रुक्मिणी अवतार और सप्तम भाव क्या?

By पं. सुव्रत शर्मा

विदर्भ राजकुमारी का गुप्त प्रेम पत्र अंबा मंदिर से हरण और सप्तम भाव के शुद्ध प्रेम का संपूर्ण रहस्य

देवी रुक्मिणी अवतार कथा और सप्तम भाव रहस्य

रुक्मिणी पूजन मुहूर्त और शास्त्रीय विधान

सनातन वैदिक परंपरा और श्रीमद्भागवत महापुराण के पावन दर्शन में आद्याशक्ति भगवती महालक्ष्मी के परम पावन प्रेममयी और अखंड पातिव्रत्य स्वरूप के रूप में पूजित माता रुक्मिणी का प्राकट्य प्रेम की अगाध शक्ति आत्मसमर्पण और नारी गरिमा का सर्वोच्च शिखर है। वैदिक ज्योतिष तथा तत्व विज्ञान के अंतर्गत जन्म कुंडली के सप्तम भाव वैवाहिक सुख जीवनसाथी के कारकत्व और सौंदर्य व ऐश्वर्य के अधिपति शुक्र देव के शुद्ध सात्विक प्रभाव को जाग्रत करने के लिए माता रुक्मिणी की उपासना को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जब जातक की जन्म कुंडली में सप्तम भाव पाप ग्रहों से पीड़ित होकर विवाह में अनावश्यक विलंब योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति में बाधा अथवा दांपत्य जीवन में कटुता उत्पन्न कर रहा हो तब द्वारका की पटरानी माँ रुक्मिणी की शरण में जाने से शीघ्र विवाह और मनवांछित वर की प्राप्ति होती है। पौष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि रुक्मिणी अष्टमी अथवा वैशाख मास की मोहिनी एकादशी के पावन अनुष्ठान का संपूर्ण शास्त्रीय विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।

शास्त्रीय आयाम अनुष्ठान विवरण और ज्योतिषीय मान्यता
प्रमुख पावन तिथि पौष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी रुक्मिणी अष्टमी अथवा वैशाख शुक्ल एकादशी
दैनिक पूजन समय प्रातः कालीन ब्रह्म मुहूर्त अथवा सायंकालीन गोधूलि प्रदोष काल
अधिष्ठाता स्वरूप भगवान श्रीकृष्ण के वामांग में विराजमान स्वर्ण कांति वाली चतुर्भुजा माँ रुक्मिणी
ज्योतिषीय ग्रह व भाव संबंध सप्तम भाव वैवाहिक सुख कारक शुक्र ग्रह और रोहिणी व उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र
मुख्य पूजन सामग्री शुद्ध पीली चुनरी सुगंधित अष्टगंध इत्र ताजे पीले पुष्प माखन मिश्री और तुलसी दल
प्रधान वैदिक अनुष्ठान रुक्मिणी मंगल पाठ श्रीमद्भागवत दशम स्कंध पत्र पाठ और ॐ श्रीं रुक्मिणीवल्लभाय नमः जप
अपेक्षित फल विवाह बाधा निवारण मनचाहा जीवनसाथी दांपत्य निष्ठा और अखंड सौभाग्य

विदर्भ राजकुमारी और भीष्मक का राजप्रासाद

श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध के बावनवें और तिरपनवें अध्याय के अत्यंत पावन इतिहास के अनुसार प्राचीन काल में विदर्भ देश की राजधानी कुंडिनपुर में परम धर्मात्मा राजा भीष्मक राज्य करते थे। राजा भीष्मक के पांच पुत्र और एक परम सुंदरी पुत्री थी जिनका नाम रुक्मिणी था। देवी रुक्मिणी कोई साधारण मानवी कन्या नहीं थीं अपितु वे साक्षात वैकुंठ की स्वामिनी भगवती महालक्ष्मी का अवतार थीं जो भगवान श्री हरि विष्णु के श्री कृष्ण अवतार में उनकी पटरानी बनने हेतु पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं।

