राधा रानी अवतार और प्रेम रहस्य क्या?

By अपर्णा पाटनी

बरसाना की रस स्वामिनी आह्लादिनी शक्ति चंद्रमा की 16 कलाएं और शुक्र चंद्र शांति का संपूर्ण रहस्य

देवी राधा रानी अवतार कथा और प्रेम रहस्य

राधाष्टमी पूजन मुहूर्त और शास्त्रीय विधान

सनातन वैदिक परंपरा पद्म पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण के पावन आगम दर्शन में साक्षात परात्पर परब्रह्म भगवान श्री कृष्ण की नित्य आह्लादिनी शक्ति के रूप में पूजित माता राधा रानी का प्राकट्य ब्रह्मांडीय प्रेम रस की पूर्णता और चेतना के परम आनंद का सर्वोच्च शिखर है। वैदिक ज्योतिष तथा तत्व विज्ञान के अंतर्गत भचक्र के सर्वाधिक संवेदनशील और सौम्य ग्रहों मन के अधिपति चंद्र देव तथा प्रेम सौंदर्य व दांपत्य के कारक शुक्र देव के समस्त दोषों को शांत करने के लिए देवी राधा की उपासना को सर्वोत्तम माना गया है। जब जातक की जन्म कुंडली में चंद्रमा और शुक्र किसी पाप ग्रह से पीड़ित होकर मानसिक अशांति चारित्रिक लांछन वैवाहिक विखंडन अथवा अत्यधिक भावुकता के कारण जीवन में अवसाद उत्पन्न कर रहे हों तब बरसाना की रस स्वामिनी माँ राधा रानी की शरण में जाने से अंतःकरण की शुद्धि और अमोघ शांति प्राप्त होती है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि राधाष्टमी पर्व और इस पावन साधना की तिथि समय तथा शास्त्रीय घटकों का संपूर्ण विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।

शास्त्रीय आयाम अनुष्ठान विवरण और ज्योतिषीय मान्यता
प्रमुख पावन तिथि भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी राधाष्टमी अथवा प्रत्येक मास की शुक्ल अष्टमी
दैनिक पूजन समय मध्याह्न काल दोपहर 12 बजे अथवा प्रातः कालीन ब्रह्म मुहूर्त
अधिष्ठाता स्वरूप तप्त स्वर्ण कांति वाली भगवान श्री कृष्ण के वामांग में विराजमान आह्लादिनी शक्ति
ज्योतिषीय ग्रह व चक्र संबंध मन कारक चंद्र देव प्रेम कारक शुक्र देव चंद्रमा की 16 कलाएं और अनाहत चक्र
मुख्य पूजन सामग्री शुद्ध पंचामृत श्वेत व गुलाबी पुष्प इत्र केसर युक्त चंदन माखन मिश्री और नीली चुनरी
प्रधान वैदिक अनुष्ठान राधा कृपा कटाक्ष स्तोत्र पाठ राधा सहस्रनाम और ॐ ह्रीं राधिकायै नमः जप
अपेक्षित फल चंद्र शुक्र दोष शांति दांपत्य प्रेम की प्रगाढ़ता मानसिक शांति और भक्ति योग

वृषभानु यज्ञ भूमि और स्वर्ण कमल पर प्राकट्य

पद्म पुराण के अत्यंत पावन पाताल खंड और ब्रह्मवैवर्त पुराण के प्रकृति खंड में वर्णित इतिहास के अनुसार द्वापर युग में ब्रजमंडल के अंतर्गत रावल ग्राम में परम धर्मात्मा और गोपराज वृषभानु निवास करते थे। वृषभानु जी महाराज अत्यंत निष्ठावान दानी और भगवान नारायण के अनन्य भक्त थे। एक बार उन्होंने संतान प्राप्ति और जगत के कल्याण हेतु यमुना तट के समीप एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया।

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पावन अष्टमी तिथि को अनुराधा नक्षत्र के शुभ संयोग में जब मध्याह्न काल में सूर्य अपने पूर्ण तेज पर था तब राजा वृषभानु यज्ञ भूमि की शुद्धि हेतु समीप स्थित एक पावन सरोवर के तट पर पहुंचे जिसे आज मानसरोवर अथवा वृषभानु कुंड कहा जाता है। वहां अचानक एक अत्यंत अलौकिक और दिव्य घटना घटित हुई।

