By अपर्णा पाटनी
पुष्कर महायज्ञ सावित्री का विलंब चौबीस अक्षर और सूर्य के आत्मबल का संपूर्ण वैदिक रहस्य

सनातन वैदिक परंपरा और ऋग्वैदिक संहिताओं के परम पावन दर्शन में साक्षात वेदों की जननी संपूर्ण मंत्र शक्ति की अधिष्ठात्री और समस्त चराचर जगत को चैतन्य प्रदान करने वाली माता गायत्री का प्राकट्य आत्मिक जागरण बुद्धि के शोधन और सूर्य मंडल के दिव्य आलोक का सर्वोच्च शिखर है। वैदिक ज्योतिष तथा तत्व विज्ञान के अंतर्गत सौरमंडल के अधिपति आत्मा के कारक भगवान सूर्य नारायण के समस्त दोषों को शांत करने तथा प्रथम भाव लग्न भाव और पंचम भाव बुद्धि भाव को जाग्रत करने के लिए माँ गायत्री की साधना को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जब जातक की जन्म कुंडली में सूर्य ग्रह नीच राशि तुला में स्थित हो राहु अथवा केतु से आक्रांत होकर ग्रहण दोष बना रहा हो अथवा शनि की कुदृष्टि से पीड़ित होकर आत्मविश्वास का अभाव हृदय रोग नेत्र विकार और अपयश उत्पन्न कर रहा हो तब सूर्य मंडल की प्राण शक्ति माँ गायत्री की शरण में जाने से अमोघ तेज और अडिग आत्मबल की प्राप्ति होती है। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि गायत्री जयंती श्रावण पूर्णिमा अथवा प्रत्येक दिन त्रिकाल संध्या के पावन अनुष्ठान का संपूर्ण शास्त्रीय विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।
| शास्त्रीय आयाम | अनुष्ठान विवरण और ज्योतिषीय मान्यता |
|---|---|
| प्रमुख पावन तिथि | ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी गायत्री जयंती अथवा श्रावण पूर्णिमा |
| दैनिक पूजन समय | प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व मध्याह्न काल और सायंकाल सूर्यास्त वेला |
| अधिष्ठाता स्वरूप | पंचमुखी कमल पुष्प पर आसीन हंस वाहिनी शंख चक्र गदा और वरद मुद्रा धारिणी माँ गायत्री |
| ज्योतिषीय ग्रह व भाव संबंध | प्रथम भाव पंचम भाव नवम भाव आत्मा कारक सूर्य देव और रोहिणी व हस्त नक्षत्र |
| मुख्य पूजन सामग्री | शुद्ध गाय का घी लाल व पीले पुष्प शुद्ध रक्त चंदन कुश का आसन और तांबे का पात्र |
| प्रधान वैदिक अनुष्ठान | गायत्री महामंत्र जप गायत्री सहस्रनाम और ऋग्वैदीय गायत्री स्तोत्र पाठ |
| अपेक्षित फल | सूर्य नीच दोष शांति प्रखर आत्मबल बुद्धि शुद्धि तेजस्विता और मोक्ष सिद्धि |
पद्म पुराण के अत्यंत पावन सृष्टि खंड और ब्रह्म पुराण के अनुसार सृष्टि के आरंभिक कालखंड में परमपिता ब्रह्मा जी ने पृथ्वी पर धर्म की पुनर्स्थापना और आसुरी शक्तियों के प्रभाव को समाप्त करने हेतु राजस्थान के पावन तीर्थ पुष्कर में एक विशाल महायज्ञ आयोजित करने का संकल्प लिया। उस महायज्ञ की वेदी पर समस्त देवता सप्तर्षि गंधर्व और दिक्पाल अपने अपने पावन स्थानों पर विराजमान हो चुके थे।
शास्त्रों का यह अखंड विधान है कि कोई भी धार्मिक यज्ञ अथवा वैदिक अनुष्ठान तब तक पूर्ण फल प्रदान नहीं कर सकता जब तक यजमान अपनी धर्मपत्नी के साथ यज्ञ वेदी पर न बैठे। जब यज्ञ आरंभ करने का अत्यंत दुर्लभ और शुभ मुहूर्त समीप आया तब ब्रह्मा जी ने अपने पुरोहितों को अपनी प्रथम अर्धांगिनी माता सावित्री को आदरपूर्वक बुलाने का आदेश दिया।
दूतों ने जब जाकर माता सावित्री को यज्ञ के समय की सूचना दी तब सावित्री जी ने कहा कि वे अभी अपने श्रृंगार में व्यस्त हैं और लक्ष्मी पार्वती व इंद्राणी जैसी देवियों के आगमन की प्रतीक्षा कर रही हैं अतः वे उनके साथ ही यज्ञ मंडप में पधारेंगी।