बाल्यकाल से ही देवी रुक्मिणी का रूप लावण्य शील और बुद्धि तीनों लोकों में अद्वितीय थी। जब कुंडिनपुर के राजमहल में देश देशांतर से आने वाले संत महात्मा ऋषि और अतिथि भगवान श्री कृष्ण के दिव्य गुणों उनके अनुपम सौंदर्य वीरता और माथुर लीलाओं का वर्णन करते थे तब राजकुमारी रुक्मिणी एकांत में बैठकर उन आख्यानों को अत्यंत तन्मयता से सुनती थीं।

भगवान श्री कृष्ण के दिव्य चरित्र का श्रवण करते करते देवी रुक्मिणी का अंतःकरण उनके चरणों में पूर्णतः समर्पित हो गया। उन्होंने अपने मन वाणी और आत्मा से भगवान श्री कृष्ण को ही अपना सनातन पति स्वीकार कर लिया। उन्होंने यह दृढ़ संकल्प लिया कि यदि वे विवाह करेंगी तो केवल द्वारकाधीश भगवान श्री कृष्ण से ही करेंगी अन्यथा वे अपने प्राणों का त्याग कर देंगी। राजा भीष्मक भी अपनी पुत्री की भावना से भलीभांति परिचित थे और वे अपनी राजकन्या का विवाह भगवान श्री कृष्ण के साथ ही संपन्न कराना चाहते थे।

क्या रुक्मी का हठ बना विवाह में संकट?

जब राजा भीष्मक भगवान श्री कृष्ण के पास विवाह का प्रस्ताव भेजने का विचार कर रहे थे उसी समय उनके ज्येष्ठ पुत्र रुक्मी ने इस प्रस्ताव का घोर विरोध किया। रुक्मी अत्यंत अभिमानी क्रोधी और मगध नरेश जरासंध का परम मित्र था। रुक्मी भगवान श्री कृष्ण से आंतरिक द्वेष रखता था क्योंकि श्री कृष्ण ने जरासंध और कंस की आसुरी शक्तियों को परास्त कर दिया था।

रुक्मी अपनी बहन रुक्मिणी का विवाह अपने मित्र और चेदि देश के क्रूर राजा शिशुपाल के साथ करना चाहता था। शिशुपाल भी जरासंध के आसुरी गुट का प्रमुख सदस्य था। रुक्मी ने अपने पिता राजा भीष्मक पर दबाव डाला और कुल की मर्यादा का भय दिखाकर अपनी हठधर्मिता से रुक्मिणी का विवाह जबरन शिशुपाल से तय कर दिया।

राजा भीष्मक अपने ज्येष्ठ पुत्र के दुराग्रह के सम्मुख विवश हो गए। संपूर्ण कुंडिनपुर में विवाह की तैयारियां आरंभ हो गईं। शिशुपाल अपनी विशाल सेना जरासंध शाल्व पौंड्रक और विदर्भ की संयुक्त सेना के साथ बारात लेकर कुंडिनपुर पहुंच गया। नगर के प्रत्येक मार्ग पर अस्त्र शस्त्रों से सुसज्जित पहरेदार तैनात कर दिए गए ताकि कोई भी बाहरी व्यक्ति महल में प्रवेश न कर सके। विवाह का दिन निश्चित हो चुका था और केवल 1 दिन का समय शेष रह गया था।

सात श्लोकों का गोपनीय प्रेम पत्र और अग्निद्योतन ब्राह्मण

जब राजकुमारी रुक्मिणी को ज्ञात हुआ कि उनका भाई उनका विवाह जबरन शिशुपाल से कराने पर तुला हुआ है तब उन्होंने निराशा के अंधकार में डूबने के स्थान पर अदम्य आत्मिक बल और बुद्धिमत्ता का परिचय दिया। उन्होंने विचार किया कि इस संकट की घड़ी में केवल भगवान श्री कृष्ण ही उनके धर्म और पातिव्रत्य की रक्षा कर सकते हैं।

देवी रुक्मिणी ने एकांत कक्ष में बैठकर अपने आंसुओं की मसि और अंतःकरण के प्रेम से भगवान श्री कृष्ण के नाम एक अत्यंत गोपनीय और पावन पत्र लिखा। श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णित यह पत्र संस्कृत साहित्य का सबसे पवित्र और दिव्य प्रेम पत्र माना जाता है जो 7 श्लोकों में रचा गया था।

