पावन बीज मंत्र का उपदेश दिया।

समस्त देवताओं ने एक पवित्र वन में बैठकर सहस्रों वर्षों तक निराहार रहकर गजानन मंत्र का सस्वर अनुष्ठान आरंभ किया। देवताओं की उस निष्कपट साधना से संतुष्ट होकर भगवान गणेश अपने चतुर्थ प्रमुख अवतार के रूप में गजानन स्वरूप में प्रकट हुए।

भगवान गजानन का स्वरूप अत्यंत भव्य और शांत था। उनका मुख एक विशाल और परम पवित्र हाथी का था जिनके कान सूप के समान बड़े और नेत्र ज्ञान की गहराई से परिपूर्ण थे। उनके चार हाथ थे जिनमें पाश अंकुश मोदक और अभय मुद्रा सुशोभित थी।

भगवान गजानन के प्राकट्य के साथ ही अंतरिक्ष से शीतल अमृत की वर्षा होने लगी जिससे संपूर्ण चराचर जगत में फैली हुई लालच की तपन शांत होने लगी। देवताओं ने हाथ जोड़कर गजानन के पावन चरणों में साष्टांग प्रणाम किया और उनसे संसार को लोभासुर के बंधन से मुक्त कराने की प्रार्थना की।

क्या गज मस्तक असीमित ज्ञान और विवेक का प्रतीक है?

सनातन शाक्त और गाणपत्य दर्शन में भगवान गणेश का हाथी वाला सिर अर्थात गज मस्तक मात्र एक रूपात्मक चित्रण नहीं है अपितु वह अद्वैत वेदांत का परम वैज्ञानिक संदेश है। हाथी संपूर्ण प्राणी जगत में सबसे विशालकाय बुद्धिमान और शांत प्राणी माना जाता है।

हाथी का विशाल मस्तक यह दर्शाता है कि ज्ञानी पुरुष का मस्तिष्क विचारों की संकीर्णता से मुक्त होकर आकाश के समान विशाल होना चाहिए। हाथी के बड़े कान यह सिखाते हैं कि मनुष्य को संसार की बातों को अधिक सुनना चाहिए और अपने सूप जैसे कानों से व्यर्थ की बातों को उड़ाकर केवल सार तत्व को ही ग्रहण करना चाहिए।

  • हाथी की छोटी आंखें अंतर्मुखी दृष्टि और एकाग्रता का प्रतीक हैं जो यह सिखाती हैं कि बाहर भटकने के स्थान पर अपने भीतर झांकना चाहिए।
  • हाथी की लंबी सूंड अत्यंत संवेदनशील और बलशाली होती है जो भारी वृक्ष के तने को भी उखाड़ सकती है और भूमि पर गिरी छोटी सी सुई को भी उठा सकती है।
  • यह सूंड इस बात का प्रमाण है कि आध्यात्मिक पुरुष को सांसारिक व्यवहार और सूक्ष्म आत्म तत्व दोनों में समान रूप से निपुण होना चाहिए।
  • हाथी कभी अनावश्यक संग्रह नहीं करता वह जंगल में रहकर अपनी तात्कालिक भूख शांत करता है और भविष्य की चिंता में लोभ नहीं करता।
  • भगवान गजानन का यह गज रूप मनुष्य को यह परम उपदेश देता है कि सच्चा सुख वस्तुओं को बटोरने में नहीं अपितु मन को शांत और संतुष्ट रखने में है।

लोभासुर का मान मर्दन और शरणागति

जब लोभासुर को ज्ञात हुआ कि देवता गजानन नामक महाशक्ति के साथ उसका अंत करने आ रहे हैं तब उसने क्रोध में भरकर अपनी विशाल सेना को युद्ध भूमि में उतार दिया। लोभासुर ने भगवान गजानन पर प्रलयंकारी मायावी बाणों और शूलों की वर्षा आरंभ कर दी।

