ऋषभदेव अवतार और लग्न शुद्धि रहस्य क्या?

By पं. सुव्रत शर्मा

राजा नाभि के गृह प्राकट्य भरत को साम्राज्य समर्पण और लग्न भाव की शुद्धि का संपूर्ण ज्योतिषीय रहस्य

ऋषभदेव अवतार कथा और लग्न शुद्धि का रहस्य

ऋषभदेव पूजन विधान और ज्योतिषीय नियम

सनातन वैदिक परंपरा में भगवान श्री हरि विष्णु के आठवें लीला अवतार और परम अवधूत दिगंबर स्वरूप के रूप में पूजित भगवान ऋषभदेव का प्राकट्य आत्म संयम निष्काम कर्म और परम परमहंस अवस्था का सर्वोच्च शिखर है। वैदिक ज्योतिष के अंतर्गत कुंडली के प्रथम भाव अर्थात लग्न भाव की शुद्धि देहाभिमान की समाप्ति तथा कर्मफलदाता शनि देव और मोक्ष कारक छाया ग्रह केतु के परम वैराग्य को संतुलित करने के लिए भगवान ऋषभदेव की आराधना को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जब जातक की जन्म कुंडली में लग्न भाव पाप ग्रहों से पीड़ित होकर शारीरिक व्याधियां अहंकार मानसिक अस्थिरता अथवा विपरीत परिस्थितियों में अत्यधिक विचलित होने का स्वभाव उत्पन्न करता है तब ऋषभदेव का ध्यान चेतना को अमोघ शांति और समभाव प्रदान करता है। इस पावन अनुष्ठान की तिथि समय और शास्त्रीय घटकों का संपूर्ण विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।

शास्त्रीय आयामअनुष्ठान विवरण और ज्योतिषीय मान्यता
प्रमुख पावन तिथिचैत्र मास के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि अथवा माघ मास की पूर्णिमा
दैनिक पूजन समयप्रातः कालीन ब्रह्म मुहूर्त अथवा सूर्योदय वेला
अधिष्ठाता स्वरूपदिगंबर पद्मासन ध्यानस्थ परमहंस रूप धारी भगवान ऋषभदेव
ज्योतिषीय भाव व ग्रह संबंधप्रथम भाव लग्न भाव तप कारक शनि देव और मोक्ष कारक केतु
मुख्य पूजन सामग्रीश्वेत पुष्प शुद्ध गंगाजल श्वेत चंदन तुलसी दल और धूप दीप
प्रधान वैदिक अनुष्ठानऋषभदेव स्तुति ध्यान योग मौन साधना और ॐ नमो भगवते ऋषभदेवाय जप
अपेक्षित फलदेहाभिमान से मुक्ति लग्न दोष शांति मानसिक समभाव और आत्म साक्षात्कार

राजा नाभि का तप और मेरुदेवी के गृह प्राकट्य

श्रीमद्भागवत महापुराण के पांचवें स्कंध और विष्णु पुराण के पावन आख्यानों के अनुसार स्वायंभुव मनु के वंश में परम प्रतापी धर्मात्मा राजा नाभि शासन करते थे। राजा नाभि की धर्मपत्नी परम सुंदरी और सती साध्वी रानी मेरुदेवी थीं। राजा नाभि संपूर्ण पृथ्वी के निष्कंटक सम्राट थे किंतु उनके कोई संतान नहीं थी। संतान की प्राप्ति और अपने कुल के उद्धार हेतु राजा नाभि ने अपनी पत्नी के साथ मिलकर अत्यंत श्रद्धापूर्वक भगवान श्री हरि विष्णु के निमित्त एक भव्य यज्ञ का आयोजन किया जिसे बर्हिष्मती यज्ञ कहा जाता है।

