By पं. अमिताभ शर्मा
मोहिनी रूप दर्शन क्रोधासुर उत्पत्ति विशाल उदर और मंगल केतु के विध्वंसक क्रोध का संपूर्ण रहस्य

सनातन वैदिक परंपरा और गणेश पुराण के पावन दर्शन में आद्यावतार के रूप में पूजित भगवान श्री गणेश का लंबोदर स्वरूप मानव चेतना के सबसे विध्वंसक विकार अर्थात क्रोध प्रतिशोध और अशांत उत्तेजना के शमन तथा परम आत्मसंयम की पुनर्स्थापना का सर्वोच्च शिखर है। वैदिक ज्योतिष तथा तत्व विज्ञान के अंतर्गत सौरमंडल के सेनापति पराक्रम व रक्त के अधिपति मंगल देव के उग्र तेज तथा विखंडन व मोक्ष के कारक छाया ग्रह केतु के विस्फोटक प्रभाव के दुर्लभ समन्वय को जाग्रत करने के लिए भगवान लंबोदर की उपासना को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जब जातक की जन्म कुंडली में प्रथम भाव तृतीय भाव षष्ठ भाव अथवा अष्टम भाव में मंगल और केतु की युति अंगारक योग अथवा दृष्टि संबंध होकर व्यक्ति के भीतर अनियंत्रित क्रोध रक्तचाप में वृद्धि वाणी में उग्रता अथवा हिंसक प्रवृत्तियों को जन्म दे रहा हो तब विशाल उदर धारी भगवान लंबोदर की शरण में जाने से अमोघ धैर्य और मानसिक शांति की प्राप्ति होती है। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी संकष्टी चतुर्थी अथवा प्रत्येक मास के शुक्ल पक्ष के मंगलवार और बुधवार के पावन अनुष्ठान का संपूर्ण शास्त्रीय विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।
| शास्त्रीय आयाम | अनुष्ठान विवरण और ज्योतिषीय मान्यता |
|---|---|
| प्रमुख पावन तिथि | आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी अथवा प्रत्येक मंगलवार व बुधवार |
| दैनिक पूजन समय | प्रातः कालीन सूर्योदय वेला अथवा सायंकालीन गोधूलि प्रदोष काल |
| अधिष्ठाता स्वरूप | विशाल ब्रह्मांडीय उदर वाले मूषक पर विराजमान पाश अंकुश और वरद मुद्रा धारी लंबोदर |
| ज्योतिषीय ग्रह व भाव संबंध | प्रथम भाव तृतीय भाव षष्ठ भाव अष्टम भाव रक्त कारक मंगल और विखंडन कारक केतु |
| मुख्य पूजन सामग्री | 21 दूर्वा दल लाल गुड़हल के पुष्प शमी पत्र शुद्ध रक्त चंदन और बेसन के मोदक |
| प्रधान वैदिक अनुष्ठान | लंबोदर स्तोत्र पाठ गणेश अथर्वशीर्ष और ॐ लंबोदराय नमः जप |
| अपेक्षित फल | विध्वंसक क्रोध का नाश शक्ति का संयम मंगल केतु शांति और धैर्य की प्राप्ति |
गणेश पुराण के क्रीड़ा खंड में वर्णित अत्यंत गोपनीय और पावन इतिहास के अनुसार प्राचीन काल में जब देवताओं और दानवों ने मिलकर क्षीरसागर का विशाल समुद्र मंथन किया था तब अमृत कलश को असुरों के हाथों में जाने से बचाने हेतु भगवान श्री हरि विष्णु ने एक परम मोहक दिव्य और अनुपम मोहिनी स्वरूप धारण किया था। मोहिनी रूप इतना अधिक सम्मोहक था कि संपूर्ण त्रिलोकी का विवेक उस सौंदर्य के सम्मुख विचलित हो गया था।
