मोहिनी अवतार और माया का रहस्य क्या?

By पं. अमिताभ शर्मा

असुरों से अमृत रक्षा भस्मासुर संहार और शुक्र राहु की कूटनीतिक शक्ति का संपूर्ण ज्योतिषीय रहस्य

मोहिनी अवतार कथा और शुक्र राहु का ज्योतिषीय रहस्य

मोहिनी एकादशी पूजन मुहूर्त और विधि विधान

सनातन वैदिक परंपरा में भगवान श्री हरि विष्णु के एकमात्र अत्यंत मनोहारी स्त्री स्वरूप के रूप में पूजित माता मोहिनी का प्राकट्य ब्रह्मांडीय संतुलन धर्म रक्षा और मायावी शक्तियों के नियमन का सर्वोच्च शिखर है। वैदिक ज्योतिष के अंतर्गत सौंदर्य कला और आकर्षण के स्वामी शुक्र देव तथा माया भ्रम और कूटनीति के अधिपति छाया ग्रह राहु के पावन संतुलन को साधने के लिए मोहिनी आराधना को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जब जातक की जन्म कुंडली में शुक्र और राहु की युति बनकर चारित्रिक भटकाव अत्यधिक वासना छल कपट अथवा संबंधों में विश्वासघात उत्पन्न कर रही हो तब मोहिनी नारायण की शरण में जाने से अंतःकरण को परम विवेक और कूटनीतिक विजय की प्राप्ति होती है। इस पावन अनुष्ठान की तिथि समय और शास्त्रीय घटकों का संपूर्ण विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।

शास्त्रीय आयाम अनुष्ठान विवरण और ज्योतिषीय मान्यता
प्रमुख पावन तिथि वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि मोहिनी एकादशी
दैनिक पूजन समय प्रातः कालीन ब्रह्म मुहूर्त अथवा सायंकालीन गोधूलि वेला
अधिष्ठाता स्वरूप अनुपम सौंदर्य युक्त त्रिभंगी मुद्रा में अमृत कलश धारिणी मोहिनी
ज्योतिषीय ग्रह संबंध सौंदर्य कारक शुक्र देव और माया कारक छाया ग्रह राहु
मुख्य पूजन सामग्री सुगंधित श्वेत पुष्प इत्र गोपी चंदन पंचामृत मक्खन मिश्री और कमल पुष्प
प्रधान वैदिक अनुष्ठान मोहिनी कवच पाठ विष्णु सहस्रनाम और ॐ नमो भगवते मोहिनीरूपाय जप
अपेक्षित फल काम वासना पर विजय कूटनीतिक कार्यों में सफलता और भ्रम निवारण

अमृत कलश हरण और त्रिभुवन मोहिनी प्राकट्य

श्रीमद्भागवत महापुराण के आठवें स्कंध में वर्णित कथा के अनुसार जब क्षीरसागर मंथन के चौदहवें रत्न के रूप में भगवान धन्वंतरि अपने हाथों में दिव्य अमृत कलश लेकर प्रकट हुए तब देव और दानव दोनों में अमृत पाने की होड़ मच गई। असुरों ने देवताओं को दुर्बल समझकर उनसे वह अमृत कलश बलपूर्वक छीन लिया। अमृत कलश को लेकर असुरों के मध्य आपस में ही भयंकर विवाद छिड़ गया कि पहले कौन पिएगा। असुरों का सेनापति राहु उस कलश को लेकर भागने लगा और देवताओं के सम्मुख यह संकट उत्पन्न हो गया कि यदि असुरों ने अमृत पी लिया तो वे अमर होकर तीनों लोकों में अधर्म और अत्याचार का साम्राज्य स्थापित कर देंगे।

देवताओं की करुण पुकार सुनकर जगतपालक भगवान श्री हरि विष्णु ने अपनी अचिंत्य योगमाया का आश्रय लिया। उन्होंने क्षणभर में एक ऐसी अनुपम और अलौकिक स्त्री का रूप धारण किया जिसके सौंदर्य की उपमा तीनों लोकों में कहीं नहीं थी। भगवान का यह रूप त्रिभुवन मोहिनी कहलाया। उनका वर्ण नीलकमल के समान श्याम और कांति तपे हुए सुवर्ण जैसी थी। उनके नेत्र प्रफुल्लित कमल के समान विशाल और चंचल थे। उनके मस्तक पर कस्तूरी का तिलक सुशोभित था कानों में मकराकृत कुंडल झिलमिला रहे थे और उनके कटि प्रदेश पर बंधी करधनी से मधुर रुनझुन ध्वनि निकल रही थी। वे अपने कोमल हाथों में एक लाल रंग की कंदुक अर्थात गेंद लेकर चंचलता से उछालती हुई असुरों के सम्मुख प्रकट हुईं।