  • पत्र के प्रथम श्लोक में रुक्मिणी ने लिखा कि हे त्रिभुवन सुंदर मैंने आपके दिव्य गुणों को कानों से सुना है जो सुनने वालों के समस्त पापों को हर लेते हैं और आपके रूप का ध्यान करने से नेत्रों का कल्याण हो जाता है अतः मेरा चित्त लज्जा त्यागकर आप में समा गया है।
  • उन्होंने लिखा कि हे कमल नयन कुल शील विद्या रूप और धन में आपके समान कोई नहीं है इसलिए मैंने आपको अपने पति रूप में वरण किया है।
  • रुक्मिणी ने अत्यंत मार्मिक चेतावनी देते हुए लिखा कि जैसे सिंह का भाग कोई सियार न छू सके उसी प्रकार शिशुपाल जैसा दुष्ट आपके भाग को स्पर्श न करने पाए।
  • पत्र के अंतिम भाग में उन्होंने श्री कृष्ण को अपनी योजना बताई कि विवाह के दिन हमारी कुल परंपरा के अनुसार मैं नगर के बाहर स्थित कुलदेवी अंबिका के मंदिर में पूजन हेतु जाऊंगी।
  • उन्होंने निवेदन किया कि हे यदुनाथ आप गुप्त रूप से आइए और वहीं से मेरा हरण करके अपने बाहुबल से मुझे अपनी दासी बना लीजिए अन्यथा मैं तपस्या द्वारा अपना देह त्याग कर दूंगी।

देवी रुक्मिणी ने इस अत्यंत गोपनीय पत्र को द्वारका पहुंचाने के लिए अपने कुल के एक अत्यंत वृद्ध निष्कपट और परम विश्वासी अग्निद्योतन नामक तपस्वी ब्राह्मण को चुना। ब्राह्मण ने वह पत्र अपने वस्त्रों में छिपाया और वे तीव्र गति से द्वारका की ओर प्रस्थान कर गए।

द्वारकाधीश का आगमन और अंबा मंदिर से हरण

तपस्वी ब्राह्मण जब द्वारका पहुंचे तो सुधर्मा राजसभा में भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं आगे बढ़कर उनका स्वागत किया और उनके चरण धोए। एकांत में जब ब्राह्मण ने देवी रुक्मिणी का वह 7 श्लोकों वाला पत्र भगवान को सौंपा और रुक्मिणी के संकट का वर्णन किया तब भगवान श्री कृष्ण का हृदय द्रवित हो उठा।

भगवान श्री कृष्ण ने उसी क्षण अपने सारथि दारुक को रथ तैयार करने का आदेश दिया। वे शैव्य सुग्रीव मेघपुष्प और बलाहक नामक चारों तीव्रगामी घोड़ों से जुते दिव्य रथ पर सवार होकर अकेले ही कुंडिनपुर की ओर वायु के वेग से निकल पड़े। जब बलराम जी को यह समाचार मिला तो वे भी यादवों की एक विशाल चतुरंगिणी सेना लेकर श्री कृष्ण की रक्षा हेतु विदर्भ की ओर चल पड़े।

विवाह के पावन प्रभात पर राजकुमारी रुक्मिणी राजसी वस्त्रों और आभूषणों से सुसज्जित होकर सशस्त्र सैनिकों के कड़े पहरे के बीच नगर के बाहर स्थित माँ गिरिजा अंबिका के प्राचीन मंदिर में पहुंचीं। रुक्मिणी ने कुलदेवी के पावन विग्रह के सम्मुख घुटने टेककर अश्रुपूर्ण नेत्रों से प्रार्थना की कि हे माता भवानी मुझे केवल और केवल भगवान श्री कृष्ण ही पति रूप में प्राप्त हों।

पूजा संपन्न करके जब देवी रुक्मिणी मंदिर की सीढ़ियों से नीचे उतर रही थीं तब संपूर्ण राजा और सैनिक उनके अनुपम सौंदर्य को देखकर स्तब्ध रह गए। उसी समय भगवान श्री कृष्ण का रथ विद्युत की भांति वहां आ पहुंचा।

