By पं. नरेंद्र शर्मा
सूर्य पुत्र शनि के प्राकट्य और दंडाधिकारी पद की पावन कथा

वैदिक ज्योतिष और धर्मशास्त्रों में शनि देव को कर्मों के अचूक निर्णायक और न्याय के अधिष्ठाता के रूप में पूजा जाता है। जब किसी जातक की जन्मपत्रिका में शनि की साढ़ेसाती, ढैया अथवा प्रतिकूल गोचर का प्रभाव पड़ता है तब अनिष्टकारी प्रभावों को शांत करने के लिए विशिष्ट वैदिक अनुष्ठान का विधान है। शनि देव की आराधना भय से नहीं अपितु श्रद्धा, अनुशासन और आत्मसंयम के भाव से की जानी चाहिए।
| अनुष्ठान अंग | वैदिक विधान और शास्त्रोक्त निर्देश |
|---|---|
| शुभ वार और काल | शनिवार का दिन अथवा शनि त्रयोदशी और शनिश्चरी अमावस्या |
| अधिष्ठाता देवता | दंडाधिकारी शनि देव और देवाधिदेव महादेव शिव |
| सिद्ध बीज मंत्र | ॐ शं शनैश्चराय नमः अथवा ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः |
| पूजन सामग्री | शुद्ध सरसों अथवा काले तिल का तेल, काले तिल, नीले पुष्प, शमी पत्र और उड़द |
| आध्यात्मिक फल | साढ़ेसाती के ताप का शमन, कर्म शुद्धि, मानसिक स्थिरता और न्याय की प्राप्ति |
शनिवार के दिन सूर्योदय से पूर्व अथवा सूर्यास्त के उपरांत प्रदोष काल में शनि देव की विशेष अर्चना की जाती है। इस साधना में छाया दान का अत्यंत विशेष महत्व माना गया है। एक लोहे अथवा कांसे के पात्र में शुद्ध सरसों का तेल भरकर उसमें अपनी छाया का दर्शन करें और फिर उस तैल का दान किसी सुपात्र अथवा शनि मंदिर में कर दें।
इस साधना का विधिपूर्वक पालन करने से व्यक्ति के चित्त का अहंकार नष्ट होता है। शनि देव केवल बाह्य आडंबर से प्रसन्न नहीं होते, वे मनुष्य के आचरण की शुद्धि और उसकी सत्यनिष्ठा को देखकर अपनी असीम अनुकंपा बरसाते हैं।
सृष्टि के आरंभिक काल में जब सूर्य देव के असहनीय ताप से व्याकुल होकर देवी संज्ञा तपस्या हेतु उत्तर कुरु चली गईं तब उन्होंने अपने ही शरीर से छाया रूपी नारी का सृजन किया। छाया ने अत्यंत निष्ठा और पतिव्रता धर्म के साथ सूर्य देव की सेवा की। कुछ काल पश्चात छाया गर्भवती हुईं। उस पावन काल में देवी छाया के मन में देवाधिदेव महादेव की घोर तपस्या करने का संकल्प जाग्रत हुआ।
माता छाया ने अपने गर्भस्थ शिशु के कल्याण हेतु ज्येष्ठ मास की प्रखर धूप में खड़े होकर शिवजी की कठोर आराधना आरंभ कर दी। वे दिन रात भगवान शिव के ध्यान में इस प्रकार लीन रहीं कि उन्हें अपने खान पान और देह का लेशमात्र भी भान नहीं रहा। चिलचिलाती धूप, प्रचंड वायु और असह्य सौर ऊर्जा को छाया ने बिना विचलित हुए सहन किया। गर्भस्थ शिशु ने माता के उदर में रहते हुए ही भगवान शिव के महामंत्रों का श्रवण किया और उस दिव्य तपस्या के समस्त ताप को अपने भीतर समाहित कर लिया।
उस कठोर तप और सूर्य के निरंतर प्रखर ताप के कारण बालक के शरीर का वर्ण अत्यंत श्याम अर्थात घोर काला हो गया। जब बालक का जन्म हुआ तो उनका शरीर कस्तूरी और कज्जल के समान जाज्वल्यमान काले रंग का था। बालक के मुख मंडल पर एक अत्यंत शांत, गंभीर और रहस्यमयी तेज विद्यमान था। छाया के गर्भ से अवतरित इस बालक को संपूर्ण संसार ने शनि के नाम से जाना।
