By पं. नरेंद्र शर्मा
उच्छिष्ट चांडालिनी रहस्य 64 कलाओं का आधिपत्य और बुध शुक्र के दुर्लभ संगीत का संपूर्ण वैदिक ज्ञान

सनातन वैदिक परंपरा और शाक्त तांत्रिक आगम दर्शन में आद्याशक्ति भगवती महामाया के दस महाविद्या स्वरूपों में नवम और राजश्यामला के रूप में पूजित माता मातंगी का प्राकट्य नाद ब्रह्म वाणी सिद्धि 64 कलाओं के आधिपत्य और परम ज्ञान का सर्वोच्च शिखर है। वैदिक ज्योतिष तथा तत्व विज्ञान के अंतर्गत वाणी बुद्धि तर्क और संचार के अधिपति बुध देव तथा सौंदर्य कला संगीत प्रेम और आकर्षण के कारक शुक्र देव के दुर्लभ समन्वय को जाग्रत करने के लिए भगवती मातंगी की आराधना को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जब जातक की जन्म कुंडली में द्वितीय भाव वाणी भाव अथवा पंचम भाव बुद्धि व विद्या भाव पाप ग्रहों से पीड़ित होकर हकलाना तुतलाना मानसिक संकोच कलात्मक असफलता अथवा संगीत व अभिनय के क्षेत्र में बारंबार पराजय उत्पन्न कर रहा हो तब कदंब वन वासिनी माँ मातंगी की शरण में जाने से वाक सिद्धि और चुंबकीय सम्मोहन की प्राप्ति होती है। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि मातंगी जयंती और इस पावन साधना की तिथि समय तथा शास्त्रीय घटकों का संपूर्ण विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।
| शास्त्रीय आयाम | अनुष्ठान विवरण और ज्योतिषीय मान्यता |
|---|---|
| प्रमुख पावन तिथि | वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया मातंगी जयंती अथवा प्रत्येक मास की शुक्ल नवमी व बुधवार |
| दैनिक पूजन समय | प्रातः कालीन ब्रह्म मुहूर्त अथवा सायंकालीन गोधूलि वेला |
| अधिष्ठाता स्वरूप | मरकत मणि सदृश हरित श्याम वर्णा वीणा और शुक धारिणी माँ मातंगी |
| ज्योतिषीय ग्रह व भाव संबंध | द्वितीय भाव पंचम भाव वाणी कारक बुध देव कला कारक शुक्र देव और आश्लेषा नक्षत्र |
| मुख्य पूजन सामग्री | कदंब के ताजे पुष्प अनार के दाने शुद्ध शहद अष्टगंध और स्फटिक माला |
| प्रधान वैदिक अनुष्ठान | मातंगी स्तोत्र पाठ सुमुखी कवच और ॐ ह्रीं क्लीं हूं मातंग्यै फट् स्वाहा जप |
| अपेक्षित फल | वाणी दोष शांति 64 कलाओं में दक्षता संगीत सिद्धि और बुध शुक्र संतुलन |
ब्रह्मवैवर्त पुराण और शाक्त आगम संहिताओं के अत्यंत गोपनीय आख्यानों के अनुसार प्राचीन काल में परम तपस्वी मातंग मुनि ने संपूर्ण चराचर जगत में नाद और वाणी के प्रभाव को स्थापित करने तथा तीनों लोकों की चेतना को आध्यात्मिक सम्मोहन से जागृत करने हेतु घोर तपस्या आरंभ की। मातंग मुनि ने वन के एकांत में कदंब के सघन वृक्षों के मध्य अपनी कुटिया बनाई और वहां सहस्रों वर्षों तक निराहार रहकर आद्याशक्ति का ध्यान किया। उनकी साधना इतनी उग्र और निष्कपट थी कि उनके तपोबल से संपूर्ण वन क्षेत्र अलौकिक सुगंध और ब्रह्म तेज से आलोकित हो उठा।
