सावित्री अवतार और मृत्युंजय शक्ति क्या?

By पं. अभिषेक शर्मा

अश्वपति की तपस्या यमराज संवाद वट सावित्री व्रत और अष्टम भाव के अखंड सौभाग्य का संपूर्ण रहस्य

माँ सावित्री अवतार कथा और अखंड सौभाग्य रहस्य

वट सावित्री व्रत मुहूर्त और शास्त्रीय विधान

सनातन वैदिक परंपरा और महाभारत के पावन वन पर्व में आद्याशक्ति भगवती महासरस्वती के परम तेजस्वी सौर स्वरूप के रूप में पूजित माता सावित्री का प्राकट्य अखंड पातिव्रत्य मृत्युंजय सौभाग्य और सत्य के अजेय संकल्प का सर्वोच्च शिखर है। वैदिक ज्योतिष तथा तत्व विज्ञान के अंतर्गत सौरमंडल के अधिपति आत्मा के कारक भगवान सूर्य नारायण के प्रचंड ओज धर्मराज यम के दंडाधिकारी रूप तथा जन्म कुंडली के अष्टम भाव जिसे आयु भाव और मांगल्य स्थान कहा जाता है उसके समस्त दोषों को शांत करने के लिए माता सावित्री की आराधना को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जब जातक की जन्म कुंडली में अष्टम भाव अथवा सप्तम भाव पाप ग्रहों से पीड़ित होकर दांपत्य जीवन में अल्पायु योग वैधव्य दोष गंभीर दुर्घटना अथवा असाध्य रोग का संकट उत्पन्न कर रहा हो तब वट वृक्ष की साक्षी में माँ सावित्री की शरण में जाने से अकाल मृत्यु का भय समाप्त होकर अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है। ज्येष्ठ मास की कृष्ण पक्ष की अमावस्या अथवा पूर्णिमा तिथि वट सावित्री व्रत और इस पावन अनुष्ठान का संपूर्ण शास्त्रीय विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।

शास्त्रीय आयाम अनुष्ठान विवरण और ज्योतिषीय मान्यता
प्रमुख पावन तिथि ज्येष्ठ मास की कृष्ण अमावस्या अथवा ज्येष्ठ पूर्णिमा वट सावित्री व्रत
दैनिक पूजन समय प्रातः कालीन सूर्योदय वेला अथवा मध्याह्न काल
अधिष्ठाता स्वरूप सूर्य मंडल के मध्य विराजमान तप्त स्वर्ण कांति वाली अक्षमाला व वरद मुद्रा धारिणी माँ सावित्री
ज्योतिषीय ग्रह व भाव संबंध अष्टम भाव सप्तम भाव आत्मा कारक सूर्य देव न्याय कारक शनि देव और रोहिणी नक्षत्र
मुख्य पूजन सामग्री वट वृक्ष कच्चा सूत भीगे हुए काले चने बांस का पंखा लाल वस्त्र रोली और ऋतु फल
प्रधान वैदिक अनुष्ठान सावित्री स्तोत्र पाठ यम सावित्री संवाद श्रवण और ॐ सावित्र्यै नमः जप
अपेक्षित फल अखंड सौभाग्य प्राप्ति पति की दीर्घायु अष्टम भाव दोष शांति और मृत्यु पर विजय

अश्वपति की कठोर तपस्या और सावित्री प्राकट्य

महाभारत के वन पर्व में वर्णित अत्यंत पावन और शिक्षाप्रद इतिहास के अनुसार प्राचीन काल में मद्र देश में परम धर्मात्मा और सत्यवादी राजा अश्वपति राज्य करते थे। राजा अश्वपति समस्त सद्गुणों से संपन्न थे और प्रजा का अपने संतानों की भांति पालन करते थे। किंतु आयु का एक लंबा पड़ाव बीत जाने के उपरांत भी उनके राजमहल में कोई संतान नहीं थी। संतानहीनता के इस गहन दुख से व्यथित होकर राजा ने राजर्षि धर्म का पालन करते हुए संतान प्राप्ति हेतु कठोर तपस्या का संकल्प लिया।

