नर नारायण अवतार का रहस्य क्या है?

By पं. नरेंद्र शर्मा

बदरिकाश्रम की घोर तपस्या सहस्त्रकवच असुर संहार और गुरु मंगल योग का संपूर्ण ज्योतिषीय रहस्य

नर नारायण अवतार कथा और गुरु मंगल योग रहस्य

नर नारायण पूजन विधान और ज्योतिषीय नियम

सनातन वैदिक परंपरा में भगवान श्री हरि विष्णु के युगल स्वरूप और बदरिकाश्रम के अधिष्ठाता के रूप में पूजित भगवान नर नारायण का प्राकट्य अखंड तपस्या अमोघ आत्मबल और पुरुषार्थ का सर्वोच्च शिखर है। वैदिक ज्योतिष के अंतर्गत ज्ञान के कारक देवगुरु बृहस्पति और अदम्य साहस के स्वामी मंगल देव के शुभ समन्वय अर्थात गुरु मंगल योग को जाग्रत करने के लिए नर नारायण की आराधना को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जब जातक की जन्म कुंडली में मंगल और गुरु निर्बल होकर इच्छाशक्ति में कमी भय अथवा जीवन संघर्षों में पलायन की प्रवृत्ति उत्पन्न करते हैं तब नर नारायण का ध्यान चेतना को परम बल प्रदान करता है। इस पावन अनुष्ठान की तिथि समय और शास्त्रीय घटकों का संपूर्ण विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।

शास्त्रीय आयामअनुष्ठान विवरण और ज्योतिषीय मान्यता
प्रमुख पावन तिथिश्रावण मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी अथवा बद्रीनाथ कपाट खुलने की पावन तिथि
दैनिक पूजन समयप्रातः कालीन ब्रह्म मुहूर्त अथवा दोपहर का अभिजित मुहूर्त
अधिष्ठाता स्वरूपबदरी वृक्ष के नीचे ध्यानस्थ द्विभुज तपस्वी नर और चतुर्भुज नारायण
ज्योतिषीय भाव व ग्रह संबंधतृतीय भाव नवम भाव देवगुरु बृहस्पति और पराक्रम कारक मंगल देव
मुख्य पूजन सामग्रीश्वेत चंदन तुलसी दल गंगाजल कमल पुष्प पंचामृत और पीत वस्त्र
प्रधान वैदिक अनुष्ठाननारायण कवच पाठ बद्रीनाथ स्तोत्र और ॐ नमो नारायणाय जप
अपेक्षित फलगुरु मंगल योग की जागृति अमोघ आत्मबल और आंतरिक शत्रुओं पर विजय

धर्म और मूर्ति के गृह पावन प्राकट्य

सत्ययुग के आरंभिक काल में जब सृष्टि के संचालन और संतुलन के लिए तप की ऊर्जा का संचय आवश्यक था तब धर्म देव की भार्या और प्रजापति दक्ष की कन्या माता मूर्ति के गर्भ से भगवान विष्णु ने युगल रूप में जन्म लिया। उनके जन्म लेते ही संपूर्ण ब्रह्मांड में दिव्य शांति व्याप्त हो गई आकाश से पुष्प वर्षा होने लगी और गंधर्वों ने मंगल गान किया। माता मूर्ति के गर्भ से उत्पन्न इन दो दिव्य बालकों का नाम नर और नारायण रखा गया। नर और नारायण कोई दो भिन्न सत्ताएं नहीं थीं अपितु वे एक ही परम ब्रह्म की दो अभिव्यक्तियां थीं जहां नर जीवात्मा के पवित्र पुरुषार्थ का प्रतीक थे और नारायण साक्षात परमात्मा के दिव्य अनुग्रह का स्वरूप थे।

