महाकाली अवतार और काल चक्र क्या है?

By पं. अमिताभ शर्मा

दारुक रक्तबीज का संहार प्रथम महाविद्या और शनि राहु के तांत्रिक नियंत्रण का संपूर्ण वैदिक रहस्य

माँ महाकाली अवतार कथा और शनि राहु रहस्य

महाकाली पूजन मुहूर्त और शास्त्रीय अनुष्ठान विधान

सनातन वैदिक परंपरा और शाक्त आगम दर्शन में आद्याशक्ति भगवती दुर्गा के परम संहारक स्वतंत्र और करुणामयी स्वरूप के रूप में पूजित माता महाकाली का प्राकट्य काल के नियमन आसुरी वृत्तियों के विनाश और शरणागत भक्तों के अभय का सर्वोच्च शिखर है। वैदिक ज्योतिष तथा तंत्र शास्त्र के अंतर्गत सौरमंडल के दंडाधिकारी कर्म कारक शनि देव तथा मायावी छाया ग्रह राहु के समस्त तांत्रिक दोषों को शांत करने के लिए दसमहाविद्याओं में प्रथम भगवती महाकाली की आराधना को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जब जातक की जन्म कुंडली में शनि की साढ़ेसाती ढैय्या अथवा राहु की महादशा के कारण जीवन में अज्ञात भय मानसिक मतिभ्रम प्रेत बाधा तंत्र बाधा और अकाल मृत्यु का साया मंडराने लगे तब काल की स्वामिनी माँ काली की शरण में जाने से अमोघ सुरक्षा प्राप्त होती है। इस पावन अनुष्ठान की तिथि समय और शास्त्रीय घटकों का संपूर्ण विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।

शास्त्रीय आयाम अनुष्ठान विवरण और ज्योतिषीय मान्यता
प्रमुख पावन तिथि कार्तिक कृष्ण अमावस्या कालरात्रि व दीवाली अथवा प्रत्येक मास की कृष्ण चतुर्दशी व अष्टमी
दैनिक पूजन समय अर्धरात्रि का निशीथ काल अथवा सायंकालीन प्रदोष काल
अधिष्ठाता स्वरूप दिगंबरा चतुर्भुजा खप्पर और खड्ग धारिणी भगवान शिव के वक्ष पर आरूढ़ महाकाली
ज्योतिषीय ग्रह व भाव संबंध अष्टम भाव द्वादश भाव कर्म दंडाधिकारी शनि देव और छाया ग्रह राहु
मुख्य पूजन सामग्री शुद्ध सरसों का तेल काले तिल गुड़हल के लाल पुष्प नीलकमल भस्म और मदिरा नैवेद्य
प्रधान वैदिक अनुष्ठान श्री काली सहस्रनाम पाठ कर्पूरादि स्तोत्र और ॐ क्रीं कालिकायै नमः जप
अपेक्षित फल शनि राहु दोष शांति तांत्रिक बाधा निवारण अकाल मृत्यु रक्षा और मोक्ष

दारुक दैत्य का आतंक और शिव का विषपान

मार्कंडेय पुराण और लिंग महापुराण के अत्यंत पावन आख्यानों के अनुसार प्राचीन काल में दारुक नामक एक अत्यंत क्रूर और महाबली असुर हुआ जिसने कठोर तपस्या करके ब्रह्मा जी से यह वरदान प्राप्त कर लिया था कि उसका वध किसी भी पुरुष देवता दानव अथवा यक्ष द्वारा कभी नहीं हो सकेगा और वह केवल किसी असाधारण स्त्री शक्ति द्वारा ही मारा जा सकेगा। इस अजेय वरदान के अहंकार में अंध होकर दारुक ने तीनों लोकों में धर्म और सत्य का विनाश करना आरंभ कर दिया। उसने समस्त ऋषियों के आश्रमों को नष्ट कर दिया और स्वर्ग पर अधिकार करके देवराज इंद्र सहित समस्त देवताओं को निष्कासित कर दिया।

