कौशिकी अवतार और सूर्य चंद्र रहस्य क्या?

By पं. सुव्रत शर्मा

पार्वती के कृष्ण कोश से प्राकट्य अयोनिजा तेज और सूर्य चंद्र समन्वय का संपूर्ण वैदिक रहस्य

माँ कौशिकी अवतार कथा और सूर्य चंद्र रहस्य

कौशिकी पूजन मुहूर्त और शास्त्रीय अनुष्ठान विधान

सनातन वैदिक परंपरा और शाक्त आगम दर्शन में आद्याशक्ति भगवती महामाया के परम पावन तेजस्वी और अयोनिजा स्वरूप के रूप में पूजित माता कौशिकी का प्राकट्य आंतरिक विकारों के भंजन अविद्या के आवरणों के विनाश और चेतना के परम प्रबोधन का सर्वोच्च शिखर है। वैदिक ज्योतिष तथा तत्व विज्ञान के अंतर्गत सौरमंडल के प्राण स्वरूप भगवान सूर्य देव के आत्मिक तेज और मन के अधिपति चंद्र देव के पावन आह्लाद के दुर्लभ समन्वय को जाग्रत करने के लिए भगवती कौशिकी की आराधना को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जब जातक की जन्म कुंडली में सूर्य देव और चंद्र देव का संबंध दूषित होकर आत्म संशय आत्मविश्वास की न्यूनता मानसिक मतिभ्रम अथवा राजपक्ष व प्रशासनिक कार्यों में निरंतर असफलताएं उत्पन्न कर रहा हो तब कृष्ण कोश का त्याग करने वाली परम सुंदरी माँ कौशिकी की शरण में जाने से अमोघ विजय और आंतरिक शुद्धि की प्राप्ति होती है। चैत्र व शारदीय नवरात्रि की षष्ठी व सप्तमी तिथि अथवा प्रत्येक मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी और रविवार व सोमवार के पावन अनुष्ठान का संपूर्ण शास्त्रीय विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।

शास्त्रीय आयामअनुष्ठान विवरण और ज्योतिषीय मान्यता
प्रमुख पावन तिथिचैत्र अथवा शारदीय नवरात्रि की षष्ठी व सप्तमी और प्रत्येक मास की शुक्ल अष्टमी
दैनिक पूजन समयप्रातः कालीन सूर्योदय वेला अथवा सायंकालीन गोधूलि वेला
अधिष्ठाता स्वरूपसिंह पर आरूढ़ दिव्य स्वर्णिम कांति वाली अष्टभुजा माँ कौशिकी अंबिका
ज्योतिषीय ग्रह व भाव संबंधप्रथम भाव पंचम भाव नवम भाव आत्मा कारक सूर्य देव और मन कारक चंद्र देव
मुख्य पूजन सामग्रीशुद्ध केसर श्वेत व पीत पुष्प गंगाजल गाय का कच्चा दूध अक्षत और कस्तूरी
प्रधान वैदिक अनुष्ठानदुर्गा सप्तशती पंचम अध्याय पाठ देवी सूक्त और ॐ ऐं कौशिक्यै नमः जप
अपेक्षित फलसूर्य चंद्र दोष शांति पंचकोश शुद्धि प्रशासनिक विजय और आत्मिक तेज

शुंभ निशुंभ का वरदान और अयोनिजा की अनिवार्यता

श्रीमार्कंडेय पुराण के अंतर्गत वर्णित श्रीदुर्गा सप्तशती के अत्यंत पावन इतिहास के अनुसार प्राचीन काल में दैत्यराज शुंभ और उसके छोटे भाई निशुंभ ने संपूर्ण त्रिलोकी को अपने अधीन करने हेतु सहस्रों वर्षों तक परमपिता ब्रह्मा जी की अत्यंत दुष्कर और उग्र तपस्या की। उनकी कठोर साधना से संतुष्ट होकर जब ब्रह्मा जी ने उन्हें वरदान मांगने को कहा तब उन दोनों असुर बंधुओं ने अत्यंत धूर्तता और अहंकार से भरकर ऐसा वरदान मांग लिया जो उनकी दृष्टि में उन्हें अमर बना देता था।