जन्म के पश्चात दोनों भाइयों ने सांसारिक भोगों और राजसी सुखों का तनिक भी उपभोग नहीं किया। वे बाल्यकाल में ही हिमालय की अगाध गहराइयों में स्थित गंधमादन पर्वत की ओर प्रस्थान कर गए। वहां उन्होंने अलकनंदा नदी के पावन तट पर एक विशाल बदरी अर्थात बेर के वृक्ष के नीचे अपना आश्रम स्थापित किया जिसे संसार आज बदरिकाश्रम या श्री बद्रीनाथ धाम के नाम से जानता है। वहां उन्होंने संपूर्ण सृष्टि के कल्याण हेतु सहस्रों वर्षों तक ऐसी भीषण और कठोर तपस्या आरंभ की जिसकी कल्पना भी साधारण मानव मन नहीं कर सकता। वे शीत ग्रीष्म और वर्षा के भयानक थपेड़ों को सहते हुए केवल वायु जल और सूखे पत्तों का सेवन करके अपनी चेतना को परमात्मा के ध्यान में लीन रखते थे।

कामदेव का मान मर्दन और उर्वशी का प्राकट्य

नर और नारायण के इस अगाध तपोबल से तीनों लोकों में भारी हलचल मच गई। स्वर्ग के राजा देवराज इंद्र अपने सिंहासन के भय से व्याकुल हो उठे। इंद्र को यह भ्रम हो गया कि दोनों मुनि अपनी तपस्या के बल से स्वर्ग का साम्राज्य छीनना चाहते हैं। अपनी सत्ता को बचाने के लिए इंद्र ने उस पावन तपोभूमि पर कामदेव वसंत ऋतु और स्वर्ग की अत्यंत रूपवती अप्सराओं जैसे रंभा मेनका और तिलोत्तमा की एक विशाल सेना को भेजा ताकि मुनियों की एकाग्रता भंग की जा सके।

गंधमादन पर्वत पर पहुंचकर कामदेव ने अपनी मायावी शक्तियों से कामुक वातावरण का निर्माण किया। कोयल कूकने लगीं सुगंधित समीर बहने लगी और अप्सराएं नग्न होकर मुनियों के सम्मुख मादक नृत्य करने लगीं। परंतु भगवान नारायण का चित्त क्षीरसागर की भांति शांत और अचल बना रहा। जब कामदेव और अप्सराएं अपने सारे प्रयासों में थककर पराजित हो गईं तब भगवान नारायण ने मंद मुस्कान के साथ अपने नेत्र खोले। उनके मन में क्रोध का तनिक भी लेश नहीं था।

भगवान नारायण ने अपने दाहिने हाथ से अपनी जंघा अर्थात उरु पर हल्के से थपकी दी। उस पावन स्पर्श से एक ऐसी अलौकिक सुंदरी कन्या प्रकट हुई जिसके रूप सौंदर्य के सम्मुख स्वर्ग की समस्त अप्सराएं मिट्टी के ढेले जैसी प्रतीत होने लगीं। जंघा से उत्पन्न होने के कारण उस कन्या का नाम उर्वशी रखा गया। भगवान नारायण ने इंद्र के दूतों से अत्यंत विनम्रता से कहा कि वे इस कन्या को उपहार स्वरूप देवराज इंद्र की सेवा में ले जाएं। कामदेव और अप्सराओं ने लज्जित होकर मुनियों के पावन चरणों में मस्तक झुका दिया और वे समझ गए कि नर नारायण की तपस्या किसी सांसारिक पद की प्राप्ति के लिए नहीं बल्कि ब्रह्मांड के कल्याण हेतु है।

सहस्त्रकवच असुर का संहार और महाभारत संबंध

उसी कालखंड में दंभोद्भव नामक एक महाबली दैत्य तीनों लोकों में हाहाकार मचा रहा था। उसने भगवान सूर्य देव की कठोर तपस्या करके 1000 दिव्य स्वर्ण कवचों का वरदान प्राप्त कर लिया था। इन 1000 कवचों के कारण संसार उसे सहस्त्रकवच के नाम से पुकारता था। सूर्य देव ने उसे यह दुर्लभ वरदान दिया था कि उसका प्रत्येक कवच केवल वही व्यक्ति तोड़ सकता है जिसने 1000 वर्षों तक निरंतर कठोर तप किया हो और फिर वह 1000 वर्षों तक लगातार उससे युद्ध करे। इसके अतिरिक्त जो व्यक्ति उसका एक कवच तोड़ेगा वह कवच टूटते ही तत्काल मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा।

