By पं. नीलेश शर्मा
ब्रह्मा जी के पांचवें शीश का छेदन काशी के कोतवाल और राहु शनि ग्रह शांति का संपूर्ण ज्योतिषीय रहस्य

सनातन वैदिक परंपरा में देवाधिदेव भगवान शिव के परम तेजस्वी संहारक और धर्म रक्षक स्वरूप के रूप में पूजित भगवान काल भैरव का प्राकट्य काल के नियमन अहंकार के विसर्जन और समस्त प्रकार के भय से मुक्ति का सर्वोच्च शिखर है। वैदिक ज्योतिष के अंतर्गत मायावी छाया ग्रह राहु और कर्म दंडाधिकारी शनि देव के समस्त क्रूर प्रभावों को शांत करने तथा जीवन में व्याप्त अदृश्य तांत्रिक बाधाओं असाध्य भय और अकाल मृत्यु के संकट से रक्षा हेतु भगवान काल भैरव की आराधना को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जब जातक की जन्म कुंडली में राहु अथवा शनि अत्यधिक पीड़ित होकर मतिभ्रम मानसिक अवसाद दुर्घटना अथवा कारागार का योग निर्मित करते हैं तब काल भैरव की शरण में जाने से अमोघ सुरक्षा और आत्मिक बल प्राप्त होता है। इस पावन अनुष्ठान की तिथि समय और शास्त्रीय घटकों का संपूर्ण विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।
| शास्त्रीय आयाम | अनुष्ठान विवरण और ज्योतिषीय मान्यता |
|---|---|
| प्रमुख पावन तिथि | मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि कालभैरव अष्टमी अथवा रविवार |
| दैनिक पूजन समय | अर्धरात्रि का निशीथ काल अथवा सायंकालीन प्रदोष काल |
| अधिष्ठाता स्वरूप | चतुर्भुज रूप में त्रिशूल डमरू खड्ग और नरमुंड धारी श्वानारूढ़ भैरव |
| ज्योतिषीय ग्रह संबंध | क्रूर छाया ग्रह राहु कर्म दंडाधिकारी शनि देव और अष्टम भाव |
| मुख्य पूजन सामग्री | शुद्ध सरसों का तेल काले तिल उड़द के वड़े सिंदूर और नीले पुष्प |
| प्रधान वैदिक अनुष्ठान | श्री भैरवाष्टकम पाठ कालभैरव कवच और ॐ भ्रं भैरवाय नमः जप |
| अपेक्षित फल | राहु शनि दोष मुक्ति तांत्रिक बाधा निवारण और अकाल मृत्यु से रक्षा |
शिव महापुराण और स्कंद महापुराण के पावन आख्यानों के अनुसार सृष्टि के आरंभिक काल में सुमेरु पर्वत के पावन शिखर पर समस्त देवता और ऋषि मुनि उपस्थित थे। उस विशाल सभा में यह गंभीर दार्शनिक प्रश्न उठा कि संपूर्ण ब्रह्मांड का मूल तत्व आदि कारण और परम सत्य कौन है। जब चारों वेदों ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद और अथर्ववेद से यह प्रश्न पूछा गया तो वेदों ने साक्षात देवाधिदेव भगवान शिव को ही संपूर्ण जगत का सृष्टा पालक और संहारक घोषित किया। वेदों ने स्पष्ट किया कि भगवान शिव ही परात्पर ब्रह्म हैं और उनके परे अन्य कोई सत्ता नहीं है।
उस सभा में उपस्थित सृष्टि के रचयिता परमपिता ब्रह्मा जी अपने रजोगुणी अहंकार के वशीभूत थे। ब्रह्मा जी के उस समय 5 मुख थे। वेदों का यह परम सत्य सुनकर ब्रह्मा जी का पांचवां मुख जो आकाश की ओर देखता था अहंकार और मिथ्या ज्ञान से भर गया। ब्रह्मा जी ने भगवान शिव की सत्ता को अस्वीकार करते हुए उपहास उड़ाया और कहा कि शिव तो श्मशान निवासी भस्म रमाने वाले और संन्यासियों के स्वामी हैं वे परम ब्रह्म कैसे हो सकते हैं। ब्रह्मा जी ने अभिमान में आकर भगवान शिव के प्रति अत्यंत अनुचित और अपमानजनक शब्दों का उच्चारण किया।
भगवान विष्णु ने ब्रह्मा जी को समझाने का भरसक प्रयास किया किंतु अहंकारी ब्रह्मा का वह पांचवां मुख निरंतर असत्य और अहंकार का विष उगलता रहा। किसी भी ज्ञानी सत्ता के लिए अपने सृष्टा का यह अहंकार अस्वीकार्य था। उसी क्षण आकाश मंडल में प्रलयंकारी गर्जना हुई और भगवान शिव का तीसरा नेत्र क्रोध से प्रज्वलित हो उठा।
