माँ शीतला अवतार और बसौड़ा रहस्य क्या?

By पं. अमिताभ शर्मा

ज्वरासुर संहार गर्दभ वाहिनी स्वरूप बसौड़ा पर्व और मंगल केतु के ज्योतिषीय प्रभाव का संपूर्ण रहस्य

माँ शीतला अवतार कथा और बसौड़ा रहस्य

शीतला अष्टमी पूजन मुहूर्त और शास्त्रीय विधान

सनातन वैदिक परंपरा और पुराण दर्शन में आद्याशक्ति भगवती महामाया के परम कल्याणकारी शीतल और आरोग्य प्रदाता स्वरूप के रूप में पूजित माता शीतला का प्राकट्य शारीरिक ताप के शमन चेचक व संक्रामक व्याधियों के विनाश और प्रकृति के जल अग्नि संतुलन का सर्वोच्च शिखर है। वैदिक ज्योतिष तथा आयुर्वेद तत्व विज्ञान के अंतर्गत सौरमंडल के सेनापति मंगल देव की अत्यधिक रक्त पित्त अग्नि और छाया ग्रह केतु देव द्वारा उत्पन्न समस्त संक्रामक जीवाणुओं त्वचा विकारों व विषाक्त फोड़े फुंसियों को शांत करने के लिए भगवती शीतला की उपासना को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जब जातक की जन्म कुंडली में मंगल और केतु का संबंध षष्ठ भाव अथवा अष्टम भाव से होकर रक्त विकार भयंकर ज्वर चेचक अथवा त्वचा में असहनीय जलन उत्पन्न कर रहा हो तब गर्दभ वाहिनी माँ शीतला की शरण में जाने से अमोघ आरोग्यता और शारीरिक शीतलता की प्राप्ति होती है। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि जिसे बसौड़ा अथवा शीतला अष्टमी कहा जाता है उस पावन पर्व का संपूर्ण विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।

शास्त्रीय आयाम अनुष्ठान विवरण और ज्योतिषीय मान्यता
प्रमुख पावन तिथि चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी शीतला अष्टमी अथवा बसौड़ा पर्व
दैनिक पूजन समय प्रातः कालीन सूर्योदय वेला अथवा ब्रह्म मुहूर्त
अधिष्ठाता स्वरूप गर्दभ पर आरूढ़ हाथ में झाड़ू सूप नीम पत्र और शीतल जल कलश धारिणी देवी
ज्योतिषीय ग्रह व तत्व संबंध षष्ठ भाव पित्त कारक मंगल देव संक्रामक कारक केतु देव और जल अग्नि संतुलन
मुख्य पूजन सामग्री एक दिन पूर्व बना बासी भोजन दही राबड़ी नीम की पत्तियां शीतल जल और रोली
प्रधान वैदिक अनुष्ठान शीतलाष्टक स्तोत्र पाठ स्कंद पुराणोक्त ध्यान और ॐ ह्रीं श्रीं शीतलायै नमः जप
अपेक्षित फल चेचक व संक्रामक रोगों से मुक्ति पित्त शांति दीर्घायु और ज्वर निवारण

ज्वरासुर का संहार और संसार में संक्रामक ज्वर का प्रकोप

स्कंद पुराण के अत्यंत पावन प्रभास खंड और काशी खंड में वर्णित इतिहास के अनुसार प्राचीन काल में ज्वरासुर नामक एक अत्यंत भयानक और क्रूर दैत्य उत्पन्न हुआ था। वह दैत्य वास्तव में भगवान शिव के ललाट से प्रस्फुटित पसीने की संहारक अग्नि से प्रकट हुआ था किंतु उसने अपनी आसुरी वृत्तियों के वशीभूत होकर संपूर्ण संसार में हाहाकार मचाना आरंभ कर दिया। ज्वरासुर के शरीर से निरंतर भयंकर तपन और विषैली ज्वालाएं निकलती थीं। उसने संपूर्ण चराचर जगत में एक ऐसा प्रलयंकारी संक्रामक ज्वर फैला दिया जिसकी कोई औषधि उपलब्ध नहीं थी।

