By पं. नीलेश शर्मा
16 कलाओं से युक्त पूर्णावतार कंस वध और चंद्र ग्रह के दोष निवारण का संपूर्ण ज्योतिषीय रहस्य

सनातन वैदिक परंपरा में भगवान श्री हरि विष्णु के आठवें अवतार और द्वापर युग के परम अधिष्ठाता के रूप में पूजित भगवान श्री कृष्ण का स्वरूप 16 कलाओं से परिपूर्ण साक्षात परब्रह्म का पूर्णावतार है। वैदिक ज्योतिष के अंतर्गत मन जल अमृत और भावनाओं के स्वामी चंद्र देव के समस्त दोषों को शांत करने तथा जीवन में मानसिक शांति चुंबकीय आकर्षण और भावनात्मक संतुलन प्राप्त करने के लिए श्री कृष्ण आराधना को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जब जातक की जन्म कुंडली में चंद्रमा नीच का हो केमद्रुम योग से पीड़ित हो अथवा राहु केतु के प्रभाव से ग्रहण दोष या मानसिक अवसाद उत्पन्न कर रहा हो तब भगवान श्री कृष्ण की शरण में जाने से दिव्य आनंद की प्राप्ति होती है। इस पावन अनुष्ठान की तिथि समय और शास्त्रीय घटकों का संपूर्ण विवरण नीचे दी गई तालिका में प्रस्तुत किया गया है।
| शास्त्रीय आयाम | अनुष्ठान विवरण और ज्योतिषीय मान्यता |
|---|---|
| प्रमुख पावन तिथि | भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि श्री कृष्ण जन्माष्टमी |
| दैनिक पूजन समय | अर्धरात्रि का निशीथ काल जब रोहिणी नक्षत्र का संयोग हो |
| अधिष्ठाता स्वरूप | मोर मुकुट वंशीधर और पीतांबर धारी चतुर्भुज व द्विभुज लीलाधर कृष्ण |
| ज्योतिषीय ग्रह संबंध | मन माता जल और अमृत तत्व के अधिपति चंद्र देव |
| मुख्य पूजन सामग्री | माखन मिश्री पंचामृत तुलसी दल वैजयंती पुष्प और पीत चंदन |
| प्रधान वैदिक अनुष्ठान | मधुराष्टकम पाठ गोपाल सहस्त्रनाम और ॐ नमो भगवते वासुदेवाय जप |
| अपेक्षित फल | केमद्रुम दोष शांति मानसिक अवसाद से मुक्ति और वैवाहिक आनंद |
वैदिक इतिहास के अनुसार द्वापर युग के अंतिम चरण में जब पृथ्वी दैत्य रूपी राजाओं के अत्याचार और अधर्म के अकूत भार से त्रस्त हो गई थी तब गौ रूप धारण करके पृथ्वी ब्रह्मा जी के पास पहुंची। ब्रह्मा जी समस्त देवताओं के साथ क्षीरसागर के तट पर पहुंचे और भगवान नारायण की स्तुति की। तब आकाशवाणी हुई कि भगवान श्री हरि स्वयं यदुवंश में अवतार लेकर अधर्म का नाश करेंगे। मथुरा के क्रूर राजा कंस ने अपनी चचेरी बहन देवकी के विवाह के समय यह आकाशवाणी सुनी कि देवकी का आठवां पुत्र ही उसका काल बनेगा। भयभीत होकर कंस ने देवकी और उनके पति वासुदेव को कारागार के अंधकारमय तहखाने में लोहे की बेड़ियों से बांध दिया।
कंस ने एक के बाद एक देवकी के 6 नवजात शिशुओं की पत्थरों पर पटककर निर्मम हत्या कर दी। सातवें गर्भ में शेषनाग के अंश भगवान बलराम पधारे जिन्हें योगमाया ने रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित कर दिया। अंततः भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को घनघोर घटाओं के मध्य रोहिणी नक्षत्र और वृषभ राशि के परम उच्च चंद्रमा के दिव्य संयोग में भगवान श्री कृष्ण का प्राकट्य हुआ। उस समय अर्धरात्रि के सन्नाटे में कारागार के कपाट स्वतः खुल गए पहरेदार योगनिद्रा में लीन हो गए और वासुदेव जी के हाथों पैरों की बेड़ियां टूटकर गिर पड़ीं।
भगवान विष्णु ने पहले अपने शंख चक्र गदा पद्म धारी चतुर्भुज रूप में दर्शन दिया और फिर एक नन्हे शिशु का रूप धारण कर लिया। वासुदेव जी ने उस दिव्य बालक को बांस की डलिया में रखा और मूसलाधार वर्षा के मध्य यमुना नदी को पार करने के लिए निकल पड़े। यमुना जी ने उफनते हुए भगवान के पावन चरणों का स्पर्श किया और उन्हें मार्ग प्रदान किया जबकि नागराज शेषनाग अपने सहस्र फनों की छत्रछाया बनाकर वर्षा से भगवान की रक्षा करते रहे। वासुदेव जी ने गोकुल में नंदबाबा और यशोदा मैया के भवन में बालक को रखकर वहां जन्मी योगमाया रूपी कन्या को लेकर मथुरा लौट आए। इस प्रकार भगवान श्री कृष्ण की पावन बाल लीलाओं का शुभारंभ हुआ।