उस अलौकिक मोहिनी रूप के दर्शन की अभिलाषा लेकर जब देवाधिदेव भगवान शिव क्षीरसागर के तट पर पहुंचे तब भगवान विष्णु ने उनके सम्मुख पुनः मोहिनी रूप प्रकट किया। मोहिनी के उस अद्वितीय सौंदर्य को देखकर देवाधिदेव भगवान शिव के अंतःकरण में एक क्षण के लिए तीव्र कामाग्नि और प्रचंड मानसिक विक्षोभ उत्पन्न हुआ।
उस क्षणिक उत्तेजना और परमात्मा की ऊर्जा के स्खलन से अंतरिक्ष में एक अत्यंत भयानक विशालकाय और लाल अंगारों जैसे नेत्रों वाला दैत्य प्रकट हुआ। चूंकि वह दैत्य काम वासना के अवरोध और अंतःकरण के तीव्र विक्षोभ रूपी क्रोध से उत्पन्न हुआ था अतः उसका नाम क्रोधासुर रखा गया। सनातन दर्शन में क्रोध का वास्तविक अर्थ होता है इच्छा पूर्ति में बाधा आने पर उत्पन्न होने वाली वह हिंसक ज्वाला जो मनुष्य के समस्त पुण्य ज्ञान और विवेक को क्षणभर में जलाकर भस्म कर देती है।
क्रोधासुर जन्म लेते ही दैत्यगुरु शुक्राचार्य की शरण में पहुंचा। शुक्राचार्य ने उसके भीतर धधक रही क्रोध की ज्वाला को देखकर उसे भगवान सूर्य देव की घोर तपस्या करने का निर्देश दिया। क्रोधासुर ने सूर्य देव को प्रसन्न करने के लिए सहस्रों वर्षों तक सूर्य की प्रखर किरणों के सम्मुख खड़े होकर पंचाग्नि तप किया।
उसकी दुष्कर साधना से संतुष्ट होकर जब भगवान सूर्य प्रकट हुए तब क्रोधासुर ने यह वरदान मांग लिया कि वह तीनों लोकों में किसी भी देवता दानव यक्ष गंधर्व अथवा अस्त्र शस्त्र से कभी पराजित न हो सके। सूर्य देव से अजेयता का वरदान प्राप्त करते ही क्रोधासुर का क्रोध संपूर्ण सीमाओं को लांघ गया।
जब क्रोधासुर के संहारक प्रकोप से संपूर्ण चराचर जगत में त्राहिमाम मच गया और पृथ्वी रक्त से लाल हो गई तब समस्त देवता और ऋषि मुनि भगवान सूर्य देव की शरण में पहुंचे। देवताओं ने कहा कि हे सूर्य देव आपके दिए गए वरदान के कारण ही क्रोधासुर ने धर्म और मर्यादा को नष्ट कर दिया है अतः अब आप ही इसके विनाश का उपाय बताएं।
भगवान सूर्य देव ने ध्यानस्थ होकर देखा और उन्होंने देवताओं को उपदेश दिया कि क्रोधासुर वास्तव में मानव मन का वह अनियंत्रित क्रोध है जिसे किसी बाण अथवा तलवार से नहीं काटा जा सकता क्योंकि क्रोध को तलवार से काटने का प्रयास करने पर वह और अधिक भड़क उठता है। क्रोध को केवल वही सत्ता शांत कर सकती है जिसके भीतर अगाध सहनशीलता और संपूर्ण ब्रह्मांड के विष को पचाने का सामर्थ्य हो।
भगवान सूर्य देव ने समस्त देवताओं को आदिदेव भगवान श्री गणेश के उस परम गोपनीय विग्रह की आराधना करने का परामर्श दिया जो माया से परे और ब्रह्मांडीय धैर्य के प्रतीक हैं।
समस्त देवताओं ने एक पावन सरोवर के तट पर बैठकर सहस्रों वर्षों तक निराहार रहकर गणेश मंत्र का सस्वर अनुष्ठान आरंभ किया। देवताओं की उस निष्कपट पुकार से संतुष्ट होकर भगवान गणेश अपने पांचवें प्रमुख अवतार के रूप में लंबोदर स्वरूप में प्रकट हुए।