मातंग मुनि के उस निष्काम तप से संतुष्ट होकर जब भगवती पराशक्ति प्रकट हुईं तो मुनि के नेत्रों से प्रेमाश्रुओं की अविरल धारा बहने लगी। मातंग मुनि के हृदय की पावन भावना और उनके तप की ऊर्जा से साक्षात माँ मातंगी का प्राकट्य हुआ। मातंग मुनि की तपस्या से उद्भूत होने के कारण ही भगवती का नाम मातंगी पड़ा और उन्हें मुनि की आध्यात्मिक कन्या के रूप में भी जाना गया।
भगवती का स्वरूप अत्यंत मनोहारी और अलौकिक था। उनका शारीरिक वर्ण मरकत मणि अर्थात गहरे पन्ना रत्न के समान हरित श्याम था जो प्रकृति के अनंत पोषण और जीवन का प्रतीक है। उनके मस्तक पर बाल चंद्रमा दमक रहा था उनके नयनों में अगाध करुणा और वात्सल्य प्रवाहित हो रहा था और वे कदंब वृक्ष की सुखद छाया में एक दिव्य रत्नजड़ित आसन पर विराजमान थीं। उनके प्राकट्य के साथ ही समस्त दिशाओं में अनहद नाद गूंज उठा और वन के समस्त हिंसक पशु पक्षी अपना वैर भाव त्यागकर माता के चरणों में नतमस्तक हो गए।
शाक्त तंत्र और आगम दर्शन में भगवती मातंगी को अत्यंत श्रद्धा और विस्मय के साथ उच्छिष्ट चांडालिनी के नाम से भी पुकारा जाता है। साधारण सांसारिक बुद्धि के लोग इस पावन नाम का केवल बाह्य और स्थूल अर्थ निकालकर भ्रमित हो जाते हैं किंतु इसके भीतर अद्वैत वेदांत का परम सत्य छिपा हुआ है। सनातन दर्शन में उच्छिष्ट शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है जो शेष रह गया हो अर्थात अवशिष्ट।
सृष्टि के प्रलय काल में जब समस्त नाम रूप पंचमहाभूत और भौतिक ब्रह्मांड नष्ट हो जाते हैं तब जो अव्यक्त और शाश्वत ब्रह्म तत्व शेष रह जाता है वही साक्षात उच्छिष्ट ब्रह्म है। देवी मातंगी उसी अविनाशी परब्रह्म की साक्षात विग्रह हैं। इसके अतिरिक्त एक अत्यंत पावन पौराणिक कथा के अनुसार एक बार देवाधिदेव भगवान शिव और भगवती पार्वती भोजन कर रहे थे। भोजन करते समय उनके मुख से कुछ दिव्य कण भूमि पर गिरे। उन पावन जूठे कणों से एक अत्यंत तेजस्वी और रूपवती कन्या प्रकट हुई जिसने उन कणों को प्रसाद मानकर ग्रहण किया। भगवान शिव ने अत्यंत प्रसन्न होकर उस कन्या को अपनी पराशक्ति मातंगी घोषित किया।
भगवती मातंगी का विग्रह ललित कलाओं और वांग्मय के सर्वोच्च प्रतीकों से सुशोभित है। देवी चतुर्भुजा हैं और उनके चारों हाथों में धारण किए गए पावन आयुध मानव चेतना के विभिन्न ऊर्जा केंद्रों को संतुलित करते हैं। उनके दो हाथों में संपूर्ण सृष्टि के नाद को नियंत्रित करने वाली पावन वीणा सुशोभित है।
वीणा का मेरुदंड मानव शरीर की रीढ़ की हड्डी अर्थात सुषुम्ना नाड़ी का साक्षात प्रतीक है। वीणा के 7 तार शरीर के 7 प्रमुख चक्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं। जब माँ मातंगी वीणा के तारों पर अपनी अंगुलियों का स्पर्श करती हैं तो संपूर्ण ब्रह्मांड में नाद ब्रह्म की मधुर तरंगे प्रस्फुटित होती हैं जो साधक के समस्त चक्रों को एक ही क्षण में जाग्रत कर देती हैं।
वैदिक ज्योतिष के महानतम ग्रंथ बृहत् पराशर होरा शास्त्र में जन्म कुंडली के प्रत्येक भाव और ग्रहों के परस्पर युति संबंधों का गहरा तात्विक विश्लेषण मिलता है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से माँ मातंगी सीधे तौर पर बुध देव और शुक्र देव के उस अत्यंत दुर्लभ और शुभ संगम का प्रतिनिधित्व करती हैं जो मनुष्य को अद्वितीय प्रतिभा प्रदान करता है।