सरोवर के नीले जल के मध्य एक सहस्र पंखुड़ियों वाला अत्यंत विशाल और तेजोमय स्वर्ण कमल खिला हुआ था। उस कमल पुष्प के भीतर से करोड़ों मध्याह्न के सूर्यों को लज्जित करने वाला एक दिव्य प्रकाश पुंज प्रस्फुटित हो रहा था। राजा वृषभानु जब विस्मयचकित होकर उस कमल के समीप पहुंचे तो उन्होंने देखा कि उस पावन पुष्प की कर्णिका पर एक अत्यंत रूपवती और परम सुंदरी नवजात कन्या अंगूठा चूसते हुए मंद मुस्कान बिखेर रही थी।

राजा वृषभानु के कोई संतान नहीं थी अतः उन्होंने उस दिव्य कन्या को भगवान का परम अनुग्रह मानकर अपनी दोनों भुजाओं में उठा लिया। जैसे ही उन्होंने उस बालिका को अपने वक्ष से लगाया उनके हृदय में अगाध वात्सल्य का सागर उमड़ पड़ा। वे उस कन्या को लेकर अपने राजमहल पहुंचे जहां उनकी धर्मपत्नी माता कीर्तिदा उस अलौकिक बालिका को देखकर परमानंद में मग्न हो गईं।

किंतु जन्म के पश्चात उस नन्हीं बालिका ने अपने दोनों नेत्र बंद कर रखे थे। राजा वृषभानु और माता कीर्तिदा अत्यंत चिंतित हो उठे कि उनकी राजकन्या जन्मांध है। कुछ समय पश्चात जब गोकुल से नन्द बाबा और यशोदा मैया अपने नन्हे बालक श्री कृष्ण को लेकर वृषभानु जी के महल में बधाई देने पहुंचे तब एक परम चमत्कार घटित हुआ।

  • बाल कृष्ण घुटनों के बल चलते हुए उस पालने के समीप पहुंचे जहां वह नन्हीं बालिका लेटी हुई थी।
  • जैसे ही बाल कृष्ण ने पालने को स्पर्श किया वैसे ही उस नन्हीं बालिका ने पहली बार अपने दोनों कमल नयन खोले।
  • बालिका के नेत्रों ने संपूर्ण ब्रह्मांड में सबसे पहले केवल और केवल अपने प्राणनाथ भगवान श्री कृष्ण के दर्शन किए।
  • यह इस बात का सनातन प्रमाण था कि राधा रानी संसार के किसी भी नश्वर पदार्थ को देखने के लिए नहीं अपितु केवल कृष्ण दर्शन हेतु अवतरित हुई थीं।
  • वृषभानु की यज्ञ भूमि और सरोवर से प्रकट होने के कारण वे वृषभानु दुलारी और रावल की किशोरी जी कहलाईं।

क्या राधा केवल प्रेमिका हैं अथवा आह्लादिनी शक्ति?

साधारण सांसारिक बुद्धि के लोग जो अध्यात्म के गूढ़ रहस्यों से अनभिज्ञ हैं वे राधा और कृष्ण के संबंध को लौकिक धरातल पर तौलने की भूल कर बैठते हैं। सनातन वैदिक दर्शन और गौड़ीय वैष्णव आगम में स्पष्ट रूप से स्थापित किया गया है कि देवी राधा केवल कोई साधारण मानवी अथवा सामान्य प्रेमिका नहीं हैं अपितु वे स्वयं परब्रह्म भगवान श्री कृष्ण की शाश्वत आह्लादिनी शक्ति हैं।

वेदांत दर्शन के अनुसार ब्रह्म के भीतर तीन प्रमुख शक्तियां नित्य विद्यमान रहती हैं जिन्हें सत चित और आनंद कहा जाता है। आनंद शक्ति का जो सबसे संकीर्ण और सर्वोच्च सार तत्व होता है उसे शास्त्रों में ह्लादिनी शक्ति कहा गया है। भगवान श्री कृष्ण स्वयं सच्चिदानंद घन हैं किंतु वे अपने ही स्वरूप के जिस अव्यक्त आनंद का आस्वादन करना चाहते हैं वह आनंद रूपी शक्ति ही साक्षात भगवती राधा हैं।

