By पं. अमिताभ शर्मा
अर्जुन का मान मर्दन मूक दानव वध और तृतीय भाव के पराक्रम का संपूर्ण वैदिक ज्योतिषीय रहस्य

सनातन वैदिक परंपरा में देवाधिदेव भगवान शिव के अत्यंत विस्मयकारी और लीला पुरुषोत्तम स्वरूप के रूप में पूजित भगवान किरात का प्राकट्य मानवीय पराक्रम के अहंकार मर्दन अटूट शरणागति और अमोघ पाशुपतास्त्र की प्राप्ति का सर्वोच्च शिखर है। वैदिक ज्योतिष तथा आध्यात्मिक तत्व विज्ञान के अंतर्गत जन्म कुंडली के तृतीय भाव के पराक्रम बाहुबल पुरुषार्थ तथा षष्ठ भाव के शत्रु दमन को जाग्रत करने के लिए भगवान किरातेश्वर की उपासना को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जब जातक की जन्म कुंडली में सौरमंडल के सेनापति मंगल देव अत्यधिक पीड़ित होकर झूठा पराक्रम अहंकार भाइयों से विवाद अथवा पराजय का भय उत्पन्न करते हैं तब किरात स्वरूप का ध्यान साधक को अजेय आत्मबल और सात्विक विजय प्रदान करता है। इस पावन अनुष्ठान की तिथि समय और शास्त्रीय घटकों का संपूर्ण विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।
| शास्त्रीय आयाम | अनुष्ठान विवरण और ज्योतिषीय मान्यता |
|---|---|
| प्रमुख पावन तिथि | प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी प्रदोष व्रत अथवा मंगलवार और शिवरात्रि |
| दैनिक पूजन समय | प्रातः कालीन सूर्योदय वेला अथवा सायंकालीन प्रदोष काल |
| अधिष्ठाता स्वरूप | धनुर्बाण धारी भील शिकारी रूप में माता उमा सहित भगवान किरातेश्वर |
| ज्योतिषीय भाव व ग्रह संबंध | तृतीय भाव षष्ठ भाव सेनापति मंगल देव और स्थिर राशि वृश्चिक |
| मुख्य पूजन सामग्री | शुद्ध गंगाजल भस्म लाल चंदन लाल पुष्प बेलपत्र और दूर्वा |
| प्रधान वैदिक अनुष्ठान | शिव पंचाक्षर मंत्र जप किरातेश्वर स्तुति और ॐ किरातेश्वराय नमः पाठ |
| अपेक्षित फल | मंगल के अहंकार का शमन शत्रु पराजय पाशुपतास्त्र सिद्धि और आत्मिक बल |
महाभारत के वनपर्व में वर्णित अत्यंत पावन इतिहास के अनुसार जब द्यूत क्रीड़ा में पराजित होकर पांडव 12 वर्ष के वनवास और 1 वर्ष के अज्ञातवास का कठिन समय व्यतीत कर रहे थे तब पांडवों के अग्रज धर्मराज युधिष्ठिर को महर्षि वेदव्यास ने दर्शन दिए। महर्षि व्यास ने युधिष्ठिर को समझाया कि भविष्य में अधर्म के विरुद्ध होने वाला महासंग्राम केवल साधारण शस्त्रों से नहीं जीता जा सकता। कौरव पक्ष में भीष्म द्रोण और कर्ण जैसे अजेय महारथी विद्यमान हैं जिनका वध केवल दिव्य अस्त्रों द्वारा ही संभव है। अतः उन्होंने तीसरे पांडव कुंती पुत्र अर्जुन को देवाधिदेव महादेव की तपस्या करके पाशुपतास्त्र प्राप्त करने का निर्देश दिया।