भगवान लंबोदर का स्वरूप अत्यंत भव्य शांत और गंभीर था। उनका मुख एक विशाल हाथी का था और उनकी सूंड बाईं ओर वक्र थी। उनका उदर अत्यंत लंबा और विशाल था जिसके भीतर संपूर्ण सृष्टि समाई हुई थी। उनके चार हाथ थे जिनमें पाश अंकुश मोदक और अभय मुद्रा सुशोभित थी। वे एक शांत मूषक पर सवार होकर प्रकट हुए थे। उनके प्राकट्य के साथ ही अंतरिक्ष से शीतल जल की वर्षा होने लगी जिससे तीनों लोकों में फैली हुई क्रोध की तपन शांत होने लगी।
शाक्त और गाणपत्य तत्व दर्शन में भगवान गणेश का लंबोदर स्वरूप अद्वैत वेदांत और योग शास्त्र का परम गुह्य संदेश प्रदान करता है। लंब का अर्थ होता है बहुत बड़ा अथवा लंबा और उदर का अर्थ होता है पेट अर्थात जिनका पेट इतना विशाल है कि उसमें संपूर्ण ब्रह्मांड समाया हुआ है।
भगवान लंबोदर का यह लंबा उदर इस बात का साक्षात प्रमाण है कि जो मनुष्य अपने भीतर उठने वाले समस्त कटु वचनों अपमान निंदा और क्रोध की ज्वाला को अपने भीतर पचा लेता है वही सच्चा महापुरुष बनता है। साधारण मनुष्य तनिक सा अपमान होने पर क्रोध से जलने लगता है और प्रतिशोध लेने हेतु तत्पर हो जाता है किंतु भगवान लंबोदर संसार के समस्त विष और आघातों को अपने उदर में धारण करके भी शांत बने रहते हैं।
जब क्रोधासुर को गुप्तचरों से सूचना मिली कि देवता लंबोदर नामक महाशक्ति की शरण में गए हैं तब उसने क्रोध से लाल होकर अपनी सेना को युद्ध की आज्ञा दी। क्रोधासुर ने अपने दो अत्यंत भयानक सेनापतियों हिंसा और संताप को एक अक्षौहिणी सेना के साथ आगे भेजा।
भगवान लंबोदर ने अपने अंकुश के एक ही प्रहार से हिंसा और संताप के समस्त अस्त्रों को छिन्न भिन्न कर दिया और उनकी सेना को परास्त कर दिया। यह देखकर क्रोधासुर स्वयं अपने विशाल रथ पर सवार होकर युद्ध भूमि में पहुंचा और उसने भगवान लंबोदर पर प्रलयंकारी अग्नि बाणों की वर्षा आरंभ कर दी।
भगवान लंबोदर मंद मुस्कान के साथ अपने स्थान पर अडिग खड़े रहे। क्रोधासुर द्वारा छोड़े गए समस्त विषैले और विनाशकारी अस्त्र भगवान के लंबे उदर में समाकर विलीन हो गए। संपूर्ण संसार का क्रोध मिलकर भी भगवान लंबोदर के उदर की शीतलता को तनिक भी तपा न सका। इसके पश्चात भगवान लंबोदर ने अपना दिव्य पाश फेंका जो सीधे क्रोधासुर के कंठ में जाकर लिपट गया।
भगवान लंबोदर ने अपनी अगाध करुणा का परिचय देते हुए उस पर अपना वरद हस्त रखा और उसे अभय दान दिया। भगवान ने क्रोधासुर को आदेश दिया कि तुम अब से केवल उन्हीं मनुष्यों के पास जाओगे जो अधर्म अज्ञान और विवेकहीनता का आचरण करते हैं और जो भक्त मेरे लंबोदर स्वरूप का ध्यान करेंगे तुम उनके समीप कभी नहीं जाओगे। क्रोधासुर नतमस्तक होकर पाताल लोक चला गया।