जैसे ही असुरों ने उस दिव्य सुंदरी को देखा वैसे ही वे अपने हाथ में रखे अमृत कलश को भूल गए। उनका सारा अहंकार पराक्रम और युद्ध का उन्माद उस रूप माधुरी के सम्मुख गलकर विलीन हो गया। असुरों की बुद्धि मोहिनी के कटाक्षों और मनोहारी मुस्कान से आच्छादित हो गई। असुरों के प्रधान मोहिनी के समीप पहुंचे और हाथ जोड़कर विनय करने लगे कि हे कल्याणी तुम हमारे इस अमृत कलश को अपने कोमल हाथों में ले लो और हमारे बीच इसका न्यायपूर्ण बंटवारा कर दो। भगवान मोहिनी ने मंद मुस्कान के साथ कहा कि मैं तो एक चंचल नारी हूं विद्वान पुरुष कभी स्त्रियों पर विश्वास नहीं करते तुम मुझ पर कैसे भरोसा कर सकते हो। मोहिनी की इस कूटनीतिक बात ने असुरों को और अधिक मोहित कर दिया और उन्होंने संपूर्ण अधिकार मोहिनी को सौंप दिया।

देव दानव पंक्ति भेद और राहु केतु का प्राकट्य

भगवान मोहिनी ने समस्त देवों और असुरों को स्नान करके नवीन वस्त्र धारण करने और अलग अलग पंक्तियों में बैठने का निर्देश दिया। एक ओर देवता बैठे और दूसरी ओर दानव आसीन हुए। भगवान मोहिनी ने अपने हाथ में अमृत कलश उठाया और वे अपनी पायल की झंकार और मादक गति से देवताओं की पंक्ति की ओर बढ़ने लगीं। वे अपनी सम्मोहक चितवन से असुरों को मदहोश करती रहीं और अमृत का एक एक घूंट केवल देवताओं को पिलाने लगीं। असुर केवल उनके सौंदर्य को निहारने में इतने तल्लीन थे कि उन्हें यह भान ही नहीं रहा कि कलश से केवल देवताओं को ही अमृत दिया जा रहा है।

उसी समय स्वर्भानु नामक एक अत्यंत धूर्त दानव मोहिनी के इस गूढ़ षड्यंत्र को समझ गया। वह देवताओं का रूप धारण करके चुपके से सूर्य देव और चंद्र देव के मध्य जाकर बैठ गया। जैसे ही भगवान मोहिनी ने स्वर्भानु के मुख में अमृत की कुछ बूंदें डालीं वैसे ही सूर्य और चंद्रमा ने तुरंत संकेत करके मोहिनी को बता दिया कि यह दानव है।

  • भगवान मोहिनी ने उसी क्षण अपने दिव्य सुदर्शन चक्र का स्मरण किया और एक ही वार से उस असुर का सिर धड़ से अलग कर दिया।
  • अमृत गले से नीचे उतर चुका था इसलिए उस असुर का शरीर निष्प्राण नहीं हुआ अपितु वह दो अमर ग्रहों के रूप में परिवर्तित हो गया।
  • सिर का भाग राहु कहलाया जो इच्छाओं और भ्रम का अधिष्ठाता बना।
  • धड़ का भाग केतु कहलाया जो वैराग्य और मोक्ष का कारक बना।
  • सूर्य और चंद्र द्वारा भेद खोले जाने के कारण ही राहु और केतु समय समय पर सूर्य और चंद्रमा को ग्रसित करके ग्रहण लगाते हैं।

संपूर्ण अमृत समाप्त होने के पश्चात जब असुरों का सम्मोहन टूटा तब उन्होंने देखा कि देवता अमर हो चुके थे और मोहिनी रूप धरकर आए साक्षात भगवान विष्णु गरुड़ पर आरूढ़ होकर वैकुंठ प्रस्थान कर चुके थे। इस प्रकार भगवान ने बिना किसी भीषण रक्तपात के केवल अपनी दिव्य माया और कूटनीति से धर्म और देवताओं की रक्षा संपन्न की।

