By अपर्णा पाटनी
कश्यप अदिति कथा मृत अंडे से पुनर्जन्म और जन्म कुंडली में मृतप्राय सूर्य के पुनरुद्धार का रहस्य

सनातन वैदिक परंपरा और मार्कंडेय पुराण के पावन सौर आख्यानों में साक्षात जगत चक्षु भगवान सूर्य नारायण के बारहवें आदित्य के रूप में पूजित भगवान मार्तण्ड का प्राकट्य जीवन ऊर्जा के पुनरुद्धार अंधकार पर शाश्वत प्रकाश की विजय और मृतप्राय चेतना में नवप्राण फूंकने का सर्वोच्च शिखर है। वैदिक ज्योतिष तथा सौर तत्व विज्ञान के अंतर्गत भचक्र के अधिपति और आत्मा के कारक भगवान सूर्य देव के समस्त गंभीर दोषों जैसे नीच राशि तुला में स्थिति ग्रहण दोष मृत अवस्था अथवा षष्ठ अष्टम व द्वादश भाव के संताप को समाप्त कर जातक के भीतर अदम्य आत्मबल और दैवीय तेज को पुनर्जीवित करने के लिए भगवान मार्तण्ड की उपासना को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जब जातक की जन्म कुंडली में सूर्य ग्रह शून्य अंश अथवा 29 अंश पर होकर मृतप्राय हो चुका हो जिसके कारण व्यक्ति को समाज में निरंतर तिरस्कार पिता से वियोग हड्डियों की गंभीर दुर्बलता हृदय रोग नेत्र विकार और घोर असफलता का संताप झेलना पड़ रहा हो तब सहस्र किरणों वाले भगवान मार्तण्ड की शरण में जाने से जीवन के समस्त अंधकार तत्काल छंट जाते हैं। माघ मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि अचला रथ सप्तमी भानु सप्तमी अथवा प्रत्येक मास के शुक्ल पक्ष के रविवार के पावन अनुष्ठान का संपूर्ण शास्त्रीय विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।
| शास्त्रीय आयाम | अनुष्ठान विवरण और ज्योतिषीय मान्यता |
|---|---|
| प्रमुख पावन तिथि | माघ मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी रथ सप्तमी अथवा प्रत्येक रविवार व भानु सप्तमी |
| दैनिक पूजन समय | प्रातः कालीन सूर्योदय की प्रथम अरुणिमा वेला अथवा मध्याह्न काल |
| अधिष्ठाता स्वरूप | प्रज्वलित अंडे से प्रकट सहस्र किरणों वाले सात श्वेत अश्वों पर सवार भगवान मार्तण्ड |
| ज्योतिषीय ग्रह व भाव संबंध | प्रथम भाव पंचम भाव नवम भाव दशम भाव आत्मा कारक सूर्य और कृतिका उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र |
| मुख्य पूजन सामग्री | तांबे का पात्र शुद्ध रक्त चंदन लाल कनेर पुष्प मदार के पत्ते गुड़ गेहूं और गाय का घी |
| प्रधान वैदिक अनुष्ठान | आदित्य हृदय स्तोत्र पाठ मार्तण्ड स्तोत्र सूर्य अष्टकम और ॐ घृणिः मार्तण्डाय नमः जप |
| अपेक्षित फल | मृतप्राय सूर्य का पुनरुद्धार अकाल मृत्यु भय नाश अडिग आत्मबल और प्रशासनिक यश |
श्रीमद्भागवत महापुराण और मार्कंडेय पुराण के अत्यंत पावन इतिहास के अनुसार प्राचीन काल में जब दैत्यों और असुरों ने अपनी आसुरी शक्ति से देवराज इंद्र और समस्त देवताओं को पराजित कर स्वर्ग से निष्कासित कर दिया था तब संपूर्ण त्रिलोकी में अधर्म और अंधकार का साम्राज्य फैल गया था। देवताओं की माता परम सती माता अदिति अपने पुत्रों की इस दयनीय और अपमानजनक अवस्था को देखकर अत्यंत व्यथित हो उठीं।