देवाधिदेव महादेव के तृतीय नेत्र के प्रचंड क्रोध से एक अत्यंत भयानक तेजस्वी और प्रलयकालीन अग्नि के समान दैदीप्यमान दिव्य पुरुष का प्राकट्य हुआ। उनका स्वरूप करोड़ों सूर्यों के समान चमत्कारी था उनके बाल प्रज्वलित अग्नि की लपटों जैसे थे उनके नेत्र अंगारों की भांति दहक रहे थे और उनके हाथों में त्रिशूल खड्ग और कपाल सुशोभित था। भगवान शिव ने उस दिव्य शक्ति को संबोधित करते हुए कहा कि तुम साक्षात काल के भी काल हो इसलिए तुम्हारा नाम काल भैरव होगा। तुम दुष्टों का संहार करने में समर्थ हो अतः तुम्हें आमर्दक भी कहा जाएगा और तुम समस्त जीवों के पापों का भक्षण करोगे इसलिए तुम्हें पापभक्षण भी कहा जाएगा।
भगवान शिव ने काल भैरव को आदेश दिया कि वे धर्म की मर्यादा का उल्लंघन करने वाले इस अहंकारी ब्रह्मा को दंडित करें। भगवान काल भैरव ने अपने स्वामी की आज्ञा पाकर एक ही क्षण में अपनी बाईं उंगली के नखाग्र से ब्रह्मा जी के उस पांचवें असत्यवादी मुख को काट डाला।
भगवान काल भैरव ने एक दिगंबर संन्यासी के रूप में तीनों लोकों स्वर्ग पाताल और पृथ्वी के समस्त तीर्थों में भ्रमण किया। वे जहां भी जाते ब्रह्महत्या रूपी भयंकर छाया उनके पीछे चलती रही। अंततः जब भगवान काल भैरव भगवान शिव की पावन नगरी काशी पहुंचे तब काशी की सीमा में प्रवेश करते ही वह ब्रह्महत्या रूपी छाया पाताल में समा गई और वह कपाल भैरव के हाथ से छूटकर भूमि पर गिर पड़ा। जिस स्थान पर वह कपाल गिरा वह पावन तीर्थ कपालमोचन तीर्थ कहलाया। भगवान शिव ने काशी में भैरव को अपना स्थायी प्रतिनिधि नियुक्त किया और उन्हें काशी के कोतवाल की पदवी प्रदान की जहां आज भी बाबा काल भैरव के दर्शन के बिना काशी विश्वनाथ की यात्रा अधूरी मानी जाती है।
वैदिक ज्योतिष के महानतम ग्रंथ बृहत् पराशर होरा शास्त्र में ग्रहों के क्रूर प्रभाव और उनके अधिष्ठाता देवताओं का विशद विवेचन किया गया है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से भगवान काल भैरव साक्षात छाया ग्रह राहु और कर्म दंडाधिकारी शनि देव के सर्वोच्च अधिष्ठाता और नियंत्रक हैं।
राहु को ज्योतिष में भ्रम अज्ञात भय मायावी आकर्षण विष असाध्य मानसिक विकार और आकस्मिक दुर्घटनाओं का स्वामी माना जाता है। जब किसी जातक की कुंडली में राहु लग्न पंचम अष्टम अथवा द्वादश भाव में बैठकर कालसर्प दोष या ग्रहण दोष का निर्माण करता है तो व्यक्ति का जीवन नरक समान हो जाता है। उसे निरंतर ऐसा अनुभव होता है मानो कोई अदृश्य नकारात्मक शक्ति उसका पीछा कर रही हो।
दूसरी ओर शनि ग्रह को काल कर्म शारीरिक पीड़ा हड्डियों के रोग और दीर्घकालिक संघर्ष का कारक माना गया है। जब शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या चलती है तो व्यक्ति का अहंकार टूट जाता है। भगवान काल भैरव का स्वरूप वस्तुतः समय और काल का साक्षात विग्रह है। भैरव शब्द में तीन मूल ध्वनियां समाहित हैं जिसमें भ से भरण अर्थात सृष्टि का पालन र से रमण अर्थात सृष्टि का आनंद और व से वमन अर्थात सृष्टि का संहार होता है।
भगवान काल भैरव काल के स्वामी हैं अतः राहु का मायावी भ्रम और शनि का कठोर दंड भैरव साधना के सम्मुख स्वतः निष्प्रभावी हो जाता है। जब कोई साधक काल भैरव की शरण में जाता है तो भैरव जी का दिव्य त्रिशूल राहु के समस्त नकारात्मक प्रभावों को काट देता है और शनि देव उस साधक पर दंड के स्थान पर कृपा बरसाने लगते हैं।
मानव जीवन में सबसे गहरा भय मृत्यु और अज्ञात तांत्रिक शक्तियों का होता है। जब कुंडली का अष्टम भाव जो आयु और गुप्त संकटों का है पाप ग्रहों से पीड़ित होता है तो व्यक्ति के ऊपर अकाल मृत्यु और दुर्घटनाओं का साया मंडराता रहता है। इसके अतिरिक्त समाज में ईर्ष्या द्वेष के कारण अनेक बार लोग गुप्त षड्यंत्रों अथवा नकारात्मक ऊर्जाओं का शिकार हो जाते हैं।