  • राधा पूर्ण शक्ति हैं और भगवान श्री कृष्ण शक्तिमान हैं।
  • जिस प्रकार सूर्य और उसकी धूप अग्नि और उसकी दाहक शक्ति तथा कस्तूरी और उसकी सुगंध को एक दूसरे से कभी अलग नहीं किया जा सकता उसी प्रकार राधा और कृष्ण तात्विक रूप से एक ही सत्ता के दो रूप हैं।
  • एक ही परब्रह्म लीला रस का आस्वादन करने हेतु प्रेम के वशीभूत होकर दो रूपों में प्रकट हुआ है जिसमें कृष्ण रस हैं और राधा रस की स्वामिनी हैं।
  • कृष्ण के बिना राधा का कोई अस्तित्व नहीं है और राधा के बिना कृष्ण सर्वथा अपूर्ण और मूक हैं।
  • जब भगवान श्री कृष्ण अपनी वंशी बजाते हैं तो उस वंशी से निकलने वाला प्रत्येक नाद केवल और केवल रा शब्द का ही उच्चारण करता है।

बरसाना की रस स्वामिनी और प्रेम योग की पराकाष्ठा

रावल ग्राम से कुछ दूरी पर स्थित पावन नगरी बरसाना माता राधा रानी का नित्य लीला धाम है। बरसाना के चार पर्वतों को साक्षात चार मुख वाले ब्रह्मा जी का स्वरूप माना जाता है जो भगवती राधा के पावन चरण कमलों की रज को अपने मस्तक पर धारण करने हेतु पर्वत रूप में स्थित हुए।

बरसाना की यह पावन भूमि निष्काम प्रेम योग की सर्वोच्च पाठशाला है। संसार में जिसे प्रेम कहा जाता है वह वास्तव में काम वासना का ही एक परिष्कृत रूप होता है जहां व्यक्ति अपनी इंद्रियों के सुख की कामना करता है। किंतु राधा रानी का प्रेम महाभाव की वह पराकाष्ठा है जहां साधक अपने समस्त सुखों अपने मान सम्मान और अपने अस्तित्व को प्रियतम के चरणों में पूर्णतः विसर्जित कर देता है।

महारास की पावन रात्रि में जब शरद पूर्णिमा का चंद्रमा अपनी समस्त 16 कलाओं से आकाश में अमृत वर्षा कर रहा था तब भगवान श्री कृष्ण ने प्रत्येक गोपी के साथ अलग रूप धारण कर रास रचाया। किंतु उस दिव्य रासमंडल के केंद्र में साक्षात राधा रानी ही विराजमान थीं। जब तक साधक के भीतर का अहंकार जीवित रहता है तब तक वह रास के रस का अधिकारी नहीं बन सकता। राधा रानी यह सिखाती हैं कि प्रेम का वास्तविक अर्थ मांगना नहीं अपितु स्वयं को न्योछावर कर देना है।

चंद्रमा की सोलह कलाएं और अनाहत चक्र का ज्योतिषीय मर्म

वैदिक ज्योतिष के महान आधार ग्रंथ बृहत् पराशर होरा शास्त्र में मन और आत्मा के सूक्ष्म संबंधों का विस्तृत विवेचन मिलता है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से देवी राधा रानी का पावन स्वरूप सीधे तौर पर चंद्रमा की 16 कलाओं और मानव शरीर में स्थित अनाहत चक्र का सर्वोच्च प्रतिनिधित्व करता है।

चंद्रमा को वैदिक ज्योतिष में मन का स्वामी जल तत्व औषधियों के पोषण और भावनाओं का अधिपति माना गया है। भचक्र में चंद्रमा जब अपनी समस्त 16 कलाओं से युक्त होता है तो वह जीव को परम शांति और आनंद प्रदान करता है। देवी राधा रानी को चंद्रमा की सोलहवीं कला अर्थात अमृत कला कहा गया है जो कभी क्षीण नहीं होती।

मानव शरीर के मेरुदंड में हृदय स्थल पर स्थित अनाहत चक्र 12 पंखुड़ियों वाला कमल है जो विशुद्ध प्रेम और करुणा का केंद्र है।

  • जब किसी मनुष्य का अनाहत चक्र सुप्त अथवा दूषित होता है तो उसके भीतर स्वार्थ ईर्ष्या और वासना का वास होता है।
  • राधा रानी की उपासना अनाहत चक्र की ग्रंथियों का भेदन करके उसे भगवद् प्रेम के अमृत से भर देती है।
  • अनाहत चक्र के जाग्रत होते ही व्यक्ति के मन से सांसारिक काम वासना समाप्त हो जाती है और निष्काम प्रेम का उदय होता है।
  • कुंडली का चतुर्थ भाव जो हृदय और मन की शांति का केंद्र है वह राधा कृपा से पूर्णतः जाग्रत होकर जातक को असीम मानसिक संतुलन प्रदान करता है।

क्या शुक्र और चंद्र के दोष राधा नाम से धुलते हैं?