राजा अश्वपति ने अपनी पत्नी सहित संपूर्ण राजसी सुखों का त्याग कर दिया। वे नियमपूर्वक उपवास रखते हुए प्रतिदिन एक लाख मालती पुष्पों से सूर्य मंडल की अधिष्ठात्री भगवती सावित्री की वेदी पर आहुतियां समर्पित करने लगे। राजा का यह उग्र तप निरंतर 18 वर्षों तक बिना किसी विराम के चलता रहा।

जब राजा के 18 वर्ष पूर्ण हुए तब एक अत्यंत अलौकिक और दिव्य घटना घटित हुई। यज्ञ कुंड की धधकती हुई पावन ज्वालाओं के मध्य से साक्षात भगवती सावित्री अपने परम तेजस्वी स्वरूप में प्रकट हुईं। देवी का शारीरिक वर्ण मध्याह्न के सहस्र सूर्यों के समान दैदीप्यमान था। उनके मुख मंडल से निकलने वाली आभा ने संपूर्ण दिशाओं के अंधकार को मिटा दिया।

भगवती सावित्री ने राजा अश्वपति के धैर्य और निष्काम भक्ति से प्रसन्न होकर वरदान दिया कि हे राजन तुम्हारी निष्ठा से संतुष्ट होकर मैं तुम्हें एक अत्यंत रूपवती तेजस्वी और धर्मनिष्ठ कन्या प्रदान करती हूं जो अपने पावन चरित्र से तीनों लोकों में तुम्हारे कुल की कीर्ति स्थापित करेगी।

यज्ञ के पावन प्रसाद स्वरूप महारानी मालवी के गर्भ से उस अलौकिक कन्या का जन्म हुआ। सूर्य के समान प्रखर तेज से युक्त होने और भगवती सावित्री के वरदान से उत्पन्न होने के कारण राजा अश्वपति ने उस नवजात राजकन्या का नाम सावित्री रखा। बाल्यकाल से ही सावित्री का सौंदर्य और तेज इतना प्रचंड था कि लोग उन्हें देखकर साक्षात कोई देवकन्या समझते थे। जब सावित्री विवाह योग्य हुईं तब उनके सूर्य सदृश तेज के सम्मुख कोई भी राजकुमार अथवा राजा उनका वरण करने का साहस न कर सका। अंततः राजा अश्वपति ने अपनी पुत्री को स्वयं अपना योग्य वर खोजने की आज्ञा दी।

सत्यवान का वरण और नारद की चेतावनी

पिता की आज्ञा शिरोधार्य कर राजकुमारी सावित्री स्वर्ण रथ पर सवार होकर योग्य वर की खोज में देश देशांतर के तीर्थों और वनों में भ्रमण करने लगीं। भ्रमण करते हुए सावित्री शाल्व देश के निर्जन वनों में पहुंचीं। वहां उन्होंने एक अत्यंत तेजस्वी रूपवान और विनयशील युवक को देखा जो अपने अंधे माता पिता की अत्यंत श्रद्धापूर्वक सेवा कर रहा था।

वह युवक कोई साधारण वनवासी नहीं था अपितु शाल्व देश के पराक्रमी राजा द्युमत्सेन का पुत्र सत्यवान था। शत्रुओं द्वारा राज्य छीन लिए जाने के कारण राजा द्युमत्सेन अपनी रानी और पुत्र के साथ वन में संन्यासियों का जीवन व्यतीत कर रहे थे। सत्यवान के भीतर धर्म सत्य और सेवा भाव को देखकर सावित्री के अंतःकरण ने उसी क्षण उन्हें अपने पति रूप में स्वीकार कर लिया।

सावित्री जब अपने पिता के राजमहल लौटीं तो वहां देवर्षि नारद पहले से विराजमान थे। राजा अश्वपति ने जब अपनी पुत्री से उसके निर्णय के विषय में पूछा तब सावित्री ने अत्यंत विनम्र स्वर में सत्यवान के वरण की बात कही।