राजा नाभि की अनन्य भक्ति और निष्कपट भाव से संतुष्ट होकर यज्ञ कुंड से साक्षात भगवान नारायण अपने चतुर्भुज रूप में शंख चक्र गदा पद्म धारण किए हुए प्रकट हुए। भगवान के दर्शन पाकर राजा नाभि और ऋषियों ने हाथ जोड़कर स्तुति की और राजा ने विनयपूर्वक प्रार्थना की कि हे प्रभु मुझे आपके समान ही एक तेजस्वी और धर्मात्मा पुत्र प्राप्त हो। ऋषियों ने राजा को समझाया कि भगवान के समान इस संपूर्ण सृष्टि में कोई दूसरा तत्व नहीं है। तब कृपालु भगवान विष्णु ने मंद मुस्कान के साथ कहा कि मेरे समान कोई अन्य नहीं हो सकता इसलिए मैं स्वयं तुम्हारे घर में पुत्र रूप में अवतार लूंगा ताकि संसार को धर्म त्याग और योग का परम मार्ग दिखा सकूं।

कुछ समय पश्चात माता मेरुदेवी के गर्भ से भगवान विष्णु ने अपने आठवें अवतार के रूप में जन्म लिया। उनके जन्म लेते ही संपूर्ण राज्य में दिव्य सुगंध फैल गई और प्रजाजन असीम आनंद में डूब गए। बालक के शरीर पर वज्र अंकुश और कमल जैसे 100 पावन लक्षण विद्यमान थे। उनका रूप इतना मनोहारी और तेजस्वी था कि राजा नाभि ने उनका नाम ऋषभ रखा जिसका अर्थ होता है श्रेष्ठतम और सभी गुणों में सर्वोच्च।

आदर्श राजधर्म और पुत्र भरत को साम्राज्य समर्पण

भगवान ऋषभदेव का बाल्यकाल से ही समस्त विद्याओं और वेदों में अद्वितीय अधिकार था। युवावस्था में प्रवेश करने पर राजा नाभि ने उन्हें संपूर्ण पृथ्वी का सम्राट बनाकर राज्याभिषेक कर दिया और स्वयं रानी मेरुदेवी के साथ बदरिकाश्रम जाकर वानप्रस्थ धर्म का पालन करते हुए मोक्ष को प्राप्त हुए। भगवान ऋषभदेव ने लोक मर्यादा की रक्षा हेतु देवराज इंद्र द्वारा समर्पित कन्या जयंती से विवाह किया।

भगवान ऋषभदेव और महारानी जयंती से 100 अत्यंत पराक्रमी और ज्ञानी पुत्रों का जन्म हुआ। इन 100 पुत्रों में सबसे ज्येष्ठ पुत्र परम प्रतापी भरत थे। भगवान ऋषभदेव ने अपने शासनकाल में प्रजा को कृषि व्यापार शिल्प नीति और सदाचार की ऐसी अद्भुत शिक्षा दी जिससे संपूर्ण राज्य में कहीं भी दरिद्रता अपराध अथवा रोग नहीं रहा। उन्होंने अपने सभी पुत्रों को बुलाकर राजधर्म और आत्म विद्या का गूढ़ उपदेश दिया। उनके 100 पुत्रों में से 9 पुत्र अत्यंत उच्च कोटि के सिद्ध योगी बने जिन्हें भागवत में नव योगेंद्र कहा गया है जिनके नाम कवि हरि अंतरिक्ष प्रबुद्ध पिप्पलायन आविर्होत्र द्रुमिल चमस और करभाजन थे। 81 पुत्रों ने कर्मकांड और वैदिक ब्राह्मण धर्म को स्वीकार किया।

जब भगवान ऋषभदेव ने देखा कि प्रजा पूर्णतः संस्कारित हो चुकी है और ज्येष्ठ पुत्र भरत शासन संभालने में पूरी तरह समर्थ हैं तब उन्होंने एक ऐतिहासिक निर्णय लिया। उन्होंने राजसी वस्त्र आभूषण और संपूर्ण पृथ्वी का साम्राज्य अपने पुत्र भरत को सौंप दिया। उन्हीं चक्रवर्ती राजा भरत के नाम पर इस पावन भूमि का नाम अजनाभ खंड से बदलकर भारतवर्ष पड़ा। भगवान ऋषभदेव ने यह सिद्ध कर दिया कि सत्ता और संपत्ति का उपभोग केवल कर्तव्य के रूप में किया जाना चाहिए न कि व्यक्तिगत वासना के लिए।