वैदिक ज्योतिष में शुक्र और चंद्रमा का संबंध मनुष्य के भावनात्मक और वैवाहिक जीवन की दिशा तय करता है। चंद्रमा मन है और शुक्र प्रेम व आकर्षण है। जब कुंडली में चंद्रमा पर राहु अथवा केतु का ग्रहण लगता है तो व्यक्ति गंभीर मानसिक अवसाद अज्ञात भय और चारित्रिक लांछन का शिकार होता है।

इसी प्रकार जब शुक्र ग्रह नीच राशि में होता है अथवा शनि मंगल से पीड़ित होता है तो व्यक्ति वासना के दलदल में फंसकर अपने संबंधों को नष्ट कर बैठता है। समाज में उसे अपयश मिलता है और उसका दांपत्य जीवन नरक बन जाता है।

शास्त्रों में यह अकाट्य सत्य वर्णित है कि राधा नाम केवल दो अक्षरों का शब्द नहीं है अपितु वह समस्त पापों को भस्म करने वाली महा औषधि है। रा शब्द का उच्चारण करते ही जातक के जन्म जन्मांतर के पाप और शुक्र जनित अशुद्धियां बाहर निकल जाती हैं और धा शब्द का उच्चारण करते ही भगवान श्री कृष्ण उसके हृदय में आकर विराजमान हो जाते हैं। जो साधक नित्य राधा नाम का संकीर्तन करता है उसके चंद्रमा का समस्त ग्रहण दोष और शुक्र का कलंक स्वतः धुल जाता है।

चंद्र शुक्र दोष शांति और प्रेम योग के अचूक उपाय

यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में चंद्रमा और शुक्र पीड़ित हों प्रेम संबंधों में निरंतर धोखा मिलता हो दांपत्य जीवन में कटुता हो अथवा मन में अत्यधिक अशांति रहती हो तो शास्त्रों में राधा रानी की प्रसन्नता हेतु अत्यंत प्रामाणिक वैदिक उपाय बताए गए हैं।

  • प्रत्येक शुक्रवार अथवा शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को प्रातः काल स्नान के उपरांत पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें और राधा कृष्ण के युगल स्वरूप के सम्मुख गाय के शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  • देवी राधा को नीली अथवा गुलाबी रेशमी चुनरी सुगंधित अष्टगंध इत्र और ताजे कमल अथवा गुलाब के पुष्प अर्पित करें तथा पावन बीज मंत्र ॐ ह्रीं राधिकायै नमः अथवा ॐ श्रीं राधाकृष्णाय नमः का कम से कम 108 बार शांत मन से जाप करें।
  • प्रतिदिन प्रातः काल अथवा सायंकाल के समय नीम करौली महाराज और संतों द्वारा पूजित पावन राधा कृपा कटाक्ष स्तोत्र का सस्वर पाठ करें जो जीवन के समस्त संतापों को मिटाकर परम आनंद प्रदान करता है।
  • दांपत्य जीवन में मधुरता और प्रेम की प्रगाढ़ता हेतु प्रत्येक शुक्रवार को भगवान श्री कृष्ण और राधा रानी को ताजे माखन और मिश्री का भोग लगाएं और उस भोग को पति पत्नी मिलकर ग्रहण करें।
  • जातक को अपनी शारीरिक अवस्था और योग्य ज्योतिर्विद के परामर्श के अनुसार दो मुखी अथवा छह मुखी नेपाली रुद्राक्ष चांदी के तार में पिरोकर सोमवार अथवा शुक्रवार को धारण करना चाहिए।
  • प्रत्येक पूर्णिमा अथवा शुक्रवार को किसी निर्धन कन्या अथवा साधु संतों को मिश्री सफेद वस्त्र चावल और इत्र का आदरपूर्वक दान करें तथा गाय को ताजी रोटी पर मक्खन रखकर खिलाएं।

