By पं. सुव्रत शर्मा
मणि मल्ल दैत्यों का संहार हल्दी भंडारा और सूर्य मंगल के संयुक्त तेज का संपूर्ण वैदिक रहस्य

सनातन वैदिक परंपरा और दक्षिण भारतीय लोक संस्कृति में देवाधिदेव भगवान शिव के अत्यंत उग्र तेजस्वी और लोक रक्षक स्वरूप के रूप में पूजित भगवान खण्डोबा का प्राकट्य आसुरी शक्तियों के समूल नाश कुल की रक्षा और शरणागत भक्तों के अभय का सर्वोच्च शिखर है। वैदिक ज्योतिष तथा आध्यात्मिक तत्व दर्शन के अंतर्गत सौरमंडल के अधिपति भगवान सूर्य देव के आत्मिक तेज और सेनापति मंगल देव के अदम्य पराक्रम के शुभ समन्वय को जाग्रत करने के लिए भगवान मल्लारी मार्तंड की उपासना को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जब जातक की जन्म कुंडली में सूर्य अथवा मंगल ग्रह पीड़ित होकर रक्त विकार भूमि विवाद शत्रुओं का भीषण षड्यंत्र अथवा कुल पर अदृश्य बाधाएं उत्पन्न कर रहे हों तब खण्डोबा महादेव की शरण में जाने से अमोघ विजय और पारिवारिक सुरक्षा प्राप्त होती है। इस पावन अनुष्ठान की तिथि समय और शास्त्रीय घटकों का संपूर्ण विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।
| शास्त्रीय आयाम | अनुष्ठान विवरण और ज्योतिषीय मान्यता |
|---|---|
| प्रमुख पावन तिथि | मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि चंपा षष्ठी अथवा रविवार |
| दैनिक पूजन समय | प्रातः कालीन सूर्योदय वेला अथवा सायंकालीन गोधूलि प्रदोष काल |
| अधिष्ठाता स्वरूप | श्वेत अश्व पर आरूढ़ खड्ग त्रिशूल और डमरू धारण किए हुए मार्तंड भैरव |
| ज्योतिषीय ग्रह व नक्षत्र संबंध | आत्मा कारक सूर्य देव पराक्रम कारक मंगल देव और कृत्तिका नक्षत्र |
| मुख्य पूजन सामग्री | शुद्ध हल्दी का चूर्ण जिसे भंडारा कहते हैं सूखा नारियल बेलपत्र और बैंगन का भर्ता |
| प्रधान वैदिक अनुष्ठान | मल्लारी अष्टकम पाठ मार्तंड भैरव मंत्र जप और चंपा षष्ठी व्रत कथा |
| अपेक्षित फल | शत्रु बाधा का समूल नाश कुल की सुरक्षा सूर्य मंगल दोष शांति और आरोग्य |
स्कंद महापुराण के ब्रह्मोत्तर खंड और मल्लारी माहात्म्य में वर्णित परम पावन इतिहास के अनुसार प्राचीन काल में मणि और मल्ल नामक दो अत्यंत महाबली और क्रूर असुर भाई हुए। उन्होंने संपूर्ण विश्व पर आधिपत्य स्थापित करने की कुत्सित अभिलाषा से परमपिता ब्रह्मा जी की कई सहस्र वर्षों तक अत्यंत कठोर और दुष्कर तपस्या की। उनकी तपस्या से संतुष्ट होकर जब ब्रह्मा जी ने उन्हें वरदान मांगने को कहा तब उन दोनों दैत्य भाइयों ने यह वरदान मांग लिया कि वे संसार के किसी भी अस्त्र शस्त्र देव दानव अथवा मनुष्य द्वारा कभी पराजित न हों और उनकी मृत्यु किसी सामान्य परिस्थिति में न हो सके।
ब्रह्मा जी से अजेय होने का वरदान प्राप्त करते ही मणि और मल्ल के भीतर का आसुरी अहंकार अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया। वे दोनों अपने विशाल असुर दल के साथ धर्म और सत्य की मर्यादाओं को कुचलने लगे। उन्होंने सबसे पहले भूलोक पर स्थित संतों ऋषियों और मुनियों के आश्रमों को अपना निशाना बनाया। महाराष्ट्र और कर्नाटक के पावन सीमावर्ती पर्वतों विशेषकर प्रेमपुरी जिसे आज जेजुरी कहा जाता है के वनों में रहने वाले सप्तर्षियों और धर्मनिष्ठ ब्राह्मणों के यज्ञों को विध्वंस कर दिया गया।