बुध ग्रह को ज्योतिष में बुद्धि वाणी तर्क विद्या हास्य और संचार कौशल का अधिपति माना जाता है। वहीं दूसरी ओर शुक्र ग्रह को सौंदर्य रूप लावण्य प्रेम आकर्षण संगीत अभिनय और भोग ऐश्वर्य का कारक माना गया है। जब किसी जातक की जन्म कुंडली में बुध और शुक्र एक साथ शुभ भावों में बैठते हैं अथवा एक दूसरे पर अपनी दृष्टि डालते हैं तब अत्यंत शुभ गंधर्व योग अथवा लक्ष्मी नारायण योग का निर्माण होता है।
कुंडली का द्वितीय भाव वाणी और मुख का स्थान होता है जबकि पंचम भाव बुद्धि प्रतिभा और पूर्व जन्म के पुण्यों का केंद्र होता है। जब किसी जातक की कुंडली में बुध और शुक्र अनुकूल होते हैं तो व्यक्ति एक महान लेखक कुशल वक्ता प्रसिद्ध गायक अथवा लोकप्रिय अभिनेता बनता है।
किंतु जब यह दोनों ग्रह राहु केतु अथवा शनि के दुष्प्रभाव से पीड़ित हो जाते हैं तो व्यक्ति के भीतर ज्ञान होते हुए भी वह अपनी बात को व्यक्त नहीं कर पाता। उसकी वाणी में हकलाहट आ जाती है उसके गले में संकोच रहता है और वह जनसमूह के सामने बोलने से भयभीत होता है। माँ मातंगी की उपासना बुध की तीव्र बुद्धि को शुक्र के कलात्मक माधुर्य से जोड़ देती है जिससे जातक को अमोघ वाक सिद्धि प्राप्त होती है और उसकी वाणी में सम्मोहन शक्ति का वास हो जाता है।
आधुनिक युग में किसी भी क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने के लिए व्यक्ति के व्यक्तित्व और उसकी संवाद शैली का प्रभावी होना अत्यंत अनिवार्य है। अनेक युवा और कलाकार अपनी प्रतिभा के बावजूद केवल इसलिए पीछे रह जाते हैं क्योंकि वे सही समय पर सही शब्दों का चयन नहीं कर पाते अथवा मंच पर जाते ही उनका आत्मविश्वास डगमगा जाता है।
माँ मातंगी साक्षात नाद की देवी हैं जो मनुष्य के कंठ में स्थित विशुद्ध चक्र और हृदय में स्थित अनाहत चक्र को शुद्ध करती हैं। जिस प्रकार मातंग मुनि के तपोबल से प्रकट होकर देवी ने संपूर्ण वन के वातावरण को संगीत और शांति से भर दिया था उसी प्रकार जो साधक निरंतर मातंगी साधना का आश्रय लेता है उसके भीतर की समस्त झिझक हीन भावना और वाणी के विकार जड़ से समाप्त हो जाते हैं। यह साधना उन लोगों के लिए साक्षात कल्पवृक्ष के समान है जो संगीत गायन वादन अभिनय पत्रकारिता अथवा लेखन के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाना चाहते हैं किंतु निरंतर असफलताओं का सामना कर रहे हैं।
यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में बुध ग्रह नीच राशि मीन में हो शुक्र ग्रह पीड़ित हो वाणी में दोष रहता हो अथवा कला के क्षेत्र में संघर्ष चल रहा हो तो शास्त्रों में माँ मातंगी की प्रसन्नता हेतु अत्यंत प्रामाणिक वैदिक उपाय बताए गए हैं।
| क्या अवश्य करें | किन गलतियों से सर्वथा दूर रहें |
|---|---|
| प्रतिदिन प्रातः काल उठकर अपनी वाणी में मधुरता और सत्य का संकल्प लें | अपनी विद्या कला बुद्धि अथवा वाणी का कभी भी अहंकार न करें |