दारुक के इस अत्याचार से पीड़ित होकर समस्त देवता और ऋषि मुनि देवाधिदेव भगवान शिव की शरण में कैलाश पहुंचे। देवताओं ने भगवान शिव से प्रार्थना की कि हे महादेव इस दुष्ट दानव का संहार केवल आपकी शक्ति द्वारा ही संभव है। भगवान शिव ने देवताओं की करुण पुकार सुनकर अपनी अर्धांगिनी भगवती पार्वती की ओर देखा। भगवान शिव ने स्मरण कराया कि समुद्र मंथन के समय जो हलाहल विष उन्होंने अपने कंठ में धारण किया था उस विष का संहारक अंश उनके भीतर विद्यमान है।

माता पार्वती ने भगवान शिव के उस नीलकंठ रूपी संहारक तेज में प्रवेश किया। भगवान शिव के कंठ में स्थित उस प्रलयंकारी विष और शिव की क्रोधाग्नि से संयुक्त होकर भगवती ने एक अत्यंत विकराल और संहारक रूप धारण किया। माता पार्वती के उस तेज से साक्षात महाकाली का प्राकट्य हुआ। उनके शरीर का वर्ण प्रलयकालीन सजल मेघों के समान गहरा कृष्ण था उनके तीन नेत्र प्रज्वलित अंगारों की भांति दहक रहे थे और उनकी भयानक गर्जना से दसों दिशाएं कंपायमान हो उठीं। माँ काली ने अपने दिव्य गणों के साथ दारुक की सेना पर आक्रमण किया और पलक झपकते ही दारुक के अहंकार को चूर चूर करके उसका मस्तक काट डाला और उसका संहार संपन्न किया।

रक्तबीज का वध और खप्पर में रक्तपान

श्रीमद्देवीभागवत और दुर्गा सप्तशती के अष्टम अध्याय में वर्णित इतिहास के अनुसार जब शुंभ और निशुंभ के सेनापति के रूप में रक्तबीज नामक असुर युद्ध भूमि में उतरा तब एक अत्यंत विचित्र और भयानक संकट उपस्थित हो गया। रक्तबीज को यह वरदान प्राप्त था कि उसके शरीर से रक्त की जितनी भी बूंदें पृथ्वी पर गिरेंगी उन प्रत्येक बूंदों से उसी के समान बलशाली पराक्रमी और विशालकाय सहस्रों रक्तबीज तत्क्षण उत्पन्न हो जाएंगे।

जब युद्ध भूमि में मातृकाओं और भगवती चंडिका ने अपने दिव्य बाणों से रक्तबीज पर प्रहार किया तब उसके शरीर से रक्त की धाराएं बहने लगीं। जैसे ही उस रक्त की बूंदों ने धरती का स्पर्श किया वैसे ही लाखों करोड़ों रक्तबीज प्रकट होकर संपूर्ण आकाश और पृथ्वी पर छा गए। देवता यह भयानक दृश्य देखकर भय से कांपने लगे क्योंकि रक्तबीज का संहार असंभव प्रतीत हो रहा था।

तब भगवती दुर्गा के भाल पटल अर्थात ललाट से अत्यंत तीव्र क्रोध के साथ एक प्रलयंकारी गर्जना हुई और साक्षात माँ महाकाली प्रकट हुईं। उनका स्वरूप अत्यंत भयावह और विस्मयकारी था। वे दिगंबरा थीं अर्थात संपूर्ण दिशाएं ही उनके वस्त्र थीं। उनके बाल खुले हुए थे उनकी जीभ बाहर निकली हुई थी उनके हाथों में तीक्ष्ण खड्ग नरमुंड और खप्पर सुशोभित था और उनके गले में 50 नरमुंडों की पावन माला शोभायमान थी।

