हनुमान अवतार और मंगल शनि रहस्य क्या?

By पं. अमिताभ शर्मा

एकादश रुद्रावतार अंजना नंदन प्राकट्य और मंगल शनि के क्रूर दोषों के शमन का संपूर्ण ज्योतिषीय रहस्य

हनुमान अवतार कथा और मंगल शनि ग्रह रहस्य

हनुमान पूजन विधान और ग्रह शांति नियम

सनातन वैदिक परंपरा में देवाधिदेव भगवान शिव के ग्यारहवें परम प्रतापी अवतार और भगवान श्री राम के अनन्य सेवक के रूप में पूजित श्री हनुमान जी का प्राकट्य अमोघ आत्मबल अखंड ब्रह्मचर्य और समस्त संकटों के निवारण का सर्वोच्च शिखर है। वैदिक ज्योतिष के अंतर्गत सौरमंडल के उग्र सेनापति मंगल देव के रक्त विकार भूमि विवाद और आक्रामकता तथा कर्म दंडाधिकारी शनि देव की साढ़ेसाती ढैय्या और पीड़ाओं को एक साथ शून्य करने के लिए केवल भगवान हनुमान की उपासना को ही अचूक माना गया है। जब जातक की जन्म कुंडली में मंगल और शनि प्रतिकूल होकर जीवन में निरंतर दुर्घटनाएं मुकदमे शारीरिक व्याधियां अथवा घोर असफलताएं उत्पन्न कर रहे हों तब अंजना नंदन श्री हनुमान जी की शरण में जाने से सभी 12 भावों को अभेद्य सुरक्षा प्राप्त होती है। इस पावन साधना की तिथि समय और शास्त्रीय घटकों का संपूर्ण विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।

शास्त्रीय आयाम अनुष्ठान विवरण और ज्योतिषीय मान्यता
प्रमुख पावन तिथि चैत्र मास की पूर्णिमा हनुमान जयंती कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी अथवा मंगलवार व शनिवार
दैनिक पूजन समय प्रातः कालीन सूर्योदय वेला अथवा सायंकालीन गोधूलि प्रदोष काल
अधिष्ठाता स्वरूप सिंदूर चर्चित वज्र देह गदा और पर्वत धारण किए हुए एकादश रुद्रावतार
ज्योतिषीय ग्रह संबंध पराक्रम कारक मंगल देव कर्म कारक शनि देव और सभी 12 भाव
मुख्य पूजन सामग्री चमेली का तेल शुद्ध सिंदूर लाल पुष्प तुलसी दल बूंदी के लड्डू और जनेऊ
प्रधान वैदिक अनुष्ठान सुंदरकांड पाठ हनुमान बाहुक हनुमान चालीसा और ॐ हं हनुमते नमः जप
अपेक्षित फल मंगल शनि दोष शांति अकाल संकट निवारण रोग मुक्ति और अजेय आत्मबल

अंजना का तप और एकादश रुद्रावतार प्राकट्य

त्रेतायुग के पावन कालखंड में जब धर्म की रक्षा और पृथ्वी पर बढ़ते राक्षसी अत्याचारों का संहार करने हेतु भगवान श्री हरि विष्णु ने अयोध्या के सूर्यवंश में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के रूप में अवतार लिया तब देवाधिदेव भगवान शिव के मन में भी अपने आराध्य की सेवा करने की तीव्र इच्छा जाग्रत हुई। भगवान शिव जानते थे कि भगवान श्री राम एक मर्यादा पुरुष के रूप में मानव लीला करेंगे इसलिए वे स्वयं सेवक रूप में रहकर पग पग पर उनकी रक्षा और असुर संहार में सहयोग करना चाहते थे। भगवान शिव ने अपने 11वें अत्यंत शक्तिशाली और संहारक रुद्र अंश को इस पावन कार्य हेतु चुना।