इस वरदान के मद में अंधा होकर सहस्त्रकवच ने देवताओं और ऋषियों का वध करना आरंभ कर दिया। अंततः वह अपनी शक्ति के घमंड में बदरिकाश्रम पहुंचा और उसने तपस्या में लीन नर नारायण को युद्ध के लिए ललकारा। भगवान नर और नारायण ने इस अधर्मी असुर के संहार की एक अत्यंत विस्मयकारी योजना बनाई।

  • जब भगवान नर 1000 वर्षों तक सहस्त्रकवच से भीषण युद्ध करते थे तब भगवान नारायण 1000 वर्षों तक कठोर तपस्या करके आत्मिक ऊर्जा संचित करते थे।
  • 1000 वर्ष पूर्ण होने पर भगवान नर ने असुर का पहला कवच तोड़ दिया और वरदान के प्रभाव से वे उसी क्षण भूमि पर गिरकर निष्प्राण हो गए।
  • तब तपस्या समाप्त करके भगवान नारायण उठे और उन्होंने अपने तपोबल से प्राप्त मृत संजीवनी विद्या से अपने भ्राता नर को पुनः जीवित कर दिया।
  • इसके पश्चात भगवान नारायण ने 1000 वर्षों तक असुर से युद्ध किया और नर ने 1000 वर्षों तक तपस्या की तथा नारायण द्वारा दूसरा कवच तोड़ने पर नर ने उन्हें पुनः जीवित किया।
  • इस अद्भुत क्रम से दोनों भाइयों ने सहस्रों वर्षों के अथक संघर्ष के पश्चात उस असुर के 999 कवचों को एक एक करके नष्ट कर दिया।

जब केवल एक अंतिम कवच शेष रह गया तब वह कायर असुर भयभीत होकर युद्धभूमि से भाग गया और उसने सूर्य लोक में जाकर भगवान सूर्य की शरण ले ली। नर नारायण ने सूर्य देव की मर्यादा का सम्मान करते हुए उस समय उसका पीछा छोड़ दिया। द्वापर युग में वही सहस्त्रकवच अपने अंतिम कवच और कुंडल के साथ माता कुंती के गर्भ से कर्ण के रूप में अवतरित हुआ और उस अधर्मी के संहार हेतु भगवान नर ने अर्जुन के रूप में और भगवान नारायण ने साक्षात भगवान श्री कृष्ण के रूप में अवतार लिया। महाभारत के कुरुक्षेत्र में अर्जुन द्वारा कर्ण का वध वस्तुतः सहस्त्रकवच के उसी अंतिम कवच के संहार की तार्किक परिणति थी।

महर्षि पराशर अनुसार गुरु मंगल योग का प्रभाव

वैदिक ज्योतिष के महानतम ग्रंथ बृहत् पराशर होरा शास्त्र में ग्रहों के आत्मिक और भौतिक संतुलन का विशद विवेचन किया गया है। पराशरीय ज्योतिषीय दृष्टिकोण से भगवान नर नारायण की युगल सत्ता सीधे तौर पर गुरु मंगल योग का साक्षात प्रतिनिधित्व करती है। भगवान नर मानवीय पुरुषार्थ शारीरिक पराक्रम धनुर्वेद और अदम्य साहस के प्रतीक हैं जो सीधे तौर पर अग्नि तत्व के स्वामी मंगल देव से जुड़े हैं। दूसरी ओर भगवान नारायण साक्षात ईश्वरीय प्रज्ञा दिव्य तपस्या धर्म और आत्मिक चेतना के प्रतीक हैं जो ज्ञान के कारक देवगुरु बृहस्पति से जुड़े हैं।

जब कुंडली में मंगल और गुरु एक साथ युति बनाते हैं अथवा एक दूसरे को पूर्ण दृष्टि से देखते हैं तब कुंडली में अत्यंत दुर्लभ गुरु मंगल योग का निर्माण होता है। केवल मंगल का बल व्यक्ति को उग्र आक्रामक और विवेकहीन बना सकता है जिसका प्रतीक सहस्त्रकवच था। परंतु जब मंगल के पराक्रम को देवगुरु बृहस्पति का सात्विक ज्ञान और धर्म का अंकुश मिल जाता है तब वह नर नारायण जैसा अमोघ सुरक्षा कवच बन जाता है। यह योग जातक को शस्त्र और शास्त्र दोनों में पारंगत बनाता है जिससे व्यक्ति धर्म की रक्षा हेतु अपनी शारीरिक और मानसिक शक्ति का सर्वोच्च उपयोग करता है।