सनातन धर्म में भगवान के विभिन्न अवतारों में कलाओं का भेद बताया गया है। त्रेतायुग में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम 12 कलाओं के साथ अवतरित हुए थे जबकि भगवान श्री कृष्ण संपूर्ण 16 कलाओं से युक्त होकर अवतरित हुए इसी कारण उन्हें पूर्णावतार कहा जाता है। इन 16 कलाओं में श्री भू कीर्ति इला लीला कांति विद्या विमला उत्कर्षिणी ज्ञान क्रिया योग प्रह्वी सत्य इसना और अनुग्रह सम्मिलित हैं। भगवान श्री कृष्ण का संपूर्ण जीवन यह दर्शाता है कि सांसारिक बंधनों के मध्य रहकर भी उनसे पूर्णतः अप्रभावित कैसे रहा जाता है।
गोकुल और वृंदावन में उन्होंने पूतना तृणावर्त बकासुर अघासुर और कालिया नाग जैसे भयानक असुरों का संहार किया। जब देवराज इंद्र ने अपने अहंकार के वशीभूत होकर ब्रजमंडल पर प्रलयंकारी वर्षा की तब भगवान श्री कृष्ण ने अपनी कनिष्ठिका उंगली पर विशाल गोवर्धन पर्वत को 7 दिनों तक उठाए रखा और इंद्र के गर्व को चूर चूर कर दिया। मथुरा पहुंचकर उन्होंने अत्याचारी कंस का वध किया और अपने माता पिता को कारागार से मुक्त कराया। महाभारत के भीषण धर्मयुद्ध में उन्होंने शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा करते हुए भी अर्जुन के सारथी बनकर कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में श्रीमद्भगवद्गीता का वह शाश्वत ज्ञान प्रदान किया जो आज भी संपूर्ण मानव जाति का मार्गदर्शन कर रहा है।
वैदिक ज्योतिष के महानतम ग्रंथ बृहत् पराशर होरा शास्त्र में महर्षि पराशर ने भगवान श्री हरि विष्णु के सभी प्रमुख अवतारों का संबंध नवग्रहों से स्पष्ट रूप से स्थापित किया है। महर्षि पराशर के अकाट्य सूत्र के अनुसार भगवान श्री कृष्ण साक्षात चंद्र ग्रह का प्रतिनिधित्व करते हैं। वेदों का प्रसिद्ध पुरुष सूक्त उद्घोष करता है कि विराट पुरुष के मन से चंद्रमा की उत्पत्ति हुई है। चंद्रमा मानव चेतना में मन भावनाओं जल कल्पना और अमृत तत्व का अधिष्ठाता ग्रह है।
भगवान श्री कृष्ण का संपूर्ण व्यक्तित्व चंद्रमा के सर्वोच्च और सात्विक स्वरूप को दर्शाता है। उनका प्राकट्य चंद्रवंश में हुआ उनका जन्म रोहिणी नक्षत्र में हुआ जो चंद्रमा की सर्वाधिक प्रिय पत्नी मानी जाती है और उनके जन्म के समय चंद्रमा अपनी परम उच्च राशि वृषभ में स्थित था। भगवान श्री कृष्ण के जीवन में चाहे कितनी भी भीषण विपत्तियां आईं उनका चित्त कभी विचलित नहीं हुआ। कंस का षड्यंत्र हो पूतना का विष हो कालिया का दंश हो अथवा महाभारत का प्रलयंकारी रक्तपात हो श्री कृष्ण के मुखारविंद पर सदैव वही शांत सम्मोहक और अमृतमयी मुस्कान बनी रही। यह अप्रतिम मानसिक संतुलन ही उच्च और बली चंद्रमा का सर्वोच्च लक्षण है।
कालपुरुष की कुंडली में चंद्रमा चतुर्थ भाव का स्वामी होता है और कर्क राशि का अधिपति है। जब किसी जातक की जन्म कुंडली में चंद्रमा के दोनों ओर अर्थात दूसरे और बारहवें भाव में कोई भी शुभ या अशुभ ग्रह न हो सूर्य राहु और केतु को छोड़कर तब अत्यंत कष्टकारी केमद्रुम योग का निर्माण होता है। इस योग के प्रभाव से व्यक्ति संपन्न परिवार में जन्म लेकर भी भीतर से अत्यंत अकेलापन मानसिक दरिद्रता बेचैनी और अज्ञात भय का अनुभव करता है।