राधा आराधना और प्रेम योग के आवश्यक शास्त्रीय नियम

क्या अवश्य करें किन गलतियों से सर्वथा दूर रहें
प्रतिदिन प्रातः काल उठकर राधा कृष्ण के युगल स्वरूप का ध्यान करें प्रेम के नाम पर कामुकता अथवा वासना जनित विचारों को मन में न आने दें
माता राधा रानी को सदैव सुगंधित इत्र श्वेत चंदन और ताजे पुष्प अर्पित करें किसी भी स्त्री कन्या अथवा माता का कभी भी अनादर अथवा उपहास न करें
अष्टमी और एकादशी के दिन पूर्ण स्वच्छता ब्रह्मचर्य और सात्विक आहार लें तामसिक भोजन मदिरा और किसी भी प्रकार के अनैतिक आचरण से दूर रहें
अपने हृदय में समस्त जीवों के प्रति अगाध करुणा और दया का भाव रखें अपने रूप सौंदर्य पद अथवा भक्ति का समाज में कभी भी अहंकार न करें
पूजा में शुद्ध गाय के घी का दीपक और तुलसी पत्र भगवान को अवश्य चढ़ाएं बिना स्नान किए अथवा अशुद्ध मन से राधा नाम का उपहास करने से बचें

रस की पूर्णता और परम भक्ति का शाश्वत संदेश

भगवती राधा रानी का पावन अवतार संपूर्ण मानव जाति को यह सनातन शिक्षा प्रदान करता है कि ईश्वर को ज्ञान योग अथवा कठोर तपस्या की तुलना में विशुद्ध प्रेम और समर्पण से अत्यंत सरलता से प्राप्त किया जा सकता है। राधा रानी ने न तो कोई ग्रंथ लिखा और न ही कोई शास्त्रार्थ किया उन्होंने केवल अपने संपूर्ण अस्तित्व को कृष्ण प्रेम में विसर्जित कर दिया। उनका यह समर्पण ही उन्हें शक्तिमान कृष्ण से भी बड़ा बना देता है क्योंकि स्वयं भगवान श्री कृष्ण भी राधा नाम सुनकर आनंद से नृत्य करने लगते हैं। जब मनुष्य अपने भीतर के सूक्ष्म स्वार्थ और अहंकार को त्यागकर राधा भाव को अपनाता है तब उसका अंतःकरण साक्षात वृंदावन बन जाता है। चंद्रमा की शीतलता और शुक्र का सात्विक माधुर्य जब आत्मा में उतरता है तब जीवन से समस्त संताप सदा के लिए समाप्त हो जाते हैं। माता राधा रानी का नित्य स्मरण मनुष्य के जीवन से समस्त कलंक मानसिक अशांति और ग्रह दोषों को समाप्त करके उसे अखंड प्रेम परम शांति और अंततः गोलोक धाम की प्राप्ति कराता है।

FAQ

माता राधा रानी का प्राकट्य किस पावन तिथि और स्थान पर हुआ था? माता राधा रानी का प्राकट्य भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को अनुराधा नक्षत्र में ब्रजमंडल के पावन रावल ग्राम में एक स्वर्ण कमल पर हुआ था।

आह्लादिनी शक्ति का तात्विक और दार्शनिक अर्थ क्या है? परब्रह्म भगवान श्री कृष्ण की तीन प्रमुख शक्तियों सत चित और आनंद में से आनंद का सर्वोच्च सार तत्व ही आह्लादिनी शक्ति है जो साक्षात राधा रानी हैं।

माता राधा रानी ने जन्म लेते ही अपने नेत्र क्यों नहीं खोले थे? माता राधा रानी ने यह संकल्प लिया था कि वे संसार में सबसे पहले केवल अपने आराध्य भगवान श्री कृष्ण के दर्शन करेंगी अतः कृष्ण स्पर्श के पश्चात ही उन्होंने नेत्र खोले।

ज्योतिष में राधा रानी का संबंध किन प्रमुख ग्रहों और चक्र से माना जाता है? वैदिक ज्योतिष में राधा रानी का सीधा संबंध मन के कारक चंद्र देव प्रेम के कारक शुक्र देव चंद्रमा की 16 कलाओं और अनाहत हृदय चक्र के सर्वोच्च प्रेम से है।

मानसिक शांति और चंद्र शुक्र दोष शांति हेतु किस स्तोत्र का पाठ सर्वोत्तम है? मानसिक शांति पाने और चंद्र शुक्र के दोषों को समाप्त करने हेतु प्रतिदिन प्रातः काल पावन राधा कृपा कटाक्ष स्तोत्र का सस्वर पाठ करना सर्वोत्तम माना गया है।

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लेखक

अपर्णा पाटनी

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