अवधूत अवस्था और दिगंबर योग साधना

राजपाट का परित्याग करने के पश्चात भगवान ऋषभदेव ने संपूर्ण परिग्रह का त्याग कर दिया। उन्होंने अपने शरीर के समस्त वस्त्र उतार दिए और वे पूर्णतः दिगंबर नग्न होकर एक अवधूत और परमहंस की भांति विचरण करने लगे। वे बाल बिखेरे हुए मौन रहकर केवल अपनी आत्मा में रमण करते थे। साधारण संसारी लोग जो केवल बाह्य वेशभूषा को ही मनुष्यता का प्रमाण मानते हैं वे उन्हें पागल अथवा पिशाच समझकर उनका उपहास उड़ाते थे।

  • दुष्ट लोग उन पर धूल मिट्टी फेंकते थे कंकड़ मारते थे और अपशब्द कहते थे किंतु भगवान ऋषभदेव का चित्त कभी विचलित नहीं हुआ।
  • उन्होंने अजगर वृत्ति अपना ली थी जिसका अर्थ है कि जहां गिर गए वहीं पड़े रहना और जो प्रारब्ध से बिना मांगे मिल जाए उसी में संतुष्ट रहना।
  • वे गाय बैल और हिरण की भांति धरती पर चलते हुए भोजन करते थे जिसे शास्त्रों में गो चरी कहा गया है।
  • उनके शरीर से मलमूत्र त्यागने पर भी दिव्य सुगंध निकलती थी जो 10 योजन तक फैल जाती थी जिससे सिद्ध होता था कि उनका शरीर पूर्णतः दिव्य हो चुका था।
  • अंत में कर्नाटक के कुटकाचल पर्वत के घने वनों में विचरण करते समय जब दावानल प्रज्वलित हुआ तब उन्होंने उसी वन अग्नि में अपने भौतिक शरीर को शांत भाव से विसर्जित कर दिया।

भगवान ऋषभदेव की यह साधना यह अमर संदेश देती है कि जब तक मनुष्य अपने शरीर को ही अपना अस्तित्व मानता रहता है तब तक वह वासनाओं और दुखों से मुक्त नहीं हो सकता। देह केवल आत्मा का वस्त्र है और इस वस्त्र के प्रति आसक्ति का अंत ही सच्चा संन्यास है।

महर्षि पराशर अनुसार लग्न शुद्धि और शनि केतु योग

वैदिक ज्योतिष के महानतम ग्रंथ बृहत् पराशर होरा शास्त्र में महर्षि पराशर ने स्पष्ट किया है कि मनुष्य का भौतिक शरीर उसकी आत्मा और पूर्व जन्म के कर्मों का साक्षात दर्पण होता है। ज्योतिष में जन्म कुंडली का प्रथम भाव जिसे लग्न भाव कहा जाता है संपूर्ण व्यक्तित्व शरीर का गठन जीवन शक्ति मान सम्मान और आत्म चेतना का आधार है। जब लग्न भाव पर शुभ ग्रहों का प्रभाव होता है तो जातक में सात्विक गुण होते हैं किंतु जब लग्न भाव पर राहु या मंगल का क्रूर प्रभाव पड़ता है तो व्यक्ति के भीतर अत्यधिक शारीरिक अहंकार कामुकता और अशांति उत्पन्न हो जाती है।

ज्योतिषीय दृष्टिकोण से भगवान ऋषभदेव का स्वरूप तपस्या के कारक शनि देव और मोक्ष के कारक केतु के परम सात्विक समन्वय का प्रतिनिधित्व करता है। शनि ग्रह व्यक्ति को कठोर परिस्थितियों को सहन करने की क्षमता धैर्य और इंद्रिय निग्रह प्रदान करता है। केतु ग्रह व्यक्ति को समस्त भौतिक बंधनों उपाधियों और वस्त्रों तक के मोह से मुक्त कराकर परम मोक्ष की ओर अग्रसर करता है। जब किसी जातक की कुंडली में लग्न भाव में शनि और केतु का शुभ प्रभाव स्थापित होता है अथवा ऋषभदेव की उपासना की जाती है तब जातक का लग्न भाव पूर्णतः शुद्ध हो जाता है। ऐसा व्यक्ति अपने शरीर के रूप रंग और बाह्य दिखावे से ऊपर उठकर अपनी शाश्वत आत्मा में स्थित हो जाता है।

क्या विपरीत परिस्थितियों में समभाव संभव है?