माँ दुर्गा ने काली को संबोधित करते हुए आदेश दिया कि हे चामुंडे तुम अपना मुख अत्यंत विशाल करो और इस असुर के शरीर से गिरने वाली रक्त की प्रत्येक बूंद को धरती पर गिरने से पूर्व ही अपने मुख में समेट लो।

  • माँ काली ने युद्ध भूमि में अपना मुख इतना विशाल फैला लिया कि रक्तबीज का संपूर्ण रक्त सीधे उनके मुख में गिरने लगा।
  • जैसे ही भगवती दुर्गा ने अपने शूल से रक्तबीज के वक्षस्थल पर प्रहार किया वैसे ही माँ काली ने उसके समस्त रक्त का पान कर लिया।
  • धरती पर रक्त की एक भी बूंद न गिरने के कारण नए असुरों की उत्पत्ति रुक गई।
  • माँ काली ने रक्त से उत्पन्न हुए पुराने असुरों को भी चबाकर उनका भक्षण कर लिया।
  • अंत में रक्तहीन होकर महाबली रक्तबीज भूमि पर निष्प्राण होकर गिर पड़ा और धर्म की विजय हुई।

शिव का चरण तले शयन और संहारक नृत्य की शांति

रक्तबीज और उसकी आसुरी सेना का संहार करने के उपरांत भी माँ महाकाली का संहारक क्रोध और उग्र भाव शांत नहीं हुआ। आसुरी रक्त के प्रभाव और युद्ध के प्रचंड उन्माद में भगवती महाकाली संपूर्ण युद्ध भूमि में एक संहारक तांडव नृत्य करने लगीं। उनके पैरों के आघात इतने भयानक थे कि पृथ्वी पाताल की ओर धंसने लगी और पर्वतों के शिखर टूट टूट कर गिरने लगे। संपूर्ण ब्रह्मांड में प्रलय जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई और समस्त देवता भयभीत होकर पुकारने लगे कि यदि यह नृत्य नहीं रुका तो संपूर्ण सृष्टि एक ही क्षण में भस्म हो जाएगी।

समस्त देवताओं ने देवाधिदेव भगवान शिव की शरण ली और उनसे इस संहार को रोकने की प्रार्थना की। भगवान शिव जानते थे कि इस समय माँ काली की क्रोधाग्नि को कोई भी शक्ति युद्ध द्वारा शांत नहीं कर सकती क्योंकि वे स्वयं साक्षात महाकाल की पराशक्ति हैं। अतः भगवान शिव ने प्रेम और समर्पण का मार्ग चुना।

भगवान शिव बिना किसी अस्त्र शस्त्र के उस युद्ध भूमि में पहुंचे और जिस मार्ग पर माँ काली उन्मत्त होकर नृत्य कर रही थीं उसी मार्ग पर वे एक निष्प्राण शव की भांति भूमि पर लेट गए। माँ काली नृत्य के तीव्र वेग में आगे बढ़ रही थीं। जैसे ही उन्होंने अपना एक पैर आगे बढ़ाया वैसे ही उनका पावन चरण सीधे भगवान शिव के वक्षस्थल पर पड़ गया।

जैसे ही माँ काली ने देखा कि उनके पैरों के नीचे उनके अपने सनातन स्वामी देवाधिदेव महादेव विराजमान हैं वैसे ही उनका समस्त संहारक वेग एक ही क्षण में स्तंभित हो गया। लज्जा और पश्चाताप के भाव से उनकी लाल जीभ बाहर निकल आई। भगवान शिव ने मुस्कुराते हुए अपनी करुणामयी दृष्टि से देवी की ओर देखा। उस पावन स्पर्श से माँ काली का क्रोध तत्काल शांत हो गया और उनका उग्र भाव वात्सल्यमयी जगदंबा के रूप में परिवर्तित हो गया। यह दृश्य पुरुष और प्रकृति शिव और शक्ति तथा चेतना और ऊर्जा के परम संतुलन का अमर प्रतीक बन गया।

