By पं. अभिषेक शर्मा
हिमालय की तपस्विनी कन्या अपर्णा तपस्या और मूलाधार चक्र जागरण का संपूर्ण वैदिक ज्योतिषीय रहस्य

सनातन वैदिक परंपरा में आद्याशक्ति भगवती महामाया के नवदुर्गा स्वरूपों में प्रथम और पर्वतराज हिमालय की तपस्विनी कन्या के रूप में पूजित माता शैलपुत्री का प्राकट्य अखंड तपस्या मूलाधार चक्र के जागरण और जीवन में नव सृजन का सर्वोच्च शिखर है। वैदिक ज्योतिष तथा योग शास्त्र के अंतर्गत जन्म कुंडली में मन के कारक चंद्र देव के समस्त दोषों को समाप्त करने स्थिर पृथ्वी तत्व को जाग्रत करने तथा चेतना को सुदृढ़ आधार प्रदान करने के लिए माता शैलपुत्री की उपासना को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जब जातक की जन्म कुंडली में चंद्रमा नीच राशि वृश्चिक में स्थित होकर अथवा राहु केतु के ग्रहण दोष से पीड़ित होकर मानसिक अशांति अवसाद भय अथवा अनिर्णय की स्थिति उत्पन्न करता है तब वृषभ पर आरूढ़ माँ शैलपुत्री का ध्यान साधक को अमोघ मानसिक स्थिरता और आत्मिक बल प्रदान करता है। नवरात्र के प्रथम दिन घटस्थापना और इस पावन अनुष्ठान की तिथि समय तथा शास्त्रीय घटकों का संपूर्ण विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।
| शास्त्रीय आयाम | अनुष्ठान विवरण और ज्योतिषीय मान्यता |
|---|---|
| प्रमुख पावन तिथि | चैत्र अथवा शारदीय नवरात्रि की शुक्ल पक्ष प्रतिपदा तिथि |
| दैनिक पूजन समय | प्रातः कालीन ब्रह्म मुहूर्त अथवा प्रातः काल का अभिजित मुहूर्त |
| अधिष्ठाता स्वरूप | वृषभ पर आरूढ़ दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल धारण किए हुए शैलपुत्री |
| ज्योतिषीय ग्रह व चक्र संबंध | मन के कारक चंद्र देव स्थिर पृथ्वी तत्व और मूलाधार चक्र |
| मुख्य पूजन सामग्री | शुद्ध गाय का देशी घी श्वेत पुष्प लाल चुनरी अक्षत रोली और मिट्टी का कलश |
| प्रधान वैदिक अनुष्ठान | घटस्थापना देवी कवच पाठ शैलपुत्री स्तोत्र और ॐ शं शैलपुत्र्यै नमः जप |
| अपेक्षित फल | मूलाधार चक्र जागरण मानसिक अवसाद से मुक्ति संकल्प बल वृद्धि और आरोग्य |
शिव महापुराण और देवी भागवत महापुराण के पावन आख्यानों के अनुसार जब प्रजापति दक्ष के यज्ञ में अपने पति देवाधिदेव महादेव का अपमान सहन न कर पाने के कारण माता सती ने अपनी योगाग्नि में देहत्याग कर दिया तब संपूर्ण ब्रह्मांड में घोर शोक छा गया। भगवान शिव परम वैराग्य में लीन होकर समाधिस्थ हो गए। सती के वियोग में सृष्टि का संतुलन डगमगाने लगा और तारकासुर जैसे भयंकर असुरों ने तीनों लोकों पर अत्याचार करना आरंभ कर दिया।
उसी कालखंड में पर्वतों के राजा शैलराज हिमालय और उनकी धर्मपत्नी रानी मैनावती ने संतान प्राप्ति और आद्याशक्ति को अपनी पुत्री के रूप में पाने हेतु सहस्रों वर्षों तक अत्यंत कठोर तपस्या की। रानी मैनावती ने अपनी तपस्या में केवल भगवती पराशक्ति का ध्यान किया। उनकी निष्कपट और अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर भगवती महामाया ने उन्हें साक्षात दर्शन दिए और वचन दिया कि वे सती के पश्चात उनके घर में पुत्री रूप में जन्म लेंगी।
उचित समय आने पर चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि के पावन प्रभात में माता मैनावती के गर्भ से भगवती आद्याशक्ति का प्राकट्य हुआ। पर्वत अर्थात शैल की पुत्री होने के कारण उनका नाम शैलपुत्री पड़ा। उन्हें गिरिराज की कन्या होने के कारण गिरिजा और पर्वतराज की पुत्री होने से पार्वती के नाम से भी जाना गया। उनके जन्म लेते ही संपूर्ण हिमालय पर्वत दिव्य औषधियों और रत्नों के प्रकाश से जगमगा उठा और देवताओं ने आकाश से पुष्प वर्षा करते हुए माता के बाल स्वरूप की स्तुति की।