यह सुनते ही देवर्षि नारद का मुख मंडल अत्यंत गंभीर हो गया। देवर्षि नारद ने एक अत्यंत भयानक भविष्यवाणी करते हुए कहा कि हे राजन सावित्री ने अनजाने में एक अत्यंत भारी भूल कर दी है। यद्यपि सत्यवान रूपवान गुणवान सत्यवादी और बुद्धिमान है किंतु उसके जीवन में एक अत्यंत घातक दोष है। सत्यवान अल्पायु है और आज से ठीक 1 वर्ष पश्चात उसकी आयु समाप्त हो जाएगी और उसकी मृत्यु निश्चित है।

देवर्षि नारद के इस वचन को सुनकर राजा अश्वपति का हृदय कांप उठा। उन्होंने सावित्री को समझाते हुए कहा कि हे पुत्री अभी विवाह नहीं हुआ है अतः तुम किसी अन्य दीर्घायु राजकुमार का चयन कर लो।

  • सावित्री ने अत्यंत दृढ़ स्वर में कहा कि मन से एक बार ही संकल्प किया जाता है वाणी से एक बार ही वचन दिया जाता है और कन्यादान भी एक बार ही होता है।
  • चाहे सत्यवान दीर्घायु हों अथवा अल्पायु मैंने उन्हें अपने अंतःकरण से पति मान लिया है और अब मैं अपने मार्ग से कभी विचलित नहीं होऊंगी।
  • सावित्री के इस अडिग पातिव्रत्य और धर्म निष्ठा को देखकर देवर्षि नारद ने भी अपना मस्तक झुका लिया और विवाह की अनुमति प्रदान की।
  • सावित्री ने राजसी रेशमी वस्त्रों और आभूषणों को त्याग दिया और वे वल्कल वस्त्र धारण कर वन में सत्यवान के साथ कुटिया में रहने लगीं।

वट वृक्ष तले यमराज से धर्म संवाद

विवाह के पश्चात सावित्री अपने अंधे सास ससुर और पति की सेवा में लीन रहने लगीं किंतु उनके मन में देवर्षि नारद द्वारा बताया गया वह एक वर्ष का कालखंड निरंतर खटक रहा था। जब मृत्यु का दिन समीप आया तब सावित्री ने लगातार तीन दिन और तीन रात का अत्यंत कठोर त्रिरात्र व्रत रखा जिसमें उन्होंने जल की एक बूंद भी ग्रहण नहीं की।

नियत दिन पर जब सत्यवान कुल्हाड़ी लेकर वन में लकड़ी काटने जाने लगे तब सावित्री भी उनके साथ वन में चली गईं। वन में लकड़ी काटते समय अचानक सत्यवान का सिर भीषण पीड़ा से फटने लगा। सत्यवान ने व्याकुल होकर कहा कि हे प्रिये मुझे अत्यधिक निद्रा आ रही है और मेरा शरीर टूट रहा है।

सावित्री ने अपने पति को एक विशाल वट वृक्ष की शीतल छाया में लिटा दिया और उनके सिर को अपनी गोद में रखकर बैठ गईं। उसी समय दक्षिण दिशा से एक अत्यंत भयानक और तेजस्वी पुरुष का आगमन हुआ। उनका शारीरिक वर्ण श्यामल था नेत्र रक्त के समान लाल थे उनके हाथों में पाश था और वे साक्षात मृत्यु के देवता धर्मराज यमराज थे।

यमराज ने सत्यवान के शरीर से अंगूठे के आकार वाले जीवात्मा को अपने पाश में बांध लिया और वे दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान करने लगे। सावित्री अपने पति के प्राणों को जाते देखकर तत्काल उठ खड़ी हुईं और वे यमराज के पीछे पीछे चलने लगीं।

जब यमराज ने पीछे मुड़कर देखा तो उन्होंने सावित्री को रोकते हुए कहा कि हे पतिव्रता नारी तुम मृत्यु के इस दुर्गम मार्ग पर नहीं आ सकतीं अतः वापस लौट जाओ और अपने पति का अंतिम संस्कार करो।