भस्मासुर का अहंकार और संहारक नृत्य का रहस्य

पौराणिक संहिताओं में भगवान मोहिनी से जुड़ी एक अन्य अत्यंत महत्वपूर्ण और विस्मयकारी कथा भस्मासुर के संहार से संबंधित है। वृकासुर नामक एक असुर ने भगवान देवाधिदेव महादेव की अत्यंत कठोर तपस्या की। उसने अपने शरीर का मांस काटकर अग्नि में आहुति दी जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसे दर्शन दिए और वरदान मांगने को कहा। उस कुटिल असुर ने वरदान मांगा कि वह जिस किसी के भी मस्तक पर अपना दाहिना हाथ रख दे वह उसी क्षण भस्म हो जाए।

आशुतोष शिव ने बिना विचार किए तथास्तु कह दिया। वरदान मिलते ही उस पापी के मन में काम वासना जाग उठी और उसने माता पार्वती को प्राप्त करने के कुत्सित विचार से स्वयं भगवान शिव के मस्तक पर हाथ रखने का प्रयास किया। भगवान शिव वहां से भागे और संपूर्ण ब्रह्मांड में चक्कर लगाने लगे किंतु भस्मासुर उनका पीछा करता रहा। अंततः भगवान शिव ने वैकुंठ पहुंचकर भगवान विष्णु की शरण ली।

सृष्टि के इस संकट को टालने के लिए भगवान श्री हरि ने पुनः मोहिनी रूप धारण किया और वे उस मार्ग पर प्रकट हुईं जहां से भस्मासुर आ रहा था। मोहिनी के अद्वितीय सौंदर्य को देखकर भस्मासुर के कदम ठिठक गए। मोहिनी ने उससे पूछा कि तुम इतने व्याकुल होकर कहां दौड़ रहे हो। भस्मासुर ने कहा कि वह तीनों लोकों का स्वामी बनने जा रहा है और वह मोहिनी से विवाह करना चाहता है।

मोहिनी ने हंसते हुए उत्तर दिया कि मैं केवल उसी पुरुष को अपना पति स्वीकार कर सकती हूं जो नृत्य कला में मेरे समान प्रवीण हो। यदि तुम मेरे साथ नृत्य की मुद्राएं कर सको तो मैं अभी तुमसे विवाह कर लूंगी। कामांध भस्मासुर नृत्य के लिए तैयार हो गया। भगवान मोहिनी ने अत्यंत मनोहारी शास्त्रीय नृत्य आरंभ किया। भस्मासुर मोहिनी के प्रत्येक पद संचालन हस्त मुद्रा और नेत्र भंगी की नकल करने लगा। नृत्य करते करते जब भस्मासुर पूर्णतः मदहोश हो गया तब मोहिनी ने एक ऐसी मुद्रा बनाई जिसमें उन्होंने अपना दाहिना हाथ अपने ही मस्तक पर रख लिया। भस्मासुर ने बिना सोचे समझे अपनी सुध बुध खोकर अपना दाहिना हाथ अपने ही मस्तक पर रख दिया। अपने ही हाथ का स्पर्श होते ही भगवान शिव के वरदान के प्रभाव से वह महाबली असुर उसी क्षण जलकर भस्म का ढेर बन गया। इस प्रकार मोहिनी अवतार ने एक बार पुनः यह सिद्ध किया कि वासना और अहंकार का अंत सदा स्वयं के ही हाथों होता है।

महर्षि पराशर अनुसार शुक्र और राहु का कूटनीतिक रहस्य

वैदिक ज्योतिष के महानतम ग्रंथ बृहत् पराशर होरा शास्त्र में महर्षि पराशर ने स्पष्ट किया है कि सृष्टि के समस्त दृश्य और अदृश्य प्रपंच नवग्रहों की रश्मियों से संचालित होते हैं। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से भगवान मोहिनी का प्राकट्य सीधे तौर पर शुक्र ग्रह और राहु ग्रह के गूढ़ तात्विक संयोजन का प्रतिनिधित्व करता है।

शुक्र देव को ज्योतिष में रूप लावण्य कला नृत्य संगीत आकर्षण और सांसारिक भोग का कारक माना गया है। दूसरी ओर छाया ग्रह राहु को सम्मोहन छल कूटनीति गुप्त योजनाएं रूप बदलने की कला और मायावी आकर्षण का स्वामी माना जाता है। जब किसी जातक की जन्म कुंडली में शुक्र और राहु की युति बनती है तो इसे भृगु ज्योतिष में माया योग अथवा अत्यधिक आकर्षण का योग कहा जाता है।