जन्म के उपरांत जब भगवान सूर्य अपने नवजात पुत्र को देखने पहुंचे तब बालक शनि के घोर काले वर्ण को देखकर वे आश्चर्यचकित और संशय में पड़ गए। सूर्य देव अत्यंत रूपवान, जाज्वल्यमान और स्वर्ण आभा से दीप्तिमान थे। उन्होंने विचार किया कि ऐसा घोर कृष्ण वर्ण बालक उनका पुत्र कैसे हो सकता है। अज्ञानवश सूर्य देव ने छाया के सतीत्व और पवित्रता पर संदेह व्यक्त कर दिया।
अपनी निर्दोष माता का अपमान देखकर बालक शनि के भीतर एक भीषण धर्म क्रोध प्रज्वलित हो उठा। उन्होंने अपनी तीक्ष्ण और तेजस्वी दृष्टि अपने पिता सूर्य देव पर डाली। शनि की उस प्रथम वक्र दृष्टि के पड़ते ही संपूर्ण आकाश मंडल में हाहाकार मच गया। सूर्य देव का दिव्य स्वर्ण रथ उसी क्षण आकाश में स्तंभित होकर रुक गया। रथ को खींचने वाले सात वेगवान घोड़े तत्क्षण अपनी आंखों की ज्योति खोकर अंधे हो गए।
इतना ही नहीं सूर्य देव का स्वयं का प्रदीप्त शरीर झुलसने लगा और उनकी त्वचा पर काले धब्बे उभर आए। सूर्य का प्रचंड प्रकाश मंद पड़ गया और चारों ओर अंधकार छाने लगा। अपनी इस दयनीय स्थिति से व्याकुल होकर सूर्य देव ने भगवान शिव की शरण ली। तब महादेव ने सूर्य को सत्य से अवगत कराया और बताया कि बालक का काला रंग किसी अपवित्रता का नहीं बल्कि उसकी माता के अनन्य तप और शिव शक्ति का साक्षात प्रमाण है। सूर्य देव ने अपनी भूल स्वीकार की और अपने पुत्र शनि का वंदन किया।
शनि देव बाल्यावस्था से ही अत्यंत वैरागी और न्यायप्रिय स्वभाव के थे। वे अपने अस्तित्व को किसी के संशय पर आश्रित नहीं रखना चाहते थे। उन्होंने अपने पिता के लोक का त्याग कर मोक्ष नगरी काशी की ओर प्रस्थान किया। गंगा के तट पर पहुंचकर उन्होंने मिट्टी से एक शिवलिंग का निर्माण किया और भगवान विश्वनाथ को साक्षी मानकर महातपस्या में लीन हो गए।
शनि देव ने हजारों वर्षों तक केवल वायु का भक्षण करते हुए एक पैर पर खड़े होकर साधना की। शीत, ग्रीष्म और वर्षा का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। उनकी अटूट निष्ठा और तपस्या के प्रभाव से काशी का संपूर्ण वातावरण पावन हो गया। अंततः भगवान आशुतोष शिव उनके सम्मुख प्रकट हुए और उनसे वर मांगने को कहा।
शनि देव ने करबद्ध होकर प्रार्थना की कि वे किसी सांसारिक सुख अथवा भोग के आकांक्षी नहीं हैं। वे केवल एक ऐसा पद चाहते हैं जहां वे बिना किसी राग, द्वेष अथवा भय के सत्य और धर्म की रक्षा कर सकें। भगवान शिव उनकी इस निष्काम और न्यायोचित भावना से अत्यंत प्रसन्न हुए।
इस प्रकार भगवान शिव की कृपा से शनि देव समस्त चराचर जगत के कर्मफल दाता के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
वैदिक ज्योतिष में शनि ग्रह को मंद गति से चलने वाला अर्थात शनैः शनैः भ्रमण करने वाला ग्रह माना गया है। वे एक राशि में लगभग ढाई वर्ष तक वास करते हैं। कालपुरुष के अंग विभाजन में मकर राशि कर्म का प्रतीक है और कुंभ राशि लाभ और जन चेतना का प्रतीक है। शनि देव मनुष्य के संचित कर्मों का लेखा जोखा रखते हैं और उचित समय आने पर उसका फल प्रदान करते हैं।
| ज्योतिषीय तत्व | शनि देव का प्रभाव और स्वरूप |
|---|---|
| स्वामित्व राशियां | मकर (पृथ्वी तत्व) और कुंभ (वायु तत्व) |
