शरभ अवतार और अंगारक योग क्या है?

By पं. संजीव शर्मा

नृसिंह भगवान के क्रोध का शमन आठ पैरों वाले शरभेश्वर का प्राकट्य और मंगल राहु दोष का संपूर्ण रहस्य

शरभ अवतार कथा और अंगारक योग का रहस्य

शरभेश्वर पूजन मुहूर्त और शास्त्रीय अनुष्ठान विधान

सनातन वैदिक परंपरा में देवाधिदेव भगवान शिव के परम संहारक और शरणागत रक्षक स्वरूप के रूप में पूजित भगवान शरभेश्वर का प्राकट्य ब्रह्मांडीय अग्नि के शमन उग्र ऊर्जा के नियमन और अमोघ आध्यात्मिक संतुलन का सर्वोच्च शिखर है। वैदिक ज्योतिष के अंतर्गत उग्र अग्नि तत्व के अधिपति मंगल देव और भ्रामक छाया ग्रह राहु के परस्पर संयोग से निर्मित होने वाले विध्वंसक अंगारक योग के दुष्प्रभावों को शांत करने के लिए भगवान शरभ की उपासना को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जब जातक की जन्म कुंडली में षष्ठ भाव के शत्रु अष्टम भाव के प्राण संकट अथवा किसी तामसिक मारण तंत्र के कारण जीवन पर निरंतर मृत्यु का साया मंडराने लगे तब शरभेश्वर नारायण और शिवावतार का ध्यान चेतना को एक अभेद्य सुरक्षा कवच प्रदान करता है। इस पावन अनुष्ठान की तिथि समय और शास्त्रीय घटकों का संपूर्ण विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।

शास्त्रीय आयामअनुष्ठान विवरण और ज्योतिषीय मान्यता
प्रमुख पावन तिथिप्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी चतुर्दशी अथवा मंगलवार
दैनिक पूजन समयसायंकालीन प्रदोष वेला अथवा अर्धरात्रि का निशीथ काल
अधिष्ठाता स्वरूपआठ पैरों वाले सिंह पक्षी और मनुष्य के संयुक्त रूप धारी शरभेश्वर
ज्योतिषीय ग्रह संबंधउग्र अग्नि कारक मंगल देव और मायावी छाया ग्रह राहु
मुख्य पूजन सामग्रीलाल चंदन कनेर पुष्प शुद्ध भस्म तिल का तेल और धतूरा
प्रधान वैदिक अनुष्ठानशरभेश्वर कवच पाठ शरभ अष्टकम और ॐ खें खं खः फट् जप
अपेक्षित फलअंगारक योग शांति मारण तंत्र से रक्षा और शत्रु स्तम्भन

नृसिंह का प्रलयंकारी क्रोध और ब्रह्मांडीय संकट

श्रीमद्भागवत महापुराण और लिंग महापुराण के पावन आख्यानों के अनुसार जब असुरराज हिरण्यकश्यप ने अपने अत्याचारों से संपूर्ण पृथ्वी और स्वर्ग लोक को त्रस्त कर दिया था तब भगवान श्री हरि विष्णु ने अपने परम भक्त प्रह्लाद की रक्षा हेतु संध्या वेला में खंभे को चीरकर नृसिंह अवतार धारण किया था। आधा मनुष्य और आधा सिंह का वह विग्रह इतना भयानक था कि उसकी एक ही गर्जना से दिशाएं कांप उठी थीं। भगवान नृसिंह ने अपनी गोद में अधर्मी असुर को रखकर अपने तीक्ष्ण नखों से उसका वक्षस्थल विदीर्ण कर दिया और उसका संहार संपन्न किया।

दैत्य के वध के उपरांत भी भगवान नृसिंह का संहारक क्रोध शांत नहीं हुआ। हिरण्यकश्यप के तामसिक और विषैले रक्त के स्पर्श से भगवान नृसिंह का उग्र भाव निरंतर बढ़ता चला गया। उनकी लाल दहकती हुई आंखों से प्रलयंकारी ज्वालाएं निकलने लगीं और उनकी श्वासों के प्रचंड वेग से पर्वत उखड़ने लगे। संपूर्ण ब्रह्मांड में भयानक ताप फैल गया जिससे नदियां और महासागर सूखने लगे तथा तीनों लोकों के प्राणी व्याकुल होकर हाहाकार करने लगे।