वैदिक ज्योतिष के महान आधार ग्रंथ बृहत् पराशर होरा शास्त्र में ग्रहों के आत्मिक और शारीरिक प्रभावों का अत्यंत सूक्ष्म विश्लेषण मिलता है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से भगवान लंबोदर का पावन स्वरूप सीधे तौर पर मंगल देव और छाया ग्रह केतु के उस विध्वंसक क्रोध को शांत करने वाली सर्वोच्च महाशक्ति है।
मंगल ग्रह भचक्र में अग्नि तत्व रक्त पराक्रम और साहस का अधिपति है। जब मंगल दूषित होता है तो वह मनुष्य को क्रोधी आक्रामक और हिंसक बना देता है। वहीं दूसरी ओर छाया ग्रह केतु को अचानक होने वाले विस्फोटों गुप्त संताप और विवेकहीन प्रतिक्रिया का कारक माना जाता है।
जब किसी जातक की जन्म कुंडली में मंगल और केतु एक साथ बैठते हैं अथवा एक दूसरे पर दृष्टि डालते हैं तो अंगारक योग का एक अत्यंत उग्र रूप बनता है।
आधुनिक युग में मानव समाज की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि अत्यधिक तनाव कार्यक्षेत्र की प्रतिस्पर्धा और पारिवारिक कलह के कारण व्यक्ति के भीतर एक छोटा सा क्रोधासुर निरंतर जीवित रहता है। व्यक्ति अपने क्रोध के वेग में अपनों को ही अपमानित कर बैठता है जिसके कारण हंसते खेलते परिवार बिखर जाते हैं और व्यापारिक संबंध समाप्त हो जाते हैं। चिकित्सा विज्ञान भी यह स्वीकार करता है कि अत्यधिक क्रोध हृदय रोग उच्च रक्तचाप और मानसिक अवसाद का मुख्य कारण है।
भगवान लंबोदर साक्षात उस आध्यात्मिक अमृत के दाता हैं जो चित्त के इस विष को एक ही क्षण में शांत कर देते हैं। जिस प्रकार भगवान ने क्रोधासुर के समस्त बाणों को अपने भीतर पचा लिया था उसी प्रकार जो व्यक्ति निष्कपट भाव से लंबोदर स्तोत्र का पाठ करता है उसके भीतर क्षमा सहनशीलता और शक्ति का संयम प्रकट होने लगता है।
यह साधना उन लोगों के लिए साक्षात संजीवनी है जो अपने क्रोधी स्वभाव से परेशान हैं और जो अपनी उग्र वाणी के कारण अपने जीवन में नुकसान उठा रहे हैं। लंबोदर कृपा से मनुष्य का मन शीतल होता है और वह कठिन से कठिन परिस्थिति में भी शांत रहकर सही निर्णय लेने में समर्थ होता है।
यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में मंगल और केतु पीड़ित हों बात बात पर अत्यधिक क्रोध आता हो रक्तचाप अनियंत्रित रहता हो अथवा शत्रुओं का भय सताता हो तो शास्त्रों में भगवान लंबोदर की प्रसन्नता हेतु अत्यंत प्रामाणिक वैदिक उपाय बताए गए हैं।
| क्या अवश्य करें | किन गलतियों से सर्वथा दूर रहें |
|---|---|
| प्रतिदिन प्रातः काल उठकर अपने अंतःकरण को शांत और धैर्यवान रखने का संकल्प लें | किसी भी परिस्थिति में आवेश में आकर अपशब्द बोलने अथवा हिंसा करने से बचें |
| भगवान लंबोदर को सदैव ताजी हरी दूर्वा लाल पुष्प और शुद्ध मोदक अर्पित करें | अपने बल अधिकार अथवा शारीरिक शक्ति का किसी निर्बल पर दुरुपयोग न करें |