विपरीत परिस्थितियों में अडिग रहने का आध्यात्मिक विज्ञान

मानव जीवन का वास्तविक सौंदर्य सुख में नहीं अपितु घोर संकटों के समय अडिग रहने में है। बदरिकाश्रम की शून्य से नीचे की कड़ाके की ठंड में सहस्रों वर्षों तक एक पैर पर खड़े रहकर तपस्या करना यह दर्शाता है कि मानव मन यदि संकल्पबद्ध हो तो प्रकृति की कोई भी प्रतिकूलता उसे परास्त नहीं कर सकती। आधुनिक जीवन में जब व्यक्ति पर चारों ओर से कठिनाइयां आती हैं तो वह अवसाद और निराशा में घिर जाता है।

कुंडली का तृतीय भाव पराक्रम और नवम भाव धर्म का स्थान होता है। जब जातक अपने धर्म नवम भाव को अपने पराक्रम तृतीय भाव से जोड़ लेता है तब उसका आत्मविश्वास हिमालय की भांति अडिग हो जाता है। नर नारायण की कथा यह सिखाती है कि जीवन के 1000 संकटों रूपी कवचों को तोड़ने के लिए तपस्या और कर्म दोनों का समन्वय आवश्यक है। केवल प्रार्थना करने से संकट नहीं कटते और केवल बाहुबल से विजय नहीं मिलती। जब प्रार्थना नारायण और पुरुषार्थ नर दोनों एक साथ चलते हैं तब असंभव दिखने वाले कार्य भी सिद्ध हो जाते हैं।

गुरु मंगल दोष शांति और आत्मबल के अचूक उपाय

यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में मंगल और गुरु पीड़ित हों नीच राशि में बैठे हों अथवा जातक के भीतर अत्यधिक कायरता निर्णय न ले पाने की दुर्बलता या रक्त से जुड़े विकार उत्पन्न हो रहे हों तो शास्त्रों में नर नारायण की कृपा प्राप्त करने के अत्यंत प्रभावी उपाय बताए गए हैं।

  • प्रतिदिन प्रातः काल स्नान के उपरांत पूर्व दिशा की ओर मुख करके बदरिकाश्रम के अधिष्ठाता नर नारायण का ध्यान करें और पावन मंत्र ॐ नमो नारायणाय अथवा ॐ नराय नमः ॐ नारायणाय नमः का 108 बार शांत मन से जाप करें।
  • महर्षि वेदव्यास रचित परम शक्तिशाली नारायण कवच का नित्य प्रातः काल पाठ करें जो शरीर और आत्मा के चारों ओर एक अभेद्य सुरक्षा घेरा स्थापित करता है।
  • प्रत्येक मंगलवार और गुरुवार को तांबे अथवा पीतल के पात्र में गंगाजल और कच्चा गाय का दूध मिलाकर भगवान विष्णु को अर्पित करें तथा माथे पर श्वेत और पीत चंदन का तिलक लगाएं।
  • अपने भीतर साहस और नैतिक बल जाग्रत करने के लिए नियमित रूप से श्रीमद्भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय का पाठ करें जिसमें भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को अपने विराट रूप का दर्शन कराया था।
  • जातक को अपनी शारीरिक अवस्था और विद्वान ज्योतिर्विद के परामर्श के अनुसार तीन मुखी और पांच मुखी नेपाली रुद्राक्ष एक साथ पीले और लाल रेशमी धागे में पिरोकर गले में धारण करना चाहिए।
  • प्रत्येक गुरुवार को किसी मंदिर में चने की दाल और पीले फल दान करें तथा मंगलवार को असहाय सैनिकों पुलिसकर्मियों अथवा निर्धन बालकों को भोजन कराएं जिससे मंगल और गुरु दोनों ग्रह परम बलशाली होते हैं।