समस्त देवता देवराज इंद्र और स्वयं ब्रह्मा जी भगवान नृसिंह के सम्मुख हाथ जोड़कर उपस्थित हुए किंतु किसी में भी उनके समीप जाने का साहस नहीं था। देवताओं ने माता लक्ष्मी और बाल भक्त प्रह्लाद को भगवान के क्रोध को शांत करने हेतु भेजा। प्रह्लाद ने हाथ जोड़कर अत्यंत विनम्रता से स्तुति की किंतु भगवान नृसिंह का रोष इतना प्रगाढ़ हो चुका था कि वे अपनी ही ज्वाला में जल रहे थे। जब सृष्टि का अस्तित्व ही संकट में पड़ गया तब समस्त देवता कैलाश पर्वत पहुंचे और उन्होंने देवाधिदेव भगवान शिव की शरण लेकर प्रार्थना की कि वे इस ब्रह्मांड को भस्म होने से बचाएं।

आठ पैरों वाले अलौकिक शरभ का प्राकट्य

देवताओं की करुण पुकार सुनकर भगवान शिव ने विचार किया कि जब उग्रता अपनी चरम सीमा पार कर जाती है तब केवल उससे भी अधिक शक्तिशाली और विराट स्वरूप ही उस ऊर्जा को नियंत्रित कर सकता है। जिस प्रकार लोहे को काटने के लिए कठोर फौलाद की आवश्यकता होती है उसी प्रकार भगवान नृसिंह के उस दिव्य क्रोध को शांत करने हेतु भगवान शिव ने साक्षात शरभ अवतार धारण किया।

कैलाश की पावन शिलाओं से अचानक एक ऐसा दिव्य और अलौकिक जीव प्रकट हुआ जिसकी कल्पना भी किसी देव अथवा दानव ने नहीं की थी। शरभेश्वर का यह स्वरूप गरुड़ पक्षी महाबली सिंह और मनुष्य का एक विस्मयकारी संगम था। उनके शरीर का तेज प्रलयकाल के सहस्र सूर्यों के समान प्रज्वलित हो रहा था। उनकी पीठ पर दो विशाल पंख फहरा रहे थे जो आकाश के दोनों छोरों को ढक रहे थे। उन पंखों में साक्षात भगवती महाप्रत्यंगिरा और शूलिनी दुर्गा की शक्तियां विद्यमान थीं। उनकी चंचु अर्थात चोंच गरुड़ के समान वज्र से भी कठोर थी और उनके शरीर में आठ विशाल पैर थे जिसमें चार पैर पृथ्वी पर स्थित थे और चार पैर आकाश की ओर उठे हुए थे।

शरभेश्वर की भयानक गर्जना से आकाश मंडल गूंज उठा। वे तीव्र वेग से उड़ते हुए सीधे उस स्थान पर पहुंचे जहां भगवान नृसिंह अपनी संहारक गर्जना कर रहे थे। दोनों दिव्य शक्तियों का जब आमना सामना हुआ तब संपूर्ण प्रकृति स्तब्ध रह गई। भगवान नृसिंह ने उस विचित्र और विशाल पक्षी को देखकर अपनी संपूर्ण शक्ति से आक्रमण किया किंतु शरभेश्वर ने तनिक भी विचलित हुए बिना अपने असीम पंखों को फैलाकर भगवान नृसिंह को अपने आलिंगन में लपेट लिया।

नृसिंह का क्रोध शमन और शरभेश्वर की विजय

भगवान शरभेश्वर और नृसिंह के मध्य हुआ यह संघर्ष वस्तुतः कोई विनाशकारी युद्ध नहीं था अपितु यह एक दिव्य शक्ति द्वारा दूसरी दिव्य शक्ति के क्रोध को शीतल करने की आध्यात्मिक प्रक्रिया थी। भगवान नृसिंह ने अपने नखों और दांतों से शरभेश्वर के शरीर पर प्रहार किए किंतु शरभेश्वर ने अपने आठ पैरों के तीक्ष्ण पंजों से नृसिंह के अंगों को अत्यंत दृढ़ता से जकड़ लिया।