| माँ मातंगी को सदैव कदंब के पुष्प ताजे फल और शुद्ध शहद का भोग लगाएं | साधना काल में किसी भी स्त्री अथवा कलाकार का उपहास न उड़ाएं |
| बुधवार और शुक्रवार को पूर्णतः सात्विक और पवित्र भोजन ग्रहण करें | तामसिक भोजन मदिरा और किसी भी प्रकार के नशीले पदार्थों से दूर रहें |
| अपनी कला और ज्ञान का उपयोग सदैव लोक कल्याण और ईश्वर भक्ति में करें | अपनी जिह्वा से कभी किसी को कटु वचन अथवा झूठी गवाही न दें |
| पूजा में अष्टगंध श्वेत चंदन और शुद्ध गाय के घी का ही प्रयोग करें | बिना सोचे समझे किसी पर कटाक्ष करने अथवा व्यर्थ विवाद में न उलझें |
भगवती मातंगी का पावन अवतार संपूर्ण मानव जाति को यह सनातन शिक्षा प्रदान करता है कि इस संसार में सबसे बड़ा सामर्थ्य सत्य और मधुर वाणी का है। जो बात तीक्ष्ण अस्त्र शस्त्रों से नहीं सुलझाई जा सकती वह एक मधुर और विवेकपूर्ण शब्द से क्षणभर में हल हो जाती है। वीणा का नाद यह स्मरण कराता है कि हमारा संपूर्ण जीवन एक दिव्य संगीत है और जब तक हमारे विचार शब्द और कर्म एक सुर में नहीं बंधते तब तक जीवन में सच्चा आनंद प्रकट नहीं हो सकता। उच्छिष्ट का भाव यह सिखाता है कि परमात्मा के सम्मुख बाह्य आडंबरों का कोई मूल्य नहीं है वहां केवल हृदय की पवित्रता और अनन्य प्रेम ही स्वीकार्य होता है। जब मनुष्य अपने भीतर की अशुद्धियों को त्यागकर मातंगी के चरणों में समर्पित हो जाता है तो उसकी वाणी में वह अमृत घुल जाता है जो संपूर्ण संसार को वशीभूत कर लेता है। माँ मातंगी का नित्य स्मरण मनुष्य के जीवन से समस्त वाणी दोषों कलात्मक अवरोधों और ग्रह दोषों को समाप्त करके उसे 64 कलाओं से युक्त एक तेजस्वी सम्मानित और मोक्षगामी व्यक्तित्व बनाकर अंततः परम शांति की प्राप्ति कराता है।
माँ मातंगी को मातंगी नाम किस कारण से प्राप्त हुआ? मातंग मुनि के घोर तप और उनकी आध्यात्मिक ऊर्जा से कदंब वन में प्रकट होने के कारण भगवती को मातंग की कन्या और मातंगी कहा जाता है।
माँ मातंगी को उच्छिष्ट चांडालिनी क्यों कहा जाता है? भगवान शिव और पार्वती के भोजन के अवशिष्ट अंश से प्रकट होने और यह सिद्ध करने के लिए कि विशुद्ध आत्म ज्ञान कभी भी अशुद्ध नहीं होता उन्हें यह नाम दिया गया है।
माँ मातंगी के हाथों में वीणा और तोता होने का क्या तात्विक अर्थ है? हाथ में वीणा संपूर्ण ब्रह्मांडीय नाद व 64 कलाओं का प्रतीक है और तोता तीव्र बुद्धि मधुर वाणी व वेदों के शुद्ध उच्चारण का प्रतीक है।
ज्योतिष में माँ मातंगी का संबंध किन प्रमुख ग्रहों से माना जाता है? वैदिक ज्योतिष में माँ मातंगी का सीधा संबंध वाणी व बुद्धि के स्वामी बुध ग्रह और सौंदर्य कला व संगीत के स्वामी शुक्र ग्रह के समन्वय से माना जाता है।
वाणी दोष हकलाहट और कलात्मक सफलता हेतु किस स्तोत्र का पाठ करना चाहिए? वाणी दोष दूर करने और कला में सफलता पाने हेतु प्रतिदिन प्रातः काल मातंगी स्तोत्र और सुमुखी कवच का सस्वर पाठ करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
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