दसमहाविद्याओं में प्रथम महाविद्या का दार्शनिक रहस्य

शाक्त परंपरा और तंत्र शास्त्र में 10 महाविद्याओं का वर्णन मिलता है जिनमें भगवती महाकाली को प्रथम महाविद्या का सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। काल शब्द का अर्थ समय भी है और मृत्यु भी है। माँ काली काल अर्थात समय का भी भक्षण करने वाली परम सत्ता हैं इसलिए उन्हें कालिका कहा जाता है। प्रलय के समय जब सूर्य चंद्र तारे और संपूर्ण ब्रह्मांड नष्ट हो जाते हैं तब केवल परम शून्यरूप अंधकार शेष रहता है और उस अंधकार की स्वामिनी केवल भगवती महाकाली ही होती हैं।

माँ काली के गले में जो 50 नरमुंडों की माला सुशोभित है वे संस्कृत वर्णमाला के 50 अक्षरों अ से क्ष तक के प्रतीक हैं जिन्हें मातृका वर्ण कहा जाता है जो संपूर्ण वांग्मय और सृष्टि के सृजन का आधार हैं। उनकी कटी में बंधे हुए कटे हुए हाथ मनुष्य के कर्म बंधनों के प्रतीक हैं जिन्हें देवी अपने खड्ग से काटकर जीव को मोक्ष प्रदान करती हैं। उनका खुला हुआ केश रूप पूर्ण स्वतंत्रता और माया के बंधनों से मुक्ति का परिचायक है। माँ काली केवल संहार की देवी नहीं हैं अपितु वे अज्ञान को मारकर आत्मा को अमरत्व प्रदान करने वाली परम दयालु माता हैं।

क्या शनि और राहु के दोष महाकाली से शांत होते हैं?

वैदिक ज्योतिष के महानतम ग्रंथ बृहत् पराशर होरा शास्त्र और तंत्र ग्रंथों के अनुसार नवग्रहों की पीड़ाओं को शांत करने के लिए महाविद्याओं की साधना परम फलदायी मानी गई है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से माँ महाकाली का सीधा संबंध शनि देव और छाया ग्रह राहु से है।

शनि ग्रह काल कर्म दण्ड मंद गति और जीवन के कठोर संघर्षों का स्वामी है जबकि राहु अज्ञात भय भ्रम मतिभ्रम विष और आकस्मिक दुर्घटनाओं का अधिपति है। जब किसी जातक की कुंडली में शनि की साढ़ेसाती अथवा ढैय्या चल रही हो या राहु के कारण कालसर्प दोष और ग्रहण दोष निर्मित हो रहा हो तो व्यक्ति का मानसिक संतुलन बिगड़ने लगता है। उसे रात में डरावने स्वप्न आते हैं उसके भीतर अज्ञात भय बना रहता है और समाज में झूठे कलंक लगते हैं।

माँ महाकाली साक्षात काल की स्वामिनी हैं अतः कालपुरुष के दंडाधिकारी शनि और कालसर्प के स्वामी राहु दोनों ही माँ काली के सम्मुख नतमस्तक रहते हैं। जब कोई साधक माँ काली की शरण में जाता है तो शनि का क्रूर दंड एक वरदान में बदल जाता है और राहु का समस्त मायावी भ्रम क्षणभर में नष्ट हो जाता है। माँ काली की कृपा से जातक के भीतर असीम आत्मबल और निर्भयता का संचार होता है।

तांत्रिक व्याधियों और प्रेत बाधा से मुक्ति का विज्ञान

मानव जीवन में कई बार ऐसी विषम परिस्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं जहां चिकित्सा विज्ञान भी असहाय हो जाता है। अकारण शरीर का सूखना घर में निरंतर कलह बने रहना व्यापार का अचानक ठप हो जाना अथवा किसी अदृश्य नकारात्मक शक्ति का निरंतर आभास होना प्रायः षष्ठ भाव और अष्टम भाव के दूषित होने का परिणाम होता है।

