मुरुगन अवतार और ज्ञान वेल रहस्य क्या?

By पं. नीलेश शर्मा

तिरुचेन्दूर संग्राम शूरपद्मन उद्धार ज्ञान वेल और मंगल अंगारक दोष शांति का संपूर्ण वैदिक रहस्य

भगवान मुरुगन अवतार कथा और ज्ञान वेल रहस्य

मुरुगन पूजन मुहूर्त और शास्त्रीय विधान

सनातन वैदिक परंपरा और स्कंद पुराण के अंतर्गत दक्षिण भारत के आगम दर्शन में साक्षात देवाधिदेव भगवान शिव के दिव्य तेज से उत्पन्न भगवान मुरुगन कार्तिकेय का प्राकट्य सर्वोच्च सौंदर्य यौवन शौर्य और परम ज्ञान का सर्वोच्च शिखर है। वैदिक ज्योतिष तथा तत्व विज्ञान के अंतर्गत सौरमंडल के सेनापति भूमि साहस रक्त और पराक्रम के अधिपति मंगल देव के समस्त क्रूर प्रभावों को शांत करने तथा अंगारक दोष और कुज दोष के निवारण हेतु भगवान मुरुगन की आराधना को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जब जातक की जन्म कुंडली में मंगल ग्रह नीच राशि कर्क में स्थित हो राहु से युक्त होकर अंगारक योग बना रहा हो अथवा प्रथम चतुर्थ सप्तम अष्टम व द्वादश भाव में बैठकर वैवाहिक जीवन में मांगलिक दोष उत्पन्न कर रहा हो तब ज्ञान वेल धारण करने वाले तमिल अधिपति भगवान मुरुगन की शरण में जाने से अमोघ विजय और समस्त प्रकार के भयों से मुक्ति प्राप्त होती है। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि स्कंद षष्ठी जिसे दक्षिण भारत में सूरसंहारम् पर्व के रूप में मनाया जाता है अथवा प्रत्येक मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी और मंगलवार के पावन अनुष्ठान का संपूर्ण शास्त्रीय विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।

शास्त्रीय आयाम अनुष्ठान विवरण और ज्योतिषीय मान्यता
प्रमुख पावन तिथि कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी सूरसंहारम् अथवा वैकासी विशाखम व थाईपू Capitalism
दैनिक पूजन समय प्रातः कालीन सूर्योदय वेला अथवा सायं गोधूलि प्रदोष काल
अधिष्ठाता स्वरूप बारह भुजाओं वाले मयूर पर विराजमान दिव्य ज्ञान वेल और कुक्कुट ध्वज धारिणी मुरुगन
ज्योतिषीय ग्रह व भाव संबंध प्रथम भाव तृतीय भाव षष्ठ भाव अष्टम भाव सेनापति मंगल और कृतिका विशाखा नक्षत्र
मुख्य पूजन सामग्री शुद्ध पंचामृत लाल कनेर के पुष्प विभूति शुद्ध लाल चंदन गुड़ और तिल का तेल
प्रधान वैदिक अनुष्ठान स्कंद षष्ठी कंद षष्ठी कवकम् पाठ सुब्रह्मण्य भुजंगम और ॐ शरवणभवाय नमः जप
अपेक्षित फल अंगारक दोष शांति शत्रु बाधा निवारण ऋण मुक्ति अदम्य साहस और वाक् सिद्धि

तमिल संस्कृति में मुरुगन और छह पावन धाम

दक्षिण भारत की परम पावन द्रविड़ परंपरा और तमिल संगम साहित्य में भगवान मुरुगन को केवल एक पौराणिक देवता नहीं अपितु तमिल भाषा और संस्कृति का शाश्वत पिता और अधिपति माना गया है। तमिल भाषा में मुरुगन शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है वह जो परम सुंदर युवा मधुर और दिव्य गुणों से परिपूर्ण है। प्राचीन काल में जब अगस्त्य मुनि ने दक्षिण भारत की यात्रा की थी तब भगवान मुरुगन ने ही उन्हें तमिल व्याकरण और अध्यात्म का गूढ़ ज्ञान प्रदान किया था।

