पद्मावती अवतार और तिरुपति ऋण रहस्य क्या?

By पं. अभिषेक शर्मा

भृगु परीक्षा कुबेर ऋण तिरुपति श्रीनिवास और गुरु शुक्र युति का संपूर्ण वैदिक रहस्य

देवी पद्मावती अवतार कथा और तिरुपति ऋण रहस्य

पद्मावती पूजन मुहूर्त और शास्त्रीय विधान

सनातन वैदिक परंपरा और स्कंद पुराण के पावन दर्शन में आद्याशक्ति भगवती महालक्ष्मी के परम पावन प्रेममयी और ऐश्वर्य प्रदाता स्वरूप के रूप में पूजित माता पद्मावती अलमेलु मंगा का प्राकट्य कलयुग के समस्त संतापों दरिद्रता के संहार और आर्थिक ऋणों से मुक्ति का सर्वोच्च शिखर है। वैदिक ज्योतिष तथा तत्व विज्ञान के अंतर्गत ज्ञान धर्म और समृद्धि के अधिपति देवगुरु बृहस्पति तथा सौंदर्य ऐश्वर्य व भौतिक सुखों के कारक शुक्र देव के दुर्लभ व दिव्य समन्वय को जाग्रत करने के लिए देवी पद्मावती की उपासना को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जब जातक की जन्म कुंडली में षष्ठ भाव ऋण रोग व शत्रु भाव अथवा द्वितीय भाव धन कोष भाव पाप ग्रहों से पीड़ित होकर निरंतर कर्ज का बोझ व्यापारिक मंदी अथवा आर्थिक अस्थिरता उत्पन्न कर रहा हो तब तिरुपति वेणुगोपाल प्रिया माँ पद्मावती की शरण में जाने से अक्षय लक्ष्मी और ऋण मुक्ति की प्राप्ति होती है। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि पद्मावती ब्रह्मोत्सव पंचमी तीर्थम अथवा प्रत्येक मास के शुक्ल पक्ष के शुक्रवार के पावन अनुष्ठान का संपूर्ण शास्त्रीय विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।

शास्त्रीय आयाम अनुष्ठान विवरण और ज्योतिषीय मान्यता
प्रमुख पावन तिथि कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी पद्मावती जयंती अथवा प्रत्येक शुक्रवार
दैनिक पूजन समय प्रातः कालीन सूर्योदय वेला अथवा सायंकालीन गोधूलि प्रदोष काल
अधिष्ठाता स्वरूप सहस्र पंखुड़ियों वाले स्वर्ण कमल पर विराजमान दोनों हाथों में कमल पुष्प धारिणी माँ पद्मावती
ज्योतिषीय ग्रह व भाव संबंध द्वितीय भाव षष्ठ भाव एकादश भाव ज्ञान कारक देवगुरु बृहस्पति और धन कारक शुक्र देव
मुख्य पूजन सामग्री शुद्ध गाय का दूध पीले व गुलाबी कमल पुष्प शुद्ध केसर हल्दी की गांठें और कमलगट्टा
प्रधान वैदिक अनुष्ठान पद्मावती अष्टोत्तर शतनामावली पाठ कनकधारा स्तोत्र और ॐ श्रीं पद्मावत्यै नमः जप
अपेक्षित फल कलयुग के आर्थिक ऋणों से मुक्ति स्थायी धन संपदा गुरु शुक्र कृपा और दांपत्य सुख

महर्षि भृगु की परीक्षा और वैकुंठ से लक्ष्मी का प्रस्थान

श्रीमद्भागवत महापुराण और स्कंद पुराण के अंतर्गत वर्णित अत्यंत पावन इतिहास के अनुसार प्राचीन काल में गंगा तट पर ऋषियों मुनियों ने एक विशाल महायज्ञ का आयोजन किया था। उस यज्ञ के समापन पर समस्त महर्षियों के सम्मुख यह गंभीर संशय उपस्थित हुआ कि त्रिदेवों में सबसे शांत सात्विक और यज्ञीय फल के योग्य सर्वोच्च देवता कौन हैं। इस सत्य की परीक्षा लेने का दायित्व ब्रह्मर्षि भृगु मुनि को सौंपा गया।