माँ महाकाली को श्मशान वासिनी और समस्त तामसिक शक्तियों की संहारिणी कहा गया है। तंत्र शास्त्र के अनुसार कोई भी मारण उच्चाटन विद्वेषण अथवा मूठ का प्रयोग उस जातक के पास भी नहीं फटक सकता जिसके ऊपर माँ काली का सुरक्षा कवच हो। जो व्यक्ति प्रतिदिन माँ काली के मंत्रों का ध्यान करता है उसके चारों ओर एक अत्यंत प्रखर और दिव्य अग्निकवच निर्मित हो जाता है। माँ काली की कृपा से समस्त प्रकार के तांत्रिक अभिचार पलटकर उसी व्यक्ति पर चले जाते हैं जिसने वे कुत्सित प्रयोग किए होते हैं।

शनि राहु दोष शांति और भय मुक्ति के अचूक उपाय

यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में शनि और राहु के कारण जीवन में भारी अशांति हो अकाल मृत्यु का भय बना रहता हो अथवा शत्रुओं के कारण संकट उपस्थित हो रहा हो तो शास्त्रों में माँ काली की प्रसन्नता हेतु अत्यंत प्रामाणिक वैदिक उपाय बताए गए हैं।

  • प्रत्येक शनिवार अथवा मंगलवार की संध्या को सूर्यास्त के पश्चात घर के पूजा स्थल अथवा किसी प्राचीन मंदिर में मिट्टी के दीपक में शुद्ध कड़वा सरसों का तेल डालकर माँ काली के सम्मुख प्रज्वलित करें।
  • प्रतिदिन प्रातः काल अथवा सायंकाल स्नान के उपरांत पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें और रुद्राक्ष की माला से पावन बीज मंत्र ॐ क्रीं कालिकायै नमः अथवा ॐ क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं हूं हूं दक्षिणे कालिके क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं हूं हूं स्वाहा का कम से कम 108 बार शांत मन से जाप करें।
  • प्रत्येक मंगलवार और शनिवार को माँ काली को 108 ताजे लाल गुड़हल के पुष्पों की माला और 21 साबुत लौंग अर्पित करें जिससे समस्त प्रकार के ग्रह दोष शांत होते हैं।
  • अकाल मृत्यु और गंभीर रोगों से मुक्ति पाने हेतु नित्य महर्षि वेदव्यास रचित काली कवच अथवा कर्पूरादि स्तोत्र का पाठ करें जो शरीर को अभेद्य सुरक्षा प्रदान करता है।
  • जातक को अपनी शारीरिक अवस्था और योग्य ज्योतिर्विद के परामर्श के अनुसार सात मुखी अथवा आठ मुखी नेपाली रुद्राक्ष काले रेशमी धागे में पिरोकर गले में धारण करना चाहिए जो शनि और राहु की नकारात्मक ऊर्जा को भस्म करता है।
  • प्रत्येक शनिवार को आवारा काले कुत्तों अथवा कौवों को सरसों के तेल से चुपड़ी हुई ताजी रोटी खिलाएं और निर्धन सफाई कर्मचारियों को काले तिल और गर्म वस्त्रों का आदरपूर्वक दान करें।