भगवान गजानन मंद मुस्कान के साथ अपने स्थान पर अडिग खड़े रहे। लोभासुर द्वारा चलाए गए समस्त अस्त्र शस्त्र भगवान के पावन आभा मंडल से टकराकर पुष्पों की भांति भूमि पर गिरने लगे। इसके पश्चात भगवान गजानन ने अपने दाहिने हाथ में स्थित पाश को घुमाकर अंतरिक्ष में फेंका।

वह पाश विद्युत की गति से घूमता हुआ सीधे लोभासुर के गले में लिपट गया। जैसे ही उस पावन पाश का स्पर्श हुआ लोभासुर के अंतःकरण से जन्मों का अज्ञान और लालच का नशा एक ही क्षण में उतर गया।

  • लोभासुर ने देखा कि भगवान गजानन के मुख में संपूर्ण ब्रह्मांड सूर्य चंद्रमा और समस्त खजाने पहले से ही समाए हुए हैं।
  • दैत्य को यह आत्मबोध हुआ कि जिस धन और साम्राज्य के लिए वह भटक रहा था वह तो परमात्मा की माया का एक छोटा सा खेल मात्र है।
  • लोभासुर का समस्त अहंकार गलकर पानी हो गया और उसने अपने अस्त्र शस्त्र फेंक दिए।
  • वह कांपते हुए भगवान गजानन के पावन चरणों में साष्टांग गिर पड़ा और अश्रु बहाते हुए क्षमा मांगने लगा।
  • दयामयी भगवान गजानन ने उस पर अपना वरद हस्त रखा और उसे अभय दान दिया तथा उसे पाताल लोक में जाकर धर्मपूर्वक निवास करने की आज्ञा दी।

क्या कुबेर की दावत से टूटा धन का अहंकार?

लोभासुर के संहार के पश्चात भी धन के स्वामी कुबेर के मन में छिपा हुआ सूक्ष्म अहंकार पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था। कुबेर अपनी राजधानी अलकापुरी के वैभव का प्रदर्शन करने हेतु देवाधिदेव भगवान शिव और माता पार्वती को एक भव्य भोज पर आमंत्रित करने कैलास पर्वत पहुंचे।

भगवान शिव कुबेर के मन में छिपे उस प्रदर्शनकारी अहंकार को भलीभांति जानते थे। भगवान शिव ने मुस्कुराते हुए कहा कि हे कुबेर मैं और पार्वती कैलास छोड़कर कहीं नहीं जाते किंतु हमारा छोटा पुत्र गणेश तुम्हारी दावत में अवश्य जाएगा और तुम उसे भरपेट भोजन करा देना।

कुबेर अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने सोचा कि एक छोटे से बालक को भोजन कराना उनके लिए कौन सी बड़ी बात है। नियत दिन पर बालक गणेश अकेले ही अलकापुरी पहुंचे। कुबेर ने रत्नजड़ित स्वर्ण थालों में छप्पन भोग परोसकर गणेश जी का आदर सत्कार किया।

बालक गणेश ने भोजन करना आरंभ किया। वे एक ही ग्रास में सहस्रों थालियां समाप्त करने लगे। देखते ही देखते कुबेर के रसोइयों द्वारा बनाया गया समस्त भोजन समाप्त हो गया। गणेश जी ने कहा कि मुझे अभी और भूख लगी है तुरंत भोजन लाओ।