| उच्च एवं नीच राशि | तुला राशि में 20 अंश पर उच्च और मेष राशि में नीच |
| नक्षत्र आधिपत्य | पुष्य, अनुराधा और उत्तराभाद्रपद |
| नैसर्गिक कारकत्व | आयु, कर्म, वैराग्य, दुख, न्याय, तप और सेवा |
| दृष्टि प्रभाव | अपने स्थान से तीसरे, सातवें और दसवें भाव पर पूर्ण दृष्टि |
| मूलत्रिकोण राशि | कुंभ राशि में 0 से 20 अंश तक |
जन्म कुंडली में चंद्रमा जिस राशि में स्थित होता है उससे बारहवें भाव में जब शनि का गोचर होता है तब साढ़ेसाती का प्रथम चरण आरंभ होता है। जब शनि चंद्रमा के ऊपर से गोचर करते हैं तब द्वितीय चरण और जब चंद्रमा से दूसरे भाव में जाते हैं तब तृतीय चरण कहलाता है। यह संपूर्ण कालखंड साढ़े सात वर्ष का होता है जिसे जनमानस में साढ़ेसाती कहा जाता है। इसी प्रकार चंद्रमा से चौथे और आठवें भाव में शनि का गोचर ढाई वर्ष की ढैया कहलाता है।
शनि देव की दृष्टि को अत्यंत तीव्र माना गया है क्योंकि उनकी दृष्टि सत्य का उद्घाटन करती है। शनि का उद्देश्य किसी को पीड़ा देना नहीं है। जिस प्रकार एक कुशल चिकित्सक रोगी के शरीर से दूषित रक्त को बाहर निकालता है उसी प्रकार शनि देव कष्टों की भट्टी में तपाकर मनुष्य की आत्मा को निर्मल बनाते हैं।
शनि देव का जीवन वृत्त हमें यह गंभीर शिक्षा देता है कि व्यक्ति का जन्म अथवा उसका बाह्य रूप उसके महान होने का प्रमाण नहीं है। उसके कर्म और उसकी साधना ही उसे संसार में पूज्य बनाती है। माता छाया के त्याग और शिव के आशीर्वाद से उत्पन्न यह अवतार वास्तव में सृष्टि के संतुलन का मूलाधार है।
जब मनुष्य अपने जीवन में अनुशासन, कर्तव्यपरायणता और निर्बलों के प्रति करुणा का भाव अपनाता है तब उसे शनि के किसी दंड का भय नहीं रहता। शनि देव उस पारसमणि के समान हैं जो लोहे जैसे सामान्य कर्मों को भी सोने जैसी शुद्ध चेतना में बदल देते हैं। उनका स्मरण प्रत्येक प्राणी को यह चेतावनी देता है कि कर्म का पहिया कभी रुकता नहीं है। जो बोया गया है वही काटना पड़ेगा। इसलिए सत्य के मार्ग पर अडिग रहकर कर्म करते रहना ही शनि देव की सच्ची और सर्वोत्तम पूजा है।
शनि देव के माता पिता कौन हैं? शनि देव के पिता भगवान सूर्य नारायण हैं और उनकी माता देवी छाया हैं जो संज्ञा की प्रतिरूप थीं।
शनि देव का रंग काला क्यों हुआ? माता छाया द्वारा गर्भकाल में भगवान शिव की घोर तपस्या और सूर्य के प्रचंड ताप को सहन करने के कारण शनि देव का रंग काला हुआ।
भगवान शिव ने शनि देव को क्या वरदान दिया? भगवान शिव ने शनि देव की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें नवग्रहों में सर्वोच्च न्यायाधीश अर्थात दंडाधिकारी का पद प्रदान किया।
शनि की साढ़ेसाती का वास्तविक उद्देश्य क्या है? साढ़ेसाती का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य के अहंकार को नष्ट करना, उसे आत्मसंयम सिखाना और उसके संचित कर्मों का शोधन करना है।
शनि देव को प्रसन्न करने का श्रेष्ठ उपाय क्या है? शनिवार को छाया दान करना, पीपल के वृक्ष के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाना और असहाय लोगों की सेवा करना सबसे श्रेष्ठ उपाय है।
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