उस समय वानरराज केसरी की धर्मपत्नी माता अंजना पूर्व जन्म के एक शाप से मुक्ति पाने और एक अजेय पुत्र की प्राप्ति हेतु मतंग ऋषि के आश्रम के समीप कठोर तपस्या में लीन थीं। माता अंजना ने सहस्रों वर्षों तक निराहार रहकर देवाधिदेव महादेव की आराधना की। उनकी अनन्य भक्ति से संतुष्ट होकर भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया कि वे स्वयं उनके गर्भ से पुत्र रूप में अवतरित होंगे।

उसी कालखंड में अयोध्या में महाराज दशरथ ने पुत्रेष्टि यज्ञ संपन्न किया था जिससे प्राप्त दिव्य खीर को तीनों रानियों में बांटा गया था। उस खीर का एक पावन भाग एक चील अपनी चोंच में दबाकर आकाश मार्ग से ले उड़ी। जब वह चील माता अंजना के तपोवन के ऊपर से गुजरी तब पवन देव अर्थात वायु देव की प्रेरणा से वह दिव्य भाग माता अंजना की खुली अंजुली में गिर पड़ा। माता अंजना ने उसे शिव का प्रसाद मानकर ग्रहण कर लिया। वायु देव ने भगवान शिव के उस अमोघ तेज को माता अंजना के कर्ण छिद्र के माध्यम से उनके गर्भ में स्थापित कर दिया। इस प्रकार चैत्र शुक्ल पूर्णिमा के पावन दिन केसरी नंदन और अंजना पुत्र के रूप में साक्षात एकादश रुद्रावतार भगवान हनुमान जी का प्राकट्य हुआ। पवन देव द्वारा गर्भ का पोषण किए जाने के कारण वे मारुतिनंदन और पवनपुत्र भी कहलाए।

लंका दहन और शनि देव को रावण के बंधन से मुक्ति

श्रीमद्वाल्मीकि रामायण और विभिन्न पौराणिक संहिताओं में वर्णित इतिहास के अनुसार लंकापति रावण ने अपनी तपस्या के बल से समस्त नवग्रहों को परास्त करके लंका में बंदी बना लिया था। अहंकारी रावण ने क्रूर कर्मफलदाता शनि देव को अपनी राजसभा की सीढ़ियों पर उल्टा लटका रखा था और उन पर पैर रखकर अपने सिंहासन पर चढ़ता था। समस्त ग्रह रावण के इस भयंकर अपमान से पीड़ित थे किंतु कोई भी उस राक्षसराज के बंधनों को काटने में समर्थ नहीं था।

जब भगवान श्री राम की मुद्रिका लेकर श्री हनुमान जी सीता माता की खोज में लंका पहुंचे तब रावण ने उनकी पूंछ में आग लगाने का आदेश दिया। हनुमान जी ने अपनी पूंछ की उस दिव्य अग्नि से संपूर्ण स्वर्णमयी लंका को क्षणभर में जलाकर राख कर दिया। लंका दहन के समय जब हनुमान जी उस बंदीगृह में पहुंचे जहां समस्त ग्रह कैद थे तब उन्होंने अपने वज्र समान पैरों से प्रहार करके उस कारागार के द्वारों को तोड़ दिया।

हनुमान जी ने शनि देव को अपने बाहुबल से उठाकर उस बंधन से मुक्त कराया। उल्टा लटके रहने के कारण शनि देव का शरीर अत्यधिक पीड़ा से जल रहा था। हनुमान जी की इस असीम कृपा को देखकर शनि देव अत्यंत भावुक हो उठे। शनि देव ने हनुमान जी से कहा कि हे पवनपुत्र आपने मुझे इस असहनीय अपमान और पीड़ा से मुक्त कराया है इसलिए मैं आपको यह वचन देता हूं कि जो भी प्राणी आपकी शरण में रहेगा उस पर मेरी साढ़ेसाती ढैय्या अथवा वक्र दृष्टि का कोई भी अनिष्टकारी प्रभाव कभी नहीं पड़ेगा।