महर्षि व्यास की आज्ञा शिरोधार्य करके अर्जुन गांडीव धनुष और अक्षय तुणीर लेकर उत्तर दिशा की ओर प्रस्थान कर गए। वे हिमालय के अत्यंत दुर्गम और सुरम्य इंद्रकील पर्वत पर पहुंचे। वहां पहुंचकर अर्जुन ने वन के एकांत में एक अत्यंत पावन स्थल चुना और कठोर तपस्या आरंभ की।
अर्जुन की तपस्या अत्यंत उग्र थी। प्रथम मास में वे तीन दिन के अंतर पर सूखे पत्ते और फल ग्रहण करते थे। दूसरे मास में उन्होंने छह दिन के अंतर पर केवल जल पीकर तप किया। तीसरे मास में वे पक्ष में केवल एक बार वायु भक्षण करते थे और चौथे मास में उन्होंने दोनों भुजाएं ऊपर उठाकर केवल एक पैर के अंगूठे पर खड़े होकर निराहार तपस्या की। अर्जुन के इस भीषण तपोबल से एक प्रलयंकारी तेज प्रस्फुटित हुआ जिसने संपूर्ण पर्वत को तपा दिया। स्वर्ग के देवता उस उग्र तपस्या को देखकर व्याकुल हो उठे और वे देवाधिदेव महादेव की शरण में पहुंचे।
भगवान शिव ने देवताओं को आश्वस्त किया कि अर्जुन किसी पद अथवा स्वर्ग की कामना से तप नहीं कर रहे हैं अपितु वे धर्म रक्षा हेतु अस्त्र प्राप्ति का यत्न कर रहे हैं। किंतु भगवान शिव जानते थे कि अर्जुन के भीतर अपने धनुर्वेद अपने गांडीव धनुष और अपने बाहुबल का एक सूक्ष्म अहंकार विद्यमान था। जब तक एक साधक के भीतर यह दंभ रहता है कि मैं अजेय योद्धा हूं तब तक उसे संपूर्ण ब्रह्मांड के सबसे संहारक अस्त्र पाशुपतास्त्र की पात्रता प्राप्त नहीं हो सकती।
उसी समय दुर्योधन द्वारा भेजा गया अथवा पूर्व जन्म के बैर के कारण मूक दानव नामक एक अत्यंत भयानक दैत्य एक विशाल और प्रलयंकारी जंगली शूकर अर्थात जंगली सूअर का रूप धारण करके अर्जुन की तपस्या स्थली पर पहुंचा। उस शूकर के दांत वज्र के समान तीक्ष्ण थे और वह पृथ्वी को खोदता हुआ अर्जुन पर प्राणघातक प्रहार करने के लिए झपटा।
अर्जुन की समाधि टूटी और उन्होंने देखा कि एक विशालकाय जंगली पशु उन पर आक्रमण करने आ रहा है। अर्जुन ने तत्काल अपने गांडीव धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाई और एक तीक्ष्ण बाण का संधान किया। ठीक उसी क्षण वहां एक अत्यंत तेजस्वी बलिष्ठ और सांवले वर्ण का वनवासी शिकारी प्रकट हुआ जिसके साथ उसकी पत्नी और किरातों की सेना थी। वह कोई साधारण शिकारी नहीं था अपितु साक्षात देवाधिदेव महादेव थे जिन्होंने किरात अवतार धारण किया था और उनके साथ भगवती पार्वती किरात नारी के रूप में विद्यमान थीं।
जैसे ही शूकर ने छलांग लगाई वैसे ही अर्जुन और किरात रूपी भगवान शिव दोनों के धनुषों से एक साथ बिजली की गति से दो बाण छूटे। दोनों बाण एक ही साथ उस शूकर के मुख में प्रविष्ट हुए और वह विशाल असुर तत्क्षण निष्प्राण होकर भूमि पर गिर पड़ा।
शूकर के वध के पश्चात अर्जुन उस शिकार को उठाने के लिए आगे बढ़े। तभी उस किरात शिकारी ने अत्यंत गंभीर वाणी में अर्जुन को ललकारते हुए कहा कि हे संन्यासी इस शिकार पर पहले मेरा बाण लगा है अतः यह मेरा भक्ष्य है तुम इसे छूने का साहस कैसे कर रहे हो।