  • भगवान श्री कृष्ण ने सैनिकों और राजाओं के देखते ही देखते अपने बाएं हाथ से रुक्मिणी को उठाकर अपने रथ पर बैठा लिया।
  • शिशुपाल जरासंध और शाल्व की सेनाओं ने क्रोध में भरकर श्री कृष्ण का पीछा किया किंतु पीछे से आए बलराम जी और यादव सेना ने उन्हें युद्ध में बुरी तरह पराजित कर दिया।
  • अभिमानी रुक्मी ने जब अकेले श्री कृष्ण को ललकारा तो श्री कृष्ण ने उसके समस्त बाणों को काटकर उसे बंदी बना लिया।
  • रुक्मिणी की करुण प्रार्थना पर भगवान ने रुक्मी के प्राण नहीं लिए किंतु उसके अहंकार को नष्ट करने हेतु उसके सिर और दाढ़ी के बालों को मूंडकर उसे छोड़ दिया।
  • भगवान श्री कृष्ण देवी रुक्मिणी को लेकर द्वारका पहुंचे जहां वैदिक रीति रिवाजों और अपार जनसमूह के हर्षोल्लास के मध्य उनका भव्य विवाह संपन्न हुआ और उन्हें द्वारका की पटरानी का सर्वोच्च पद प्रदान किया गया।

शुक्र ग्रह का शुद्ध प्रेम और सप्तम भाव का ज्योतिषीय मर्म

वैदिक ज्योतिष के महानतम ग्रंथ बृहत् पराशर होरा शास्त्र में जन्म कुंडली के प्रत्येक भाव और ग्रहों के आत्मिक स्वभाव का गहरा विश्लेषण मिलता है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से माता रुक्मिणी का पावन स्वरूप सीधे तौर पर शुक्र ग्रह के सात्विक प्रेम और जन्म कुंडली के सप्तम भाव का प्रतिनिधित्व करता है।

शुक्र ग्रह को ज्योतिष में भौतिक आकर्षण रूप लावण्य कला और दांपत्य सुख का अधिपति माना जाता है। किंतु सामान्य सांसारिक प्रेम में काम वासना और स्वार्थ का मिश्रण होता है जबकि माता रुक्मिणी का प्रेम शुक्र के उस सर्वोच्च आध्यात्मिक स्तर का प्रतीक है जहां वासना शून्य हो जाती है और केवल विशुद्ध आत्मसमर्पण शेष रहता है।

जन्म कुंडली का सप्तम भाव जिसे जाया भाव अथवा कलत्र भाव कहा जाता है सीधे तौर पर विवाह जीवनसाथी की प्रकृति वैवाहिक तालमेल और गृहस्थ जीवन की स्थिरता का केंद्र होता है।

  • जब जन्म कुंडली के सप्तम भाव पर शनि राहु अथवा मंगल का क्रूर प्रभाव होता है तो विवाह की बातचीत बारंबार टूटती है और कन्या को योग्य वर नहीं मिल पाता।
  • सप्तम भाव में पाप ग्रहों की स्थिति से विवाह के पश्चात पति पत्नी के विचारों में भयंकर टकराव होता है और अलगाव की स्थिति बनती है।
  • माता रुक्मिणी का प्राकट्य और उनका विवाह यह प्रमाणित करता है कि जब प्रेम में धर्म और सत्य का आश्रय होता है तो समस्त आसुरी बाधाएं स्वतः नष्ट हो जाती हैं।
  • रुक्मिणी साधना सप्तम भाव के समस्त वास्तु और ग्रह दोषों को शांत कर देती है जिससे जातक को अपने अनुरूप श्रेष्ठ गुणी और समर्पित जीवनसाथी की प्राप्ति होती है।

क्या रुक्मिणी मंगल पाठ से विवाह बाधाएं मिटती हैं?