महाकाली साधना और आचरण के शास्त्रीय नियम

क्या अवश्य करें किन गलतियों से सर्वथा दूर रहें
प्रतिदिन प्रातः काल और सायंकाल माँ काली और भगवान शिव का स्मरण करें केवल किसी का अनिष्ट करने अथवा बदले की भावना से पूजा कभी न करें
शनिवार और मंगलवार के दिन पूर्ण ब्रह्मचर्य और सात्विक आहार का पालन करें मदिरा मांसाहार और किसी भी प्रकार के तामसिक भोजन से सर्वथा दूर रहें
पूजा में शुद्ध सरसों का तेल लाल पुष्प और लोबान की धूप अर्पित करें बिना गुरु आज्ञा के श्मशान साधना अथवा उग्र वाममार्गी तंत्र में न उलझें
अपने माता पिता स्त्रियों और असहाय दुर्बल प्राणियों का सदैव आदर करें कभी भी किसी निर्बल व्यक्ति को सताने अथवा अपशब्द बोलने से बचें
नित्य पूजा के समय मन में पूर्ण समर्पण और वात्सल्य भाव बनाए रखें बिना कुंडली मिलान किए नीलम अथवा गोमेद रत्न पहनने की भूल न करें

परम निर्भयता और कालजयी चेतना का जागरण

भगवती महाकाली का पावन अवतार संपूर्ण जगत को यह सनातन सत्य सिखाता है कि जिसे संसार मृत्यु और संहार समझता है वह वास्तव में नवीन सृजन का ही एक अनिवार्य अंग है। जब तक पुरानी सड़ी गली व्यवस्था और आसुरी वृत्तियों का विनाश नहीं होता तब तक नव जीवन का उदय संभव नहीं है। रक्तबीज का वध यह सिखाता है कि मनुष्य के भीतर की काम क्रोध और लोभ रूपी वासनाएं एक बार कटने पर पुनः सहस्रों रूपों में जन्म लेती हैं और उन्हें केवल माँ काली रूपी तीव्र वैराग्य और ज्ञान के खप्पर में ही भस्म किया जा सकता है। भगवान शिव का उनके चरणों के नीचे लेटना यह सिद्ध करता है कि शक्ति जब अपने परम स्रोत शिव से जुड़ती है तभी संपूर्ण सृष्टि में शांति स्थापित होती है। माँ महाकाली का नित्य स्मरण मनुष्य के भीतर सोई हुई अमोघ निर्भयता को जाग्रत करता है उसे शनि और राहु के समस्त बंधनों से मुक्त करता है और उसे इस संसार में एक तेजस्वी निडर और सम्मानित व्यक्तित्व बनाकर अंततः परम पद की प्राप्ति कराता है।

FAQ

माँ महाकाली का प्राकट्य किस मुख्य उद्देश्य से हुआ था? माँ महाकाली का प्राकट्य दारुक और रक्तबीज जैसे भयंकर असुरों का संहार करने देवताओं की रक्षा करने और काल के संहारक वेग को संतुलित करने हेतु हुआ था।

भगवान शिव माँ काली के चरणों के नीचे क्यों लेट गए थे? रक्तबीज के वध के पश्चात माँ काली के संहारक नृत्य से संपूर्ण ब्रह्मांड को नष्ट होने से बचाने और उनके क्रोध को शांत करने हेतु भगवान शिव उनके मार्ग में लेट गए थे।

रक्तबीज असुर का वध माँ काली ने किस प्रकार किया? माँ काली ने अपना मुख अत्यंत विशाल फैलाकर रक्तबीज के शरीर से निकलने वाले समस्त रक्त का धरती पर गिरने से पूर्व ही पान कर लिया जिससे वह निष्प्राण होकर मारा गया।

ज्योतिष में माँ महाकाली का संबंध किन प्रमुख ग्रहों से है? वैदिक ज्योतिष में माँ महाकाली का सीधा संबंध कर्म दंडाधिकारी शनि देव और मायावी छाया ग्रह राहु से है जिनके समस्त क्रूर दोष काली साधना से शांत होते हैं।

शनि की साढ़ेसाती और राहु के भय से मुक्ति हेतु किस मंत्र का जाप करना चाहिए? शनि की साढ़ेसाती और राहु के भय से मुक्ति पाने हेतु प्रतिदिन प्रातः काल अथवा सायंकाल ॐ क्रीं कालिकायै नमः मंत्र का 108 बार जाप करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

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लेखक

पं. अमिताभ शर्मा

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