अर्जुन को एक वनवासी द्वारा इस प्रकार रोके जाने पर अत्यंत क्रोध आ गया। अपने क्षत्रिय तेज और धनुर्विद्या के अहंकार में भरकर अर्जुन ने कहा कि मैंने अपने प्राणों की रक्षा हेतु इस पशु का वध किया है तुम वन के सामान्य शिकारी होकर मेरे अधिकार को चुनौती देने का दुस्साहस मत करो।
अपने सबसे प्रिय धनुष के छिन जाने के पश्चात अर्जुन ने अपनी तलवार निकाली और किरात पर वार किया किंतु तलवार किरात के मस्तक से टकराकर कांच की भांति टूट गई। अंत में दोनों के मध्य प्रलयंकारी मल्ल युद्ध आरंभ हुआ। दोनों भुजाओं से एक दूसरे को जकड़कर युद्ध करने लगे। किरात रूपी शिव ने अपनी एक ही भुजा के प्रहार से अर्जुन के समस्त अंगों को शिथिल कर दिया। अर्जुन रक्त से लथपथ होकर मूर्छित हो गए और भूमि पर गिर पड़े। उस क्षण अर्जुन का समस्त शारीरिक और शस्त्र जनित अहंकार पूरी तरह धूल में मिल गया।
कुछ समय पश्चात जब अर्जुन की चेतना लौटी तो वे अत्यंत लज्जित और दुखी हुए। उन्होंने विचार किया कि एक साधारण वनवासी शिकारी के सम्मुख मेरी यह पराजय यह सिद्ध करती है कि मेरी संपूर्ण शक्ति नष्ट हो चुकी है। अर्जुन ने अनुभव किया कि अब केवल देवाधिदेव महादेव ही उनकी रक्षा कर सकते हैं।
अर्जुन ने तत्काल वन की पावन मिट्टी एकत्र की और गंगाजल से उसे सानकर एक सुंदर पार्थिव शिवलिंग का निर्माण किया। अर्जुन ने शिवलिंग के सम्मुख बैठकर हाथ जोड़े और अपनी दुर्बलताओं के लिए क्षमा याचना की। उन्होंने वन से ताजे जंगली पुष्प और बेलपत्र एकत्र किए और अत्यंत भक्ति भाव से शिव पंचाक्षर मंत्र का उच्चारण करते हुए वह पुष्प माला शिवलिंग पर अर्पित कर दी।
पूजा संपन्न करने के पश्चात जब अर्जुन ने अपनी आंखें खोलीं तो उन्होंने एक अत्यंत विस्मयकारी अलौकिक दृश्य देखा। शिवलिंग पर अर्पित की गई वह ताजी पुष्प माला उस मिट्टी के शिवलिंग पर नहीं थी अपितु वह कुछ ही दूरी पर खड़े उसी किरात शिकारी के गले में सुशोभित हो रही थी।
भगवान शिव का वह किरात रूप उसी क्षण अंतर्धान हो गया और उस निर्जन वन में साक्षात वृषभ पर आरूढ़ नीलकंठ देवाधिदेव महादेव माता पार्वती सहित अपने पूर्ण दिव्य स्वरूप में प्रकट हो गए। भगवान शिव ने अपनी अमृतमयी भुजाओं से अर्जुन को उठाया और अपने वक्षस्थल से लगा लिया।
भगवान शिव ने मंद मुस्कान के साथ कहा कि हे पार्थ मैं तुम्हारे युद्ध कौशल और अदम्य साहस की परीक्षा ले रहा था। तुमने जिस वीरता के साथ मुझसे युद्ध किया है उससे मैं अत्यंत प्रसन्न हूं। इस संपूर्ण ब्रह्मांड में तुम्हारे समान कोई दूसरा धनुर्धर नहीं है। भगवान शिव ने अर्जुन को उनका गांडीव धनुष लौटा दिया और उन्हें अपनी सबसे गोपनीय एवं संहारक शक्ति पाशुपतास्त्र प्रदान की। भगवान शिव ने उपदेश दिया कि यह अस्त्र केवल धर्म रक्षा और अधर्म के समूल नाश हेतु है इसका प्रयोग कभी भी किसी निर्बल अथवा साधारण मनुष्य पर नहीं किया जाना चाहिए।