यह योग दो धारी तलवार के समान होता है। यदि इस योग पर गुरु की शुभ दृष्टि न हो तो यह व्यक्ति को अत्यधिक वासना अवैध संबंधों और नशीले पदार्थों के दलदल में धकेल देता है जिसका परिणाम भस्मासुर और असुरों जैसा पतन होता है। परंतु जब इसी शुक्र और राहु की ऊर्जा को धर्म और सत्य की रक्षा के लिए जागृत किया जाता है तब यह मोहिनी रूपी उच्च कूटनीति बन जाती है। मोहिनी अवतार यह सिखाता है कि जब सामने वाला शत्रु अत्यधिक बलवान और अधर्मी हो तो उसके साथ सीधे युद्ध करने के स्थान पर उसकी कमजोरियों वासना और अहंकार का उपयोग करके उसे परास्त किया जाना चाहिए।

क्या मायावी आकर्षण और छल से रक्षा संभव है?

आधुनिक युग में मनुष्य चारों ओर से मायावी आकर्षणों और डिजिटल छल कपट से घिरा हुआ है। विज्ञापनों का सम्मोहन अश्लीलता का प्रसार और संबंधों में होने वाले विश्वासघात वस्तुतः राहु और दूषित शुक्र के ही आधुनिक रूप हैं। जब कुंडली में शुक्र नीच राशि कन्या में हो अथवा राहु सप्तम या अष्टम भाव में बैठकर दांपत्य जीवन को विषाक्त कर रहा हो तब व्यक्ति अक्सर ऐसे लोगों के प्रेम जाल में फंस जाता है जो उसका सर्वस्व लूट लेते हैं।

भगवान मोहिनी की उपासना साधक के अंतःकरण को एक ऐसा दिव्य विवेक प्रदान करती है जिससे वह सत्य और भ्रम के मध्य का अंतर तुरंत पहचान लेता है। मोहिनी साधना करने वाले व्यक्ति पर किसी भी प्रकार का काला जादू सम्मोहन वशीकरण अथवा षड्यंत्र कभी प्रभावी नहीं होता। यह साधना साधक के चित्त को स्थिर करके उसे यह बोध कराती है कि बाहर दिखने वाला रूप केवल नश्वर आवरण है वास्तविक सत्य केवल आत्मा है।

शुक्र राहु शांति और कूटनीतिक विजय के अचूक उपाय

यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में शुक्र और राहु का शापित योग बन रहा हो चरित्र पर लांछन लगने का भय हो अथवा गुप्त शत्रु आपके विरुद्ध षड्यंत्र रच रहे हों तो शास्त्रों में मोहिनी स्वरूप की आराधना के अत्यंत दिव्य उपाय बताए गए हैं।

  • वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की मोहिनी एकादशी का पूर्ण श्रद्धा के साथ निर्जल अथवा फलाहार व्रत रखें और श्री मोहिनी एकादशी व्रत कथा का श्रवण करें।
  • प्रतिदिन प्रातः काल स्नान के उपरांत पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें और भगवान मोहिनी का ध्यान करते हुए ॐ क्लीं मोहिनीरूपाय नमः अथवा ॐ नमो भगवते मोहिनीरूपाय का 108 बार शांत मन से स्फटिक की माला से जाप करें।
  • शुक्रवार के दिन किसी प्राचीन मंदिर में जाकर देवी महालक्ष्मी अथवा राधा कृष्ण के युगल स्वरूप को श्वेत सुगंधित पुष्प इत्र और माखन मिश्री का भोग लगाएं।
  • राहु के भ्रम और शुक्र के दोषों को शांत करने हेतु प्रत्येक बुधवार और शुक्रवार को पक्षियों को बाजरा खिलाएं और कन्याओं को सफेद मिष्ठान का आदरपूर्वक दान करें।
  • जातक को अपनी शारीरिक अवस्था और योग्य ज्योतिर्विद के परामर्श के अनुसार छह मुखी अथवा आठ मुखी नेपाली रुद्राक्ष चांदी के तार में पिरोकर गले में धारण करना चाहिए।
  • गुप्त शत्रुओं और कानूनी मुकदमों में विजय पाने के लिए नियमित रूप से भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र स्तोत्र का पाठ करें जिससे शत्रुओं के सारे षड्यंत्र निष्फल हो जाते हैं।