तमिलनाडु की पावन भूमि पर भगवान मुरुगन के 6 अत्यंत पावन और दिव्य मंदिर स्थित हैं जिन्हें सामूहिक रूप से आरुपदै वीडु अर्थात छह युद्ध छावनियां अथवा छह पावन धाम कहा जाता है।

  • तिरुपरंकुंद्रम यह वह पावन स्थल है जहां भगवान मुरुगन ने देवराज इंद्र की पुत्री देवसेना के साथ दिव्य विवाह संपन्न किया था।
  • तिरुचेन्दूर यह बंगाल की खाड़ी के पावन समुद्र तट पर स्थित वह पावन धाम है जहां मुरुगन ने क्रूर असुर शूरपद्मन का संहार कर धर्म की पुनर्स्थापना की थी।
  • पलानी यह वह पावन पर्वत धाम है जहां भगवान मुरुगन ने समस्त सांसारिक वस्त्रों और आभूषणों का त्याग कर एक संन्यासी बाल दण्डायुधपाणि का रूप धारण किया था।
  • स्वामीमलाई यह वह अत्यंत गोपनीय ज्ञान पीठ है जहां बालक मुरुगन ने अपने पिता देवाधिदेव भगवान शिव को प्रणव मंत्र ॐ का परम रहस्य सिखाया था।
  • तिरुत्तणी यह वह शांत पर्वत शिखर है जहां असुरों के संहार के पश्चात भगवान मुरुगन ने अपने क्रोध को शांत कर विश्राम किया था।
  • पझमुदिरचोलै यह घने वनों और प्राकृतिक झरनों से घिरा हुआ वह पावन स्थल है जहां मुरुगन अपनी दोनों पत्नियों वल्ली और देवसेना के साथ भक्तों को अखंड आशीर्वाद प्रदान करते हैं।

माता पार्वती का ज्ञान वेल और तिरुचेन्दूर संग्राम

स्कंद पुराण के अत्यंत गोपनीय तमिल संस्करण कंद पुराणम् के अनुसार प्राचीन काल में तारकासुर के भाई शूरपद्मन ने अपनी भीषण तपस्या के बल पर तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था। शूरपद्मन का अत्याचार इतना बढ़ चुका था कि उसने समस्त देवताओं को बंदी बनाकर अपने कारागार में डाल दिया था और वह उन्हें दासों की भांति प्रताड़ित करता था।

देवताओं की करुण पुकार सुनकर जब भगवान मुरुगन ने युद्ध का संकल्प लिया तब उनकी माता जगत जननी भगवती पार्वती ने अपने संपूर्ण तपोबल और दिव्य शक्तियों को एकत्र कर एक अत्यंत तेजस्वी और अमोघ अस्त्र का निर्माण किया जिसे सनातन आगमों में ज्ञान वेल अर्थात दिव्य भाला कहा जाता है।

माता पार्वती ने यह पावन वेल अपने पुत्र मुरुगन के हाथों में सौंपते हुए आशीर्वाद दिया कि यह केवल एक भौतिक अस्त्र नहीं है अपितु यह साक्षात पराशक्ति की वह दिव्य ज्ञान शक्ति है जो संसार के समस्त अज्ञान और अंधकार का नाश करने वाली है।

भगवान मुरुगन अपनी विशाल सेना के साथ दक्षिण भारत में समुद्र के तट पर स्थित तिरुचेन्दूर पहुंचे। वहां छह दिनों तक देवताओं और असुरों के मध्य ऐसा भीषण महासंग्राम लड़ा गया जिससे संपूर्ण सागर का जल उबलने लगा और दिशाएं कांप उठीं। मुरुगन ने शूरपद्मन के समस्त भाइयों और सेनापतियों का वध कर दिया।

  • जब शूरपद्मन युद्ध भूमि में अकेला रह गया तब उसने अपनी पराजय को निकट देखकर अनेक मायावी रूप धारण किए।
  • वह कभी विशाल पर्वताकार बन जाता तो कभी समुद्र की अतल गहराइयों में छिप जाता।
  • अंत में जब उसके समस्त मायावी छल निष्फल हो गए तब वह समुद्र के बीच में एक अत्यंत विशाल और भयावह आम्र वृक्ष अर्थात आम के पेड़ के रूप में रूपांतरित होकर छिप गया।
  • भगवान मुरुगन ने अपने दाहिने हाथ से उस दैदीप्यमान ज्ञान वेल का संधान किया।
  • वह दिव्य वेल विद्युत की गति से समुद्र को चीरता हुआ गया और उसने उस विशाल आम्र वृक्ष को बीच में से दो फाड़ कर दिया।

क्या मयूर और कुक्कुट शूरपद्मन का ही रूपांतरण हैं?