शुंभ और निशुंभ ने यह वरदान मांगा कि वे संसार के किसी भी देवता दानव यक्ष गंधर्व अथवा मानव द्वारा कभी न मारे जा सकें। इसके साथ ही उन्होंने एक अत्यंत विचित्र शर्त रखी कि उनकी मृत्यु केवल उसी स्त्री के हाथों संभव हो सके जो अयोनिजा हो अर्थात जिसने किसी माता के गर्भ से जन्म न लिया हो।

असुरों का यह विचार था कि इस चराचर जगत में ऐसा कोई प्राणी या स्त्री संभव ही नहीं है जिसका प्राकट्य मातृ गर्भ के बिना हुआ हो। ब्रह्मा जी से यह वरदान प्राप्त करते ही शुंभ और निशुंभ के भीतर का आसुरी अहंकार संपूर्ण सीमाओं को लांघ गया। उन्होंने अपनी विशाल सेना के साथ अमरावती पर धावा बोल दिया। देवराज इंद्र वरुण कुबेर यम और अग्नि जैसे लोकपालों को पराजित कर स्वर्ग से निष्कासित कर दिया गया।

समस्त यज्ञों के हविर्भाग पर दैत्यों का अधिकार हो गया और संपूर्ण पृथ्वी पर धर्म सत्य और वेदों का पठन पाठन अवरुद्ध हो गया। स्वर्ग और अधिकार से वंचित होकर समस्त देवता अत्यंत व्याकुल होकर हिमालय के दुर्गम शिखरों पर पहुंचे और उन्होंने भगवती आद्याशक्ति का स्तवन आरंभ किया जिसे शास्त्रों में अपराजिता स्तुति अथवा नमो देव्यै महादेव्यै कहा जाता है।

गंगा तट पर घोर तप और कृष्ण कोश का त्याग

देवताओं की उस करुण पुकार को सुनकर कैलाश वासिनी माता पार्वती के हृदय में अगाध वात्सल्य और करुणा जाग्रत हुई। माता पार्वती उस समय मंदाकिनी और जाह्नवी गंगा के पावन संगम तट पर स्नान और तपस्या हेतु पधारी थीं। देवताओं द्वारा की जा रही स्तुति को सुनकर माता पार्वती ने विचार किया कि शुंभ और निशुंभ के वरदान की मर्यादा को सुरक्षित रखते हुए उनका संहार करने के लिए एक ऐसी शक्ति का प्राकट्य अनिवार्य है जिसका जन्म किसी लौकिक गर्भ से न हुआ हो।

माता पार्वती ने उस पावन तट पर समाधि लगाई। उनके अंतःकरण से एक अत्यंत अद्भुत और विस्मयकारी ज्योति प्रस्फुटित हुई। भगवान शिव के साथ विवाह के उपरांत माता पार्वती का जो शारीरिक वर्ण तपस्या और पूर्व संस्कारों के कारण सांवला अथवा श्यामल था वह संपूर्ण श्यामल आवरण एकाएक उनके शरीर से अलग होने लगा।

माता पार्वती के शरीर से उस काली त्वचा अर्थात कृष्ण कोश का विसर्जन हुआ। जैसे ही वह बाहरी कोश उतरा वैसे ही माता पार्वती के भीतर से करोड़ों मध्याह्न के सूर्यों की प्रभा को समेटे हुए एक अत्यंत मनोहारी स्वर्णिम और दिव्य सुंदरी प्रकट हुईं।

  • पार्वती के शरीर कोश से प्रकट होने के कारण ही उस परम चेतना का नाम संपूर्ण ब्रह्मांड में माँ कौशिकी पड़ा।
  • वे साक्षात पराशक्ति अंबिका थीं जिनके अंग प्रत्यंग से दिव्य सुवास और तेज निकल रहा था।
  • माता पार्वती के शरीर से जो काली त्वचा रूपी कोश उतरा था वह एक स्वतंत्र प्रचंड संहारक शक्ति बन गया जिसे माँ कालिका कहा गया जो हिमाचल के वनों में स्थित होकर दैत्यों के संहार हेतु तत्पर हुईं।
  • माँ कौशिकी पूर्णतः अयोनिजा थीं क्योंकि उनका प्राकट्य किसी माता के गर्भ से नहीं अपितु पार्वती के विशुद्ध ज्ञान कोश से हुआ था।
  • इस प्रकार ब्रह्मा जी के वरदान की समस्त शर्तें पूर्ण हो गईं और असुरों के विनाश का काल चक्र गतिमान हो गया।

क्या है पंचकोश भेदन और आध्यात्मिक सौंदर्य?