उस ज्वर के प्रभाव से मनुष्यों और पशुओं का रक्त उबलने लगता था उनकी त्वचा पर लाल रंग के भयानक दाने और फफोले निकल आते थे जिन्हें चेचक अथवा शीतला रोग कहा गया। उस संताप के कारण प्राणियों के कंठ सूखने लगे उनकी आंखें बाहर आने लगीं और वे भीषण प्यास तथा जलन से तड़प तड़प कर प्राण त्यागने लगे। संपूर्ण पृथ्वी पर केवल रोगियों का चीत्कार सुनाई देने लगा।

वैद्य और चिकित्सक उस भयानक महामारी के सम्मुख पूर्णतः असहाय हो गए क्योंकि वह रोग केवल शारीरिक नहीं था अपितु वह प्रकृति के अग्नि तत्व के विकराल रूप का आक्रमण था। जब देवलोक और भूलोक के समस्त प्राणी जलकर भस्म होने के कगार पर पहुंच गए तब देवताओं और ऋषियों ने देवाधिदेव महादेव और आद्याशक्ति जगदंबा की करुण पुकार की।

जीवों के उस असहनीय दाह को देखकर माता पार्वती के हृदय में वात्सल्य और करुणा जाग्रत हुई। जगत के ताप को हरने और संतानों के शरीर को शीतल करने हेतु भगवती ने स्वयं एक अत्यंत पावन और अलौकिक विग्रह धारण किया जिसे सनातन परंपरा में माँ शीतला कहा गया। देवी ने स्वयं को एक ऐसी ग्रामीण और सहज माता के रूप में प्रस्तुत किया जो बाह्य आडंबरों से परे होकर केवल प्रेम स्वच्छता और प्राकृतिक औषधियों से रोगों का निवारण करती हैं।

गर्दभ वाहिनी का प्राकट्य और दिव्य आयुध

भगवती शीतला का स्वरूप अन्य उग्र देवियों की भांति सिंह अथवा व्याघ्र पर आरूढ़ नहीं है अपितु वे एक शांत गर्दभ अर्थात गधे की सवारी करती हैं। उनके हाथों में किसी भयानक अस्त्र शस्त्र के स्थान पर दैनिक जीवन की शुद्धि और चिकित्सा से जुड़े चार अत्यंत पावन उपकरण सुशोभित हैं।

माता शीतला का यह स्वरूप अत्यंत गूढ़ वैज्ञानिक और आध्यात्मिक संदेश प्रदान करता है।

  • गर्दभ की सवारी यह संदेश देती है कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य सहनशीलता और शीतलता बनाए रखना ही संक्रामक रोगों से विजय पाने का मूल मंत्र है।
  • देवी के दाहिने हाथ में स्थित झाड़ू स्वच्छता और शुद्धि का साक्षात प्रतीक है जो घर और शरीर से समस्त जीवाणुओं विषाणुओं और धूल कणों को बाहर निकाल फेंकने की प्रेरणा देती है।
  • देवी के बाएं हाथ में स्थित सूप अनाज को फटकने वाला उपकरण है जो यह सिखाता है कि जिस प्रकार सूप सार तत्व को रखकर कचरे को अलग कर देता है उसी प्रकार हमें शुद्ध आहार ग्रहण कर अशुद्धियों का त्याग करना चाहिए।
  • देवी के मस्तक अथवा हाथ में सुशोभित नीम की पत्तियां सनातन आयुर्वेद की सर्वोच्च जीवाणु नाशक औषधि हैं जो संक्रामक चेचक के विषाणुओं को नष्ट करने की अमोघ शक्ति रखती हैं।
  • देवी के गले अथवा करकमल में स्थित शीतल जल का कलश अमृत और जीवन का प्रतीक है जिसकी बूंदों का छिड़काव शरीर के समस्त दाह और आंतरिक ज्वर को क्षणभर में शांत कर देता है।

माता शीतला ने प्रकट होते ही अपने उस शीतल कलश से अमृतमयी जल का छिड़काव संपूर्ण पृथ्वी पर किया और नीम की टहनियों से रोगियों का स्पर्श किया। उनके इस स्पर्श मात्र से ज्वरासुर का समस्त संक्रामक वेग स्तंभित हो गया। माता ने अपनी झाड़ू से समस्त कीटाणुओं को बुहारकर भस्म कर दिया और ज्वरासुर के अहंकार को चूर चूर कर उसे शांत कर दिया। संसार के समस्त रोगी एक ही क्षण में निरोगी हो गए और उनके शरीरों में शीतल अमृत का संचार हो गया।