नर नारायण साधना के आवश्यक वैदिक नियम

क्या अवश्य करेंकिन गलतियों से सर्वथा दूर रहें
प्रतिदिन प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व उठकर ध्यान साधना करेंविपरीत परिस्थितियों में घबराकर अपने कर्तव्य पथ से कभी न भागें
अपने शारीरिक बल का प्रयोग सदैव दुर्बलों की रक्षा हेतु करेंअपने ज्ञान पराक्रम अथवा तप का तनिक भी अहंकार न करें
मन वचन और कर्म से पवित्र रहकर इंद्रिय निग्रह का अभ्यास करेंकामुक विचारों काम वासना और अश्लील संगति से सर्वथा दूर रहें
बदरीनाथ धाम और पवित्र हिमालयी तीर्थों का मानसिक नमन करेंअपने भाइयों मित्रों और सहयोगियों के साथ कभी विश्वासघात न करें
पूजा में शुद्ध तुलसी दल श्वेत चंदन और पीले पुष्प अर्पित करेंबिना कुंडली मिलान किए मूंगा अथवा पुखराज धारण करने की भूल न करें

शाश्वत तप और दिव्य पुरुषार्थ से स्वर्णिम जीवन

भगवान नर नारायण का पावन प्राकट्य यह सनातन सत्य उद्घाटित करता है कि मनुष्य केवल हाड़ मांस का पुतला नहीं है अपितु उसके भीतर अनंत ईश्वरीय शक्तियां सुप्त अवस्था में विद्यमान हैं। जब नर अपने भीतर के नारायण को पहचान लेता है तब वह साधारण मानव से महामानव बन जाता है। बदरिकाश्रम की वह पावन तपोभूमि आज भी नर नारायण के स्पंदनों से गुंजायमान है। जीवन में चाहे सहस्त्रकवच जैसी कितनी भी भयानक विपत्तियां क्यों न आ जाएं यदि हमारी आत्मा धर्म के मार्ग पर अडिग है तो प्रत्येक विपत्ति का अंत निश्चित है। भगवान नर नारायण का नित्य स्मरण मनुष्य के भीतर सोए हुए पुरुषार्थ को जगाता है जिससे वह सांसारिक वासनाओं को जीतकर इस पृथ्वी पर एक यशस्वी तेजस्वी और धर्मनिष्ठ व्यक्तित्व का निर्माण करते हुए अंततः परम पद को प्राप्त करता है।

FAQ

भगवान नर नारायण का अवतार किस पावन स्थान पर हुआ था? भगवान नर नारायण का अवतार हिमालय की गंधमादन पर्वत श्रृंखला में स्थित अलकनंदा तट पर पावन बदरिकाश्रम श्री बद्रीनाथ में हुआ था।

भगवान नर नारायण के माता पिता कौन थे? भगवान नर नारायण के पिता धर्म देव थे जो ब्रह्मा जी के मानस पुत्र थे और उनकी माता प्रजापति दक्ष की कन्या माता मूर्ति थीं।

भगवान नारायण ने कामदेव का मान मर्दन किस प्रकार किया था? भगवान नारायण ने अपनी जंघा को थपथपाकर स्वर्ग की समस्त अप्सराओं से अधिक सुंदर कन्या उर्वशी को प्रकट किया जिससे कामदेव लज्जित होकर नतमस्तक हो गए।

सहस्त्रकवच असुर आगे चलकर महाभारत में किस रूप में अवतरित हुआ था? सहस्त्रकवच असुर अपने अंतिम बचे हुए कवच और कुंडल के साथ महाभारत काल में सूर्य पुत्र महारथी कर्ण के रूप में अवतरित हुआ था।

कुंडली में गुरु मंगल योग को जाग्रत करने के लिए किस स्तोत्र का पाठ करना चाहिए? गुरु मंगल योग को जाग्रत करने और आत्मबल बढ़ाने हेतु प्रतिदिन प्रातः काल नारायण कवच और बद्रीनाथ स्तोत्र का पाठ करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

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लेखक

पं. नरेंद्र शर्मा

पं. नरेंद्र शर्मा (63)


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