वैदिक उपनिषद दर्शन और तैत्तिरीय उपनिषद में मानव चेतना के 5 आवरणों का विस्तृत वर्णन मिलता है जिन्हें पंचकोश कहा जाता है। ये 5 कोश हैं अन्नमय कोश प्राणमय कोश मनोमय कोश विज्ञानमय कोश और आनंदमय कोश। मानव आत्मा इन 5 कोशों के आवरण में लिपटी रहने के कारण अपने वास्तविक दिव्य स्वरूप को विस्मृत कर बैठती है।

माँ कौशिकी का प्राकट्य वस्तुतः इसी पंचकोश भेदन का साक्षात आध्यात्मिक रूपक है। माता पार्वती का कृष्ण कोश स्थूल और सूक्ष्म प्रकृति की उस अविद्या का प्रतीक है जो आत्मा पर मैल की भांति चढ़ी रहती है। जब कोई साधक निरंतर साधना तप और वैराग्य के मार्ग पर अग्रसर होता है तब उसके चित्त से तमोगुण और रजोगुण का श्यामल कोश उतर जाता है।

उस श्यामल कोश के हटते ही भीतर छिपी हुई विशुद्ध स्वर्णिम आत्मा अर्थात कौशिकी शक्ति प्रकट हो जाती है। कौशिकी का सौंदर्य बाह्य मांस मज्जा का सौंदर्य नहीं है अपितु वह ज्ञान और पूर्ण आत्म साक्षात्कार का वह दिव्य आलोक है जिसके सम्मुख संसार के समस्त प्रलोभन तुच्छ सिद्ध होते हैं। शुंभ और निशुंभ वास्तव में मनुष्य के अंतःकरण में बैठे हुए अस्मिता और ममता रूपी वे दो महाअसुर हैं जो आत्मा के इस दिव्य सौंदर्य को अपनी वासनाओं का दास बनाना चाहते हैं। माँ कौशिकी का खड्ग इन्हीं आंतरिक विकारों का समूल छेदन करके साधक को आत्म स्वरूप में प्रतिष्ठित करता है।

सूर्य और चंद्रमा के संयुक्त तेज का ज्योतिषीय मर्म

वैदिक ज्योतिष के महानतम ग्रंथ बृहत् पराशर होरा शास्त्र में ग्रहों के आत्मिक और मानसिक स्वभाव का अत्यंत सूक्ष्म विश्लेषण मिलता है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से माँ कौशिकी का पावन स्वरूप सीधे तौर पर भगवान सूर्य देव और भगवान चंद्र देव के अत्यंत दुर्लभ और संतुलित संगम का प्रतिनिधित्व करता है।

सूर्य ग्रह को ज्योतिष में आत्मा तेज पिता उच्च पद प्रशासनिक प्रतिष्ठा और आंतरिक प्रकाश का कारक माना जाता है जबकि चंद्र ग्रह को मन भावना पोषण मानसिक शांति और आह्लाद का अधिपति माना गया है। जब किसी जातक की जन्म कुंडली में सूर्य और चंद्रमा दोनों बली होते हैं अथवा एक दूसरे से शुभ दृष्टि संबंध रखते हैं तब व्यक्ति के भीतर आत्मबल और मानसिक शांति का अद्भुत संतुलन दिखाई देता है।

  • जन्म कुंडली की सिंह राशि सूर्य की अपनी राशि है जो कौशिकी के सिंह वाहन का प्रतीक है और कर्क राशि चंद्रमा की अपनी राशि है जो गंगा की शीतलता का प्रतीक है।
  • जब किसी कुंडली में सूर्य राहु से पीड़ित होकर ग्रहण दोष बनाता है तो व्यक्ति के भीतर आत्म संशय और नेतृत्व की दुर्बलता आ जाती है।
  • जब चंद्रमा केतु अथवा शनि से दूषित होता है तो मन में अवसाद नकारात्मक विचार और भ्रम का वास होता है।
  • माँ कौशिकी का स्वर्णिम रूप सूर्य का साक्षात आत्म तेज है और उनका शांत मुखमंडल चंद्रमा का सात्विक आह्लाद है।
  • कौशिकी साधना से आत्मा पर चढ़े हुए समस्त अज्ञान के कोश भस्म हो जाते हैं जिससे जातक का सूर्य और चंद्रमा दोनों एक साथ उच्च के समान फल प्रदान करने लगते हैं।

क्या कौशिकी साधना से आंतरिक विकार मिटते हैं?