बसौड़ा पर्व और बासी भोजन का वैज्ञानिक रहस्य

सनातन संस्कृति में चैत्र कृष्ण अष्टमी को बसौड़ा पर्व के रूप में अत्यंत श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। इस पावन दिन घर के चूल्हे में अग्नि प्रज्वलित नहीं की जाती और न ही कोई ताजा या गर्म भोजन पकाया जाता है। इस दिन परिवार के समस्त सदस्य एक दिन पूर्व अर्थात सप्तमी की सायंकाल को बना हुआ बासी और ठंडा भोजन ही प्रसाद रूप में ग्रहण करते हैं।

यह परंपरा कोई अंधविश्वास नहीं है अपितु इसके पीछे ऋतु परिवर्तन का अत्यंत गहन वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक रहस्य छिपा हुआ है। चैत्र मास का यह समय शीत ऋतु की विदाई और ग्रीष्म ऋतु के आगमन का संधिकाल होता है। इस संधिकाल में मौसम का तापमान अचानक बढ़ने लगता है जिससे वातावरण में संक्रामक जीवाणु और फंगस तेजी से पनपने लगते हैं।

  • अचानक बढ़ती गर्मी के कारण मानव शरीर का पित्त दोष कुपित होने लगता है और जठराग्नि शिथिल पड़ जाती है।
  • बसौड़ा के दिन अग्नि न जलाकर घर को शीतल रखा जाता है ताकि शरीर और वातावरण में अग्नि तत्व का अत्यधिक प्रकोप न हो।
  • बासी और ठंडा भोजन जिसे विशेष रूप से बाजरे की रोटी दही राबड़ी और चावल के रूप में तैयार किया जाता है वह आंतों के लिए अत्यंत गुणकारी प्रोबायोटिक का कार्य करता है।
  • ठंडा भोजन ग्रहण करने से आमाशय और यकृत की जलन शांत होती है जिससे शरीर आने वाली भीषण ग्रीष्म ऋतु के ताप को सहने के लिए तैयार हो जाता है।
  • इस दिन नीम की पत्तियों का सेवन और उनसे स्नान करने का विधान है जिससे त्वचा की रोग प्रतिरोधक क्षमता कई गुना बढ़ जाती है।

मंगल की पित्त अग्नि और केतु के त्वचा रोगों का ज्योतिषीय मर्म

वैदिक ज्योतिष के महान आधार ग्रंथ बृहत् पराशर होरा शास्त्र में ग्रहों के शारीरिक और त्रिदोष संबंधी प्रभावों का विस्तृत विश्लेषण मिलता है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से माँ शीतला का सीधा संबंध मंगल ग्रह की क्रूर अग्नि और केतु ग्रह के संक्रामक त्वचा विकारों से है।

मंगल ग्रह भचक्र में अग्नि तत्व पित्त रस रक्त मांसपेशियों और तेज का स्वामी है। जब कुंडली में मंगल अत्यधिक बलवान होकर दूषित होता है अथवा नीच का होता है तो शरीर में पित्त की मात्रा अनियंत्रित हो जाती है जिससे उच्च रक्तचाप रक्त विकार और तेज दाह वाला ज्वर उत्पन्न होता है। वहीं दूसरी ओर छाया ग्रह केतु को समस्त प्रकार के संक्रामक रोगों अदृश्य जीवाणुओं फोड़े फुंसियों चेचक और त्वचा के भयानक दानों का कारक माना जाता है।

  • जन्म कुंडली का षष्ठ भाव रोग ऋण और व्याधियों का स्थान होता है जहां से संक्रामक रोगों का विचार किया जाता है।
  • जब षष्ठ भाव में मंगल और केतु की युति होती है तो जातक को रक्त में विषैल संक्रमण अथवा संक्रामक चेचक जैसी व्याधियां घेर लेती हैं।
  • माँ शीतला का जल कलश मंगल की क्रोधाग्नि को बुझाने वाला अमृत है और उनकी नीम की पत्तियां केतु के समस्त संक्रामक विष को नष्ट करने वाली औषधि हैं।
  • जब कोई साधक शीतला देवी की आराधना करता है तो कुंडली का जल तत्व बलवान होकर अग्नि तत्व को संतुलित कर देता है जिससे शरीर में त्रिदोष का संतुलन स्थापित हो जाता है।

क्या संक्रामक रोग और पित्त विकार साधना से शांत होते हैं?