मोहिनी साधना और इंद्रिय संयम के आवश्यक नियम

क्या अवश्य करें किन गलतियों से सर्वथा दूर रहें
प्रतिदिन प्रातः काल अपने मन को कामुक विचारों से मुक्त रखें पराई स्त्री अथवा पराए पुरुष के प्रति कामुक दृष्टि कदापि न रखें
अपनी बुद्धि और कूटनीति का प्रयोग केवल धर्म रक्षा हेतु करें किसी निर्बल व्यक्ति के साथ छल कपट अथवा विश्वासघात न करें
शुक्रवार को सुगंधित चंदन और श्वेत वस्त्र धारण करें मदिरा मांसाहार और नशीले पदार्थों का सेवन करने से सर्वथा बचें
स्त्रियों का सदैव आदर करें और उन्हें देवी स्वरूप मानें अपने सौंदर्य आकर्षण अथवा धन का तनिक भी अहंकार न करें
पूजा में शुद्ध गाय के दूध से बनी खीर और तुलसी पत्र अर्पित करें बिना कुंडली मिलान किए ओपल अथवा गोमेद रत्न पहनने की भूल न करें

धर्म रक्षा और विवेक जागृति से स्वर्णिम जीवन

भगवान श्री हरि विष्णु का मोहिनी अवतार यह सनातन सत्य प्रतिपादित करता है कि इस संसार में बल ही सब कुछ नहीं होता अपितु बुद्धि और विवेक की शक्ति बल से कहीं अधिक श्रेष्ठ होती है। जहां विशाल सेनाएं और प्रलयंकारी अस्त्र शस्त्र विफल हो जाते हैं वहां धर्म सम्मत कूटनीति और मधुर व्यवहार विजय दिला देता है। माया वास्तव में भगवान की ही शक्ति है जो अज्ञानियों को बांधती है और ज्ञानियों को मुक्त करती है। जब मनुष्य अपने भीतर की काम वासना को जीतकर अपनी इंद्रियों को ईश्वर के चरणों में समर्पित कर देता है तब वह भस्मासुर जैसी विनाशकारी प्रवृत्तियों से स्वतः सुरक्षित हो जाता है। भगवान मोहिनी का नित्य स्मरण मनुष्य को विषम से विषम परिस्थितियों में भी शांत चतुर और अजेय बनाए रखता है और अंततः उसे इस नश्वर संसार के मायाजाल से मुक्त करके परम पद की प्राप्ति कराता है।

FAQ

भगवान विष्णु ने मोहिनी अवतार किस मुख्य उद्देश्य से धारण किया था? भगवान विष्णु ने समुद्र मंथन के पश्चात असुरों से अमृत कलश की रक्षा करने और उसे देवताओं को पिलाने तथा बाद में भस्मासुर के संहार हेतु मोहिनी अवतार धारण किया था।

मोहिनी एकादशी किस पावन तिथि को मनाई जाती है? मोहिनी एकादशी प्रतिवर्ष वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को अत्यंत श्रद्धा और वैदिक नियमों के साथ मनाई जाती है।

राहु और केतु की उत्पत्ति मोहिनी अवतार के समय किस प्रकार हुई? स्वर्भानु नामक दानव जब देवताओं का रूप धरकर अमृत पीने लगा तब सूर्य और चंद्र के संकेत पर मोहिनी रूपी भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उसका सिर काट दिया जिससे सिर राहु और धड़ केतु बना।

भस्मासुर का संहार भगवान मोहिनी ने किस प्रकार किया? भगवान मोहिनी ने भस्मासुर को नृत्य की प्रतियोगिता में उलझाकर ऐसा हस्त संचालन कराया जिससे भस्मासुर ने अपना ही हाथ अपने मस्तक पर रख लिया और भस्म हो गया।

ज्योतिष में मोहिनी अवतार का संबंध किन ग्रहों से माना जाता है? ज्योतिष में मोहिनी अवतार का सीधा संबंध सौंदर्य कला और काम के कारक शुक्र देव तथा माया भ्रम और कूटनीति के कारक छाया ग्रह राहु से माना जाता है।

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लेखक

पं. अमिताभ शर्मा

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