वैदिक ज्योतिष के महानतम ग्रंथ बृहत् पराशर होरा शास्त्र में जन्म कुंडली के प्रत्येक भाव के कारकत्व का सूक्ष्म विश्लेषण किया गया है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से भगवान किरात की यह पावन कथा सीधे तौर पर जन्म कुंडली के तृतीय भाव और सेनापति मंगल के तात्विक स्वभाव का प्रतिनिधित्व करती है।
जन्म कुंडली का तृतीय भाव जिसे पराक्रम भाव अथवा सहज भाव कहा जाता है सीधे तौर पर व्यक्ति के बाहुबल शारीरिक सामर्थ्य युद्ध कला साहसिक निर्णयों और छोटे भाइयों का स्थान है। इस भाव के स्वाभाविक और नैसर्गिक कारक ग्रह सौरमंडल के सेनापति मंगल देव हैं। मंगल ग्रह अग्नि तत्व साहस और अस्त्र शस्त्र के अधिपति हैं किंतु जब मंगल पर अत्यधिक अहंकार का प्रभाव पड़ जाता है तो वह व्यक्ति को अंधा बना देता है।
आधुनिक युग में मनुष्य की सबसे बड़ी दुर्बलता उसका झूठा अहंकार और अपने बाहुबल पर अत्यधिक विश्वास है। जब व्यक्ति अपने पद अपनी बुद्धि अथवा अपनी शक्ति के मद में चूर होकर दूसरों को तुच्छ समझने लगता है तो उसकी वही शक्ति उसके विनाश का कारण बन जाती है। इसके अतिरिक्त समाज में अनेक बार व्यक्ति को मूक असुर जैसे गुप्त और मूक शत्रुओं का सामना करना पड़ता है जो पीछे से वार करके करियर और जीवन को नष्ट करना चाहते हैं।
भगवान किरात की यह साधना मनुष्य को यह सिखाती है कि सच्चा योद्धा वही है जो बाहर से अत्यंत वीर हो किंतु भीतर से ईश्वर के सम्मुख पूर्णतः समर्पित हो। जब कोई साधक भगवान किरातेश्वर का स्मरण करता है तो उसके भीतर का अनुचित क्रोध और मिथ्या दंभ शांत हो जाता है। यह साधना कोर्ट कचहरी के मुकदमों गुप्त शत्रुओं के षड्यंत्रों और जीवन में आने वाली अचानक बाधाओं को उसी प्रकार भस्म कर देती है जिस प्रकार भगवान शिव के बाण ने मूक असुर का वध किया था।
यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में मंगल ग्रह नीच राशि कर्क में स्थित हो तृतीय भाव में राहु अथवा शनि का पाप प्रभाव हो जिसके कारण आत्मविश्वास की कमी हो अथवा अत्यधिक क्रोध के कारण संबंध टूट रहे हों तो शास्त्रों में इसके निवारण हेतु अत्यंत प्रभावी वैदिक उपाय बताए गए हैं।
| क्या अवश्य करें | किन गलतियों से सर्वथा दूर रहें |
|---|---|
| प्रतिदिन प्रातः काल उठकर अपने आराध्य और माता पिता को नमन करें | अपनी विद्या धन पद अथवा शारीरिक बल का कभी भी घमंड न करें |
| शिवलिंग पर सदैव ताजे बेलपत्र और शुद्ध जल ही अर्पित करें | कभी भी किसी असहाय निर्बल अथवा मूक पशु पर शस्त्र न उठाएं |
