By अपर्णा पाटनी
वेन शरीर मंथन प्रथम चक्रवर्ती सम्राट और चतुर्थ भाव की अचल संपत्ति का संपूर्ण ज्योतिषीय रहस्य

सनातन वैदिक परंपरा में भगवान श्री हरि विष्णु के नौवें अंशावतार और भूमंडल के प्रथम चक्रवर्ती सम्राट के रूप में पूजित महाराज पृथु का प्राकट्य भूमि पोषण कृषि विस्तार और पृथ्वी तत्व के स्थायित्व का सर्वोच्च शिखर है। वैदिक ज्योतिष के अंतर्गत कुंडली के चतुर्थ भाव के भूमि भवन कृषि और अचल संपत्ति से जुड़े दोषों को शांत करने तथा पृथ्वी तत्व की तीन प्रमुख राशियों वृषभ कन्या और मकर के असंतुलन को दूर करने के लिए भगवान पृथु की आराधना को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जब जातक की जन्म कुंडली में भूमि कारक मंगल पीड़ित होकर अदालती विवाद भूमि हरण अथवा अचल संपत्ति में भारी अवरोध उत्पन्न करता है तब महाराज पृथु का ध्यान चेतना को अमोघ सुरक्षा और समृद्धि प्रदान करता है। इस पावन अनुष्ठान की तिथि समय और शास्त्रीय घटकों का संपूर्ण विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।
| शास्त्रीय आयाम | अनुष्ठान विवरण और ज्योतिषीय मान्यता |
|---|---|
| प्रमुख पावन तिथि | वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया अक्षय तृतीया अथवा मार्गशीर्ष पूर्णिमा |
| दैनिक पूजन समय | प्रातः कालीन सूर्योदय वेला अथवा अभिजित मुहूर्त |
| अधिष्ठाता स्वरूप | आजगव धनुष और बाण धारण किए हुए मुकुटधारी चक्रवर्ती सम्राट पृथु और महारानी अर्चि |
| ज्योतिषीय भाव व राशि संबंध | चतुर्थ भाव दशम भाव भूमि कारक मंगल और पृथ्वी तत्व राशियां वृषभ कन्या मकर |
| मुख्य पूजन सामग्री | शुद्ध गोमय गंगाजल हरी दूर्वा श्वेत पुष्प पंचामृत और सात प्रकार के धान्य |
| प्रधान वैदिक अनुष्ठान | श्रीमद्भागवत चतुर्थ स्कंध पृथु चरित्र पाठ और ॐ नमो भगवते पृथुमहाराजाय जप |
| अपेक्षित फल | भूमि विवादों का शमन अचल संपत्ति की प्राप्ति कृषि लाभ और पारिवारिक स्थिरता |
श्रीमद्भागवत महापुराण के चतुर्थ स्कंध में वर्णित इतिहास के अनुसार स्वायंभुव मनु के वंश में राजा अंग का विवाह मृत्यु की कन्या सुनीता से हुआ था। उनके घर वेन नामक एक अत्यंत क्रूर पापी और नास्तिक पुत्र का जन्म हुआ। जब वेन सिंहासन पर बैठा तो उसने संपूर्ण राज्य में वैदिक यज्ञों अग्निहोत्र वेद पाठ और दान धर्म पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया। उसने घोषणा कर दी कि इस संसार में राजा ही एकमात्र ईश्वर है अतः समस्त प्रजा केवल उसकी ही पूजा करे।
ऋषि मुनियों ने राजा वेन को समझाने का भरसक प्रयास किया किंतु अहंकारी वेन ने ऋषियों का घोर अपमान किया। तब महर्षि भृगु और अंगिरा आदि संतों ने धर्म की रक्षा हेतु अपनी हुंकार और कुशा के अभिमंत्रित जल से उस अत्याचारी राजा का वध कर दिया। राजा के मरते ही संपूर्ण राज्य में अराजकता फैल गई और लुटेरों डाकुओं का साम्राज्य स्थापित हो गया। संतों ने विचार किया कि बिना राजा के प्रजा नष्ट हो जाएगी। अतः संतों ने राजा वेन के शरीर का वैज्ञानिक और यौगिक मंथन आरंभ किया।