वृक्ष के दो टुकड़े होते ही शूरपद्मन का समस्त आसुरी अहंकार और अज्ञान एक ही क्षण में वाष्प बनकर उड़ गया। मृत्यु के उस अंतिम क्षण में जब शूरपद्मन ने भगवान मुरुगन के दिव्य विश्वरूप का दर्शन किया तो उसकी आंखों से पश्चाताप के अश्रु बहने लगे। उसने थर थर कांपते हुए भगवान के पावन चरणों में आत्मसमर्पण कर दिया।

सनातन धर्म का यह परम सत्य है कि भगवान किसी भी प्राणी का विनाश नहीं करते वे केवल उसके भीतर बैठे हुए आसुरी भाव का संहार कर उसकी आत्मा का उद्धार करते हैं।

भगवान मुरुगन ने अपनी अगाध करुणा का परिचय देते हुए उस कटे हुए आम के वृक्ष के दो भागों को अपनी शरण में ले लिया।

  • वृक्ष का एक भाग एक अत्यंत सुंदर और तेजस्वी मयूर अर्थात मोर के रूप में रूपांतरित हो गया जिसे भगवान मुरुगन ने अपना पावन वाहन बनाकर अपने चरणों के नीचे स्थान दिया।
  • वृक्ष का दूसरा भाग एक परम बलशाली कुक्कुट अर्थात मुर्गे के रूप में रूपांतरित हो गया जिसे भगवान ने अपनी विजय पताका अर्थात ध्वज के रूप में अपने हाथ में धारण किया।
  • यह घटना सनातन दर्शन का सबसे सुंदर रूपक है जहां अहंकार मयूर बनकर भगवान की सेवा में झुक गया और कामुक वृत्तियां कुक्कुट बनकर ब्रह्म मुहूर्त के ज्ञान का उद्घोष करने लगीं।
  • शूरपद्मन का यह उद्धार यह सिद्ध करता है कि जो घोर पापी भी मुरुगन के ज्ञान वेल के सम्मुख आत्मसमर्पण कर देता है भगवान उसे दंड देने के स्थान पर अपना नित्य सेवक बना लेते हैं।

स्वामीमलाई में पिता शिव को ओंकार का उपदेश

भगवान मुरुगन के बाल्यकाल की एक अत्यंत पावन और चमत्कारी लीला का वर्णन तमिल आगमों में मिलता है जिसे सुनकर ज्ञानी जन भी नतमस्तक हो जाते हैं। एक बार सृष्टि के रचयिता परमपिता ब्रह्मा जी भगवान शिव के दर्शन हेतु कैलास पहुंचे। मार्ग में बालक मुरुगन ने ब्रह्मा जी से पूछा कि आप सृष्टि की रचना किस आधार पर करते हैं।

ब्रह्मा जी ने गर्व से कहा कि मैं वेदों के आधार पर सृष्टि का निर्माण करता हूं। बालक मुरुगन ने मुस्कुराते हुए कहा कि यदि आप वेदों के ज्ञाता हैं तो मुझे वेदों के मूल बीज अक्षर प्रणव मंत्र ॐ का वास्तविक तात्विक अर्थ समझाइए।

ब्रह्मा जी ने ओंकार के बाह्य अर्थ का वर्णन करना आरंभ किया किंतु जब मुरुगन ने उसके सूक्ष्म आंतरिक और नाद ब्रह्म के रहस्यों पर प्रश्न किए तब ब्रह्मा जी निरुत्तर हो गए। ब्रह्मा जी के मौन को देखकर बालक मुरुगन ने उन्हें अज्ञानी बताते हुए अपने कारागार में बंदी बना लिया।