  • शनि देव ने प्रतिज्ञा की कि जो मनुष्य शनिवार के दिन हनुमान जी को सिंदूर और चमेली का तेल अर्पित करेगा उसके समस्त कर्म दोष शांत हो जाएंगे।
  • उन्होंने यह भी वरदान दिया कि हनुमान चालीसा और सुंदरकांड का पाठ करने वाले साधक को वे कभी भी शारीरिक अथवा आर्थिक दंड नहीं देंगे।
  • हनुमान जी ने शनि देव की शारीरिक जलन को शांत करने के लिए उन पर सरसों का तेल अर्पित किया था तभी से शनि देव पर तेल चढ़ाने की पवित्र परंपरा आरंभ हुई।

मंगल और शनि का ज्योतिषीय नियंत्रण

वैदिक ज्योतिष के महानतम ग्रंथ बृहत् पराशर होरा शास्त्र में महर्षि पराशर ने स्पष्ट प्रतिपादित किया है कि नवग्रहों में मंगल देव और शनि देव परस्पर धुर विरोधी स्वभाव के ग्रह हैं। मंगल ग्रह अग्नि तत्व का अधिपति है जो देह बल रक्त साहस आक्रामकता और भूमि का कारक है। दूसरी ओर शनि देव वायु तत्व के स्वामी हैं जो कर्म न्याय धीमी गति हड्डियों और जीवन के कठोर संघर्षों के कारक हैं।

जब किसी जातक की जन्म कुंडली में मंगल और शनि एक साथ बैठ जाते हैं अथवा एक दूसरे पर अपनी पूर्ण दृष्टि डालते हैं तब अत्यंत विनाशकारी विस्फोटक योग निर्मित होता है। मंगल की अनियंत्रित अग्नि जब शनि की अंधकारमय वायु से मिलती है तो व्यक्ति के जीवन में रक्त से जुड़ी बीमारियां हड्डियों के फ्रैक्चर भूमि के विवाद पुलिस केस और व्यापार में भारी घाटा उत्पन्न करती है।

वैदिक ज्योतिष में श्री हनुमान जी एकमात्र ऐसे सर्वोच्च देवता हैं जो मंगल और शनि दोनों को एक साथ पूर्णतः नियंत्रित करते हैं। हनुमान जी स्वयं रुद्रावतार हैं और उनका वर्ण सिंदूरी है जो मंगल की सात्विक अग्नि का प्रतीक है। वहीं दूसरी ओर वे शनि देव के परम उद्धारक और पूज्य हैं। जब कोई साधक हनुमान जी की उपासना करता है तो मंगल का अमंगल शांत होकर अमोघ पराक्रम बन जाता है और शनि का क्रूर दंड समाप्त होकर जातक को अचल धैर्य और दीर्घायु प्रदान करता है।

सुंदरकांड और हनुमान बाहुक से बारह भावों की रक्षा

गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस का पंचम सोपान सुंदरकांड केवल एक धार्मिक काव्य नहीं है अपितु यह जीवन के समस्त अवरोधों को नष्ट करने वाला एक महामंत्र है। सुंदरकांड में हनुमान जी के समुद्र लांघने लंका दहन और सीता माता की खोज का वर्णन है जो यह सिद्ध करता है कि निष्काम भक्ति से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं।

जन्म कुंडली के 12 भाव मनुष्य के जीवन के संपूर्ण आयामों को दर्शाते हैं। जब जातक सुंदरकांड का नियमित पाठ करता है तो कुंडली के सभी 12 भाव स्वतः जागृत और सुरक्षित हो जाते हैं।