  • कुबेर ने अपने नगर के समस्त अन्न भंडारों को खाली करवा दिया किंतु गणेश जी की भूख शांत नहीं हुई।
  • गणेश जी ने राजमहल के स्वर्ण पात्र अनाज की बोरियां फल मेवे और वस्त्र तक खाना आरंभ कर दिया।
  • अंत में जब नगर का समस्त अन्न समाप्त हो गया तो गणेश जी ने दहाड़ते हुए कहा कि यदि मुझे भोजन नहीं मिला तो मैं कुबेर तुम्हें ही खा जाऊंगा।
  • भय से थर थर कांपते हुए कुबेर अपने प्राण बचाने हेतु नंगे पैर कैलास की ओर दौड़े और भगवान शिव के चरणों में गिरकर रोने लगे।
  • भगवान शिव ने मंद मुस्कान के साथ कुबेर को हाथ में एक चुटकी भुने हुए धान दिए और कहा कि इसे पूर्ण श्रद्धा और प्रेम से जाकर गणेश को खिला दो।

कुबेर दौड़ते हुए वापस अलकापुरी आए। उन्होंने अपने समस्त धन और वैभव का अभिमान त्यागकर अत्यंत विनीत भाव से वह एक चुटकी भुना हुआ धान बालक गणेश के मुख में समर्पित किया।

वह एक चुटकी अन्न ग्रहण करते ही भगवान गणेश की भूख तत्क्षण शांत हो गई और उन्होंने तृप्ति की डकार ली। कुबेर लज्जा से नतमस्तक हो गए और उन्हें यह बोध हुआ कि संसार का संपूर्ण सोना चांदी भी ईश्वर की भूख शांत नहीं कर सकता भगवान केवल प्रेम और विनम्रता के भूखे हैं।

बुध और गुरु का संतुलन तथा ज्योतिषीय मर्म

वैदिक ज्योतिष के महानतम ग्रंथ बृहत् पराशर होरा शास्त्र में जन्म कुंडली के धन भावों और ग्रहों के परस्पर प्रभाव का अत्यंत विस्तृत विश्लेषण मिलता है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से भगवान गजानन का स्वरूप सीधे तौर पर बुध देव और देवगुरु बृहस्पति के उस परम संतुलन का प्रतिनिधित्व करता है जो मनुष्य को असीमित तृष्णा से मुक्त करता है।

बुध ग्रह ज्योतिष में व्यापार गणना तर्क बुद्धि और लेन देन का कारक है। जब बुध पर पाप प्रभाव होता है तो व्यक्ति केवल लाभ और हानि की संकीर्ण मानसिकता में जीता है। वहीं दूसरी ओर देवगुरु बृहस्पति ज्ञान धर्म त्याग और आंतरिक संतोष के अधिपति हैं।

जब कुंडली में बुध बलवान हो किंतु गुरु निर्बल हो तो मनुष्य एक चतुर व्यापारी तो बन जाता है किंतु उसके भीतर लोभ की आग जलती रहती है। वह कितना भी धन कमा ले उसे कभी संतुष्टि नहीं मिलती।

  • जन्म कुंडली का द्वितीय भाव धन संग्रह कुटुंब और वाणी का स्थान होता है।
  • जन्म कुंडली का एकादश भाव लाभ नियमित आय और समस्त भौतिक कामनाओं का केंद्र होता है।
  • जन्म कुंडली का द्वादश भाव व्यय दान त्याग और मोक्ष का स्थान माना जाता है।
  • जब द्वितीय और एकादश भाव पर राहु अथवा वक्री शनि का क्रूर प्रभाव होता है तो जातक सट्टेबाजी शेयर बाजार अथवा अनैतिक तरीकों से धन कमाने के लोभ में अपनी जमा पूंजी गंवा बैठता है।
  • भगवान गजानन की साधना बुध की व्यावहारिक बुद्धि को गुरु के सात्विक संतोष से जोड़ देती है जिससे जातक को अपने पुरुषार्थ से अर्जित धन में परम शांति का अनुभव होता है।

क्या गजानन साधना से असीमित तृष्णा शांत होती है?