जब देवाधिदेव भगवान शिव को यह ज्ञात हुआ तो वे बालक मुरुगन के सम्मुख पहुंचे और उन्होंने कहा कि तुमने जगत पिता ब्रह्मा को क्यों बंदी बनाया है क्या तुम ओंकार का अर्थ जानते हो।

  • बालक मुरुगन ने अत्यंत गंभीरता से कहा कि हां मैं ओंकार का परम सत्य जानता हूं किंतु यदि आप वह ज्ञान सुनना चाहते हैं तो आपको एक शिष्य की भांति मेरे चरणों में बैठना होगा।
  • देवाधिदेव भगवान शिव अपने पुत्र की इस प्रज्ञा को देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए।
  • भगवान शिव ने बालक मुरुगन को अपने कंधों पर बिठाया और स्वयं शिष्य का रूप धारण कर अपने कान उनके मुख के समीप लगाए।
  • स्वामीमलाई के पावन स्थल पर बालक मुरुगन ने भगवान शिव के कान में ओंकार के उस अद्वैत रहस्य का उपदेश दिया जिसे सुनकर भगवान शिव परमानंद में मग्न हो गए।
  • अपने ही पिता के गुरु बन जाने के कारण संपूर्ण ब्रह्मांड में भगवान मुरुगन का नाम स्वामीनाथ स्वामी पड़ा जिसका अर्थ होता है जो स्वयं देवों के देव महादेव के भी स्वामी हैं।

मंगल ग्रह और अंगारक दोष का ज्योतिषीय मर्म

वैदिक ज्योतिष और विशेष रूप से दक्षिण भारतीय नाड़ी ज्योतिष परंपरा में भगवान मुरुगन को सौरमंडल के सेनापति मंगल ग्रह का साक्षात अधिपति और मूल शासक देवता माना गया है। तमिल ज्योतिष में मंगल को शेव्वॉय कहा जाता है।

मंगल ग्रह भचक्र में अग्नि तत्व रक्त बाहुबल भूमि अचल संपत्ति युद्ध कौशल पुलिस और प्रशासनिक सत्ता का नैसर्गिक कारक होता है। जब किसी जातक की जन्म कुंडली में मंगल ग्रह अशुभ स्थिति में होता है तो व्यक्ति के जीवन में अनेक प्रकार की विसंगतियां उत्पन्न होती हैं।

  • जन्म कुंडली के प्रथम चतुर्थ सप्तम अष्टम अथवा द्वादश भाव में मंगल के स्थित होने से भयंकर मांगलिक दोष अथवा कुज दोष का निर्माण होता है जो दांपत्य जीवन में कलह विच्छेद अथवा जीवनसाथी के स्वास्थ्य पर गंभीर संकट उत्पन्न करता है।
  • जब मंगल और राहु की युति होती है तो अंगारक योग बनता है जिससे जातक अत्यधिक क्रोधी हिंसक रक्त विकार से पीड़ित अथवा पुलिस व अदालती विवादों में फंस जाता है।
  • जन्म कुंडली का तृतीय भाव पराक्रम का स्थान है जहां मुरुगन की कृपा से व्यक्ति में अदम्य साहस का संचार होता है।
  • जन्म कुंडली का षष्ठ भाव ऋण रोग और शत्रु का स्थान है जहां मंगल की शुभता से जातक अपने समस्त कर्जों और गुप्त शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है।
  • जन्म कुंडली का दशम भाव कर्म स्थान है जहां मंगल को सर्वोच्च दिशा बल प्राप्त होता है जिससे जातक सेना पुलिस अथवा उच्च प्रशासनिक सेवाओं में उच्च पद प्राप्त करता है।
  • भगवान मुरुगन की आराधना मंगल के इस समस्त क्रूर ताप को शांत कर उसे रचनात्मक ऊर्जा और आत्मिक शौर्य में रूपांतरित कर देती है।

क्या मुरुगन साधना से ऋण और भय मिटते हैं?