महर्षि भृगु सर्वप्रथम सत्यलोक पहुंचे जहां उन्होंने परमपिता ब्रह्मा जी के प्रति कोई आदर प्रकट नहीं किया जिससे ब्रह्मा जी कुपित हो गए। इसके पश्चात वे कैलास पर्वत पहुंचे जहां देवाधिदेव भगवान शिव ने उनका आलिंगन करना चाहा किंतु भृगु ने उन्हें अशुद्ध बताकर परीक्षा लेनी चाही जिससे भगवान शिव ने अपना त्रिशूल उठा लिया जिन्हें माता पार्वती ने शांत किया। अंत में महर्षि भृगु क्षीरसागर में स्थित वैकुंठ धाम पहुंचे।

वैकुंठ में भगवान श्री हरि विष्णु शेषशैया पर शयन कर रहे थे और भगवती महालक्ष्मी उनके चरण दबा रही थीं। महर्षि भृगु ने भगवान विष्णु की परीक्षा लेने के लिए बिना कुछ कहे सीधे जाकर उनके वक्षस्थल पर अपने दाहिने पैर से भीषण प्रहार कर दिया।

भगवान विष्णु के वक्षस्थल पर आद्याशक्ति महालक्ष्मी का स्थायी वास होता है। जब भृगु का पैर भगवान के वक्ष पर लगा तो देवाधिदेव विष्णु क्रोधित होने के स्थान पर तत्काल उठ खड़े हुए। भगवान ने अत्यंत विनीत भाव से महर्षि के चरण पकड़ लिए और कहा कि हे महर्षि आपका चरण अत्यंत कोमल है और मेरा वक्ष वज्र के समान कठोर है अतः कहीं आपके पैर में चोट तो नहीं लगी। यह कहते हुए भगवान ने भृगु के पैर के तलवे में स्थित अहंकार के नेत्र को दबाकर नष्ट कर दिया।

महर्षि भृगु भगवान विष्णु की इस अगाध सहनशीलता और क्षमा भाव को देखकर नतमस्तक हो गए और उन्होंने भगवान को त्रिदेवों में परम सात्विक घोषित किया। किंतु भगवान के वक्षस्थल पर निवास करने वाली भगवती महालक्ष्मी इस घटना से अत्यंत व्यथित और रुष्ट हो गईं।

  • माता लक्ष्मी ने विचार किया कि जिस वक्षस्थल पर उनका शाश्वत अधिकार है उस पर एक ऋषि ने लात मारी और उनके पति ने दण्ड देने के स्थान पर उस ऋषि का सत्कार किया।
  • अपने निवास स्थान का यह अपमान माता लक्ष्मी सहन न कर सकीं।
  • उन्होंने तत्काल वैकुंठ धाम का परित्याग कर दिया और वे भूलोक पर उतर आईं।
  • माता लक्ष्मी महाराष्ट्र के करवीरपुर अर्थात कोल्हापुर पहुंचीं और वहां उन्होंने भगवान की विरह वेदना में घोर तपस्या आरंभ कर दी।

तिरुमाला की पहाड़ियों पर श्रीनिवास और पद्मावती का प्राकट्य

वैकुंठ में माता लक्ष्मी के चले जाने से संपूर्ण वैकुंठ श्री हीन और अंधकारमय हो गया। भगवान श्री हरि विष्णु अपनी प्राण वल्लभा के वियोग में अत्यंत व्याकुल और उदास हो गए। भगवान विष्णु ने भी वैकुंठ धाम का त्याग कर दिया और वे भूलोक पर माता लक्ष्मी की खोज में भटकने लगे।