बाल्यकाल से ही माता शैलपुत्री का मुखमंडल करोड़ों सूर्यों के समान दैदीप्यमान था। जब देवर्षि नारद पर्वतराज हिमालय के राजमहल में पधारे तब हिमालय ने अपनी नवजात कन्या के भविष्य और लक्षणों के विषय में पूछा। देवर्षि नारद ने उस बालिका के चरण कमलों को स्पर्श करते हुए कहा कि यह कन्या साक्षात जगत जननी पराशक्ति है। इसके समस्त लक्षण दिव्य हैं किंतु इसे पति रूप में वही संन्यासी प्राप्त होगा जो जटाधारी श्मशान निवासी और दिगंबर है अर्थात साक्षात देवाधिदेव महादेव ही इसके सनातन स्वामी हैं।
नारद जी ने स्पष्ट किया कि महादेव को पाने के लिए तपस्या ही एकमात्र मार्ग है। नारद जी के उपदेश को अपने हृदय में धारण करके माता पार्वती ने अत्यंत कोमल आयु में ही वन की ओर प्रस्थान किया। उन्होंने राजसी वस्त्रों और आभूषणों को उतारकर वल्कल वस्त्र धारण किए और हिमालय के दुर्गम शिखरों पर कठोर तप आरंभ किया।
माता पार्वती ने निरंतर 12 वर्षों तक ऐसी भीषण तपस्या की जिसकी कल्पना भी किसी देव अथवा मनुष्य के लिए असंभव थी। शीत ऋतु में बर्फ से ढके शिखरों पर कंठ तक ठंडे जल में खड़े रहकर और वर्षा ऋतु में मूसलाधार जल धाराओं के नीचे बैठकर उन्होंने केवल शिव पंचाक्षर मंत्र का अविरल जाप किया। उनके तपोबल से उत्पन्न प्रचंड ब्रह्म तेज ने तीनों लोकों को तपा दिया जिससे विवश होकर स्वयं देवाधिदेव महादेव प्रकट हुए और उन्होंने माता पार्वती को अपनी सनातन अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया।
योग शास्त्र और कुंडलिनी तंत्र के अनुसार मानव शरीर के भीतर 7 मुख्य ऊर्जा केंद्र होते हैं जिनमें सबसे प्रथम और आधारभूत केंद्र मूलाधार चक्र है। रीढ़ की हड्डी के सबसे निचले भाग में स्थित यह चार पंखुड़ियों वाला चक्र संपूर्ण स्थूल शरीर की नींव है। इसका मूल तत्व पृथ्वी तत्व है और इसका बीज मंत्र लं है।
नवरात्र के प्रथम दिन माता शैलपुत्री की आराधना सीधे तौर पर इसी मूलाधार चक्र के शोधन और जागरण से जुड़ी हुई है। जिस प्रकार एक विशाल भवन का स्थायित्व उसकी सुदृढ़ नींव पर निर्भर करता है उसी प्रकार किसी भी साधक की आध्यात्मिक यात्रा तब तक सफल नहीं हो सकती जब तक उसका मूलाधार चक्र जागृत न हो।
माता शैलपुत्री का वाहन वृषभ अर्थात बैल है जो दृढ़ता धैर्य और स्थिर पृथ्वी तत्व का साक्षात प्रतीक है। उनके दाहिने हाथ में स्थित त्रिशूल भूत वर्तमान और भविष्य तीनों कालों पर नियंत्रण का प्रतीक है जबकि बाएं हाथ में खिला हुआ कमल संसार के कीचड़ में रहते हुए भी पूर्ण अनासक्ति और पवित्रता का संदेश देता है। जब साधक प्रथम दिन माता शैलपुत्री का ध्यान अपने मूलाधार चक्र में करता है तो उसके भीतर से भय असुरक्षा और आलस्य की तामसिक जड़ता समाप्त हो जाती है और उसकी चेतना में नव जीवन का संचार होता है।
वैदिक ज्योतिष के महानतम ग्रंथ बृहत् पराशर होरा शास्त्र में मन का अधिष्ठाता ग्रह चंद्र देव को माना गया है। भचक्र में चंद्रमा की स्थिति व्यक्ति की मानसिक शांति भावनात्मक संतुलन और माता के साथ संबंधों को निर्धारित करती है। जब जन्म कुंडली में चंद्रमा निर्बल होता है अथवा पाप ग्रहों के प्रभाव से दूषित होता है तो व्यक्ति निरंतर चिंता भय अवसाद और अनिद्रा का शिकार रहता है।
ज्योतिषीय दृष्टिकोण से माता शैलपुत्री का संबंध सीधे तौर पर चंद्रमा के उच्च प्रभाव से है। चंद्रमा भचक्र की द्वितीय राशि वृषभ में परम उच्च का होता है और माता शैलपुत्री का वाहन भी साक्षात वृषभ ही है। इसका गहरा तात्विक अर्थ यह है कि जब मन रूपी चंचल चंद्रमा माता शैलपुत्री के चरणों में समर्पित होकर स्थिर पृथ्वी तत्व को प्राप्त कर लेता है तब वह समस्त प्रकार की मानसिक दुर्बलताओं से मुक्त हो जाता है।