वे दैत्य मुनियों के यज्ञ कुंडों में रक्त और हड्डियां फेंक देते थे उनके शिष्यों की हत्या कर देते थे और वेदों के अध्ययन पर प्रतिबंध लगा देते थे। जब ऋषियों ने धर्म की रक्षा हेतु देवी देवताओं की गुहार लगाई तो मणि और मल्ल ने स्वर्ग पर भी धावा बोल दिया। देवराज इंद्र वरुण कुबेर और यमराज जैसे लोकपाल भी उन दोनों भाइयों के वरदान जनित बल के सम्मुख टिक न सके और स्वर्ग छोड़कर वनों में छिपने के लिए विवश हो गए। संपूर्ण पृथ्वी पर अधर्म का अंधकार छा गया और धर्म का अस्तित्व संकट में पड़ गया।
जब देवताओं और ऋषियों के समस्त प्रयास विफल हो गए तब देवर्षि नारद के परामर्श पर समस्त देवता और ऋषि मुनि देवाधिदेव महादेव की शरण में कैलाश पर्वत पहुंचे। उन्होंने हाथ जोड़कर अत्यंत कातर स्वर में आशुतोष शिव की स्तुति की और निवेदन किया कि हे त्रिलोकीनाथ यदि आपने शीघ्र ही इन दैत्यों का दमन नहीं किया तो पृथ्वी से वेदों और यज्ञों की पावन परंपरा सदा के लिए विलुप्त हो जाएगी।
ऋषियों की दारुण दशा और संसार में अधर्म का तांडव देखकर देवाधिदेव भगवान शिव का अंतःकरण भीषण क्रोध से प्रज्वलित हो उठा। उनके नेत्रों से प्रलयंकारी अग्नि स्फुलिंग निकलने लगे। भगवान शिव ने विचार किया कि जो दैत्य सामान्य अस्त्रों से नहीं मर सकते उनका संहार केवल सूर्य के अपरिमित ताप और भैरव के संहारक पराक्रम के संगम से ही संभव है। अतः भगवान शिव ने सहस्र सूर्यों के प्रचंड तेज से युक्त एक अत्यंत दिव्य और अलौकिक विग्रह धारण किया जिसे सनातन परंपरा में मल्लारी मार्तंड अथवा मार्तंड भैरव कहा जाता है।
भगवान शिव का यह रूप अत्यंत भव्य और भयानक था। उनका शरीर स्वर्ण के समान दमक रहा था उनके हाथों में तीक्ष्ण खड्ग त्रिशूल और डमरू सुशोभित थे और वे एक अत्यंत तेजस्वी श्वेत अश्व पर आरूढ़ थे। उनके साथ साक्षात जगज्जननी भगवती पार्वती अपने उग्र और तेजस्वी स्वरूप में म्हालसा के रूप में प्रकट हुईं जो खण्डोबा की प्रधान शक्ति बनीं। इसके अतिरिक्त भगवान विष्णु और कार्तिकेय के तेज से युक्त अनेक गण और दिव्य कुत्ते जो भैरव के निष्ठावान रक्षक माने जाते हैं उस विशाल सेना का अंग बने। भगवान खण्डोबा ने अपनी विशाल सेना के साथ जेजुरी के पर्वतों की ओर प्रस्थान किया।
भगवान खण्डोबा और माता म्हालसा के आगमन का समाचार पाकर मणि और मल्ल दैत्यों ने अपनी अक्षौहिणी सेना के साथ उन पर आक्रमण कर दिया। जेजुरी के पावन पर्वतों पर मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से लेकर षष्ठी तिथि तक लगातार 6 दिनों तक एक प्रलयंकारी महायुद्ध चला।
भगवान खण्डोबा के श्वेत अश्व के खुरों की टापों से पाताल लोक कंपायमान हो उठा। उनके खड्ग के एक एक प्रहार से सहस्रों असुर गाजर मूली की भांति कटने लगे। माता म्हालसा ने अपनी तलवार से असुर सेनापतियों के मस्तक धड़ से अलग कर दिए। युद्ध के पांचवें दिन भगवान खण्डोबा ने महाबली मणि दैत्य को अपने त्रिशूल के प्रहार से भूमि पर गिरा दिया।
दैत्यों के संहार के उपरांत जब संपूर्ण पृथ्वी और स्वर्ग लोक भयमुक्त हो गया तब स्वर्ग से देवताओं ने भगवान खण्डोबा और माता म्हालसा पर पुष्पों की वर्षा की। उसी समय समस्त ऋषियों और भक्तों ने भगवान की विजय के उल्लास में स्वर्ण के समान आभा वाली विशुद्ध हल्दी का चूर्ण आकाश में उड़ाया जिसे स्थानीय भाषा में भंडारा कहा जाता है।