भटकते हुए भगवान दक्षिण भारत की पावन शेषाचलम पर्वत श्रृंखला पर पहुंचे जिसे आज तिरुमाला की सात पहाड़ियां कहा जाता है। वहां भगवान एक विशाल चींटियों के बांबी अर्थात वल्मीक के भीतर समाधिस्थ हो गए। उस समय चोल राजा की एक गाय प्रतिदिन उस बांबी पर आकर अपना दूध भगवान के ऊपर अर्पित कर जाती थी। जब ग्वाले ने यह देखा तो उसने गाय को मारने के लिए कुल्हाड़ी चलाई जो सीधे भगवान के मस्तक पर लगी। भगवान के मस्तक से रक्त बहने लगा और वे उस बांबी से बाहर प्रकट हुए जिन्हें संसार ने श्रीनिवास के नाम से पुकारा। इसके पश्चात भगवान ने अपनी परम भक्त बकुला देवी के आश्रम में शरण ली जो पूर्व जन्म में माता यशोदा थीं।

उसी कालखंड में तोंदईमंडलम क्षेत्र में चंद्र वंश के राजा आकाशराज राज्य करते थे। राजा आकाशराज अत्यंत धर्मात्मा थे किंतु उनके कोई संतान नहीं थी। संतान प्राप्ति की कामना से राजा ने ऋषियों के परामर्श पर एक पुत्रकामेष्टि यज्ञ का आयोजन किया।

यज्ञ भूमि को पवित्र करने हेतु राजा आकाशराज ने स्वर्ण के हल से भूमि को जोतना आरंभ किया। जब हल वर्तमान तिरुचनूर के समीप पद्मा सरोवर के तट पर पहुंचा तो हल का फलक भूमि में किसी दिव्य वस्तु से टकराया।

जब मिट्टी हटाई गई तो सरोवर के जल के मध्य एक सहस्र पंखुड़ियों वाला पूर्ण विकसित स्वर्ण कमल खिला हुआ था। उस स्वर्ण कमल के भीतर साक्षात माता महालक्ष्मी एक अत्यंत रूपवती और परम तेजस्वी नवजात कन्या के रूप में विराजमान थीं।

  • कमल अर्थात पद्म से प्रकट होने के कारण राजा आकाशराज ने उस कन्या का नाम पद्मावती रखा।
  • तमिल भाषा में अलार अर्थात कमल के ऊपर स्थित होने के कारण उन्हें अलमेलु मंगा के नाम से पुकारा गया।
  • राजा आकाशराज और महारानी धरणी देवी ने उस कन्या का पालन पोषण अत्यंत लाड़ प्यार से किया और वे धीरे धीरे एक परम विदुषी और सुंदरी राजकुमारी के रूप में बड़ी हुईं।

क्या कुबेर से लिया ऋण कलयुग का विधान है?

एक बार जब राजकुमारी पद्मावती अपनी सखियों के साथ उपवन में भ्रमण कर रही थीं तब वहां एक जंगली मदमस्त हाथी आ धमका। उसी समय भगवान श्रीनिवास आखेट करते हुए वहां पहुंचे और उन्होंने उस हाथी को शांत कर राजकुमारी की रक्षा की। दोनों ने एक दूसरे को देखा और उनके अंतःकरण में पूर्व जन्मों का शाश्वत दिव्य प्रेम पुनः जाग्रत हो गया।

माता बकुला देवी ने राजा आकाशराज के राजमहल जाकर श्रीनिवास और पद्मावती के विवाह का प्रस्ताव रखा। महर्षि शुकदेव और बृहस्पति ने दोनों की जन्म पत्रिकाओं का मिलान किया और घोषित किया कि यह कोई साधारण मिलन नहीं अपितु साक्षात नारायण और महालक्ष्मी का शाश्वत गठबंधन है। राजा आकाशराज अपनी पुत्री का विवाह भगवान श्रीनिवास से करने हेतु सहर्ष सहमत हो गए।

किंतु विवाह के आयोजन हेतु राजा आकाशराज ने एक भव्य और अभूतपूर्व आयोजन की इच्छा प्रकट की। भगवान श्रीनिवास उस समय एक वनवासी और संन्यासी के रूप में थे और उनके पास विवाह के राजसी खर्च और आभूषणों हेतु कोई सांसारिक धन नहीं था।

तब भगवान श्रीनिवास ने संपूर्ण देवताओं के कोषाध्यक्ष यक्षराज कुबेर को स्मरण किया। भगवान श्रीनिवास ने कुबेर से विवाह संपन्न कराने हेतु एक करोड़ स्वर्ण मुद्राएं उधार लीं।