जो जातक केमद्रुम योग अथवा चंद्र के ग्रहण दोष से पीड़ित होकर जीवन में अकेलेपन और असुरक्षा का अनुभव करते हैं उनके लिए नवरात्र की प्रतिपदा को माता शैलपुत्री की पूजा एक संजीवनी बूटी की भांति कार्य करती है। यह साधना मन को पर्वत की भांति अडिग और संकल्पवान बना देती है।
यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में चंद्रमा पीड़ित हो मानसिक भटकाव रहता हो अथवा आध्यात्मिक साधना में मन एकाग्र न हो पा रहा हो तो शास्त्रों में माता शैलपुत्री की प्रसन्नता हेतु अत्यंत प्रामाणिक उपाय बताए गए हैं।
| क्या अवश्य करें | किन गलतियों से सर्वथा दूर रहें |
|---|---|
| घटस्थापना सदैव शुभ मुहूर्त और ईशान कोण में ही संपन्न करें | घर के पूजा स्थल पर कभी भी अंधेरा अथवा अशुद्धता न रहने दें |
| माता शैलपुत्री को केवल शुद्ध गाय के घी से बने पदार्थों का भोग लगाएं | नवरात्र के पावन दिनों में चमड़े की वस्तुओं का प्रयोग सर्वथा वर्जित रखें |
| प्रतिपदा के दिन पूर्ण ब्रह्मचर्य और सात्विक आहार का कठोर पालन करें | तामसिक भोजन मदिरा प्याज और लहसुन का सेवन भूलकर भी न करें |
| अपने माता पिता और कन्याओं का सदैव आदर सत्कार करें | परिवार के सदस्यों के साथ क्रोध कटु वचन अथवा कलह से बचें |
| पूजा में श्वेत पुष्प लाल चुनरी और शुद्ध सुगंधित धूप का प्रयोग करें | बिना स्नान किए अथवा अशुद्ध अवस्था में कलश को स्पर्श न करें |
भगवती शैलपुत्री का पावन अवतार संपूर्ण मानव जाति को यह सनातन शिक्षा प्रदान करता है कि जीवन में किसी भी महान लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कठोर तपस्या और अटूट संकल्प अनिवार्य है। जिस प्रकार माता शैलपुत्री ने 12 वर्षों तक सूखे पत्तों का भी त्याग करके अपने आराध्य महादेव को प्राप्त किया उसी प्रकार एक साधारण मनुष्य भी अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति से कठिन से कठिन प्रारब्ध को बदल सकता है। मूलाधार चक्र की शुद्धि मनुष्य को सांसारिक भयों से मुक्त कर उसे एक दिव्य आधार प्रदान करती है। जब साधक का मन चंद्रमा की भांति निर्मल और पर्वतराज की भांति स्थिर हो जाता है तब उसके जीवन में नव सृजन की अनंत संभावनाएं खिल उठती हैं। माता शैलपुत्री का नित्य स्मरण मनुष्य के अंतःकरण से समस्त दुर्बलताओं को समाप्त करके उसे अखंड स्वास्थ्य आत्मिक शांति और अंततः मोक्ष का परम मार्ग प्रशस्त कराता है।
माता शैलपुत्री को यह नाम किस कारण से प्राप्त हुआ? पर्वतों के राजा शैलराज हिमालय के घर में पुत्री रूप में जन्म लेने के कारण भगवती को शैलपुत्री के नाम से जाना जाता है।
माता पार्वती को अपर्णा नाम क्यों दिया गया था? कठोर तपस्या के दौरान जब माता पार्वती ने वृक्षों से स्वतः गिरने वाले सूखे पत्तों जिन्हें पर्ण कहा जाता है खाना भी छोड़ दिया तब उन्हें अपर्णा कहा गया।
नवरात्र के प्रथम दिन माता शैलपुत्री को किस वस्तु का भोग लगाया जाता है? नवरात्र के प्रथम दिन माता शैलपुत्री को शुद्ध गाय के देशी घी का नैवेद्य अर्पित किया जाता है जो जातक को निरोगी काया और दीर्घायु प्रदान करता है।
योग साधना में माता शैलपुत्री का संबंध किस चक्र से है? योग साधना और कुंडलिनी तंत्र में माता शैलपुत्री का सीधा संबंध शरीर के प्रथम चक्र मूलाधार चक्र और स्थिर पृथ्वी तत्व से माना जाता है।
ज्योतिष में माता शैलपुत्री की पूजा से किस ग्रह का दोष शांत होता है? माता शैलपुत्री की आराधना से जन्म कुंडली में मन के कारक चंद्र देव के समस्त अशुभ प्रभाव शांत होते हैं और मानसिक स्थिरता प्राप्त होती है।
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