आधुनिक युग में मनुष्य की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वह बाह्य संसार में सब कुछ जीत लेना चाहता है किंतु अपने ही भीतर उठने वाले काम क्रोध लोभ मोह और अहंकार के सम्मुख घुटने टेक देता है। शुंभ का अर्थ होता है अपने अस्तित्व का घमंड और निशुंभ का अर्थ होता है ममता व आसक्ति का गहरा अंधकार।

जब तक मनुष्य इन दोनों आसुरी वृत्तियों के नियंत्रण में रहता है तब तक वह कभी भी वास्तविक शांति का अनुभव नहीं कर सकता। माँ कौशिकी साक्षात वह विवेक शक्ति हैं जो मनुष्य को उसके शरीर मन और बुद्धि के परे स्थित विशुद्ध आत्मा का दर्शन कराती हैं। जब कोई साधक निष्कपट भाव से कौशिकी स्वरूप का ध्यान करता है तो उसके भीतर की समस्त हीन भावनाएं भय और संशय उसी प्रकार जलकर भस्म हो जाते हैं जिस प्रकार देवी के बाणों से शुंभ और निशुंभ की विशाल सेनाएं नष्ट हो गई थीं। यह साधना व्यक्ति को समाज में एक तेजस्वी नीतिवान और अजेय व्यक्तित्व प्रदान करती है।

सूर्य चंद्र दोष शांति और आत्मिक विजय के उपाय

यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में सूर्य और चंद्रमा निर्बल हों प्रशासनिक कार्यों में निरंतर रुकावटें आ रही हों पिता अथवा माता के स्वास्थ्य को लेकर चिंता बनी रहती हो अथवा आत्मविश्वास डगमगाता हो तो शास्त्रों में माँ कौशिकी की प्रसन्नता हेतु अत्यंत प्रामाणिक वैदिक उपाय बताए गए हैं।

  • प्रत्येक रविवार अथवा सोमवार को प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में स्नान के उपरांत पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें और माँ कौशिकी के चित्र अथवा यंत्र के सम्मुख गाय के शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  • तांबे अथवा चांदी के पात्र में जल अक्षत और लाल चंदन मिलाकर उगते हुए सूर्य देव को अर्घ्य समर्पित करें और मन ही मन माँ कौशिकी का ध्यान करते हुए ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कौशिक्यै नमः अथवा नवार्ण मंत्र का 108 बार शांत मन से जाप करें।
  • प्रतिदिन प्रातः काल श्रीदुर्गा सप्तशती के अंतर्गत आने वाले पावन पंचम अध्याय का पाठ करें जिसमें देवताओं द्वारा की गई भगवती की स्तुति और कौशिकी प्राकट्य का पावन प्रसंग वर्णित है।
  • प्रत्येक पूर्णिमा की रात्रि को चंद्रोदय के समय चंद्रमा को कच्चे दूध और जल का अर्घ्य दें जिससे मन की चंचलता समाप्त होती है और मानसिक स्थिरता प्राप्त होती है।
  • जातक को अपनी शारीरिक अवस्था और योग्य ज्योतिर्विद के परामर्श के अनुसार एक मुखी अथवा दो मुखी नेपाली रुद्राक्ष चांदी के तार में पिरोकर धारण करना चाहिए जो सूर्य और चंद्रमा के तेज को संतुलित करता है।
  • प्रत्येक रविवार को निर्धन व्यक्तियों को गेहूं तांबे के बर्तन अथवा गुड़ का दान करें तथा सोमवार को चावल दूध और श्वेत वस्त्रों का आदरपूर्वक दान करें जिससे समस्त प्रकार के आंतरिक दोष शांत होते हैं।