आधुनिक युग में मानव समाज की सबसे बड़ी मानसिक बीमारी यह है कि मनुष्य के पास आवश्यकता से अधिक होने के उपरांत भी वह निरंतर और अधिक पाने की अंधी दौड़ में भाग रहा है। क्रेडिट कार्ड महंगे गैजेट्स और दिखावे की संस्कृति ने प्रत्येक व्यक्ति के भीतर एक छोटा सा लोभासुर जीवित कर दिया है।

भगवान गजानन साक्षात उस आत्मिक अमृत के प्रदाता हैं जो चित्त की इस तृष्णा को शांत कर देते हैं। जिस प्रकार एक चुटकी भुने हुए अन्न से गणेश जी तृप्त हो गए थे उसी प्रकार जो साधक नित्य गजानन स्तोत्र का पाठ करता है उसके भीतर संतोष रूपी महाधन प्रकट हो जाता है।

यह साधना मनुष्य को यह सिखाती है कि धन जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन है वह स्वयं जीवन का साध्य नहीं है। जब मनुष्य के भीतर से लोभ समाप्त होता है तब उसकी बुद्धि निर्मल होती है और उसे व्यापार तथा कार्यक्षेत्र में वास्तविक प्रगति और समाज में आदर प्राप्त होता है।

तृष्णा मुक्ति और बुध गुरु संतुलन के अचूक वैदिक उपाय

यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में बुध और गुरु पीड़ित हों व्यापार में घाटे के भय से मन अशांत रहता हो अथवा अनियंत्रित खर्चों से संचित पूंजी नष्ट हो रही हो तो शास्त्रों में भगवान गजानन की प्रसन्नता हेतु अत्यंत प्रामाणिक वैदिक उपाय बताए गए हैं।

  • प्रत्येक बुधवार अथवा संकष्टी चतुर्थी के दिन प्रातः काल स्नान के उपरांत पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें और भगवान गजानन के चित्र अथवा विग्रह के सम्मुख शुद्ध गाय के घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  • भगवान गजानन को 21 दूर्वा दल गंगाजल से धोकर अर्पित करें और पीले कनेर के पुष्प चढ़ाएं तथा पावन बीज मंत्र ॐ गं गजाननाय नमः अथवा ॐ एकदंताय विद्महे वक्रतुंडाय धीमहि तन्नो दंती प्रचोदयात् का कम से कम 108 बार शांत मन से जाप करें।
  • अपने घर से लोभ और दरिद्रता को समाप्त करने हेतु प्रतिदिन प्रातः काल स्नान के उपरांत गणेश अथर्वशीर्ष अथवा संकट नाशन गणेश स्तोत्र का शुद्ध उच्चारण के साथ पाठ करें।
  • प्रत्येक बुधवार को भगवान गजानन को बेसन के मोदक अथवा थोड़ी सी भुनी हुई धानी अर्पित करें और उस प्रसाद को परिवार के सदस्यों में प्रेमपूर्वक वितरित करें।
  • जातक को अपनी शारीरिक अवस्था और योग्य ज्योतिर्विद के परामर्श के अनुसार चार मुखी अथवा पांच मुखी नेपाली रुद्राक्ष पीले रेशमी धागे में पिरोकर बुधवार अथवा गुरुवार के दिन धारण करना चाहिए।
  • प्रत्येक बुधवार को गाय को हरी दूर्वा अथवा हरा चारा खिलाएं तथा किसी निर्धन विद्यार्थी अथवा अनाथालय में पठन पाठन की सामग्री और फलों का आदरपूर्वक दान करें।