| मंगलवार और बुधवार के दिन पूर्ण स्वच्छता ब्रह्मचर्य और सात्विक आहार लें | तामसिक भोजन मदिरा और अत्यधिक गर्म व तीखे मसालों से सर्वथा दूर रहें |
| अपने जीवन में क्षमा सहनशीलता और दूसरों की गलतियों को भूलने का अभ्यास करें | अपने मन में प्रतिशोध की भावना पालने अथवा व्यर्थ विवाद बढ़ाने से बचें |
| पूजा में शुद्ध रक्त चंदन पीतल अथवा तांबे के बर्तन और गाय के घी का प्रयोग करें | बिना स्नान किए अथवा अशुद्ध अवस्था में पूजा के स्थान पर जाने से बचें |
भगवान लंबोदर का पावन अवतार संपूर्ण मानव जाति को यह सनातन शिक्षा प्रदान करता है कि सच्चा बलवान वह नहीं है जो दूसरों पर क्रोध प्रकट करके अपनी शक्ति का प्रदर्शन करे अपितु सच्चा वीर वह है जो क्रोध आने पर भी अपनी शक्ति को संयमित कर ले। क्रोधासुर का मान मर्दन यह सिद्ध करता है कि क्रोध चाहे कितना भी भयंकर क्यों न हो अंततः वह धैर्य और क्षमा के सम्मुख पराजित हो ही जाता है। भगवान लंबोदर का विशाल उदर हमें यह सिखाता है कि जीवन में मिलने वाले कटु अनुभवों अपमानों और आघातों को अपने भीतर पचाकर शांत रहना ही वास्तविक आध्यात्मिक सिद्धि है। मंगल का पराक्रम जब केतु के सात्विक विवेक और लंबोदर के धैर्य से जुड़ जाता है तब मनुष्य संसार में अद्वितीय यश और प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। भगवान लंबोदर का नित्य स्मरण मनुष्य के जीवन से समस्त क्रोध रक्त दोषों और ग्रह बाधाओं को समाप्त करके उसे एक शांत धैर्यवान और सम्मानित व्यक्तित्व बनाकर अंततः परम शांति की प्राप्ति कराता है।
भगवान गणेश ने लंबोदर अवतार किस मुख्य असुर के संहार हेतु लिया था? भगवान गणेश ने भगवान शिव के कामाग्नि विक्षोभ से उत्पन्न दैत्य क्रोधासुर का अहंकार तोड़ने और उसका दमन करने हेतु लंबोदर अवतार धारण किया था।
क्रोधासुर का प्राकट्य किस ऐतिहासिक घटना के समय हुआ था? समुद्र मंथन के समय भगवान विष्णु के मोहिनी रूप को देखकर भगवान शिव के अंतःकरण में जो मानसिक विक्षोभ और कामाग्नि उत्पन्न हुई थी उससे क्रोधासुर का जन्म हुआ था।
भगवान लंबोदर का लंबा उदर किस बात का प्रतीक माना जाता है? भगवान लंबोदर का लंबा उदर संपूर्ण ब्रह्मांड को अपने भीतर समाहित करने तथा संसार के समस्त अपमान क्रोध और विष को पचाकर शांत रहने का प्रतीक है।
ज्योतिष में भगवान लंबोदर का संबंध किन प्रमुख ग्रहों से माना जाता है? वैदिक ज्योतिष में भगवान लंबोदर का सीधा संबंध पराक्रम के कारक मंगल ग्रह और विखंडन के कारक छाया ग्रह केतु के विध्वंसक क्रोध को शांत करने से है।
क्रोध नियंत्रण और मानसिक शांति पाने हेतु किस मंत्र का जाप सर्वोत्तम है? अत्यधिक क्रोध को शांत करने और धैर्य की प्राप्ति हेतु प्रतिदिन प्रातः काल ॐ लंबोदराय नमः अथवा गणेश अथर्वशीर्ष का 108 बार शांत मन से जाप करना सर्वोत्तम माना गया है।
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