आधुनिक युग में मनुष्य की सबसे बड़ी दुर्बलता यह है कि वह छोटी सी असफलता अपमान अथवा विपरीत परिस्थिति आते ही मानसिक रूप से टूट जाता है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण जिस स्थितप्रज्ञ पुरुष का वर्णन करते हैं जो सुख और दुख में मान और अपमान में शीत और उष्ण में सदा एक समान रहता है भगवान ऋषभदेव उस स्थितप्रज्ञता के जीवंत आदर्श थे।

जब समाज ने उन पर पत्थर बरसाए तब भी उनके मुख पर दया की वही शांत मुस्कान थी जो महलों में राज सिंहासन पर बैठते समय थी। यह समभाव तभी संभव है जब मनुष्य अपने मन की बागडोर बुद्धि को और बुद्धि की बागडोर आत्मा को सौंप देता है। जब कुंडली का लग्न भाव बली और शुद्ध होता है तो व्यक्ति के भीतर एक ऐसा आध्यात्मिक सुरक्षा कवच निर्मित हो जाता है जिसे संसार का कोई भी आघात भेद नहीं सकता। ऋषभदेव की कथा हमें यह सिखाती है कि बाहर की परिस्थितियों को बदलना सदैव हमारे वश में नहीं होता किंतु उन परिस्थितियों के प्रति अपने आंतरिक दृष्टिकोण को शांत रखना पूर्णतः हमारे अधिकार में है।

लग्न शुद्धि और वैराग्य संवर्धन के अचूक वैदिक उपाय

यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में लग्न भाव निर्बल हो लग्न पर पापी ग्रहों की दृष्टि हो अथवा व्यक्ति अत्यधिक शारीरिक मोह मानसिक चंचलता और क्रोध से ग्रस्त रहता हो तो शास्त्रों में इसके निवारण के लिए अत्यंत प्रभावी उपाय बताए गए हैं।

  • प्रतिदिन प्रातः काल स्नान के उपरांत पूर्व दिशा की ओर मुख करके पद्मासन में बैठें और भगवान ऋषभदेव के शांत दिगंबर स्वरूप का ध्यान करते हुए ॐ नमो भगवते ऋषभदेवाय नमः अथवा ॐ ऋषभनाथाय नमः का 108 बार शांत मन से जाप करें।
  • अपने लग्न भाव को शुद्ध करने के लिए प्रतिदिन प्रातः काल उगते हुए सूर्य को तांबे के पात्र से जल अर्पित करें और उसके पश्चात 10 मिनट तक मौन रहकर अपनी श्वासों पर ध्यान केंद्रित करें।
  • शरीर और मन के ताप को शांत करने के लिए प्रत्येक सोमवार अथवा पूर्णिमा को शिवलिंग पर शुद्ध शीतल जल और गंगाजल अर्पित करें तथा माथे पर श्वेत चंदन का त्रिपुंड लगाएं।
  • जातक को अपनी शारीरिक स्थिति और योग्य ज्योतिर्विद के परामर्श के अनुसार चौदह मुखी अथवा नौ मुखी नेपाली रुद्राक्ष काले अथवा श्वेत रेशमी धागे में पिरोकर धारण करना चाहिए जो लग्न दोष और केतु के भ्रम को शांत करता है।
  • प्रत्येक शनिवार को असहाय निर्धन व्यक्तियों कुष्ठ रोगियों और संन्यासियों को कंबल काले तिल और सात्विक अन्न का दान करें तथा आवारा पशुओं को भोजन कराएं।
  • सप्ताह में कम से कम 1 दिन विशेषकर एकादशी अथवा शनिवार को नमक का त्याग करें और केवल फलाहार ग्रहण करें जिससे इंद्रियों का स्वाभाविक निग्रह होता है।