इसी प्रकार जब चंद्रमा राहु या केतु के साथ युति बनाता है तब ग्रहण दोष बनता है और जब चंद्रमा नीच राशि वृश्चिक में होता है तब जातक गंभीर मानसिक अवसाद अनिद्रा द्विध्रुवी विकार और भावनात्मक असंतुलन से घिर जाता है। ऐसे जातक का मन सदैव अशक्त रहता है और वह छोटी छोटी बातों पर अत्यधिक भावुक या भयभीत हो जाता है। ऐसी विषम परिस्थितियों में भगवान श्री कृष्ण की शरण लेना एक दिव्य संजीवनी औषधि सिद्ध होता है। श्री वल्लभाचार्य जी द्वारा रचित मधुराष्टकम का नित्य पाठ करने से जातक के अंतर्मन में व्याप्त संपूर्ण नकारात्मकता समाप्त हो जाती है और चंद्रमा की अमृतमयी किरणें उसके चित्त को स्थिर और आनंदित बना देती हैं।
यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में चंद्रमा की महादशा या अंतर्दशा चल रही हो अथवा चंद्रमा पीड़ित होकर मानसिक तनाव अवसाद या माता के स्वास्थ्य में संकट उत्पन्न कर रहा हो तो शास्त्रों में श्री कृष्ण स्वरूप की आराधना के विशेष उपाय बताए गए हैं।
| क्या अवश्य करें | किन गलतियों से सर्वथा दूर रहें |
|---|---|
| भगवान श्री कृष्ण को नित्य तुलसी दल अवश्य अर्पित करें | बिना तुलसी दल के भगवान को कभी भी भोग न लगाएं |
| अपनी माता और बुजुर्ग महिलाओं का सदैव सम्मान करें | माता का अनादर करने अथवा कटु वचन बोलने से बचें |
| प्रतिदिन मानसिक रूप से शांत रहकर गीता के श्लोक पढ़ें | घर में क्लेश अशांति और जल का अपव्यय कदापि न करें |
| पूर्णिमा के दिन चंद्र दर्शन और अर्घ्य समर्पण करें | पूर्णिमा अथवा एकादशी के दिन तामसिक भोजन न लें |
| पूजा में श्वेत चंदन माखन मिश्री और मोरपंख रखें | बिना कुंडली परीक्षण के मोती रत्न धारण करने की भूल न करें |
भगवान श्री कृष्ण का पावन जीवन यह परम सत्य उद्घाटित करता है कि परिस्थितियां मनुष्य के वश में नहीं हो सकतीं परंतु उन परिस्थितियों के प्रति हमारा मानसिक दृष्टिकोण पूर्णतः हमारे अधिकार में होता है। कारागार में जन्म लेकर भी जो उत्सव मना सकता है विष पीकर भी जो अमृत बांट सकता है और युद्ध के भीषण वातावरण में भी जो बांसुरी की मधुर तान छेड़ सकता है वही सच्चा योगी है। चंद्रमा की वास्तविक साधना यही है कि मनुष्य अपने मन को इतना शांत और निर्मल बना ले कि उसमें संसार की कोई भी मलिनता ठहर न सके। जब मनुष्य अपने संपूर्ण कर्मों और भावनाओं को भगवान श्री कृष्ण के पावन चरणों में समर्पित कर देता है तब उसके जीवन का सारा अवसाद समाप्त हो जाता है और वह इस संसार में एक स्थितप्रज्ञ आनंदमय और चुंबकीय व्यक्तित्व बनकर परमानंद को प्राप्त करता है।
भगवान श्री कृष्ण का संबंध किस नवग्रह से माना जाता है? महर्षि पराशर रचित बृहत् पराशर होरा शास्त्र के अनुसार भगवान श्री कृष्ण साक्षात चंद्र ग्रह का प्रतिनिधित्व करते हैं।
श्री कृष्ण जन्माष्टमी किस पावन तिथि को मनाई जाती है? श्री कृष्ण जन्माष्टमी प्रतिवर्ष भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र के संयोग में मनाई जाती है।
भगवान श्री कृष्ण को पूर्णावतार क्यों कहा जाता है? भगवान श्री कृष्ण संपूर्ण 16 दिव्य कलाओं से युक्त होकर अवतरित हुए थे और उन्होंने धर्म प्रेम ज्ञान व लीला का पूर्ण प्राकट्य किया इसलिए उन्हें पूर्णावतार कहा जाता है।
कुंडली में चंद्रमा की शांति और अवसाद से मुक्ति हेतु कौन सा पाठ करना चाहिए? चंद्र दोष शांति और मानसिक अवसाद से मुक्ति के लिए श्री वल्लभाचार्य रचित मधुराष्टकम और ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का नित्य पाठ करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
भगवान श्री कृष्ण की जन्म कुंडली में चंद्रमा किस राशि में स्थित था? भगवान श्री कृष्ण के प्राकट्य के समय चंद्रमा अपनी परम उच्च राशि वृषभ में और अपने प्रिय रोहिणी नक्षत्र में स्थित था।
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