दूतों ने लौटकर ब्रह्मा जी को यह संदेश दिया। उधर यज्ञ का परम पावन नक्षत्र और मुहूर्त निरंतर बीत रहा था। महर्षि भृगु और ऋषियों ने व्याकुल होकर कहा कि हे प्रजापति यदि यह मुहूर्त निकल गया तो इस महायज्ञ का संपूर्ण फल निष्फल हो जाएगा और तीनों लोकों में भारी अनिष्ट फैल जाएगा अतः आप तत्काल किसी अन्य कन्या के साथ विवाह कर इस अनुष्ठान को पूर्ण करें।
ब्रह्मा जी ने गंधर्व विवाह की शास्त्रीय विधि से माँ गायत्री का पाणिग्रहण किया और उन्हें अपने दक्षिण भाग में बैठाकर यज्ञ की पूर्णाहुति संपन्न की। जब यज्ञ संपन्न हो चुका तब माता सावित्री अन्य देवियों के साथ वहां पहुंचीं। अपने स्थान पर एक अन्य स्त्री को बैठा देखकर सावित्री जी भीषण क्रोध से जल उठीं और उन्होंने ब्रह्मा जी सहित समस्त देवताओं को शाप दे दिया। किंतु अंततः भगवान विष्णु और महर्षियों की स्तुति से शांत होकर उन्होंने गायत्री को स्वीकार किया और उन्हें समस्त वेदों की माता के रूप में प्रतिष्ठित किया।
सनातन वैदिक वांग्मय में गायत्री महामंत्र को समस्त मंत्रों का राजा और साक्षात ब्रह्म का साक्षात वाचक माना गया है। ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्। इस पावन मंत्र में विद्यमान 24 अक्षर मात्र व्याकरण के वर्ण नहीं हैं अपितु वे संपूर्ण चराचर ब्रह्मांड के 24 मूल तत्वों और भगवान श्री हरि विष्णु के 24 अवतारों के दिव्य बीज रूप हैं।
सांख्य दर्शन के अनुसार प्रकृति के 24 तत्व होते हैं जिनमें पांच महाभूत पांच तन्मात्राएं पांच ज्ञानेंद्रियां पांच कर्मेंद्रियां मन बुद्धि अहंकार और मूल प्रकृति सम्मिलित हैं। गायत्री मंत्र का प्रत्येक अक्षर मानव शरीर की एक विशिष्ट नाड़ी ग्रंथि को स्पर्श करता है।
वैदिक ज्योतिष के महान आधार ग्रंथ बृहत् पराशर होरा शास्त्र में ग्रहों के आत्मिक और चेतना जनित प्रभावों का अत्यंत सूक्ष्म विश्लेषण मिलता है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से माँ गायत्री साक्षात भगवान सूर्य नारायण की अंतरंग प्राण शक्ति और सविता देव के प्रकाश का सजीव रूप हैं।
सूर्य ग्रह को ज्योतिष में संपूर्ण भचक्र की आत्मा पिता जीवन शक्ति शारीरिक रोग प्रतिरोधक क्षमता और सामाजिक मान प्रतिष्ठा का सर्वोच्च अधिपति माना गया है। जब जन्म कुंडली में सूर्य बली होता है तो मनुष्य के भीतर राजाओं जैसा तेज अडिग निर्णय क्षमता और नेतृत्व करने का अद्भुत सामर्थ्य होता है।
किंतु जब सूर्य ग्रह पीड़ित होता है तो व्यक्ति जीवन भर अपनी योग्यता के अनुसार पहचान पाने के लिए तरसता रहता है।
आधुनिक युग में मनुष्य की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वह बाहर से कितना भी संपन्न क्यों न दिखाई दे भीतर से वह अत्यधिक असुरक्षित भयभीत और कमजोर होता है। छोटी सी असफलता उसे अवसाद में डाल देती है और वह विपरीत परिस्थितियों के सामने घुटने टेक देता है। यह स्थिति सीधे तौर पर आत्मबल की कमी का प्रमाण है जो सूर्य के कमजोर होने से उत्पन्न होती है।
सनातन वैदिक संस्कृति में आत्मबल को पर्वत की भांति दृढ़ बनाने हेतु त्रिकाल संध्या का अचूक विधान दिया गया है। त्रिकाल संध्या का अर्थ है दिन के तीन संधिकालों में माँ गायत्री का ध्यान और जप करना।
जो व्यक्ति प्रतिदिन निष्काम भाव से त्रिकाल संध्या में गायत्री मंत्र की न्यूनतम 1 माला का जप करता है उसके चेहरे पर एक दिव्य आभा छा जाती है। उसका आत्मबल हिमालय की तरह अडिग हो जाता है और संसार का कोई भी भय अथवा विरोधी उसे कभी विचलित नहीं कर सकता।
यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में सूर्य ग्रह निर्बल हो पिता के साथ संबंधों में कटुता हो सरकारी कार्यों में निरंतर अड़चनें आ रही हों अथवा आत्मबल कमजोर रहता हो तो शास्त्रों में माँ गायत्री की प्रसन्नता हेतु अत्यंत प्रामाणिक उपाय बताए गए हैं।
| क्या अवश्य करें | किन गलतियों से सर्वथा दूर रहें |
|---|---|
| प्रतिदिन प्रातः काल उठकर अपने पिता और गुरु के चरणों का स्पर्श कर आशीर्वाद लें | सूर्योदय के समय सोते रहना अथवा दिन में सोना सर्वथा वर्जित रखें |
| गायत्री मंत्र का जप सदैव शुद्ध स्थान पर कुश के आसन पर बैठकर ही करें | कभी भी अपवित्र अशुद्ध अथवा चलते फिरते अवस्था में गायत्री जप न करें |
| साधना के दिनों में पूर्ण स्वच्छता ब्रह्मचर्य और सात्विक आहार का पालन करें | तामसिक भोजन मदिरा मांस और तीखे गरिष्ठ पदार्थों से सर्वथा दूर रहें |
| अपने जीवन में सत्य निष्ठा और नैतिक मर्यादा का सदैव निष्कपट पालन करें | अपने पद अधिकार अथवा बल का किसी निर्बल पर कभी भी दुरुपयोग न करें |
| पूजा में शुद्ध तांबे के बर्तन गाय का घी और रक्त चंदन का ही प्रयोग करें | संध्या वंदन के समय मन में क्रोध ईर्ष्या अथवा वासना के विचार न आने दें |
भगवती गायत्री का पावन अवतार संपूर्ण मानव जाति को यह सनातन शिक्षा प्रदान करता है कि सांसारिक ज्ञान कितना भी विस्तृत क्यों न हो वह तब तक निष्प्राण है जब तक मनुष्य के भीतर आत्मज्ञान का प्रकाश न फैले। पुष्कर के महायज्ञ में उनका प्राकट्य यह सिद्ध करता है कि परमात्मा बाह्य कुल अथवा रूप को नहीं अपितु अंतःकरण की विशुद्ध पवित्रता को स्वीकार करते हैं। 24 अक्षरों की यह महाशक्ति वास्तव में उस अनंत ब्रह्मांडीय चेतना का विस्तार है जो मनुष्य को अज्ञान के गहन अंधकार से निकालकर सत्य के पावन आलोक में प्रतिष्ठित करती है। जब साधक गायत्री महामंत्र की शरण लेता है तो उसकी बुद्धि साक्षात ऋतंभरा बन जाती है जो केवल सत्य और धर्म का ही वरण करती है। सूर्य का दिव्य तेज जब माँ गायत्री के वात्सल्य से जुड़ जाता है तब साधक इस नश्वर संसार में रहते हुए भी जीवनमुक्त हो जाता है। माँ गायत्री का नित्य स्मरण मनुष्य के जीवन से समस्त ग्रह दोषों अकाल मृत्यु के भय और आत्म संशय को समाप्त करके उसे एक तेजस्वी यशस्वी और सम्मानित व्यक्तित्व बनाकर अंततः परम मोक्ष की प्राप्ति कराता है।
माँ गायत्री का प्राकट्य किस पावन तीर्थ पर और किस प्रयोजन हेतु हुआ था? माँ गायत्री का प्राकट्य राजस्थान के पुष्कर तीर्थ में ब्रह्मा जी के महायज्ञ को शुभ मुहूर्त में संपन्न कराने हेतु मुख के पावन तेज से हुआ था।
गायत्री महामंत्र के चौबीस अक्षर किस बात का प्रतिनिधित्व करते हैं? गायत्री मंत्र के 24 अक्षर ब्रह्मांड के 24 मूल तत्वों सांख्य दर्शन और भगवान श्री हरि विष्णु के 24 दिव्य अवतारों के बीज रूप माने जाते हैं।
वैदिक ज्योतिष में माँ गायत्री का संबंध किस प्रमुख ग्रह से माना जाता है? वैदिक ज्योतिष में माँ गायत्री का सीधा संबंध सौरमंडल के अधिपति और आत्मा के कारक भगवान सूर्य नारायण की अंतरंग प्राण शक्ति से माना जाता है।
सूर्य के नीच फल को समाप्त करने हेतु किस साधना को सर्वोत्तम माना गया है? जन्म कुंडली के पीड़ित सूर्य को बली बनाने और आत्मबल को हिमालय सदृश करने हेतु प्रतिदिन त्रिकाल संध्या में गायत्री मंत्र का जप करना सर्वोत्तम माना गया है।
त्रिकाल संध्या के तीन प्रमुख काल कौन से माने गए हैं? प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व का समय मध्याह्न काल दोपहर का समय और सायं काल सूर्यास्त का समय ये तीन संधिकाल त्रिकाल संध्या हेतु निर्धारित हैं।
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