ऋषभदेव साधना के आवश्यक नियम और मर्यादाएं

क्या अवश्य करेंकिन गलतियों से सर्वथा दूर रहें
प्रतिदिन कुछ समय एकांत में बैठकर आत्म निरीक्षण और मौन साधना करेंकिसी के अपमान अथवा निंदा करने पर क्रोधित होने से बचें
सुख और दुख दोनों ही परिस्थितियों में मन को शांत रखने का अभ्यास करेंअपने सुंदर शरीर रूप रंग अथवा धन का तनिक भी अहंकार न करें
प्रकृति पशु पक्षियों और सभी प्राणियों के प्रति दया का भाव रखेंभोजन में अत्यधिक स्वाद लोभ तीखे और तामसिक पदार्थों का सेवन न करें
अपने कर्तव्यों को निष्काम भाव से निभाएं और फल की चिंता न करेंजीवन की जिम्मेदारियों से भागने को वैराग्य समझने की भूल न करें
पूजा में श्वेत पुष्प तुलसी दल और शुद्ध गाय के घी का दीपक जलाएंबिना सोचे समझे किसी पर कटाक्ष करने अथवा उपहास उड़ाने से बचें

देहाभिमान से मुक्ति और आत्म स्वरूप की प्राप्ति

भगवान ऋषभदेव का पावन चरित्र संपूर्ण मानव जाति के लिए त्याग और आत्म विजय का एक प्रकाश स्तंभ है। उनका जीवन यह सिद्ध करता है कि वास्तविक सम्राट वह नहीं है जो दूसरों पर शासन करता है बल्कि सच्चा चक्रवर्ती वह है जिसने अपनी इंद्रियों और मन को जीत लिया है। जब तक मनुष्य का लग्न भाव देहाभिमान में फंसा रहता है तब तक वह संसार के छोटे छोटे सुखों के लिए भटकता रहता है। परंतु जैसे ही वह भगवान ऋषभदेव के वैराग्य को अपनी चेतना में स्थान देता है वैसे ही उसके सारे भय और संताप भस्म हो जाते हैं। भगवान ऋषभदेव का नित्य स्मरण मनुष्य को विषम से विषम परिस्थितियों में भी शांत अचल और तेजस्वी बनाए रखता है और अंततः उसे इस नश्वर भवसागर से पार उतारकर परम पद की प्राप्ति कराता है।

FAQ

भगवान ऋषभदेव किसके पुत्र थे और उनका जन्म किस वंश में हुआ था? भगवान ऋषभदेव स्वायंभुव मनु के वंश में राजा नाभि और रानी मेरुदेवी के घर भगवान विष्णु के आठवें अवतार के रूप में जन्मे थे।

हमारे देश का नाम भारतवर्ष किसके नाम पर पड़ा? भगवान ऋषभदेव के ज्येष्ठ पुत्र चक्रवर्ती राजा भरत के नाम पर ही इस पावन भूमि का नाम अजनाभ खंड से बदलकर भारतवर्ष पड़ा।

ज्योतिष में भगवान ऋषभदेव का संबंध किस भाव और ग्रह से माना जाता है? भगवान ऋषभदेव का सीधा संबंध जन्म कुंडली के प्रथम भाव लग्न भाव की शुद्धि तथा शनि और केतु के परम वैराग्य से माना जाता है।

भगवान ऋषभदेव ने अपने 100 पुत्रों को क्या मार्गदर्शन दिया था? उन्होंने अपने पुत्रों को राजधर्म त्याग सदाचार और आत्म विद्या का उपदेश दिया जिसमें से 9 पुत्र नव योगेंद्र बने और भरत चक्रवर्ती राजा बने।

लग्न भाव की शुद्धि और इंद्रिय निग्रह के लिए कौन सा मंत्र जपना चाहिए? लग्न भाव की शुद्धि और मानसिक शांति हेतु प्रतिदिन प्रातः काल ॐ नमो भगवते ऋषभदेवाय नमः मंत्र का 108 बार जाप करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

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लेखक

पं. सुव्रत शर्मा

पं. सुव्रत शर्मा (63)


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