  • सावित्री ने अत्यंत विनम्रता पूर्वक कहा कि हे धर्मराज जहां मेरे पति जाते हैं वहां पत्नी का जाना सनातन धर्म का शाश्वत नियम है।
  • सावित्री ने यमराज के साथ चलते हुए धर्म सत्य मित्रता और सत्संग पर ऐसे अद्भुत और गूढ़ वचनों का उच्चारण किया जिसे सुनकर साक्षात धर्मराज विस्मयचकित रह गए।
  • सावित्री के वाक् चातुर्य और धर्म ज्ञान से प्रसन्न होकर यमराज ने सत्यवान के प्राणों को छोड़कर कोई भी वरदान मांगने को कहा।
  • प्रथम वरदान में सावित्री ने अपने सास ससुर की आंखों की ज्योति और उनका खोया हुआ राज्य वापस मांग लिया।
  • द्वितीय वरदान में सावित्री ने अपने पिता अश्वपति के लिए 100 तेजस्वी पुत्रों का वरदान मांग लिया।
  • तृतीय वरदान में सावित्री ने अत्यंत चतुराई से अपने लिए सत्यवान के वीर्य से 100 कुलदीपक पुत्रों की प्राप्ति का वरदान मांग लिया।

यमराज ने बिना विचार किए तथास्तु कह दिया। वरदान देने के उपरांत जब यमराज आगे बढ़ने लगे तब सावित्री मुस्कुराते हुए बोलीं कि हे प्रभु आपने मुझे 100 पुत्रों की माता बनने का वरदान दिया है किंतु एक पतिव्रता नारी अपने पति के बिना संतान कैसे उत्पन्न कर सकती है। अतः आपका ही दिया हुआ वरदान सत्यवान के जीवित हुए बिना पूर्ण नहीं हो सकता।

यमराज सावित्री के इस अद्भुत पातिव्रत्य वाक् चातुर्य और धर्म निष्ठा के सम्मुख पूरी तरह नतमस्तक हो गए। यमराज ने सहर्ष अपने पाश से सत्यवान के जीवात्मा को मुक्त कर दिया और सत्यवान को 400 वर्षों की नवीन दीर्घायु प्रदान की। सावित्री वट वृक्ष के नीचे लौटीं जहां सत्यवान ऐसे जाग उठे मानो वे किसी गहरी निद्रा से जागे हों।

अष्टम भाव और मृत्युंजय सौभाग्य का ज्योतिषीय मर्म

वैदिक ज्योतिष के महान आधार ग्रंथ बृहत् पराशर होरा शास्त्र में जन्म कुंडली के प्रत्येक भाव और ग्रहों के सूक्ष्म कर्म बंधनों का अत्यंत विस्तृत विवेचन मिलता है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से माता सावित्री सीधे तौर पर जन्म कुंडली के अष्टम भाव और सूर्य देव के आत्म तेज का सर्वोच्च प्रतिनिधित्व करती हैं।

जन्म कुंडली का सप्तम भाव विवाह और जीवनसाथी का केंद्र होता है जबकि सप्तम से दूसरा भाव अर्थात लग्न से अष्टम भाव वैवाहिक जीवन की आयु जिसे मांगल्य स्थान कहा जाता है उसका निर्धारण करता है।

अष्टम भाव सीधे तौर पर अचानक आने वाले संकटों दुर्घटनाओं अकाल मृत्यु और पति की आयु का स्वामी होता है।

  • जब किसी स्त्री अथवा पुरुष की जन्म कुंडली के अष्टम भाव पर राहु शनि अथवा मंगल का क्रूर प्रभाव होता है तो वैवाहिक जीवन में वैधव्य दोष अथवा जीवनसाथी की अकाल मृत्यु का योग बनता है।
  • सूर्य ग्रह को ज्योतिष में सविता और प्राण शक्ति का कारक माना गया है जो अकाल मृत्यु के अंधकार को अपनी किरणों से भस्म कर देता है।
  • शनि देव धर्मराज यम के भ्राता हैं जो कर्म फल और आयु के नियंत्रक हैं।
  • वट वृक्ष साक्षात ब्रह्मा विष्णु और महेश का संयुक्त स्वरूप है जो दीर्घायु और अमरत्व का प्रतीक माना जाता है।
  • वट सावित्री व्रत अष्टम भाव के समस्त मारक और अमंगलकारी दोषों को शांत कर दांपत्य जीवन को वज्र के समान सुरक्षा प्रदान करता है।

क्या वट सावित्री व्रत से अकाल मृत्यु टलती है?