| मंगलवार और प्रदोष के दिन पूर्णतः सात्विक और शुद्ध भोजन लें | मदिरा मांसाहार और किसी भी प्रकार के तामसिक पदार्थों से दूर रहें |
| संकट के समय सदैव धैर्य रखें और अपने पराक्रम को धर्म में लगाएं | क्रोध के आवेश में आकर किसी को अपशब्द बोलने से सर्वथा बचें |
| पूजा में लाल चंदन लाल कनेर पुष्प और शुद्ध घी का प्रयोग करें | बिना कुंडली मिलान किए मूंगा रत्न पहनने की भूल कदापि न करें |
भगवान शिव का किरात अवतार संपूर्ण मानव जाति को यह सनातन शिक्षा प्रदान करता है कि शक्ति का वास्तविक उद्देश्य अहंकार का पोषण करना नहीं अपितु धर्म और निर्बलों की रक्षा करना है। जब तक मनुष्य अपने साधनों और अपने बाहुबल पर निर्भर रहता है तब तक वह अपूर्ण रहता है किंतु जिस क्षण वह अपनी शक्ति को परमात्मा के चरणों में समर्पित कर देता है उसी क्षण वह अजेय बन जाता है। अर्जुन का गांडीव तभी सार्थक हुआ जब उसके पीछे देवाधिदेव महादेव का पाशुपतास्त्र और भगवान श्री कृष्ण का मार्गदर्शन जुड़ा। तृतीय भाव का पराक्रम जब शिव चरणों में झुकता है तभी वास्तविक विजय की प्राप्ति होती है। भगवान किरातेश्वर का नित्य स्मरण मनुष्य के भीतर सोए हुए सात्विक शौर्य को जाग्रत करता है उसे समस्त गुप्त शत्रुओं से मुक्त करता है और उसे इस संसार में एक तेजस्वी धर्मनिष्ठ और सम्मानित व्यक्तित्व बनाकर अंततः परम शांति की प्राप्ति कराता है।
भगवान शिव ने किरात अवतार किस मुख्य कारण से धारण किया था? भगवान शिव ने इंद्रकील पर्वत पर तपस्या कर रहे अर्जुन के गांडीव और बाहुबल के अहंकार का मान मर्दन करने तथा उन्हें पाशुपतास्त्र प्रदान करने हेतु किरात रूप धारण किया था।
मूक असुर कौन था और उसका वध किस प्रकार हुआ था? मूक असुर एक भयानक दैत्य था जिसने अर्जुन पर आक्रमण करने हेतु जंगली शूकर का रूप धारण किया था और उसका वध अर्जुन तथा किरात शिव के संयुक्त बाणों से हुआ था।
अर्जुन को यह कैसे ज्ञात हुआ कि वह वनवासी शिकारी साक्षात भगवान शिव हैं? मल्ल युद्ध में पराजित होकर जब अर्जुन ने पार्थिव शिवलिंग बनाकर पुष्प माला अर्पित की तो वह माला किरात के गले में दिखाई दी जिससे उन्हें शिव के वास्तविक स्वरूप का बोध हुआ।
ज्योतिष में किरात अवतार का संबंध किस भाव और ग्रह से माना जाता है? वैदिक ज्योतिष में किरात अवतार का सीधा संबंध जन्म कुंडली के तृतीय भाव पराक्रम बाहुबल और सेनापति मंगल ग्रह के अहंकार शोधन से माना जाता है।
शत्रु बाधा और पराजय के भय से मुक्ति पाने के लिए किस मंत्र का जाप करना चाहिए? शत्रु दमन और पराक्रम संवर्धन हेतु प्रतिदिन प्रातः काल ॐ किरातेश्वराय नमः अथवा शिव पंचाक्षर मंत्र ॐ नमः शिवाय का 108 बार जाप करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
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