आधुनिक युग में जब नई नई संक्रामक महामारियां और त्वचा के असाध्य रोग मानव जाति को भयभीत करते हैं तब माँ शीतला की साधना एक सुरक्षा कवच की भांति कार्य करती है। कई बार चिकित्सा के उपरांत भी शरीर की जलन शांत नहीं होती अथवा दवाइयों के दुष्प्रभाव से शरीर में अत्यधिक गर्मी उत्पन्न हो जाती है।

माँ शीतला साक्षात उस प्राकृतिक संतुलन की देवी हैं जो शरीर के भीतर अग्नि और जल के संतुलन को पुनर्स्थापित करती हैं। जिस प्रकार माता ने अपने नीम और शीतल जल के स्पर्श से समस्त संसार को ज्वर मुक्त किया था उसी प्रकार जो व्यक्ति निष्कपट भाव से शीतलाष्टक स्तोत्र का पाठ करता है उसके रक्त का शोधन स्वतः हो जाता है। यह साधना उन लोगों के लिए साक्षात संजीवनी है जो लंबे समय से अज्ञात ज्वर त्वचा की एलर्जी सोरायसिस अथवा नेत्रों की जलन से पीड़ित हैं।

मंगल केतु दोष शांति और आरोग्यता के अचूक उपाय

यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में मंगल और केतु के कारण रक्त विकार रहते हों पित्त की अधिकता से शरीर में जलन होती हो अथवा संक्रामक रोगों का भय निरंतर बना रहता हो तो शास्त्रों में माँ शीतला की प्रसन्नता हेतु अत्यंत प्रामाणिक वैदिक उपाय बताए गए हैं।

  • चैत्र मास की शीतला अष्टमी अथवा प्रत्येक मंगलवार को प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व उठकर ठंडे जल में नीम की पत्तियां डालकर स्नान करें।
  • पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें और माँ शीतला के चित्र अथवा विग्रह के सम्मुख शीतल जल अर्पित करें तथा पावन मंत्र ॐ ह्रीं श्रीं शीतलायै नमः अथवा वन्देऽहं शीतलां देवीं रासभस्थां दिगम्बराम् का 108 बार शांत मन से जाप करें।
  • अपने भीतर के समस्त शारीरिक और मानसिक ताप को शांत करने हेतु प्रतिदिन प्रातः काल महर्षि वेदव्यास विरचित पावन शीतलाष्टक स्तोत्र का पाठ करें जो स्कंद पुराण में वर्णित है।
  • शीतला अष्टमी के दिन घर में चूल्हा न जलाएं और माँ शीतला को दही राबड़ी बाजरे की ठंडी रोटी और भीगे हुए चने का भोग लगाकर उसी ठंडे भोजन को पूरे परिवार सहित प्रसाद रूप में ग्रहण करें।
  • जातक को अपनी शारीरिक अवस्था और योग्य ज्योतिर्विद के परामर्श के अनुसार तीन मुखी अथवा नौ मुखी नेपाली रुद्राक्ष चांदी के तार में पिरोकर धारण करना चाहिए जो मंगल और केतु के दोषों को शांत करता है।
  • प्रत्येक मंगलवार को गाय को गुड़ और भीगी हुई हरी मूंग की दाल खिलाएं तथा निर्धन रोगियों को शीतल जल का मटका ताजे फल और दवाइयों का आदरपूर्वक दान करें।

