By पं. नीलेश शर्मा
सनकादिक मुनियों के प्रश्नों का समाधान हंस पंचमहापुरुष योग और देवगुरु बृहस्पति का संपूर्ण रहस्य

सनातन वैदिक परंपरा में भगवान श्री हरि विष्णु के अत्यंत पावन ज्ञानात्मक स्वरूप और समस्त योगियों के मार्गदर्शक के रूप में पूजित भगवान हंस का प्राकट्य परम विवेक चित्त शुद्धि और तुरीय चेतना का सर्वोच्च शिखर है। वैदिक ज्योतिष के अंतर्गत ज्ञान और धर्म के कारक देवगुरु बृहस्पति की ऊर्जा को जाग्रत करने कुंडली में हंस पंचमहापुरुष राजयोग के शुभ फलों को सक्रिय करने तथा आकाश तत्व के निर्मल बोध को प्राप्त करने के लिए भगवान हंस की आराधना को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जब जातक की जन्म कुंडली में देवगुरु बृहस्पति दुर्बल होकर विवेक हीनता मानसिक द्वंद्व अथवा आध्यात्मिक भटकाव उत्पन्न करते हैं तब हंस नारायण की शरण में जाने से अंतःकरण में अमोघ ज्ञान का प्रकाश प्रज्वलित होता है। इस पावन अनुष्ठान की तिथि समय और शास्त्रीय घटकों का संपूर्ण विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।
| शास्त्रीय आयाम | अनुष्ठान विवरण और ज्योतिषीय मान्यता |
|---|---|
| प्रमुख पावन तिथि | मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की मोक्षदा एकादशी अथवा गुरु पुष्य योग |
| दैनिक पूजन समय | प्रातः कालीन ब्रह्म मुहूर्त अथवा सूर्योदय से 48 मिनट पूर्व का समय |
| अधिष्ठाता स्वरूप | दुग्ध धवल पंखों से युक्त दिव्य चंचु और शांत नेत्र वाले परमहंस नारायण |
| ज्योतिषीय भाव व ग्रह संबंध | नवम भाव द्वादश भाव देवगुरु बृहस्पति और आकाश तत्व |
| मुख्य पूजन सामग्री | श्वेत पुष्प शुद्ध गाय का कच्चा दूध केसर तुलसी दल और पीत चंदन |
| प्रधान वैदिक अनुष्ठान | हंस गीता पाठ श्रीमद्भागवत एकादश स्कंध स्वाध्याय और ॐ हंसाय नमः जप |
| अपेक्षित फल | चित्त वृत्तियों का निरोध हंस योग की जागृति और सांसारिक बंधनों से मुक्ति |
श्रीमद्भागवत महापुराण के एकादश स्कंध के 13वें अध्याय में भगवान श्री कृष्ण ने उद्धव जी को हंस अवतार की परम पावन और रहस्यमयी कथा का उपदेश दिया था। सृष्टि के आरंभिक काल में जब ब्रह्मा जी के चार मानस पुत्र सनक सनंदन सनातन और सनत्कुमार योग मार्ग के गहनतम रहस्यों पर विचार कर रहे थे तब उनके मन में एक अत्यंत गूढ़ आध्यात्मिक संशय उत्पन्न हुआ। उन्होंने देखा कि मनुष्य का मन स्वाभाविक रूप से संसार के विषयों और गुणों में रमण करता है और सांसारिक विषय भी सूक्ष्म संस्कारों के रूप में मनुष्य के मन में प्रविष्ट हो जाते हैं।
चारों बाल मुनियों ने विचार किया कि जब मन और विषय दोनों एक दूसरे में इस प्रकार गुंथे हुए हैं तो मोक्ष की इच्छा रखने वाला साधक अपने चित्त को इन सांसारिक विषयों से पूर्णतः अलग कैसे कर सकता है। इस कठिन प्रश्न का समाधान पाने के लिए वे अपने पिता परमपिता ब्रह्मा जी की सभा में पहुंचे। ब्रह्मा जी उस समय नई सृष्टि के सृजन और रजोगुणी संकल्पों में व्यस्त थे। ब्रह्मा जी का मन प्रजापति रूपी कार्य में संलग्न होने के कारण वे सनकादिक मुनियों के इस सूक्ष्म और तत्वदर्शी प्रश्न का तत्काल समाधान न कर सके। ब्रह्मा जी का मौन यह सिद्ध करता है कि जब तक बुद्धि कर्म और निर्माण के द्वंद्व में लगी रहती है तब तक वह परम अद्वैत ज्ञान को प्रकट नहीं कर सकती। तब ब्रह्मा जी ने अपने नेत्र बंद किए और जगतपालक भगवान श्री हरि विष्णु का ध्यान आरंभ किया ताकि इस आध्यात्मिक ग्रंथि का भेदन हो सके।