आधुनिक युग में अनेक कन्याएं और युवक अपनी उच्च शिक्षा और उत्तम संस्कारों के उपरांत भी विवाह के संबंध में भारी मानसिक संताप झेलते हैं। कुंडली में मांगलिक दोष होना सप्तमेश का नीच राशि में बैठना अथवा राहु की महादशा का चलना विवाह के मार्ग में विकराल शिला बनकर खड़ा हो जाता है।

शास्त्रों और लोक परंपरा में यह अखंड विश्वास है कि श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध में वर्णित रुक्मिणी मंगल अथवा रुक्मिणी विवाह प्रसंग का पाठ साक्षात कल्पवृक्ष के समान फलदायी है। जिस प्रकार देवी रुक्मिणी के विवाह में जरासंध और शिशुपाल जैसी महाशक्तियां भी अवरोध उत्पन्न नहीं कर सकीं उसी प्रकार जो कन्या श्रद्धा भाव से रुक्मिणी मंगल का पाठ करती है उसके विवाह मार्ग की समस्त अड़चनें एक ही झटके में दूर हो जाती हैं।

यह पावन पाठ कन्या के आभा मंडल को दिव्य तेज से भर देता है और उसे भगवान श्री कृष्ण के समान ही रक्षा करने वाला और प्रेम करने वाला सुयोग्य वर प्रदान कराता है। जिन दंपतियों के जीवन में अविश्वास और कलह का विष घुल चुका हो उनके घर में यह पाठ पुनः मधुरता और शांति का संचार कर देता है।

शीघ्र विवाह और दांपत्य सुख के अचूक वैदिक उपाय

यदि किसी कन्या अथवा जातक की जन्म कुंडली में विवाह का योग न बन पा रहा हो सप्तम भाव पीड़ित हो अथवा प्रेम संबंधों में बाधाएं आ रही हों तो शास्त्रों में माता रुक्मिणी की प्रसन्नता हेतु अत्यंत प्रामाणिक उपाय बताए गए हैं।

  • प्रत्येक शुक्रवार अथवा शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को प्रातः काल स्नान के उपरांत पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें और भगवान श्री कृष्ण व माता रुक्मिणी के युगल चित्र के सम्मुख शुद्ध गाय के घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  • देवी रुक्मिणी को पीली चुनरी सुगंधित इत्र ताजे पीले पुष्प और तुलसी दल अर्पित करें तथा पावन बीज मंत्र ॐ क्लीं रुक्मिणीवल्लभाय नमः अथवा ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं कृष्णाय गोविंदाय गोपीजनवल्लभाय नमः का कम से कम 108 बार शांत मन से जाप करें।
  • प्रतिदिन प्रातः काल अथवा विशेष रूप से गुरुवार और शुक्रवार को श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध के बावनवें अध्याय में वर्णित रुक्मिणी पत्र के सात श्लोकों का शुद्ध उच्चारण के साथ पाठ करें।
  • शीघ्र विवाह की कामना रखने वाली कन्याएं प्रत्येक शुक्रवार को माता रुक्मिणी को माखन मिश्री का भोग लगाएं और उस प्रसाद को स्वयं भी ग्रहण करें तथा सुहागिन स्त्रियों को हल्दी कुमकुम और पीले वस्त्रों का आदरपूर्वक दान करें।
  • जातक को अपनी शारीरिक अवस्था और योग्य ज्योतिर्विद के परामर्श के अनुसार छह मुखी अथवा दस मुखी नेपाली रुद्राक्ष चांदी के तार में पिरोकर शुक्रवार के दिन धारण करना चाहिए जो शुक्र ग्रह की ऊर्जा को बली बनाता है।
  • प्रत्येक गुरुवार और शुक्रवार को गाय को ताजी रोटी पर थोड़ा सा माखन अथवा शुद्ध घी और गुड़ रखकर खिलाएं जिससे विवाह मार्ग के समस्त ग्रह दोष शांत होते हैं।