  • शरभेश्वर ने अपने दोनों विशाल पंखों से भगवान नृसिंह के संपूर्ण शरीर को ढक लिया और उन पर शीतल वायु की दिव्य धारा प्रवाहित की।
  • शरभेश्वर के पंखों में समाहित माता प्रत्यंगिरा की शांत ऊर्जा ने नृसिंह के भीतर प्रज्वलित हो रही तामसिक अग्नि का शोषण आरंभ किया।
  • शरभेश्वर ने अपनी चोंच के अग्रभाग से नृसिंह के मस्तक का कोमलता से स्पर्श किया जिससे नृसिंह का समस्त मोह और उन्माद विगलित हो गया।
  • धीरे धीरे भगवान नृसिंह का श्वास शांत हुआ उनकी आंखें शीतल हुईं और उनका संहारक भाव लुप्त होकर परम वैकुंठ चेतना में रूपांतरित हो गया।
  • जब भगवान नृसिंह का क्रोध पूर्णतः शांत हो गया तब उन्होंने अपनी आंखें खोलीं और अपने सम्मुख खड़े भगवान शिव के शरभ रूप को पहचान लिया।

भगवान नृसिंह ने हाथ जोड़कर शरभेश्वर की स्तुति की और कहा कि हे महादेव आपने आज मुझे मेरे ही क्रोध की सीमा से मुक्त कर ब्रह्मांड की रक्षा की है। कृतज्ञता व्यक्त करते हुए भगवान नृसिंह ने अपने सिंह शरीर का उत्सर्ग किया और भगवान शिव ने उनके चर्म को अपने आसन और वस्त्र के रूप में स्वीकार किया। इसके पश्चात भगवान विष्णु अपने शांत चतुर्भुज नारायण रूप में और भगवान शिव अपने सौम्य स्वरूप में स्थित हो गए जिससे तीनों लोकों में पुनः शांति और धर्म की स्थापना हो गई।

महर्षि पराशर अनुसार मंगल राहु और अंगारक योग

वैदिक ज्योतिष के महानतम ग्रंथ बृहत् पराशर होरा शास्त्र में ग्रहों की संहारक युतियों और उनके शांति उपायों का विस्तृत वर्णन मिलता है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से भगवान नृसिंह और शरभेश्वर का यह प्रसंग सीधे तौर पर मंगल देव और छाया ग्रह राहु के मध्य बनने वाले विनाशकारी संबंध का प्रतिनिधित्व करता है।

मंगल ग्रह ज्योतिष में शुद्ध अग्नि रक्त शारीरिक साहस पराक्रम और अस्त्र शस्त्र का अधिष्ठाता है। भगवान नृसिंह का वह रूप मंगल की इसी चरम अग्नि का प्रतीक है। दूसरी ओर छाया ग्रह राहु विषैले प्रभाव उन्माद भ्रम और उग्रता को अनियंत्रित करने वाला ग्रह माना जाता है। हिरण्यकश्यप का वह असुर रक्त वस्तुतः राहु के उस विष का प्रतीक था जिसने मंगल रूपी नृसिंह के विवेक को आच्छादित कर दिया था। जब किसी जातक की जन्म कुंडली में मंगल और राहु एक साथ किसी भाव में युति बनाते हैं अथवा एक दूसरे को पूर्ण दृष्टि से देखते हैं तब कुंडली में अत्यंत अनिष्टकारी अंगारक योग का निर्माण होता है।

अंगारक योग के प्रभाव से मनुष्य का स्वभाव अत्यंत हिंसक क्रोधी और विवेकहीन हो जाता है। वह छोटी सी बात पर आपा खो बैठता है और अपने ही हाथों अपने परिवार और करियर का विनाश कर लेता है। यह योग जातक के जीवन में रक्त से जुड़े असाध्य रोग अग्नि से जलने के भयानक हादसे पुलिस केस और प्राणघातक दुर्घटनाएं उत्पन्न करता है। भगवान शरभेश्वर साक्षात उस उच्च चेतना के प्रतीक हैं जो मंगल और राहु के इस विनाशकारी अंगारक योग को अपने नियंत्रण में लाकर उसे एक सात्विक और रक्षात्मक ऊर्जा में बदल देते हैं।

क्या मारण तंत्र और शत्रु बाधा से शरभ कवच बचाता है?