आधुनिक युग में मानव जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि व्यक्ति निरंतर अज्ञात भय मानसिक असुरक्षा और आर्थिक कर्जों के जाल में फंसा रहता है। कई बार व्यक्ति कठोर परिश्रम करता है किंतु भूमि विवाद संपत्ति के झगड़े और भारी कर्ज उसके जीवन को नरक बना देते हैं। इसके अतिरिक्त रक्त जनित रोग उच्च रक्तचाप और दुर्घटनाओं का भय व्यक्ति को भीतर से तोड़ देता है।

शास्त्रों में यह अकाट्य सत्य वर्णित है कि जो व्यक्ति श्रद्धा भाव से भगवान मुरुगन के पावन ज्ञान वेल का ध्यान करता है उसके जीवन से भय का समूल नाश हो जाता है। जिस प्रकार मुरुगन के वेल ने शूरपद्मन के आम्र वृक्ष को चीरकर सत्य की विजय स्थापित की थी उसी प्रकार मुरुगन साधना जातक के जीवन के समस्त पुराने कर्जों और भूमि विवादों को पल में समाप्त कर देती है।

यह साधना उन युवाओं के लिए साक्षात वरदान है जो सेना पुलिस अथवा रक्षा क्षेत्र में अपना करियर बनाना चाहते हैं। मुरुगन कृपा से वाणी में ऐसा ओज उत्पन्न होता है कि व्यक्ति जहां भी जाता है लोग उसके नेतृत्व को स्वीकार करने के लिए विवश हो जाते हैं।

अंगारक दोष शांति और मुरुगन कृपा के उपाय

यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में मंगल ग्रह पीड़ित हो विवाह में निरंतर रुकावटें आ रही हों भारी कर्ज का बोझ हो अथवा रक्त विकार सताते हों तो शास्त्रों में भगवान मुरुगन की प्रसन्नता हेतु अत्यंत प्रामाणिक वैदिक उपाय बताए गए हैं।

  • प्रत्येक मंगलवार अथवा शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को प्रातः काल स्नान के उपरांत पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें और भगवान मुरुगन के चित्र अथवा विग्रह के सम्मुख शुद्ध तिल के तेल अथवा गाय के घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  • भगवान मुरुगन को ताजे लाल कनेर अथवा गुड़हल के पुष्प अर्पित करें और शुद्ध लाल चंदन व विभूति का तिलक लगाएं तथा पावन षडाक्षर मंत्र ॐ शरवणभवाय नमः अथवा ॐ सुब्रह्मण्याय नमः का कम से कम 108 बार शांत मन से जाप करें।
  • अपने भीतर अदम्य साहस को जाग्रत करने और अंगारक दोष को शांत करने हेतु प्रतिदिन प्रातः काल स्नान के उपरांत तमिल परंपरा में पूजित पावन कंद षष्ठी कवकम् अथवा आदि शंकराचार्य विरचित सुब्रह्मण्य भुजंगम का शुद्ध उच्चारण के साथ पाठ करें।
  • प्रत्येक मंगलवार को भगवान मुरुगन को ताजे फलों से बने पंचामृत अथवा शुद्ध गुड़ और भुने चने का भोग लगाएं और उस प्रसाद को बालकों में प्रेमपूर्वक वितरित करें।
  • जातक को अपनी शारीरिक अवस्था और योग्य ज्योतिर्विद के परामर्श के अनुसार तीन मुखी अथवा छह मुखी नेपाली रुद्राक्ष तांबे अथवा चांदी के तार में पिरोकर मंगलवार के दिन धारण करना चाहिए जो मंगल की ऊर्जा को बली बनाता है।
  • प्रत्येक मंगलवार को किसी निर्धन श्रमिक अथवा सैनिक की आर्थिक सहायता करें तथा लाल गाय को गुड़ और भीगी हुई मसूर की दाल खिलाएं।