सनातन परंपरा में यह अटूट विश्वास है कि जिस प्रकार सती सावित्री ने यमराज के पाश से अपने मृत पति को वापस छीन लिया था उसी प्रकार जो सुहागिन स्त्री श्रद्धा भाव से वट सावित्री का व्रत रखती है उसके पति पर आने वाले बड़े से बड़े प्राणघातक संकट टल जाते हैं।

वट वृक्ष की शाखाओं में कच्चा सूत 108 बार अथवा 7 बार लपेटना वास्तव में अपने वैवाहिक जीवन को कालगति के बंधनों से सुरक्षित करने का एक तांत्रिक और वैदिक अनुष्ठान है। भीगे हुए चने शक्ति और पोषण का प्रतीक हैं जबकि बांस का पंखा पति को शीतल और दीर्घ जीवन प्रदान करने की प्रार्थना का प्रतीक है।

यह साधना केवल एक लौकिक व्रत नहीं है अपितु यह नारी चेतना की उस प्रचंड शक्ति का जागरण है जो यमराज के विधान को भी बदलने का सामर्थ्य रखती है। जिन दंपतियों की कुंडली में मांगलिक दोष अथवा नाड़ी दोष के कारण जीवनसाथी के स्वास्थ्य पर निरंतर संकट बना रहता है उनके लिए यह साधना साक्षात संजीवनी बूटी के समान कार्य करती है।

अखंड सौभाग्य प्राप्ति और अष्टम भाव रक्षा के अचूक उपाय

यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में अष्टम भाव का स्वामी निर्बल हो दांपत्य जीवन में निरंतर अशांति अथवा जीवनसाथी के स्वास्थ्य में भारी उतार चढ़ाव आ रहे हों तो शास्त्रों में माता सावित्री की प्रसन्नता हेतु अत्यंत प्रामाणिक उपाय बताए गए हैं।

  • प्रत्येक वर्ष ज्येष्ठ मास की अमावस्या अथवा पूर्णिमा को वट सावित्री व्रत का पूर्ण निष्ठा से पालन करें और वट वृक्ष की जड़ में कच्चा दूध व शुद्ध जल अर्पित कर कच्चे सूत से परिक्रमा करें।
  • सुहागिन स्त्रियां लाल अथवा पीले रेशमी वस्त्र धारण कर माता सावित्री और सत्यवान का ध्यान करते हुए पावन मंत्र ॐ ह्रीं श्रीं सावित्र्यै नमः अथवा ॐ नमः शिवाय का कम से कम 108 बार शांत मन से जाप करें।
  • प्रतिदिन प्रातः काल स्नान के उपरांत सौभाग्यवती स्त्रियां महाभारत में वर्णित पावन सावित्री स्तोत्र अथवा मृत्युंजय महामंत्र का शुद्ध उच्चारण के साथ पाठ करें जो वैवाहिक जीवन की समस्त आपदाओं को हर लेता है।
  • वट सावित्री के दिन भीगे हुए काले चने गुड़ और मौसमी फल बांस के पंखे पर रखकर किसी योग्य ब्राह्मण अथवा वृद्ध सुहागिन स्त्री को आदरपूर्वक दान करें।
  • जातक को अपनी शारीरिक अवस्था और योग्य ज्योतिर्विद के परामर्श के अनुसार दो मुखी अथवा गौरी शंकर नेपाली रुद्राक्ष चांदी के तार में पिरोकर सोमवार अथवा शुक्रवार के दिन धारण करना चाहिए जो अखंड सौभाग्य का कारक बनता है।
  • प्रत्येक पूर्णिमा अथवा शुक्रवार को किसी निर्धन कन्या अथवा सुहागिन स्त्री को सुहाग सामग्री लाल चूड़ियां सिंदूर और कुमकुम का दान करें तथा गाय को ताजी रोटी पर घी और गुड़ रखकर खिलाएं।