आज के युग में ईर्ष्या द्वेष और प्रतिस्पर्धा के कारण अनेक व्यक्ति अपने गुप्त शत्रुओं द्वारा किए गए षड्यंत्रों और नकारात्मक तंत्र प्रयोगों का शिकार हो जाते हैं। जब जन्म कुंडली का षष्ठ भाव जो रोग ऋण और शत्रुओं का है तथा अष्टम भाव जो आकस्मिक मृत्यु और गुप्त तंत्र बाधाओं का है मंगल और राहु के क्रूर प्रभाव में आ जाता है तब व्यक्ति का जीवन अत्यंत कष्टकारी हो जाता है। ऐसे जातक पर किसी तांत्रिक द्वारा किया गया मारण उच्चाटन अथवा मूठ का प्रयोग अत्यंत घातक सिद्ध होता है।

भगवान शरभेश्वर साक्षात समस्त तंत्रों के अधिपति हैं क्योंकि उनके दोनों पंखों में माता प्रत्यंगिरा और शूलिनी दुर्गा जैसी परम संहारक देवियां निवास करती हैं। जब कोई साधक संकट के समय पवित्र शरभ कवच अथवा शरभ अष्टकम का पाठ करता है तो उसके चारों ओर एक ऐसी दिव्य ऊर्जा का घेरा बन जाता है जिसे कोई भी नकारात्मक शक्ति भेद नहीं सकती। यह साधना शत्रुओं द्वारा किए गए तंत्र प्रयोग को उसी क्षण उलटकर उसी के ऊपर वापस भेज देती है। शरभ साधना से शत्रुओं का तत्काल स्तम्भन हो जाता है और जातक को अकाल मृत्यु के मुख से भी नया जीवन प्राप्त होता है।

अंगारक दोष शांति और शरभेश्वर कृपा के वैदिक उपाय

यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में मंगल राहु का अंगारक योग बन रहा हो जीवन में निरंतर दुर्घटनाएं हो रही हों अथवा किसी घातक शत्रु का भय बना रहता हो तो शास्त्रों में इसके निवारण हेतु अत्यंत प्रामाणिक उपाय बताए गए हैं।

  • प्रत्येक मंगलवार अथवा प्रदोष के दिन सायंकाल के समय लाल आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें और भगवान शरभेश्वर का ध्यान करते हुए ॐ खें खं खः फट् शरभेश्वराय नमः अथवा ॐ ह्रीं शरभेश्वराय सर्व शत्रु संहारणाय नमः मंत्र का 108 बार शांत मन से जाप करें।
  • नियमित रूप से सायंकाल के समय पावन शरभेश्वर कवच का पाठ करें जो समस्त प्रकार के तांत्रिक प्रयोगों और दुर्घटनाओं से देह की रक्षा करता है।
  • प्रत्येक मंगलवार को किसी प्राचीन शिव मंदिर में जाकर शिवलिंग पर शुद्ध जल और भस्म अर्पित करें तथा उनके सम्मुख तिल के तेल का दीपक प्रज्वलित करें।
  • अंगारक दोष की शांति के लिए प्रत्येक मंगलवार को निर्धन व्यक्तियों अथवा अनाथ बालकों को मीठी पूड़ी अथवा हलवा खिलाएं और गाय को गुड़ और पके हुए केले अर्पित करें।
  • जातक को अपनी शारीरिक अवस्था और योग्य ज्योतिर्विद के परामर्श के अनुसार ग्यारह मुखी अथवा चौदह मुखी नेपाली रुद्राक्ष तांबे अथवा चांदी के तार में पिरोकर गले में धारण करना चाहिए।
  • घर में नियमित रूप से शाम के समय नीम के सूखे पत्ते गुग्गल और लोबान का धुआं दें जिससे घर के भीतर व्याप्त समस्त नकारात्मक और प्रेत बाधाएं स्वतः शांत हो जाती हैं।