माता अदिति ने विचार किया कि जब तक उनके कुल में साक्षात परमात्मा का अंश जन्म नहीं लेगा तब तक असुरों के आतंक से मुक्ति असंभव है। अपने पुत्रों के उद्धार और तीनों लोकों में पुनः धर्म की स्थापना हेतु माता अदिति ने एक अत्यंत दुष्कर और शरीर को तपा देने वाले कृच्छ्र चांद्रायण व्रत का कठोर संकल्प लिया।
चांद्रायण व्रत का विधान इतना कठोर था कि उसमें चंद्रमा की घटती और बढ़ती कलाओं के अनुसार अन्न का एक एक ग्रास घटाया और बढ़ाया जाता था और कई दिनों तक निराहार रहना पड़ता था। माता अदिति उस समय गर्भवती थीं। गर्भ में साक्षात भगवान सूर्यनारायण का परम दिव्य तेज स्थित था।
कठोर उपवासों और निरंतर तपस्या के कारण माता अदिति का शरीर अत्यंत दुर्बल और कृशकाय हो गया था। जब प्रजापति महर्षि कश्यप ने अपनी धर्मपत्नी को इस अत्यंत अशक्त अवस्था में देखा तो वे भावी संतान की सुरक्षा को लेकर अत्यंत चिंतित हो उठे।
अपनी धर्मपत्नी का करुण क्रंदन सुनकर और उस निष्प्राण अंडे को देखकर महर्षि कश्यप को तत्काल बोध हुआ कि उनके द्वारा बोले गए अनुचित वचनों के कारण ही यह अनर्थ हुआ है। महर्षि कश्यप आत्मग्लानि और घोर पश्चाताप की अग्नि में जलने लगे। उन्हें समझ आया कि अज्ञानवश उन्होंने उस गर्भस्थ दिव्य चेतना पर संदेह किया था जो स्वयं संपूर्ण ब्रह्मांड को जीवन देने वाली थी।
महर्षि कश्यप ने उस मृतप्राय अंडे को कुशा के पावन आसन पर स्थापित किया। उन्होंने हाथ जोड़कर अपनी आंखें मूंद लीं और ऋग्वेद के पावन सौर सूक्तों से साक्षात परब्रह्म स्वरूप भगवान सूर्य नारायण की स्तुति आरंभ की।
महर्षि कश्यप ने अपने तपोबल और आर्त वाणी से संपूर्ण अंतरिक्ष को गुंजायमान कर दिया। कश्यप जी की उस निष्कपट प्रार्थना और माता अदिति के वात्सल्य से संतुष्ट होकर अंतरिक्ष से एक अत्यंत गंभीर और मधुर आकाशवाणी गूंजी कि हे प्रजापति यह अंडा मृत नहीं है अपितु यह संपूर्ण चराचर जगत के तेज का संचित कोष है।
देखते ही देखते वह निष्प्राण अंडा अचानक मध्याह्न के सहस्र सूर्यों के समान धधक उठा। उस अंडे की ऊपरी परत कड़कड़ाहट की ध्वनि के साथ टूटकर विदीर्ण हो गई।
वैदिक ज्योतिष के महान आधार ग्रंथ बृहत् पराशर होरा शास्त्र में ग्रहों की विभिन्न अवस्थाओं का अत्यंत वैज्ञानिक विवेचन मिलता है। ग्रहों की बाल अवस्था कुमार अवस्था युवा अवस्था वृद्ध अवस्था के पश्चात अंतिम अवस्था मृत अवस्था कहलाती है।
जब जन्म कुंडली में सूर्य ग्रह शून्य अंश से 1 अंश के मध्य अथवा 29 अंश से 30 अंश के मध्य स्थित होता है तो वह मृतप्राय माना जाता है। इसके अतिरिक्त जब सूर्य अपनी नीच राशि तुला में 10 अंश पर परम नीच का होता है अथवा षष्ठ अष्टम व द्वादश भाव में राहु केतु और शनि से बुरी तरह पीड़ित होकर षडबल में शून्य हो जाता है तो जातक के जीवन में सूर्य का प्रभाव पूरी तरह समाप्त हो जाता है।
सूर्य आत्मा का कारक है और जब आत्मा का कारक ही मृतप्राय हो जाए तो व्यक्ति जीवित होते हुए भी एक निष्प्राण छाया के समान जीवन व्यतीत करता है।