गजानन आराधना और जीवन शुद्धि के शास्त्रीय नियम

क्या अवश्य करें किन गलतियों से सर्वथा दूर रहें
प्रतिदिन प्रातः काल उठकर अपने भाग्य और प्राप्त संसाधनों के प्रति कृतज्ञ रहें दूसरों की संपदा अथवा प्रगति को देखकर कभी भी मन में लोभ न लाएं
भगवान गजानन को सदैव ताजी हरी दूर्वा पीले पुष्प और शुद्ध मोदक अर्पित करें व्यापार अथवा दैनिक जीवन में किसी के साथ कभी भी छल कपट न करें
बुधवार और चतुर्थी के दिन पूर्ण स्वच्छता ब्रह्मचर्य और सात्विक आहार लें सट्टेबाजी जुआ और किसी भी प्रकार के अनैतिक धनार्जन से सर्वथा दूर रहें
अपनी आय का दसवां अंश सदैव धर्म गौ सेवा और निर्धनों की सहायता में लगाएं अपने धन आभूषण अथवा बैंक बैलेंस का समाज में कभी भी झूठा प्रदर्शन न करें
पूजा में शुद्ध पीले चंदन पीतल के बर्तन और गाय के घी का ही प्रयोग करें बिना स्नान किए अथवा अशुद्ध अवस्था में पूजा के स्थान पर जाने से बचें

असीम संतोष और आत्मिक शांति का दिव्य प्रकाश

भगवान गजानन का पावन अवतार संपूर्ण मानव जाति को यह सनातन शिक्षा प्रदान करता है कि इस संसार में सबसे बड़ा धन संतोष है। गोधन गजधन बाजिधन और रतनधन खान जब आवै संतोष धन सब धन धूरि समान। लोभासुर का मर्दन यह सिद्ध करता है कि लालच का साम्राज्य चाहे कितना भी विशाल क्यों न हो अंततः वह आत्मा को पतन की ओर ही ले जाता है। कुबेर का मान मर्दन यह सिखाता है कि परमात्मा के सम्मुख हमारे भौतिक खजाने तिनके के समान भी नहीं हैं वहां केवल हृदय का निर्मल प्रेम ही स्वीकार्य होता है। बुध की तीक्ष्ण गणना जब गुरु के दिव्य संतोष में विलीन हो जाती है तब मनुष्य इस पृथ्वी पर रहते हुए भी जीवनमुक्त हो जाता है। भगवान गजानन का नित्य स्मरण मनुष्य के जीवन से समस्त लोभ तृष्णा और ग्रह दोषों को समाप्त करके उसे एक शांत सुखी और सम्मानित व्यक्तित्व बनाकर अंततः परम पद की प्राप्ति कराता है।

FAQ

भगवान गणेश ने गजानन अवतार किस मुख्य असुर के संहार हेतु लिया था? भगवान गणेश ने धन के अधिपति कुबेर के लोभ से उत्पन्न दैत्य लोभासुर का अहंकार तोड़ने और उसका दमन करने हेतु गजानन अवतार धारण किया था।

लोभासुर का प्राकट्य किस देवता के लोभ से हुआ था? लोभासुर का प्राकट्य धन के कोषाध्यक्ष यक्षराज कुबेर के अंतःकरण में अपनी अकूत संपदा के प्रति उपजे अहंकार और लोभ की तरंगों से हुआ था।

भगवान गजानन ने कुबेर के घर जाकर क्या लीला की थी? भगवान गजानन ने बालक रूप में अकेले जाकर कुबेर के महलों का समस्त अन्न भंडार खा लिया और एक चुटकी भुने धान से तृप्त होकर कुबेर का मान मर्दन किया।

ज्योतिष में भगवान गजानन का संबंध किन प्रमुख ग्रहों से माना जाता है? वैदिक ज्योतिष में भगवान गजानन का सीधा संबंध व्यापार व बुद्धि के कारक बुध ग्रह और ज्ञान व संतोष के कारक देवगुरु बृहस्पति के दुर्लभ समन्वय से है।

असीमित तृष्णा और लोभ से मुक्ति पाने हेतु किस मंत्र का जाप सर्वोत्तम है? मन को शांत करने और लोभ से मुक्ति पाने हेतु प्रतिदिन प्रातः काल ॐ गं गजाननाय नमः अथवा गणेश अथर्वशीर्ष का 108 बार जाप करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

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लेखक

पं. अभिषेक शर्मा

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