हल्दी का यह अभिषेक केवल एक उत्सव नहीं है अपितु यह अत्यंत गहन आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व रखता है। हल्दी विशुद्ध सात्विक ऊर्जा आरोग्य विष नाशक क्षमता और सूर्य देव के स्वर्णिम तेज का साक्षात प्रतीक है। जेजुरी के पावन पर्वत पर जब लाखों भक्त एक साथ एलगार एलगार जय मल्हार का उद्घोष करते हुए भंडारा उड़ाते हैं तो संपूर्ण गगन पीत वर्ण के दिव्य प्रकाश से आलोकित हो उठता है।
भगवान खण्डोबा की पूजा में हल्दी का अर्पण जातक के जीवन से समस्त प्रकार की नकारात्मक ऊर्जाओं विषैले प्रभावों और त्वचा जनित व्याधियों को समूल नष्ट कर देता है। यह भंडारा भक्त के अंतःकरण पर ज्ञान और वैराग्य का वह स्वर्णिम लेप लगा देता है जिससे सांसारिक माया का प्रभाव स्वतः समाप्त हो जाता है।
वैदिक ज्योतिष के महानतम ग्रंथ बृहत् पराशर होरा शास्त्र में ग्रहों के आत्मिक और भौतिक प्रभाव का विस्तृत विवेचन मिलता है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से भगवान खण्डोबा का स्वरूप सीधे तौर पर सूर्य देव और मंगल देव के अत्यंत दुर्लभ और शक्तिशाली संगम का प्रतिनिधित्व करता है।
सूर्य देव को ज्योतिष में आत्मा तेज पिता उच्च पद और जीवन ऊर्जा का कारक माना गया है जबकि मंगल देव को बाहुबल पराक्रम अस्त्र शस्त्र युद्ध और रक्त का स्वामी माना जाता है। भगवान खण्डोबा को मार्तंड कहा जाता है जो साक्षात सूर्य का ही एक पावन नाम है और वे भैरव स्वरूप हैं जो मंगल के संहारक पराक्रम का प्रतीक हैं। जब किसी जातक की जन्म कुंडली में सूर्य और मंगल एक साथ बैठते हैं अथवा एक दूसरे पर दृष्टि डालते हैं तो अत्यंत उग्र अग्नि तत्व का निर्माण होता है।
इसके अतिरिक्त भगवान खण्डोबा का संबंध सीधे तौर पर कृत्तिका नक्षत्र से माना जाता है। कृत्तिका नक्षत्र का स्वामी ग्रह सूर्य है और इसके देवता साक्षात अग्नि देव हैं जबकि इस नक्षत्र का प्रथम चरण मेष राशि में मंगल के अधीन और शेष तीन चरण वृषभ राशि में आते हैं।
महाराष्ट्र कर्नाटक और मध्य भारत के करोड़ों परिवारों में भगवान खण्डोबा को कुलदेवता के रूप में पूजा जाता है। कुलदेवता की उपासना का मूल सिद्धांत यह है कि वे परिवार के संपूर्ण वंश की रक्षा करते हैं और किसी भी नकारात्मक तांत्रिक शक्ति अथवा कुलघाती दोष को घर की चौखट के भीतर प्रवेश नहीं करने देते।
आधुनिक युग में जब व्यक्ति व्यापार में भारी प्रतिस्पर्धा गुप्त शत्रुओं के ईर्ष्या जनित षड्यंत्रों अथवा पैतृक संपत्ति के मुकदमों से घिर जाता है तब उसका आत्मविश्वास डगमगाने लगता है। भगवान खण्डोबा साक्षात उस अमोघ खड्ग के समान हैं जो अन्याय का तत्काल छेदन करता है। जो जातक नियमित रूप से खण्डोबा जी के मंत्रों का अनुष्ठान करता है उसके घर के चारों ओर एक ऐसा अदृश्य अग्नि सुरक्षा घेरा बन जाता है जिसे कोई भी मारण उच्चाटन अथवा नकारात्मक शक्ति भेद नहीं सकती। यह साधना शत्रुओं की मति को कुंठित कर देती है और जातक को जीवन के प्रत्येक संघर्ष में विजयी बनाती है।
यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में सूर्य मंगल पीड़ित हों शत्रुओं का भय निरंतर बना रहता हो अथवा कुल की उन्नति में रुकावटें आ रही हों तो शास्त्रों में भगवान खण्डोबा की प्रसन्नता हेतु अत्यंत प्रामाणिक उपाय बताए गए हैं।