इस ऋण के संबंध में भगवान ब्रह्मा और भगवान शिव साक्षात साक्षी बने। कुबेर और भगवान श्रीनिवास के मध्य एक अत्यंत दिव्य और पवित्र अनुबंध हुआ।

  • अनुबंध के अनुसार भगवान श्रीनिवास ने यह प्रतिज्ञा ली कि वे कलयुग के अंत तक इस ऋण का केवल ब्याज चुकाते रहेंगे।
  • जब कलयुग समाप्त होगा तब वे कुबेर को उसका मूलधन वापस लौटाएंगे।
  • नारायणवनम के पावन स्थल पर भगवान श्रीनिवास और माता पद्मावती का अत्यंत भव्य और दिव्य विवाह संपन्न हुआ।
  • विवाह के उपरांत भगवान श्रीनिवास तिरुमाला के शिखर पर वेंकटेश्वर के रूप में प्रतिष्ठित हुए और माता पद्मावती तिरुचनूर के पावन धाम में विराजमान हुईं।
  • यही कारण है कि आज भी कलयुग में लाखों भक्त तिरुपति बालाजी के मंदिर में जाकर अपनी सामर्थ्य अनुसार हुंडी में धन और स्वर्ण दान करते हैं ताकि भगवान कुबेर का ऋण चुका सकें और बदले में भगवान उस भक्त को करोड़ों गुना ऐश्वर्य प्रदान करते हैं।

गुरु और शुक्र का दुर्लभ संगम और आर्थिक मुक्ति

वैदिक ज्योतिष के आधार ग्रंथ बृहत् पराशर होरा शास्त्र में ग्रहों के आत्मिक और भौतिक प्रभावों का विस्तृत विवेचन मिलता है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से भगवान श्रीनिवास और माता पद्मावती का पावन अवतार सीधे तौर पर देवगुरु बृहस्पति और शुक्र देव के उस दुर्लभ संगम का प्रतीक है जो कलयुग में दरिद्रता को भस्म करने वाला है।

देवगुरु बृहस्पति स्वर्ण ज्ञान धर्म नीति और दैवीय अनुग्रह के कारक हैं जबकि शुक्र देव भौतिक संपदा आभूषण वाहन दांपत्य सुख और तरल धन के अधिपति हैं। ज्योतिष में जब गुरु और शुक्र की शुभ दृष्टि होती है अथवा इन दोनों का संबंध धन भावों से बनता है तो व्यक्ति के जीवन में कभी भी धन का अभाव नहीं रहता।

  • जन्म कुंडली का द्वितीय भाव संचित धन परिवार और स्वर्ण संपदा का स्थान है।
  • जन्म कुंडली का षष्ठ भाव ऋण कर्ज बीमारी और अदालती विवादों का केंद्र होता है।
  • जन्म कुंडली का एकादश भाव नियमित आय लाभ और इच्छाओं की पूर्ति का स्थान है।
  • जब किसी जातक की कुंडली में षष्ठ भाव पर पाप ग्रहों की दृष्टि होती है तो व्यक्ति भयंकर कर्ज के जाल में फंस जाता है और उसकी कमाई केवल ब्याज चुकाने में चली जाती है।
  • देवी पद्मावती साक्षात उस ऋण मोचक शक्ति का स्वरूप हैं जो कुबेर के खजाने को भी नियंत्रित करती हैं।
  • जब साधक पद्मावती स्वरूप का ध्यान करता है तो कुंडली के द्वितीय और एकादश भाव जाग्रत हो जाते हैं जिससे व्यक्ति को अप्रत्याशित धन लाभ होता है और उसके समस्त पुराने ऋण समाप्त हो जाते हैं।

क्या तिरुपति दान से जन्मों का ऋण मिटता है?