आदिशंकराचार्य जी ने काशी में भगवान काल भैरव की स्तुति करते हुए अत्यंत चमत्कारी कालभैरवाष्टकम की रचना की थी। इस स्तोत्र में स्पष्ट कहा गया है कि जो मनुष्य काल भैरव के पावन स्वरूप का ध्यान करता है उसके समीप काल भी आने से भयभीत होता है। रविवार की रात्रि को भैरव जी की साधना करने का एक विशेष वैज्ञानिक आधार है। रविवार भगवान सूर्य का दिन है जो आत्मा और जीवनी शक्ति के कारक हैं और रात्रि राहु और तमस की प्रतीक है। जब रविवार की रात्रि में भैरव आराधना की जाती है तो आत्मा का प्रकाश तमस के अंधकार को चीरकर बाहर आ जाता है। यह साधना मनुष्य के अंतःकरण से समस्त प्रकार के फोबिया वहम और अवसाद को समूल नष्ट कर देती है।
यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में राहु की महादशा चल रही हो शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या का भयंकर प्रकोप हो अथवा व्यापार और स्वास्थ्य में निरंतर अवरोध आ रहे हों तो शास्त्रों में काल भैरव की प्रसन्नता हेतु अत्यंत प्रामाणिक उपाय बताए गए हैं।
| क्या अवश्य करें | किन गलतियों से सर्वथा दूर रहें |
|---|---|
| प्रतिदिन प्रातः काल और सायंकाल भगवान शिव का स्मरण करें | केवल किसी का अनिष्ट करने के लिए तामसिक प्रयोग न करें |
| भैरव जी के वाहन काले कुत्ते के प्रति दया और स्नेह रखें | कभी भी किसी कुत्ते अथवा पशु को डंडे से प्रताड़ित न करें |
| रविवार और अष्टमी के दिन पूर्णतः सात्विक आहार ग्रहण करें | मदिरा मांसाहार और अनैतिक आचरण से सर्वथा दूर रहें |
| अपने माता पिता गुरु और वृद्ध जनों का सदैव आदर करें | अपने बल अधिकार पद अथवा धन का तनिक भी अहंकार न करें |
| पूजा में शुद्ध सरसों का तेल सिंदूर और नीले पुष्प अर्पित करें | बिना गुरु आज्ञा के श्मशान साधना अथवा उग्र तंत्र में न उलझें |
भगवान शिव का काल भैरव अवतार संपूर्ण मानव जाति को यह सनातन सत्य सिखाता है कि इस संसार में अहंकार ही मनुष्य के पतन का सबसे बड़ा कारण है। जब ब्रह्मा जी जैसी महान विभूति का पांचवां मुख अहंकार के कारण कट सकता है तो साधारण मनुष्य अपने तुच्छ धन और पद पर गर्व कैसे कर सकता है। काल भैरव का भयानक स्वरूप वास्तव में हमारे अपने ही भीतर के तमस वासना और अज्ञान का काल है। जब साधक अपनी दुर्बलताओं को त्यागकर भैरव की शरण में जाता है तो उसे यह बोध होता है कि समय का वास्तविक सदुपयोग केवल आत्म साक्षात्कार में है। भगवान काल भैरव का नित्य स्मरण मनुष्य के भीतर सोई हुई निर्भयता को जाग्रत करता है उसे राहु और शनि के समस्त बंधनों से मुक्त करता है और उसे इस संसार में एक तेजस्वी निडर और सम्मानित व्यक्तित्व बनाकर अंततः मोक्ष की प्राप्ति कराता है।
भगवान काल भैरव का प्राकट्य किस कारण से हुआ था? भगवान काल भैरव का प्राकट्य ब्रह्मा जी के पांचवें मुख द्वारा भगवान शिव के प्रति किए गए अहंकार और अपमान का दंड देने तथा वेदों की मर्यादा की रक्षा हेतु हुआ था।
भगवान काल भैरव को काशी का कोतवाल क्यों कहा जाता है? काशी में ब्रह्महत्या के दोष से मुक्ति पाने के पश्चात भगवान शिव ने काल भैरव को काशी की सुरक्षा और शासन का दायित्व सौंपा इसलिए उन्हें काशी का कोतवाल कहा जाता है।
ज्योतिष में काल भैरव का संबंध किन प्रमुख ग्रहों से माना गया है? वैदिक ज्योतिष में भगवान काल भैरव का सीधा संबंध छाया ग्रह राहु कर्म दंडाधिकारी शनि देव और जन्म कुंडली के अष्टम भाव से माना गया है।
राहु की महादशा और तांत्रिक भय में किस स्तोत्र का पाठ सबसे लाभकारी है? राहु की पीड़ा और तांत्रिक भय से मुक्ति पाने हेतु आदिशंकराचार्य विरचित कालभैरवाष्टकम का नित्य रात्रि में पाठ करना सबसे अधिक लाभकारी माना गया है।
भगवान काल भैरव का प्रिय वाहन कौन सा है और उसकी सेवा से क्या लाभ होता है? भगवान काल भैरव का प्रिय वाहन श्वान अर्थात कुत्ता है और काले कुत्ते को रोटी खिलाने से कुंडली के राहु केतु और शनि के समस्त क्रूर दोष शांत होते हैं।
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