जैसे ही ब्रह्मा जी ने निष्कपट भाव से भगवान नारायण की शरण ली वैसे ही सत्यलोक की दिव्य सभा में एक अत्यंत विस्मयकारी और अलौकिक दृश्य उपस्थित हुआ। संपूर्ण आकाश मंडल से एक दिव्य प्रकाश प्रस्फुटित हुआ और करोड़ों शरद ऋतु के चंद्रमाओं के समान श्वेत कांति वाले एक विशाल हंस का प्राकट्य हुआ। उस हंस के पंख कर्पूर और बर्फ की भांति उज्ज्वल थे उसकी चंचु स्वर्ण के समान दमक रही थी और उसके नेत्र करुणा के अगाध सागर जैसे प्रतीत हो रहे थे। भगवान का यह रूप साक्षात हंस अवतार था।
उस दिव्य हंस के पंखों की फड़फड़ाहट से समस्त वेदों की ऋचाएं स्वतः गुंजायमान होने लगीं। ब्रह्मा जी और सनकादिक मुनियों ने उस दिव्य पक्षी को पहचान लिया और साष्टांग प्रणाम करके उनके चरणों में बैठ गए। मुनियों ने हाथ जोड़कर पूछा कि हे दिव्य स्वरूप आप वास्तव में कौन हैं। भगवान हंस ने एक अत्यंत मधुर और गंभीर वाणी में उपदेश देना आरंभ किया जिसे सनातन दर्शन में हंस गीता कहा जाता है।
भगवान हंस ने कहा कि हे मुनियों यदि तुम्हारा यह प्रश्न मेरी आत्मा के विषय में है तो आत्मा एक अखंड और निर्गुण तत्व है उसमें तुम और मैं का कोई भेद नहीं हो सकता। यदि तुम्हारा प्रश्न इस भौतिक शरीर के विषय में है तो संसार के समस्त शरीर पंच महाभूतों पृथ्वी जल अग्नि वायु और आकाश से मिलकर बने हैं अतः इस दृष्टि से भी तुम्हारा प्रश्न निरर्थक है। भगवान ने आगे स्पष्ट किया कि जाग्रत स्वप्न और सुषुप्ति यह तीनों अवस्थाएं बुद्धि और मन के गुणों की हैं आत्मा की नहीं। आत्मा इन तीनों अवस्थाओं से परे साक्षी स्वरूप तुरीय चेतना है।
भगवान हंस ने मुनियों को समझाया कि जिस प्रकार हंस जल और दूध के मिश्रण में से केवल दूध को ग्रहण कर लेता है और जल को छोड़ देता है उसी प्रकार एक आत्मज्ञानी साधक को प्रकृति के गुणों में से केवल शुद्ध चैतन्य आत्मा को ग्रहण करना चाहिए और नश्वर प्रपंचों का त्याग कर देना चाहिए। इसे ही वैदिक दर्शन में नीर क्षीर विवेक कहा गया है। भगवान हंस के इस उपदेश से सनकादिक मुनियों के सारे संशय क्षणभर में भस्म हो गए और उनका चित्त अचल समाधि में लीन हो गया।
वैदिक ज्योतिष के महानतम ग्रंथ बृहत् पराशर होरा शास्त्र में महर्षि पराशर ने ग्रहों के आधार पर बनने वाले 5 अत्यंत दुर्लभ और चमत्कारी योगों का वर्णन किया है जिन्हें पंचमहापुरुष योग कहा जाता है। इनमें से देवगुरु बृहस्पति द्वारा निर्मित होने वाला योग साक्षात हंस योग कहलाता है।
हंस योग तब निर्मित होता है जब जातक की जन्म कुंडली में देवगुरु बृहस्पति केंद्र भावों प्रथम चतुर्थ सप्तम अथवा दशम भाव में स्थित हों और वे अपनी स्वराशि धनु या मीन में हों अथवा अपनी परम उच्च राशि कर्क में स्थित हों।
हंस योग से संपन्न जातक का अंतःकरण दूध की भांति निर्मल होता है। ऐसा व्यक्ति कभी किसी के साथ छल कपट नहीं करता और उसकी वाणी में मां सरस्वती का वास होता है। भगवान हंस का स्वरूप वास्तव में इसी उच्च बृहस्पति का मूर्त रूप है जो जीवात्मा को सांसारिक दलदल से निकालकर परमहंस की पदवी तक पहुंचाता है।
योग दर्शन और वैदिक तत्व विज्ञान के अनुसार संपूर्ण ब्रह्मांड 5 तत्वों पर टिका है जिसमें आकाश तत्व सर्वाधिक सूक्ष्म पवित्र और सर्वव्यापी है। आकाश तत्व की विशेषता यह है कि वह प्रत्येक वस्तु को अपने भीतर स्थान देता है किंतु स्वयं किसी से लिप्त नहीं होता। धूल धुआं अथवा अग्नि आकाश में फैलते हैं किंतु आकाश सदा अछूता और निर्मल बना रहता है।
भगवान हंस अवतार इसी आकाश तत्व की पूर्ण शुद्धि का प्रतीक है। जब साधक का आकाश तत्व शुद्ध हो जाता है तो उसके भीतर असीम शून्यता और शांति का उदय होता है। हमारे शरीर में श्वास का आना और जाना भी हंस मंत्र से संचालित होता है। जब हम श्वास भीतर खींचते हैं तो हम ध्वनि उत्पन्न होती है और जब श्वास बाहर छोड़ते हैं तो सः ध्वनि निकलती है। इसे ही वैदिक विज्ञान में अजपा जप कहा जाता है। प्रत्येक मनुष्य प्रतिदिन अनजाने में ही 21600 बार सोहम अर्थात वह परमात्मा मैं हूं का जाप करता है। जब मनुष्य अपने भीतर इस हंस रूपी श्वास और आकाश तत्व को पहचान लेता है तो उसकी चित्त वृत्तियों का स्वाभाविक निरोध हो जाता है और उसे किसी भी बाह्य हठ योग की आवश्यकता नहीं रहती।
यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में देवगुरु बृहस्पति नीच राशि मकर में स्थित हों राहु के साथ गुरु चांडाल योग बना रहे हों अथवा जातक का मन निरंतर अशांत और सांसारिक तृष्णाओं से घिरा रहता हो तो शास्त्रों में हंस अवतार की आराधना के अत्यंत दिव्य उपाय बताए गए हैं।
| क्या अवश्य करें | किन गलतियों से सर्वथा दूर रहें |
|---|---|
| प्रतिदिन प्रातः काल अपनी श्वासों पर ध्यान केंद्रित करते हुए ध्यान करें | अपने ज्ञान तप अथवा साधना का तनिक भी अहंकार न करें |
| संसार के समस्त प्राणियों में एक ही परमात्मा का दर्शन करने का अभ्यास करें | किसी की जाति रूप रंग अथवा संप्रदाय के आधार पर भेदभाव न करें |
| गुरुवार और एकादशी के दिन पूर्णतः सात्विक और फलाहारी भोजन लें | तामसिक भोजन मदिरा और नशीले पदार्थों का सेवन सर्वथा वर्जित रखें |
| अपनी वाणी को सदैव सत्य हितकारी और मधुर बनाए रखें | दूसरों की निंदा चुगली अथवा व्यर्थ के वाद विवाद में समय नष्ट न करें |
| पूजा में श्वेत पुष्प तुलसी दल और शुद्ध गाय के घी का दीपक जलाएं | बिना कुंडली परीक्षण के पुखराज रत्न धारण करने की भूल न करें |
भगवान हंस का पावन अवतार मानव आत्मा को उसकी वास्तविक महिमा का स्मरण कराने वाला एक दिव्य उद्घोष है। यह संसार एक विशाल जल राशि के समान है जिसमें सुख और दुख राग और द्वेष के अनेक विकार घुले हुए हैं। साधारण मनुष्य इस मिश्रण में उलझकर जीवन भर भटकता रहता है किंतु जिसके भीतर नीर क्षीर विवेक का हंस जाग्रत हो जाता है वह संसार में रहते हुए भी उससे अछूता रहता है। देवगुरु बृहस्पति की सच्ची कृपा यही है कि मनुष्य को भौतिक संपत्तियों के साथ साथ वह दिव्य प्रज्ञा प्राप्त हो जो उसे सांसारिक प्रपंचों से मुक्त कर सके। जब साधक अपनी चेतना को जाग्रत स्वप्न और सुषुप्ति के पार तुरीय अवस्था में स्थित कर लेता है तब उसके सारे संशय स्वतः समाप्त हो जाते हैं। भगवान हंस का नित्य स्मरण मनुष्य के अंतःकरण को गंगाजल की भांति पवित्र बनाकर उसे इसी जीवन में परमहंस अवस्था और शाश्वत मोक्ष की प्राप्ति कराता है।
भगवान हंस अवतार का मुख्य उद्देश्य क्या था? भगवान हंस अवतार का मुख्य उद्देश्य सनकादिक मुनियों के चित्त और विषयों के संबंध पर पूछे गए गूढ़ प्रश्नों का समाधान करना और अद्वैत तत्व ज्ञान का उपदेश देना था।
हंस गीता का वर्णन किस धार्मिक ग्रंथ में मिलता है? हंस गीता का अत्यंत विस्तृत और पावन वर्णन श्रीमद्भागवत महापुराण के एकादश स्कंध के 13वें अध्याय में भगवान श्री कृष्ण और उद्धव के संवाद में मिलता है।
ज्योतिष में हंस पंचमहापुरुष योग कैसे बनता है? जब कुंडली के केंद्र भावों 1 4 7 10 में देवगुरु बृहस्पति अपनी स्वराशि धनु या मीन में अथवा अपनी उच्च राशि कर्क में स्थित होते हैं तब हंस योग बनता है।
नीर क्षीर विवेक का आध्यात्मिक अर्थ क्या है? नीर क्षीर विवेक का अर्थ है दूध और पानी को अलग करने की वह क्षमता जिससे साधक भौतिक संसार की असत्य वस्तुओं को छोड़कर केवल सत्य आत्मा को ग्रहण करता है।
अजपा जप में हंस मंत्र का क्या रहस्य है? अजपा जप में श्वास भीतर लेते समय हम और बाहर छोड़ते समय सः की ध्वनि निकलती है जो निरंतर सोहम अर्थात वह परमात्मा मैं हूं का स्वाभाविक स्मरण कराती है।
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