शरभेश्वर अनुष्ठान और मर्यादा के आवश्यक नियम

क्या अवश्य करेंकिन गलतियों से सर्वथा दूर रहें
प्रतिदिन प्रातः काल और सायंकाल भगवान शिव और शरभेश्वर का ध्यान करेंकेवल किसी निर्दोष का अहित करने हेतु इस उग्र मंत्र का कभी प्रयोग न करें
अपने मन के भीतर उठने वाले क्रोध और उत्तेजना पर आत्म नियंत्रण रखेंअपने ज्ञान बल पद अथवा सामर्थ्य का तनिक भी अहंकार न करें
मंगलवार के दिन पूर्णतः सात्विक और बिना नमक का भोजन ग्रहण करेंमांस मदिरा और किसी भी प्रकार के नशीले पदार्थों का सेवन सर्वथा वर्जित रखें
संकट के समय सदैव धैर्य रखें और ईश्वर की न्याय व्यवस्था पर भरोसा करेंसड़क पर वाहन चलाते समय अत्यधिक गति और क्रोध से सर्वथा दूर रहें
पूजा में लाल चंदन कनेर पुष्प और शुद्ध तिल के तेल का दीपक जलाएंबिना सोचे समझे किसी पर कटाक्ष करने अथवा झूठा आरोप लगाने से बचें

संहारक तेज से ब्रह्मांडीय संतुलन और अभय

भगवान शिव का शरभ अवतार संपूर्ण मानव जाति को यह सनातन शिक्षा प्रदान करता है कि क्रोध चाहे कितना भी न्यायोचित क्यों न हो यदि वह एक सीमा के पश्चात शांत न हो तो वह विनाश का कारण बन जाता है। शक्ति का वास्तविक सौंदर्य उसके विवेकपूर्ण नियंत्रण में है न कि उसके अंधाधुंध प्रदर्शन में। भगवान शरभेश्वर ने नृसिंह को मारकर नहीं अपितु अपने प्रेम पंखों में समेटकर और उनकी उग्रता को सोखकर शांत किया जो यह सिद्ध करता है कि बड़े से बड़े क्रोध को भी उच्च आत्मिक शक्ति द्वारा ही जीता जा सकता है। जब मनुष्य अपने भीतर के अंगारक रूपी क्रोध को शरभेश्वर के चरणों में समर्पित कर देता है तब उसका जीवन समस्त भयों से मुक्त हो जाता है। भगवान शरभेश्वर का नित्य स्मरण मनुष्य के भीतर सोई हुई अमोघ रक्षा शक्ति को जाग्रत करता है उसे शत्रुओं के समस्त षड्यंत्रों से बचाता है और उसे इस संसार में एक निडर तेजस्वी और सम्मानित व्यक्तित्व बनाकर अंततः परम शांति की प्राप्ति कराता है।

FAQ

भगवान शिव ने शरभ अवतार किस मुख्य कारण से धारण किया था? भगवान शिव ने हिरण्यकश्यप के वध के पश्चात भगवान नृसिंह के न शांत होने वाले प्रलयंकारी क्रोध को शांत करने और ब्रह्मांड को भस्म होने से बचाने हेतु शरभ अवतार धारण किया था।

शरभेश्वर भगवान के स्वरूप की मुख्य विशेषताएं क्या हैं? शरभेश्वर भगवान आठ पैरों वाले एक अलौकिक जीव हैं जिनका आधा शरीर पक्षी का और आधा शरीर सिंह का है तथा जिनके पंखों में माता प्रत्यंगिरा और शूलिनी दुर्गा निवास करती हैं।

ज्योतिष में शरभ अवतार का संबंध किस प्रमुख ग्रह दोष से है? ज्योतिष में शरभेश्वर अवतार का सीधा संबंध मंगल और राहु के संयोग से बनने वाले अत्यंत विध्वंसक अंगारक योग और षष्ठ अष्टम भाव के दोषों से है।

मारण तंत्र और शत्रु षड्यंत्र से बचने के लिए किस पाठ का विधान है? शत्रु षड्यंत्रों और मारण तंत्र के दुष्प्रभावों को नष्ट करने के लिए नियमित रूप से शरभेश्वर कवच और शरभ अष्टकम का पाठ करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

भगवान शरभेश्वर का प्रिय मंत्र कौन सा है जिसका जाप करना चाहिए? भगवान शरभेश्वर का अत्यंत शक्तिशाली बीज मंत्र ॐ खें खं खः फट् शरभेश्वराय नमः है जिसका नियमित 108 बार जाप करने से समस्त भय और संकट शांत होते हैं।

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लेखक

पं. संजीव शर्मा

पं. संजीव शर्मा (63)


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