आधुनिक युग में मनुष्य की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वह निरंतर आर्थिक असुरक्षा कर्ज के बोझ और मानसिक तनाव में जीवन व्यतीत करता है। कई बार व्यक्ति कठोर परिश्रम करता है किंतु उसके पैसे अनचाहे खर्चों में बह जाते हैं। यह स्थिति वस्तुतः जन्म जन्मांतर के कर्म ऋण का परिणाम होती है।

सनातन दर्शन में यह विधान है कि जब कोई व्यक्ति तिरुपति धाम जाकर अथवा अपने घर पर ही माँ पद्मावती और श्रीनिवास के निमित्त अपनी गाढ़ी कमाई का एक अंश दान करता है तो उसका वह दान सीधे कुबेर के ऋण खाते में जमा माना जाता है।

भगवान श्रीनिवास अपने भक्त के उस छोटे से दान से अत्यंत प्रसन्न होते हैं और वे भक्त के जीवन से समस्त ऋण दोष को समाप्त कर देते हैं। जो व्यक्ति सच्चे मन से पद्मावती अष्टोत्तर शतनामावली का पाठ करता है उसके घर में कभी भी आर्थिक कंगाली पैर नहीं पसार सकती और उसे समाज में राजा के समान प्रतिष्ठा प्राप्त होती है।

ऋण मुक्ति और पद्मावती कृपा के अचूक वैदिक उपाय

यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में षष्ठ भाव का स्वामी पीड़ित हो कर्ज का बोझ निरंतर बढ़ता जा रहा हो अथवा व्यापार में भारी घाटा हो रहा हो तो शास्त्रों में माँ पद्मावती की प्रसन्नता हेतु अत्यंत प्रामाणिक उपाय बताए गए हैं।

  • प्रत्येक शुक्रवार अथवा कार्तिक शुक्ल पंचमी के दिन प्रातः काल स्नान के उपरांत पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें और माँ पद्मावती व भगवान वेंकटेश्वर के चित्र के सम्मुख शुद्ध गाय के घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  • माता पद्मावती को पीले अथवा गुलाबी कमल के पुष्प सुगंधित अष्टगंध इत्र और केसर युक्त खीर अर्पित करें तथा पावन बीज मंत्र ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं पद्मावत्यै नमः अथवा ॐ नमो वेंकटेशाय का कम से कम 108 बार शांत मन से जाप करें।
  • अपने घर से घोर दरिद्रता और कर्ज को समाप्त करने हेतु प्रतिदिन प्रातः काल महर्षि वेदव्यास रचित पद्मावती स्तोत्र अथवा आदि शंकराचार्य विरचित कनकधारा स्तोत्र का शुद्ध उच्चारण के साथ पाठ करें।
  • प्रत्येक मंगलवार को अपने पुराने ऋण की कुछ राशि अवश्य चुकाएं क्योंकि शास्त्रों के अनुसार मंगलवार को कर्ज चुकाने से ऋण का भार शीघ्र समाप्त हो जाता है।
  • जातक को अपनी शारीरिक अवस्था और योग्य ज्योतिर्विद के परामर्श के अनुसार छह मुखी अथवा सात मुखी नेपाली रुद्राक्ष चांदी के तार में पिरोकर शुक्रवार के दिन धारण करना चाहिए जो शुक्र और लक्ष्मी कृपा का कारक बनता है।
  • प्रत्येक शुक्रवार को किसी निर्धन कन्या अथवा ब्राह्मण को हल्दी की पांच गांठें पीले वस्त्र मिश्री और चने की दाल का आदरपूर्वक दान करें तथा देशी गाय को गुड़ और पके हुए चावल खिलाएं।

पद्मावती साधना और दान के शास्त्रीय नियम

क्या अवश्य करें किन गलतियों से सर्वथा दूर रहें
प्रतिदिन प्रातः काल उठकर अपने घर के पूजा स्थल और मुख्य द्वार को स्वच्छ रखें सूर्यास्त के समय घर में झाड़ू लगाना अथवा किसी को उधार धन देने से बचें
माता पद्मावती को सदैव ताजे कमल पुष्प केसर की खीर और हल्दी अर्पित करें घर की स्त्रियों माता और कन्याओं का कभी भी अनादर अथवा अपमान न करें
शुक्रवार के दिन पूर्ण स्वच्छता ब्रह्मचर्य और सात्विक फलाहार का पालन करें तामसिक भोजन मदिरा जुआ और किसी भी प्रकार के अनैतिक आचरण से दूर रहें
अपनी आय का कुछ अंश सदैव धर्म गौ सेवा और निर्धनों की सहायता में लगाएं अपने धन संपत्ति पद अथवा आभूषणों का समाज में कभी भी झूठा अहंकार न करें
पूजा में शुद्ध गाय के घी का दीपक और कमलगट्टे की माला का ही प्रयोग करें बिना सोचे समझे किसी को कटु वचन बोलने अथवा धन का दुरुपयोग करने से बचें