  • प्रथम भाव लग्न को आरोग्य और तेज प्राप्त होता है जिससे आत्मविश्वास बढ़ता है।
  • द्वितीय भाव वाणी और धन को शुद्धि मिलती है जिससे वाणी दोष समाप्त होते हैं।
  • तृतीय भाव पराक्रम अजेय बनता है और जातक का साहस हिमालय जैसा अडिग हो जाता है।
  • चतुर्थ भाव भूमि और गृहस्थ में शांति आती है तथा पारिवारिक कलह समाप्त होती है।
  • पंचम भाव बुद्धि और संतान को सद्बुद्धि प्राप्त होती है तथा विद्या में सफलता मिलती है।
  • षष्ठ भाव के समस्त गुप्त शत्रु रोग और कर्ज का समूल नाश हो जाता है।
  • सप्तम भाव वैवाहिक जीवन को स्थिरता और दांपत्य सुख प्रदान करता है।
  • अष्टम भाव की अकाल मृत्यु और गंभीर दुर्घटनाओं का भय समाप्त हो जाता है।
  • नवम भाव भाग्य और धर्म को बल मिलता है जिससे ईश्वर कृपा सुलभ होती है।
  • दशम भाव कर्म और करियर में पद प्रतिष्ठा और सफलता प्राप्त होती है।
  • एकादश भाव आय और लाभ के नए मार्ग प्रशस्त करता है।
  • द्वादश भाव के व्यर्थ व्यय और कानूनी मुकदमों से मुक्ति मिलकर मोक्ष की प्राप्ति होती है।

इसी प्रकार जब गोस्वामी तुलसीदास जी अपने जीवन के अंतिम काल में असहनीय बाहु पीड़ा और वात व्याधि से पीड़ित थे तब उन्होंने भगवान हनुमान की स्तुति में हनुमान बाहुक की रचना की थी। इसके 44 पद शारीरिक रोगों जोड़ों के दर्दों और प्रेत बाधाओं को नष्ट करने में साक्षात संजीवनी बूटी के समान कार्य करते हैं।

मंगल शनि पीड़ा शांति के अचूक वैदिक उपाय

यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में मांगलिक दोष हो मंगल केतु का अंगारक योग हो अथवा शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या चल रही हो तो शास्त्रों में श्री हनुमान जी के निमित्त अत्यंत प्रामाणिक उपाय बताए गए हैं।

  • प्रत्येक मंगलवार और शनिवार को प्रातः काल अथवा सायंकाल स्नान के उपरांत लाल आसन पर बैठकर श्री हनुमान चालीसा का कम से कम 7 बार पाठ करें और 1 बार सुंदरकांड का पाठ करें।
  • प्रत्येक मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर उनके चरणों से सिंदूर लेकर अपने माथे पर तिलक लगाएं और चमेली के तेल में नारंगी सिंदूर मिलाकर चोला अर्पित करें।
  • शारीरिक व्याधियों और असहनीय दर्दों से मुक्ति पाने के लिए प्रतिदिन एक तांबे के पात्र में जल भरकर रखें और हनुमान बाहुक का पाठ करने के उपरांत उस अभिमंत्रित जल का आचमन करें।
  • प्रत्येक शनिवार को पीपल के 11 साबुत पत्तों पर चंदन से राम नाम लिखकर उनकी माला बनाएं और हनुमान जी के गले में अर्पित करें जिससे शनि देव के समस्त कष्ट तत्काल शांत होते हैं।
  • जातक को अपनी शारीरिक अवस्था और योग्य ज्योतिर्विद के परामर्श के अनुसार ग्यारह मुखी नेपाली रुद्राक्ष लाल अथवा पीले रेशमी धागे में पिरोकर मंगलवार को धारण करना चाहिए।
  • प्रत्येक मंगलवार को बंदरों अथवा निर्धन बालकों को गुड़ चने और केले का दान करें तथा शनिवार को काले कुत्ते को सरसों के तेल से चुपड़ी हुई रोटी खिलाएं।