सावित्री साधना और पातिव्रत्य के शास्त्रीय नियम

क्या अवश्य करें किन गलतियों से सर्वथा दूर रहें
प्रतिदिन प्रातः काल उठकर अपने पति सास ससुर और माता पिता का नमन करें अपने जीवनसाथी अथवा ससुराल पक्ष के लोगों के प्रति मन में कभी दुर्भावना न लाएं
वट वृक्ष की पूजा में सदैव कच्चा सूत भीगे चने और ताजे फलों का प्रयोग करें वट सावित्री व्रत के दिन काले अथवा नीले वस्त्र धारण करने से सर्वथा बचें
व्रत के दिन पूर्ण स्वच्छता ब्रह्मचर्य और सात्विक फलाहार का पालन करें तामसिक भोजन मदिरा मांस और किसी भी प्रकार के कलह से सर्वथा दूर रहें
अपने दांपत्य जीवन में सदैव सत्य निष्ठा और समर्पण की भावना बनाए रखें अपने रूप कुल अथवा मायके के धन का समाज में कभी भी झूठा अहंकार न करें
पूजा में शुद्ध गाय के घी का दीपक और श्वेत चंदन का ही श्रद्धापूर्वक प्रयोग करें बिना स्नान किए अथवा अशुद्ध अवस्था में वट वृक्ष को स्पर्श करने से बचें

पातिव्रत्य का अमर आलोक और सनातन चेतना

भगवती सावित्री का पावन अवतार संपूर्ण मानव जाति को यह सनातन शिक्षा प्रदान करता है कि सच्चा पातिव्रत्य और निष्काम प्रेम काल के चक्र को भी पीछे मोड़ने की शक्ति रखता है। सावित्री की यह पावन गाथा केवल एक पौराणिक इतिहास नहीं है अपितु यह नारी के अदम्य आत्मबल और उसकी वाक् शक्ति का वह अनुपम उदाहरण है जो यमराज जैसे कठोर न्यायकर्ता को भी पिघला देता है। वट वृक्ष की अमरता यह संदेश देती है कि जब प्रेम धर्म और सत्य की जड़ों पर खड़ा होता है तो वह युगों युगों तक हरा भरा रहता है। सूर्य का प्रचंड तेज जब माता सावित्री की करुणा से जुड़ जाता है तब मृत्यु का भय भी जीवन के अमृत में बदल जाता है। माता सावित्री का नित्य स्मरण मनुष्य के जीवन से समस्त वैधव्य दोषों अकाल मृत्यु के भय और ग्रह संतापों को समाप्त करके उसे अखंड सौभाग्य दीर्घायु और अंततः परम शांति की प्राप्ति कराता है।

FAQ

माता सावित्री का प्राकट्य किस राजा की तपस्या से हुआ था? माता सावित्री का प्राकट्य मद्र देश के परम धर्मात्मा राजा अश्वपति द्वारा 18 वर्षों तक की गई कठोर तपस्या के फलस्वरूप हुआ था।

सत्यवान के जीवन में देवर्षि नारद ने किस गंभीर दोष की घोषणा की थी? देवर्षि नारद ने भविष्यवाणी की थी कि सत्यवान समस्त सद्गुणों से संपन्न होने के पश्चात भी अल्पायु हैं और विवाह के ठीक 1 वर्ष पश्चात उनकी मृत्यु हो जाएगी।

सावित्री ने यमराज से तीसरे वरदान में किस चतुराई से पति के प्राण वापस लिए थे? सावित्री ने सत्यवान के वीर्य से 100 पुत्रों की माता बनने का वरदान मांगा जिसे पूरा करने हेतु यमराज को सत्यवान के प्राण वापस लौटाने पड़े।

ज्योतिष में माता सावित्री और वट सावित्री व्रत का संबंध किस भाव से है? वैदिक ज्योतिष में माता सावित्री का सीधा संबंध जन्म कुंडली के अष्टम भाव मांगल्य स्थान और पति की दीर्घायु की रक्षा से है।

वट सावित्री व्रत में किस वृक्ष की पूजा का विशेष विधान है और क्यों? वट सावित्री व्रत में वट वृक्ष अर्थात बरगद की पूजा की जाती है क्योंकि यह ब्रह्मा विष्णु और महेश का स्वरूप तथा अमरता व अखंड सौभाग्य का प्रतीक है।

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लेखक

पं. अभिषेक शर्मा

पं. अभिषेक शर्मा (63)


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