सर्वप्रथम जब वेन की जंघाओं का मंथन किया गया तो उससे कौवे जैसा काला लाल आंखों वाला अत्यंत बौना पुरुष प्रकट हुआ जिसका नाम निषाद रखा गया। उसने वेन के समस्त पापों और तामसिक विकारों को अपने भीतर समाहित कर लिया जिससे वेन का शरीर निष्पाप हो गया। इसके पश्चात जब ऋषियों ने वेन की दोनों भुजाओं का पुनः मंथन किया तो एक अत्यंत अलौकिक चमत्कार घटित हुआ। वेन की दाहिनी भुजा से साक्षात भगवान श्री हरि विष्णु के अंश से चक्रवर्ती राजा पृथु का प्राकट्य हुआ और बाईं भुजा से देवी महालक्ष्मी के अंश से उनकी धर्मपत्नी महारानी अर्चि प्रकट हुईं। उनके जन्म लेते ही संपूर्ण ब्रह्मांड में शांति छा गई आकाश से पुष्प वर्षा होने लगी और देवताओं ने उनका भव्य राज्याभिषेक संपन्न किया।
राजा पृथु के राज्याभिषेक के समय संपूर्ण पृथ्वी पर भीषण अकाल पड़ा हुआ था। वर्षा न होने से नदियां और सरोवर सूख चुके थे प्रजा भूख से तड़प रही थी और अन्न का एक दाना भी धरती पर उपलब्ध नहीं था। दुखी प्रजाजन अपने नए राजा के सम्मुख पहुंचे और रक्षा की गुहार लगाई। राजा पृथु ने अपने दिव्य ज्ञान से देखा कि वेन के अधर्म और अनाचार के कारण माता पृथ्वी ने समस्त बीजों वनस्पतियों और औषधियों को अपने उदर में छिपा लिया है।
प्रजा की भूख मिटाने के लिए परम प्रतापी राजा पृथु ने अपना दिव्य आजगव धनुष उठाया और उस पर संहारक बाण चढ़ाकर पृथ्वी पर क्रोध व्यक्त किया। भयभीत होकर माता पृथ्वी एक गाय का रूप धारण करके आकाश और पाताल में भागने लगीं। किंतु राजा पृथु ने अपने बाण के साथ उनका पीछा नहीं छोड़ा। अंततः असहाय होकर पृथ्वी ने राजा पृथु के चरणों में आत्मसमर्पण कर दिया और विनम्र स्वर में कहा कि हे राजन मुझे मारने से आपको कुछ प्राप्त नहीं होगा। संसार के दुष्ट और पापी लोग केवल उपभोग करते थे और यज्ञों में देवताओं को भाग नहीं देते थे इसलिए मैंने समस्त अन्नों को अपनी कोख में सुरक्षित कर लिया था।
पृथ्वी के दोहन के उपरांत राजा पृथु ने अपने धनुष की कोटि से बड़े बड़े पर्वतों को तोड़कर संपूर्ण भूमि को समतल बना दिया। उन्होंने सर्वप्रथम मानव इतिहास में व्यवस्थित गांवों नगरों दुर्गों और व्यापारिक मार्गों की नींव रखी। उन्होंने कृषि और पशुपालन का ऐसा वैज्ञानिक विस्तार किया कि संपूर्ण धरा धन धान्य से परिपूर्ण हो गई। राजा पृथु द्वारा अपनी पुत्री की भांति पालन और रक्षण किए जाने के कारण ही इस धरा का नाम पृथ्वी पड़ा।
वैदिक ज्योतिष में संपूर्ण भचक्र को 4 मूल तत्वों में विभाजित किया गया है जिसमें अग्नि पृथ्वी वायु और जल तत्व सम्मिलित हैं। पृथ्वी तत्व की तीन प्रमुख राशियां हैं जो भौतिक स्थायित्व का निर्माण करती हैं।
जन्म कुंडली का चतुर्थ भाव सुख भाव कहलाता है जो जातक की माता भूमि भवन अचल संपत्ति कृषि उपज और आंतरिक मानसिक शांति का साक्षात केंद्र है। कालपुरुष के चक्र में भूमि का नैसर्गिक कारक ग्रह मंगल देव को माना गया है जो भूमि के क्रय विक्रय और अधिकार का स्वामी है। दूसरी ओर शनि देव कृषि भूमि के वास्तविक दोहन कठोर श्रम और खदानों के स्वामी हैं। जब किसी जातक की कुंडली में चतुर्थ भाव पीड़ित होता है अथवा मंगल शनि और राहु के दुष्प्रभाव में आ जाता है तब व्यक्ति को पैतृक संपत्ति से वंचित होना पड़ता है भूमि के झूठे मुकदमों में धन नष्ट होता है और घर में निरंतर कलह बनी रहती है।
महाराज पृथु का चरित्र साक्षात पृथ्वी तत्व के शोधन और चतुर्थ भाव की परम शुद्धि का प्रतीक है। जिस प्रकार पृथु ने बंजर और असमतल भूमि को समतल बनाकर उसे उपजाऊ बनाया उसी प्रकार पृथु साधना जातक की जन्म कुंडली में भूमि दोषों और वास्तु दोषों को समाप्त करके स्थिर संपत्ति का मार्ग प्रशस्त करती है।
यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में मंगल नीच राशि कर्क में हो भूमि से जुड़े न्यायालय के मुकदमे चल रहे हों अथवा नया मकान या भूमि खरीदने में निरंतर बाधाएं आ रही हों तो शास्त्रों में महाराज पृथु के निमित्त अत्यंत प्रामाणिक वैदिक उपाय बताए गए हैं।
| क्या अवश्य करें | किन गलतियों से सर्वथा दूर रहें |
|---|---|
| प्रातः काल उठते ही सर्वप्रथम भूमि माता को पाद स्पर्श हेतु क्षमा मांगें | पृथ्वी पर कभी भी अकारण जल अथवा भोजन का अपव्यय न करें |
| अपने खेत अथवा भूमि की मिट्टी को सदैव उपजाऊ और स्वच्छ बनाए रखें | किसी निर्बल अथवा अनाथ की भूमि हड़पने का कुत्सित प्रयास न करें |
| नियमित रूप से वृक्षारोपण करें और हरियाली का संरक्षण करें | हरे भरे फलदार वृक्षों को काटने अथवा नष्ट करने से सर्वथा बचें |
| मंगलवार और शनिवार को सात्विक आहार ही ग्रहण करें | भूमि सौदों में किसी के साथ बेईमानी अथवा जालसाजी न करें |
| पूजा में शुद्ध गोमय गाय का दूध और गंगाजल का प्रयोग करें | घर के ईशान कोण में गंदगी कबाड़ अथवा भारी वस्तुएं न रखें |
भगवान पृथु का पावन जीवन यह सनातन सत्य उद्घाटित करता है कि प्रकृति और मनुष्य का संबंध शोषण का नहीं अपितु दोहन और पोषण का होना चाहिए। जब मनुष्य केवल अपने स्वार्थ के लिए पृथ्वी का अंधाधुंध दोहन करता है और उसे बदले में कुछ नहीं देता तब प्रकृति भी वेन काल की भांति अपने समस्त भंडारों को समेट लेती है और सूखा अकाल तथा महामारियां जन्म लेती हैं। सच्चा चक्रवर्ती राजा और सच्चा साधक वही है जो प्रकृति की रक्षा अपनी संतान की भांति करता है। जब मनुष्य पृथ्वी तत्व का सम्मान करते हुए निष्काम भाव से अपने कर्मों को समाज के कल्याण में लगाता है तब उसके जीवन के समस्त अभाव दूर हो जाते हैं। भगवान पृथु का नित्य स्मरण जातक के जीवन से भूमि विवादों को समाप्त करके उसे स्थिर संपत्ति प्रचुर समृद्धि और अचल पारिवारिक शांति प्रदान करता है।
भगवान पृथु किसके अंश से अवतरित हुए थे? भगवान पृथु भगवान श्री हरि विष्णु के साक्षात पालन शक्ति के अंश से और उनकी पत्नी महारानी अर्चि भगवती महालक्ष्मी के अंश से अवतरित हुई थीं।
राजा पृथु के माता पिता कौन थे? भगवान पृथु राजा वेन के शरीर के संतों द्वारा किए गए मंथन से प्रकट हुए थे और उनकी वंशावली राजा अंग और माता सुनीता से जुड़ी हुई थी।
धरा का नाम पृथ्वी क्यों पड़ा? महाराज पृथु ने गौ रूपी धरा को अपना बाण दिखाकर नियंत्रित किया उसका दोहन किया और अपनी पुत्री की भांति उसका पालन पोषण किया इसलिए इसका नाम पृथ्वी पड़ा।
ज्योतिष में भगवान पृथु का संबंध किन राशियों से माना जाता है? ज्योतिष में भगवान पृथु का सीधा संबंध पृथ्वी तत्व की तीनों राशियों वृषभ कन्या और मकर तथा चतुर्थ भाव से माना जाता है।
भूमि विवाद और मकान निर्माण की बाधाओं में किस पाठ से लाभ होता है? भूमि विवादों के निवारण हेतु श्रीमद्भागवत महापुराण के चतुर्थ स्कंध में वर्णित पृथु चरित्र का पाठ और ॐ नमो भगवते पृथुमहाराजाय नमः मंत्र का जाप सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
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