हनुमान साधना के आवश्यक शास्त्रीय नियम

क्या अवश्य करें किन गलतियों से सर्वथा दूर रहें
प्रतिदिन प्रातः काल और सायंकाल भगवान श्री राम और हनुमान जी का स्मरण करें पूजा के समय मन में कामुक विचार अथवा अनैतिक भाव कभी न लाएं
मंगलवार और शनिवार को पूर्ण ब्रह्मचर्य और सात्विक आहार का पालन करें किसी भी स्त्री का अपमान करने अथवा उस पर कटाक्ष करने से सर्वथा बचें
हनुमान जी को सदैव शुद्ध तुलसी दल और बूंदी का सात्विक भोग लगाएं हनुमान जी की पूजा में कभी भी सफेद फूल अथवा दूध का प्रयोग न करें
पाठ करते समय अपने मुख को सदैव पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर रखें बिना स्नान किए अथवा अशुद्ध अवस्था में हनुमान चालीसा का स्पर्श न करें
अपने शारीरिक बल का प्रयोग सदैव दुर्बलों की रक्षा हेतु करें अपने बल विद्या अथवा बुद्धि का तनिक भी अहंकार न करें

शरणागति और अमोघ आत्मबल से परम कल्याण

भगवान शिव का हनुमान अवतार संपूर्ण जगत को यह अमर संदेश देता है कि संसार में सबसे बड़ा बल समर्पण का बल है। जिसके हृदय में साक्षात भगवान श्री राम का वास हो उसके लिए तीनों लोकों में कोई भी कार्य असंभव नहीं रह जाता। असीम शक्ति होने के उपरांत भी हनुमान जी ने स्वयं को सदा एक विनम्र दास माना और यही विनम्रता उन्हें देवताओं में पूजनीय बनाती है। मंगल का रक्त और शनि का कर्म जब हनुमान जी की भक्ति में समर्पित हो जाता है तो मनुष्य का संपूर्ण जीवन समस्त भयों से मुक्त होकर एक दिव्य सुरक्षा घेरे में बंध जाता है। भगवान हनुमान जी का नित्य स्मरण मनुष्य के भीतर सोए हुए शौर्य और विवेक को जाग्रत करता है उसे समस्त क्रूर ग्रह दोषों से मुक्त करता है और उसे इस संसार में एक तेजस्वी धर्मनिष्ठ और सम्मानित व्यक्तित्व बनाकर अंततः परम पद की प्राप्ति कराता है।

FAQ

भगवान हनुमान जी किसके अवतार माने जाते हैं? भगवान हनुमान जी देवाधिदेव भगवान शिव के ग्यारहवें संहारक रुद्रावतार माने जाते हैं जिनका प्राकट्य माता अंजना के गर्भ से हुआ था।

वायु देव को हनुमान जी का पिता क्यों कहा जाता है? वायु देव ने भगवान शिव के पावन तेज और महाराज दशरथ के यज्ञ की दिव्य खीर के भाग को माता अंजना के कान के माध्यम से उनके गर्भ में स्थापित किया था इसलिए वे पवनपुत्र कहलाए।

शनि देव ने हनुमान भक्तों को क्या वरदान दिया था? शनि देव ने रावण के कारागार से मुक्त होने पर वचन दिया था कि जो मनुष्य हनुमान जी की शरण में रहेगा उस पर शनि की साढ़ेसाती ढैय्या अथवा वक्र दृष्टि का कोई अनिष्ट प्रभाव नहीं पड़ेगा।

कुंडली के सभी 12 भावों को सुरक्षित करने के लिए किस पाठ का विधान है? कुंडली के सभी 12 भावों के दोषों को शांत करने और ग्रह बाधा से रक्षा हेतु नित्य अथवा मंगलवार को सुंदरकांड और हनुमान बाहुक का पाठ करना सर्वोत्तम माना गया है।

हनुमान जी को चमेली का तेल और सिंदूर क्यों अर्पित किया जाता है? माता सीता को मांग में सिंदूर लगाते देख भगवान श्री राम की दीर्घायु और प्रसन्नता हेतु हनुमान जी ने अपने पूरे शरीर पर सिंदूर धारण कर लिया था इसलिए उन्हें सिंदूर और चमेली का तेल अत्यंत प्रिय है।

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लेखक

पं. अमिताभ शर्मा

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