कौशिकी साधना के आवश्यक शास्त्रीय नियम

क्या अवश्य करेंकिन गलतियों से सर्वथा दूर रहें
प्रतिदिन प्रातः काल उठकर अपने माता पिता और सूर्य देव को नमन करेंअपने ज्ञान पद प्रतिष्ठा अथवा शारीरिक रूप का कभी भी अहंकार न करें
पूजा में सदैव ताजे कमल पुष्प केसर श्वेत चंदन और शुद्ध घी का प्रयोग करेंसाधना काल में किसी भी स्त्री कन्या अथवा दुर्बल प्राणी का अनादर न करें
रविवार और सोमवार के दिन पूर्णतः सात्विक और पवित्र भोजन ग्रहण करेंतामसिक भोजन मदिरा और किसी भी प्रकार के नशीले पदार्थों से सर्वथा दूर रहें
अपनी चेतना को सदैव धर्म सत्य और जनकल्याण के कार्यों में लगाएंअपने भीतर कामुक विचारों अथवा बदले की दुर्भावना को तनिक भी स्थान न दें
पूजा स्थल को सदैव स्वच्छ सुगंधित और ईशान कोण में स्थापित रखेंबिना सोचे समझे किसी पर क्रोध करने अथवा कटु वचन बोलने से बचें

अयोनिजा तेज और परम चेतना की शाश्वत विजय

भगवती कौशिकी का पावन अवतार संपूर्ण मानव जाति को यह अमर संदेश प्रदान करता है कि सत्य और धर्म की रक्षा के लिए जब ईश्वर की शक्ति प्रकट होती है तो संसार का कोई भी वरदान अथवा छल प्रपंच उसके सम्मुख नहीं टिक सकता। शुंभ और निशुंभ का वध यह सिद्ध करता है कि अधर्म चाहे कितना भी सुरक्षित घेरा क्यों न बना ले विधि का विधान उसके अंत का मार्ग खोज ही लेता है। माता पार्वती द्वारा अपनी कृष्ण त्वचा का त्याग यह स्मरण कराता है कि जब तक हम अपने पुराने संस्कारों और अज्ञान के आवरणों को उतारकर नहीं फेंकते तब तक हमारे भीतर का दिव्य चैतन्य प्रकट नहीं हो सकता। सूर्य का आत्म बल और चंद्रमा की मानसिक शांति जब एक साथ जाग्रत होते हैं तब साधक तीनों लोकों में अजेय बन जाता है। माँ कौशिकी का नित्य स्मरण मनुष्य के जीवन से समस्त भय संशय और ग्रह दोषों को समाप्त करके उसे एक तेजस्वी धर्मनिष्ठ और सम्मानित व्यक्तित्व बनाकर अंततः परम पद की प्राप्ति कराता है।

FAQ

माँ कौशिकी को यह नाम किस कारण से प्राप्त हुआ था? माता पार्वती द्वारा तपस्या के समय अपनी देह से उतारी गई काली त्वचा अर्थात कृष्ण कोश से प्रकट होने के कारण भगवती को कौशिकी कहा जाता है।

शुंभ और निशुंभ का वध केवल कौशिकी द्वारा ही क्यों संभव था? शुंभ और निशुंभ को वरदान था कि वे केवल अयोनिजा स्त्री द्वारा ही मारे जा सकते हैं और कौशिकी किसी गर्भ से उत्पन्न न होकर पार्वती के कोश से प्रकट हुई थीं।

कौशिकी के प्राकट्य के पश्चात उनकी काली त्वचा से किस देवी का रूप बना? पार्वती के शरीर से जो श्यामल त्वचा रूपी कोश अलग हुआ था उससे महापराक्रमी संहारक शक्ति माँ कालिका का प्राकट्य हुआ।

ज्योतिष में माँ कौशिकी का संबंध किन प्रमुख आकाशीय पिंडों से है? वैदिक ज्योतिष में माँ कौशिकी का सीधा संबंध आत्मा के कारक भगवान सूर्य देव और मन के कारक भगवान चंद्र देव के संयुक्त तेज से माना जाता है।

आत्मबल में वृद्धि और सूर्य चंद्र दोष शांति हेतु किस अध्याय का पाठ करना चाहिए? आत्मबल बढ़ाने और मानसिक शांति पाने हेतु प्रतिदिन श्रीदुर्गा सप्तशती के पावन पंचम अध्याय का पाठ करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

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लेखक

पं. सुव्रत शर्मा

पं. सुव्रत शर्मा (63)


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