वैदिक ज्योतिष के अनुसार जन्म कुंडली के चार प्रमुख केंद्र और त्रिकोण भाव सीधे तौर पर भगवान मार्तण्ड की प्राण ऊर्जा से संचालित होते हैं।
| जन्म कुंडली भाव | शास्त्रीय नाम | मार्तण्ड साधना का दिव्य प्रभाव | जातक को प्राप्त होने वाली सिद्धि |
|---|---|---|---|
| प्रथम भाव | लग्न भाव | शरीर का कायाकल्प और आभा मंडल की शुद्धि | तेजस्वी व्यक्तित्व और असीम आत्मविश्वास |
| पंचम भाव | बुद्धि व पूर्व पुण्य | प्रज्ञा की जागृति और मंत्र सिद्धि का वरदान | तीक्ष्ण बुद्धि और संतान सुख का विस्तार |
| नवम भाव | भाग्य व धर्म स्थान | सोए हुए भाग्य का उदय और पितृ कृपा की प्राप्ति | ईश्वरीय अनुग्रह और तीर्थाटन का योग |
| दशम भाव | कर्म व सत्ता स्थान | राज्य पक्ष से अमोघ लाभ और उच्च पद प्राप्ति | प्रशासनिक सेवाओं में सफलता और उच्च प्रतिष्ठा |
जब जातक प्रतिदिन प्रातः काल भगवान मार्तण्ड का ध्यान करते हुए अर्घ्य समर्पित करता है तो जन्म कुंडली के प्रथम और दशम भाव में स्थित सूर्य को अद्वितीय दिग्बल प्राप्त होता है। यह साधना जातक के शरीर में स्थित 72 हजार नाड़ियों में सौर ऊर्जा का संचार कर देती है जिससे समस्त प्रकार के मानसिक अवसाद और आलस्य का समूल नाश हो जाता है।
चिकित्सा ज्योतिष और वैदिक तत्व दर्शन के अनुसार सूर्य देव प्रत्यक्ष देवता हैं जो पंचतत्वों में से अग्नि और तेज तत्व का संचालन करते हैं। जब किसी परिवार की कुंडली में पीढ़ी दर पीढ़ी सूर्य पीड़ित रहता है तो वहां भयंकर पितृ दोष का निर्माण होता है जिसके कारण वंश वृद्धि रुक जाती है और कुल में अकाल मृत्यु की घटनाएं घटने लगती हैं।
भगवान मार्तण्ड साक्षात वह सूर्य नारायण हैं जिन्होंने स्वयं मृत्यु को परास्त करके पुनर्जन्म धारण किया था। अतः वे काल और अकाल मृत्यु के भय को समाप्त करने वाले परम मृत्युंजय सूर्य हैं।
शास्त्रों में यह स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि जो व्यक्ति प्रतिदिन मार्तण्ड स्तोत्र अथवा आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करता है उसके रक्त कणिकाओं में उपस्थित विषैले तत्व नष्ट हो जाते हैं। यह साधना हृदय के अवरोधों को खोलती है नेत्रों की ज्योति को पुनः लौटाती है और रीढ़ की हड्डी को वज्र के समान सुदृढ़ बनाती है। जिन रोगियों को चिकित्सकों ने असाध्य घोषित कर दिया हो उनके लिए मार्तण्ड सूर्य की आराधना साक्षात संजीवनी बूटी के समान कार्य करती है।
यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में सूर्य ग्रह नीच राशि में हो मृत अवस्था में हो अथवा जीवन में निरंतर असफलताएं और अपमान मिल रहा हो तो शास्त्रों में भगवान मार्तण्ड की प्रसन्नता हेतु अत्यंत प्रामाणिक वैदिक उपाय बताए गए हैं।
| क्या अवश्य करें | किन गलतियों से सर्वथा दूर रहें |
|---|---|
| प्रतिदिन प्रातः काल उठकर सर्वप्रथम अपने पिता और कुल के वृद्धजनों का चरण स्पर्श करें | सूर्योदय के समय सोते रहना अथवा दिन में सोना सर्वथा वर्जित रखें |
| सूर्य देव को सदैव तांबे के पात्र से ही शुद्ध जल और लाल चंदन का अर्घ्य दें | अपने पिता गुरु अथवा राज्य के अधिकारियों का कभी भी अपमान न करें |