रुक्मिणी साधना और वैवाहिक निष्ठा के शास्त्रीय नियम

क्या अवश्य करें किन गलतियों से सर्वथा दूर रहें
प्रतिदिन प्रातः काल उठकर अपने माता पिता और कुलदेवी का आदरपूर्वक नमन करें अपने जीवनसाथी अथवा मंगेतर के प्रति मन में कभी भी छल कपट न लाएं
माता रुक्मिणी को सदैव शुद्ध माखन मिश्री ताजे पीले पुष्प और तुलसी अर्पित करें विवाह के मामलों में किसी भी असहाय व्यक्ति का उपहास अथवा अनादर न करें
शुक्रवार और एकादशी के दिन पूर्ण स्वच्छता ब्रह्मचर्य और सात्विक आहार लें तामसिक भोजन मदिरा और किसी भी प्रकार के अनैतिक आचरण से सर्वथा दूर रहें
अपने प्रेम और वैवाहिक संबंधों में सदैव पूर्ण निष्ठा और सत्य का पालन करें अपने रूप यौवन कुल अथवा धन का समाज में कभी भी झूठा अहंकार न करें
पूजा में शुद्ध गाय के घी का दीपक और सुगंधित चंदन का ही श्रद्धापूर्वक प्रयोग करें बिना स्नान किए अथवा अशुद्ध अवस्था में पूजा के बर्तनों अथवा मूर्तियों को न छुएं

आत्मसमर्पण और अमर प्रेम का दिव्य आलोक

भगवती रुक्मिणी का पावन अवतार संपूर्ण मानव जाति को यह सनातन शिक्षा प्रदान करता है कि सच्चा प्रेम केवल इच्छाओं का नाम नहीं है अपितु वह आत्मा का परमात्मा के चरणों में पूर्ण समर्पण है। जब रुक्मिणी ने जरासंध और शिशुपाल की विशाल सेनाओं की तनिक भी चिंता किए बिना केवल श्री कृष्ण पर भरोसा किया तो स्वयं जगदीश्वर को उनके द्वार पर आना पड़ा। उनका 7 श्लोकों का पत्र यह सिखाता है कि ईश्वर को पाने के लिए किसी आडंबर की आवश्यकता नहीं होती वहां केवल हृदय की सच्ची पुकार और निष्काम भक्ति ही पर्याप्त होती है। शुक्र का सात्विक प्रेम जब मनुष्य के जीवन में उतरता है तो उसके संबंध स्वार्थ से ऊपर उठकर दिव्य बन जाते हैं। माता रुक्मिणी का नित्य स्मरण मनुष्य के जीवन से समस्त वैवाहिक संकटों ग्रह दोषों और हीन भावना को समाप्त करके उसे मनवांछित जीवनसाथी अखंड सौभाग्य और अंततः मोक्ष की परम शांति प्रदान कराता है।

FAQ

माता रुक्मिणी का प्राकट्य किस राजकुल में हुआ था? माता रुक्मिणी का प्राकट्य विदर्भ देश की राजधानी कुंडिनपुर के परम धर्मात्मा राजा भीष्मक के राजमहल में राजकुमारी के रूप में हुआ था।

माता रुक्मिणी ने भगवान श्री कृष्ण को कितने श्लोकों का प्रेम पत्र भेजा था? माता रुक्मिणी ने अपने ब्राह्मण दूत अग्निद्योतन के माध्यम से भगवान श्री कृष्ण को संस्कृत के अत्यंत पावन 7 श्लोकों का गोपनीय पत्र भेजा था।

भगवान श्री कृष्ण ने माता रुक्मिणी का हरण किस पावन स्थान से किया था? भगवान श्री कृष्ण ने कुंडिनपुर नगर के बाहर स्थित कुलदेवी माता अंबिका गिरिजा के प्राचीन मंदिर से माता रुक्मिणी का ससम्मान हरण किया था।

ज्योतिष में माता रुक्मिणी का संबंध किस भाव और ग्रह से माना जाता है? वैदिक ज्योतिष में माता रुक्मिणी का सीधा संबंध जन्म कुंडली के सप्तम भाव वैवाहिक सुख और शुद्ध सात्विक प्रेम के कारक शुक्र ग्रह से माना जाता है।

शीघ्र विवाह और मनचाहा वर पाने हेतु किस पाठ को सर्वोत्तम माना गया है? शीघ्र विवाह की बाधाएं दूर करने और सुयोग्य वर पाने हेतु श्रीमद्भागवत महापुराण के अंतर्गत आने वाले रुक्मिणी मंगल और रुक्मिणी पत्र के 7 श्लोकों का पाठ सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

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लेखक

पं. सुव्रत शर्मा

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