शीतला अष्टमी व्रत के आवश्यक शास्त्रीय नियम

क्या अवश्य करें किन गलतियों से सर्वथा दूर रहें
शीतला अष्टमी के दिन केवल एक दिन पूर्व बना ठंडा बासी भोजन ही ग्रहण करें इस पावन दिन घर में चूल्हा अथवा गैस जलाकर गर्म भोजन पकाने की भूल न करें
पूजा में नीम की ताजी पत्तियां शीतल जल और दही का प्रमुखता से प्रयोग करें चेचक अथवा संक्रामक रोग से पीड़ित व्यक्ति का कभी तिरस्कार न करें
अष्टमी के दिन घर और पूजा स्थल की झाड़ू से अच्छी तरह सफाई करें तामसिक भोजन मदिरा और किसी भी प्रकार के गर्म मसालों से सर्वथा दूर रहें
अपने शरीर को शीतल रखने हेतु सूती और स्वच्छ श्वेत वस्त्र धारण करें घर के भीतर गंदगी सीलन अथवा दुर्गंध जमा न होने दें
पूजन के पश्चात शीतल जल का छिड़काव पूरे घर और परिवार के सदस्यों पर करें बिना स्नान किए अथवा अशुद्ध अवस्था में पूजा के बर्तनों को न छुएं

पावन शीतलता से आरोग्य और जीवन रक्षा

भगवती शीतला का पावन अवतार संपूर्ण मानव जाति को यह सनातन शिक्षा प्रदान करता है कि स्वास्थ्य की रक्षा केवल महंगी औषधियों से नहीं अपितु स्वच्छता संयम और प्राकृतिक जीवन शैली से होती है। देवी के हाथों में स्थित झाड़ू और सूप हमें बाह्य परिवेश और आंतरिक विचारों की निरंतर शुद्धि का संदेश देते हैं। नीम की पत्तियां यह सिद्ध करती हैं कि प्रकृति ने हमें रोगों से लड़ने के लिए अमोघ साधन दिए हैं। जब मनुष्य अपने भीतर की क्रोधाग्नि और वासनाओं के ताप को शांत करके शीतलता को अपनाता है तब उसके जीवन से समस्त व्याधियां स्वतः पलायन कर जाती हैं। मंगल का पराक्रम जब केतु के विष से मुक्त होकर सात्विक बनता है तब साधक को दीर्घायु और निरोगी काया प्राप्त होती है। माँ शीतला का नित्य स्मरण मनुष्य के जीवन से समस्त संक्रामक रोगों ज्वर के ताप और ग्रह दोषों को समाप्त करके उसे एक स्वस्थ तेजस्वी और शांत व्यक्तित्व बनाकर अंततः परम शांति की प्राप्ति कराता है।

FAQ

माँ शीतला का प्राकट्य किस मुख्य संकट के निवारण हेतु हुआ था? ज्वरासुर नामक दैत्य द्वारा संपूर्ण संसार में फैलाए गए भीषण संक्रामक ज्वर चेचक और असाध्य शारीरिक दाह को शांत करने हेतु माँ शीतला का प्राकट्य हुआ था।

माँ शीतला के हाथों में झाड़ू सूप नीम और कलश होने का क्या अर्थ है? झाड़ू स्वच्छता का सूप सार तत्व ग्रहण करने का नीम की पत्तियां कीटाणु नाशक औषधि का और शीतल जल कलश शारीरिक ताप शांत करने का प्रतीक है।

बसौड़ा पर्व पर बासी भोजन करने का क्या वैज्ञानिक कारण है? ऋतु परिवर्तन के समय बढ़ती गर्मी में जठराग्नि को विश्राम देने शरीर के पित्त को शांत करने और आंतों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने हेतु ठंडा भोजन किया जाता है।

ज्योतिष में माँ शीतला का संबंध किन प्रमुख ग्रहों से माना जाता है? वैदिक ज्योतिष में माँ शीतला का सीधा संबंध अत्यधिक पित्त व रक्त के कारक मंगल ग्रह और संक्रामक त्वचा रोगों के कारक छाया ग्रह केतु से है।

चेचक और संक्रामक रोगों से मुक्ति हेतु किस स्तोत्र का पाठ सर्वश्रेष्ठ है? संक्रामक रोगों और शारीरिक तपन से मुक्ति पाने हेतु स्कंद पुराण में वर्णित महर्षि वेदव्यास रचित शीतलाष्टक स्तोत्र का पाठ करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

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लेखक

पं. अमिताभ शर्मा

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