दिव्य अनुग्रह और कलयुग में अक्षय संपदा

भगवती पद्मावती अलमेलु मंगा का पावन अवतार संपूर्ण मानव जाति को यह सनातन शिक्षा प्रदान करता है कि कलयुग के घोर अंधकार और अभाव में भी यदि मनुष्य ईश्वर पर अडिग विश्वास रखे तो उसका जीवन अभावमुक्त हो सकता है। भगवान श्रीनिवास द्वारा कुबेर से लिया गया ऋण यह सिद्ध करता है कि भगवान अपने भक्तों की रक्षा और धर्म की मर्यादा हेतु संसार के नियमों को भी शिरोधार्य करते हैं। तिरुचनूर के पावन पद्मा सरोवर का कमल यह स्मरण कराता है कि हमारा अंतःकरण भी संसार के कीचड़ में रहकर ज्ञान और प्रेम के कमल की भांति प्रफुल्लित होना चाहिए। जब मनुष्य अपने भीतर के लोभ को त्यागकर परमात्मा के चरणों में निष्काम दान करता है तब उसके जीवन से समस्त आर्थिक संकट स्वतः समाप्त हो जाते हैं। देवगुरु बृहस्पति का ज्ञान और शुक्र देव का ऐश्वर्य जब एक साथ जाग्रत होते हैं तब साधक को अक्षय संपदा की प्राप्ति होती है। माँ पद्मावती का नित्य स्मरण मनुष्य के जीवन से समस्त कर्जों दरिद्रता और ग्रह दोषों को समाप्त करके उसे अखंड सौभाग्य मानसिक शांति और अंततः मोक्ष की परम सिद्धि प्रदान कराता है।

FAQ

माता पद्मावती का प्राकट्य किस पावन सरोवर से हुआ था? माता पद्मावती का प्राकट्य तिरुपति के समीप तिरुचनूर में स्थित पावन पद्मा सरोवर के जल के मध्य एक सहस्र पंखुड़ियों वाले स्वर्ण कमल से हुआ था।

भगवान श्रीनिवास ने विवाह हेतु कुबेर से कितना ऋण लिया था? भगवान श्रीनिवास ने माता पद्मावती के साथ विवाह के आयोजन हेतु यक्षराज कुबेर से एक करोड़ स्वर्ण मुद्राएं कलयुग के अंत तक चुकाने की शर्त पर उधार ली थीं।

भक्त तिरुपति मंदिर की हुंडी में धन और स्वर्ण का दान क्यों करते हैं? भक्त भगवान श्रीनिवास द्वारा कुबेर से लिए गए ऋण का ब्याज चुकाने में सहायता करने हेतु हुंडी में दान करते हैं जिससे उनके अपने समस्त सांसारिक ऋण समाप्त हो जाते हैं।

ज्योतिष में माता पद्मावती का संबंध किन प्रमुख ग्रहों से माना जाता है? वैदिक ज्योतिष में माता पद्मावती का सीधा संबंध ज्ञान के कारक देवगुरु बृहस्पति और ऐश्वर्य व सौंदर्य के कारक शुक्र ग्रह के दुर्लभ संगम से माना जाता है।

कलयुग में घोर कर्ज और आर्थिक तंगी से मुक्ति पाने हेतु किस पाठ को सर्वश्रेष्ठ माना गया है? आर्थिक ऋणों से तत्काल मुक्ति पाने और स्थायी लक्ष्मी की प्राप्ति हेतु प्रतिदिन पद्मावती अष्टोत्तर शतनामावली और कनकधारा स्तोत्र का पाठ करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

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लेखक

पं. अभिषेक शर्मा

पं. अभिषेक शर्मा (63)


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