| रविवार के दिन पूर्ण स्वच्छता ब्रह्मचर्य और नमक रहित सात्विक आहार का पालन करें | तामसिक भोजन मदिरा मांस और पराए धन पर दृष्टि रखने से सर्वथा दूर रहें |
| अपनी शक्ति और पद का उपयोग सदैव निर्बलों की सहायता और धर्म की रक्षा में करें | अपने ज्ञान कुल अथवा धन का समाज में कभी भी झूठा अहंकार न करें |
| पूजा में शुद्ध तांबे के बर्तन गाय का घी और रक्त चंदन का ही श्रद्धापूर्वक प्रयोग करें | घर के पूर्व दिशा के कोने को कभी भी गंदा अथवा भारी वस्तुओं से दबाकर न रखें |
भगवान मार्तण्ड का पावन अवतार संपूर्ण मानव जाति को यह सनातन शिक्षा प्रदान करता है कि जीवन में चाहे कितना भी घोर अंधकार क्यों न आ जाए और परिस्थितियां चाहे कितनी भी मृतप्राय क्यों न प्रतीत हों सत्य और धर्म की ज्योति कभी बुझ नहीं सकती। कश्यप और अदिति के मृत अंडे से भगवान सूर्य का पुनः प्रज्वलित होना यह सिद्ध करता है कि ईश्वर के विधान में विनाश केवल एक नए और भव्य सृजन का आरंभ होता है। जब मनुष्य अपने अहंकार का त्याग कर सच्चे हृदय से पश्चाताप करता है तो परमात्मा उसके जीवन के बुझे हुए दीपकों को पुनः सहस्र सूर्यों के तेज से प्रज्वलित कर देते हैं। सूर्य का आत्म तेज जब जातक के अंतःकरण में उतरता है तब वह संसार की किसी भी परिस्थिति से भयभीत नहीं होता। भगवान मार्तण्ड का नित्य स्मरण मनुष्य के जीवन से समस्त कायरता दरिद्रता नेत्र रोग और ग्रह संतापों को समाप्त करके उसे एक तेजस्वी यशस्वी और सम्मानित व्यक्तित्व बनाकर अंततः परम पद की प्राप्ति कराता है।
भगवान सूर्य को मार्तण्ड नाम से क्यों संबोधित किया जाता है? माता अदिति के गर्भ से निष्प्राण अंडे के रूप में प्रकट होने और महर्षि कश्यप की स्तुति से पुनः प्रज्वलित होकर बाहर आने के कारण उन्हें मार्तण्ड कहा जाता है।
ज्योतिष में मृतप्राय सूर्य का क्या अर्थ होता है? जब सूर्य जन्म कुंडली में शून्य अंश अथवा 29 से 30 अंश पर हो नीच राशि तुला में हो अथवा षष्ठ अष्टम द्वादश भाव में पीड़ित होकर बलहीन हो जाए तो उसे मृतप्राय सूर्य कहते हैं।
कमजोर सूर्य को पुनः जीवित करने हेतु कौन सा स्तोत्र सबसे अधिक प्रभावशाली है? कुंडली के कमजोर सूर्य को बलवान बनाने और आत्मबल जगाने हेतु प्रतिदिन प्रातः काल महर्षि अगस्त्य विरचित पावन आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ सर्वोत्तम माना गया है।
भगवान मार्तण्ड की पूजा में किस धातु के पात्र से अर्घ्य देना अनिवार्य माना गया है? भगवान मार्तण्ड सूर्य की आराधना में केवल और केवल शुद्ध तांबे के पात्र से जल रोली और अक्षत मिलाकर अर्घ्य देना शास्त्रों में अनिवार्य बताया गया है।
रथ सप्तमी पर्व का भगवान मार्तण्ड के अवतार से क्या संबंध है? माघ मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी जिसे रथ सप्तमी कहा जाता है उसी पावन दिन भगवान मार्तण्ड अपने सात श्वेत अश्वों के रथ पर सवार होकर संपूर्ण ब्रह्मांड को प्रकाशित करने प्रकट हुए थे।
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