मुरुगन आराधना और व्रत के शास्त्रीय नियम

क्या अवश्य करें किन गलतियों से सर्वथा दूर रहें
प्रतिदिन प्रातः काल उठकर अपने मस्तक पर शुद्ध भस्म अथवा विभूति धारण करें अपने शारीरिक बल अधिकार अथवा अस्त्र का किसी निर्बल पर दुरुपयोग न करें
भगवान मुरुगन को सदैव ताजे लाल पुष्प शुद्ध पंचामृत और गुड़ अर्पित करें किसी भी परिस्थिति में अपने कर्तव्यों से भागने अथवा कायरता दिखाने से बचें
मंगलवार और षष्ठी के दिन पूर्ण स्वच्छता ब्रह्मचर्य और सात्विक आहार लें तामसिक भोजन मदिरा मांस और अत्यधिक तीखे गरिष्ठ पदार्थों से सर्वथा दूर रहें
अपने जीवन में सत्य साहस अनुशासन और आध्यात्मिक विद्या को सर्वोच्च स्थान दें अपने ज्ञान पद अथवा पराक्रम का समाज में कभी भी झूठा अहंकार न करें
पूजा में शुद्ध तांबे के बर्तन तिल का तेल और लाल चंदन का ही प्रयोग करें बिना स्नान किए अथवा अशुद्ध अवस्था में मुरुगन के विग्रह को स्पर्श न करें

दिव्य शौर्य और परम ज्ञान का शाश्वत आलोक

भगवान मुरुगन का पावन अवतार संपूर्ण मानव जाति को यह सनातन शिक्षा प्रदान करता है कि सच्चा बलवान वही है जिसके शौर्य के भीतर परम ज्ञान और अगाध करुणा का वास हो। शूरपद्मन का वध और उसका मयूर व कुक्कुट के रूप में रूपांतरण यह सिद्ध करता है कि ईश्वर का उद्देश्य किसी का विनाश करना नहीं अपितु आत्मा के अहंकार को समाप्त कर उसे परमात्मा के चरणों का नित्य सेवक बनाना है। ज्ञान वेल यह स्मरण कराता है कि हमारी बुद्धि अज्ञान के आम्र वृक्ष को चीरने वाली तीक्ष्ण और व्यापक होनी चाहिए। पिता शिव को ओंकार का उपदेश देना यह सिखाता है कि सत्य का ज्ञान कहीं से भी मिले उसे विनम्रता से शिरोधार्य करना चाहिए। मंगल का शौर्य जब मुरुगन के पावन तेज में विलीन हो जाता है तब मनुष्य इस संसार में रहते हुए समस्त द्वंद्वों पर विजय प्राप्त कर लेता है। भगवान मुरुगन का नित्य स्मरण मनुष्य के जीवन से समस्त अंगारक दोषों कर्जों भय और शारीरिक संतापों को समाप्त करके उसे एक तेजस्वी निर्भीक और आत्मज्ञानी व्यक्तित्व बनाकर अंततः परम पद की प्राप्ति कराता है।

FAQ

भगवान मुरुगन को दक्षिण भारत में किन प्रमुख नामों से जाना जाता है? भगवान मुरुगन को दक्षिण भारत में कार्तिकेय सुब्रह्मण्य षडानन स्वामीनाथ स्वामी कंदन और वेदन जैसे परम पावन नामों से जाना जाता है।

भगवान मुरुगन का मुख्य अस्त्र क्या है और वह उन्हें किसने प्रदान किया था? भगवान मुरुगन का मुख्य अस्त्र ज्ञान वेल अर्थात दिव्य भाला है जो उन्हें उनकी माता जगत जननी भगवती पार्वती ने आसुरी शक्तियों के संहार हेतु प्रदान किया था।

शूरपद्मन को परास्त करने के पश्चात भगवान मुरुगन ने उसे किस रूप में अपनाया था? शूरपद्मन के पश्चाताप करने पर भगवान मुरुगन ने उसके शरीर के दो भागों को मयूर अर्थात अपने वाहन और कुक्कुट अर्थात अपने ध्वज के रूप में स्वीकार किया था।

ज्योतिष में भगवान मुरुगन का संबंध किस प्रमुख ग्रह से माना जाता है? वैदिक और दक्षिण भारतीय नाड़ी ज्योतिष में भगवान मुरुगन का सीधा संबंध सौरमंडल के सेनापति मंगल ग्रह से माना जाता है जो अंगारक दोष को शांत करते हैं।

भगवान मुरुगन ने अपने पिता भगवान शिव को किस पावन स्थल पर ओंकार का उपदेश दिया था? भगवान मुरुगन ने तमिलनाडु के पावन स्वामीमलाई धाम में अपने पिता देवाधिदेव भगवान शिव को प्रणव मंत्र ॐ का परम गूढ़ रहस्य सिखाया था।

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लेखक

पं. नीलेश शर्मा

पं. नीलेश शर्मा (63)


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