| क्या अवश्य करें | किन गलतियों से सर्वथा दूर रहें |
|---|---|
| प्रतिदिन प्रातः काल अपने कुलदेवता और भगवान खण्डोबा का स्मरण करें | किसी भी कुत्ते अथवा मूक पशु को लाठी से पीटने की भूल कदापि न करें |
| रविवार और षष्ठी तिथि को पूर्णतः सात्विक और पवित्र भोजन ग्रहण करें | तामसिक भोजन मदिरा और किसी भी प्रकार के नशीले पदार्थों से दूर रहें |
| पूजा में शुद्ध हल्दी सूखा नारियल और ताजे बेलपत्र ही अर्पित करें | अपने बाहुबल शारीरिक शक्ति अथवा पद का कभी भी घमंड न करें |
| घर की स्त्रियों और कुल की मर्यादा का सदैव आदर और संरक्षण करें | किसी भी निर्दोष व्यक्ति के विरुद्ध षड्यंत्र रचने से सर्वथा बचें |
| चंपा षष्ठी के दिन व्रत रखकर खण्डोबा मंदिर में भंडारा अर्पित करें | बिना कुंडली मिलान किए माणिक्य अथवा मूंगा रत्न पहनने से बचें |
भगवान शिव का खण्डोबा अवतार संपूर्ण मानव जाति को यह सनातन संदेश प्रदान करता है कि अधर्म चाहे कितना भी शक्तिशाली और वरदान संपन्न क्यों न हो अंततः सत्य और धर्म के सम्मुख उसका विनाश निश्चित होता है। मणि और मल्ल जैसे अजेय असुरों का संहार यह प्रमाणित करता है कि जब लोक कल्याण की रक्षा का प्रश्न उपस्थित होता है तो देवाधिदेव महादेव स्वयं संहारक मार्तंड भैरव का रूप धारण करके धर्म की पुनः स्थापना करते हैं। सूर्य का आत्मिक प्रकाश और मंगल का निडर पराक्रम जब मनुष्य के जीवन में एक साथ जाग्रत होते हैं तो उसका जीवन समस्त भयों से मुक्त हो जाता है। भगवान मल्लारी खण्डोबा का नित्य स्मरण मनुष्य के भीतर सोए हुए सात्विक शौर्य को जाग्रत करता है उसके कुल की समस्त विपत्तियों से रक्षा करता है और उसे इस संसार में एक धर्मनिष्ठ अजेय और सम्मानित व्यक्तित्व बनाकर अंततः परम पद की प्राप्ति कराता है।
भगवान खण्डोबा को मल्लारी मार्तंड क्यों कहा जाता है? भगवान शिव ने मल्ल नामक भयंकर दैत्य का संहार किया था इसलिए उन्हें मल्लारी अर्थात मल्ल का शत्रु और सूर्य के समान प्रचंड तेज धारण करने के कारण मार्तंड कहा जाता है।
भगवान खण्डोबा की पूजा में हल्दी भंडारा क्यों चढ़ाया जाता है? मणि और मल्ल पर विजय के उपरांत देवताओं और भक्तों ने उल्लास में हल्दी उड़ाई थी जो सात्विक ऊर्जा आरोग्य और सूर्य के स्वर्णिम तेज का प्रतीक मानी जाती है।
चंपा षष्ठी का पावन पर्व किस दिन मनाया जाता है? चंपा षष्ठी का पावन पर्व प्रत्येक वर्ष मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को भगवान खण्डोबा के विजय दिवस के रूप में अत्यंत श्रद्धा से मनाया जाता है।
ज्योतिष में भगवान खण्डोबा का संबंध किन प्रमुख ग्रहों से माना जाता है? वैदिक ज्योतिष में भगवान खण्डोबा का सीधा संबंध आत्मा कारक सूर्य देव पराक्रम कारक मंगल देव और अग्नि तत्व प्रधान कृत्तिका नक्षत्र से माना जाता है।
शत्रु बाधा और कुल दोष शांति के लिए किस मंत्र का जाप करना चाहिए? शत्रु बाधा के निवारण और कुल रक्षा हेतु प्रतिदिन प्रातः काल ॐ मार्तंडाय नमः अथवा ॐ मल्लारी खण्डोबाय नमः मंत्र का 108 बार जाप करना सर्वोत्तम माना गया है।
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