क्या है अनंत शेषनाग अवतार का रहस्य?

By पं. सुव्रत शर्मा

पृथ्वी धारक शेषनाग की तपस्या विष्णु शय्या और लक्ष्मण रूप

शेषनाग अवतार कथा पृथ्वी धारण और कुण्डलिनी रहस्य

अनंत साधना और पृथ्वी स्थिरता अनुष्ठान विधान

सनातन धर्म की पावन धारा में भगवान शेषनाग को अनंत धैर्य, निश्चल निष्ठा और ब्रह्मांडीय संतुलन का साक्षात विग्रह माना गया है। जब किसी जातक के जीवन में मानसिक भटकाव, निर्णयों में अस्थिरता, भूमि भवन संबंधी विवाद अथवा कालसर्प दोष जैसी प्रतिकूलताएं उपस्थित होती हैं तब अनंत देव की आराधना अमोघ फल प्रदान करती है। यह साधना मनुष्य के भीतर छिपी तामसिक वृत्तियों का दमन कर प्राण वायु को स्थिर करती है और चित्त में अटूट शांति की स्थापना करती है। इस अनुष्ठान को संपन्न करने हेतु शास्त्रों में विशिष्ट तिथियां, शुद्ध पूजन सामग्री और पवित्र आचरण के नियम विस्तार से बताए गए हैं।

साधना अंग वैदिक विधान और अनुष्ठान निर्देश
शुभ काल और तिथि भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी अथवा श्रावण शुक्ल पंचमी और प्रत्येक मास की शुक्ल चतुर्दशी
अधिष्ठाता देवता भगवान अनंत शेषनाग और क्षीरसागर शयन भगवान श्रीहरि विष्णु
सिद्ध बीज मंत्र ॐ अनंताय नमः अथवा ॐ शेषाय नमः
पूजन सामग्री कच्चा गोदुग्ध, दूर्वा, हरिद्रा, अक्षत, तुलसी पत्र, श्वेत चंदन और तांबे या रजत का सर्प विग्रह
आध्यात्मिक फल चित्त की स्थिरता, कालसर्प पीड़ा का शमन, कुण्डलिनी जागरण और भूमि लाभ

इस अनुष्ठान को प्रारंभ करने के लिए प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि नित्यकर्म से निवृत्त होकर श्वेत अथवा पीत वस्त्र धारण करने चाहिए। पूजा वेदी पर स्वच्छ पाटा स्थापित कर उस पर श्वेत रेशमी वस्त्र बिछाएं और तांबे अथवा चांदी के बने शेषनाग विग्रह को स्थापित करें। एक स्वच्छ ताम्र पात्र में शुद्ध जल और गंगाजल भरकर उसमें थोड़ा कच्चा दूध, अक्षत और श्वेत चंदन मिलाएं।

  • तांबे के पात्र में रखे पंचामृत और कच्चे दूध से शेषनाग विग्रह का श्रद्धापूर्वक अभिषेक करें
  • अभिषेक के पश्चात विग्रह को स्वच्छ जल से धोकर उस पर हरिद्रा, रोली, अक्षत और ताजी दूर्वा की 21 गांठें अर्पित करें
  • भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी के साथ शेषनाग के 12 पावन नामों का शांत चित्त से उच्चारण करें
  • पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें और तुलसी अथवा रुद्राक्ष की माला से सिद्ध अनंत मंत्र का 108 बार जप करें
  • अनुष्ठान के दिन भूमि पर शयन करें, नमक का त्याग करें और किसी पवित्र जलाशय अथवा पीपल की जड़ में थोड़ा दूध अर्पित करें

इस साधना का विधिपूर्वक पालन करने से साधक के जीवन से घबराहट और अनिश्चितता का भय समाप्त हो जाता है। गृह क्लेश शांत होते हैं और परिवार में स्थायित्व का संचार होता है। यह उपासना मनुष्य को यह सिखाती है कि चाहे परिस्थितियां कितनी भी डांवाडोल क्यों न हों, आत्मा को सदैव अपने धर्म और मर्यादा पर अविचल रहना चाहिए।

कश्यप कद्रू का वंश और गंधमादन पर घोर तप

सृष्टि के आरंभिक काल में महर्षि कश्यप की दो प्रमुख पत्नियां थीं जिनके नाम कद्रू और विनता थे। कद्रू ने सहस्र सर्पों को जन्म दिया जिनमें ज्येष्ठ और सबसे तेजस्वी पुत्र शेषनाग थे। शेषनाग के अन्य अनुज भ्राताओं में वासुकी, तक्षक, कर्कोटक और पिंगल जैसे महाबली सर्प सम्मिलित थे। समय बीतने के साथ शेषनाग के सभी सर्प भ्राता अत्यंत कुटिल, विषैले, अभिमानी और अधर्मी आचरण में लिप्त होने लगे। उन्होंने अपनी विमाता विनता और उनके पुत्र गरुड़ के साथ भीषण छल किया और उन्हें छलपूर्वक अपना दास बना लिया।

शेषनाग स्वभाव से परम सात्विक, धर्मनिष्ठ और ईश्वर के अनन्य भक्त थे। अपने सगे भाइयों की यह दुष्टता, दंभ और छल देखकर उनका मन संसार से विरक्त हो गया। उन्हें अपने कुल के पाप कर्मों से अत्यंत ग्लानि हुई। उन्होंने विचार किया कि इस कुटिल संगति में रहकर अपनी आत्मा को पतित करने से कहीं उत्तम है कि वे समस्त सांसारिक संबंधों का परित्याग कर दें।

वे अपने भाइयों और माता को छोड़कर पवित्र तीर्थों की यात्रा पर निकल पड़े। वे गंधमादन पर्वत, बदरिकाश्रम, गोकर्ण और पुष्कर जैसे अत्यंत दुर्गम और शांत तपोवनों में पहुंचे। वहां पहुंचकर उन्होंने अत्यंत कठोर तपस्या आरंभ की। वे केवल वायु का भक्षण करते थे और उन्होंने अपने संपूर्ण इंद्रिय समूह को वश में कर लिया था। ग्रीष्म काल में पंचाग्नि तपते, वर्षा काल में जलधाराओं के बीच रहते और शीत काल में हिमखंडों पर बैठकर वे निरंतर परमपिता ब्रह्मा का ध्यान करते रहे। सहस्रों वर्षों तक चली इस निष्काम साधना से संपूर्ण ब्रह्मांड में उनकी तपस्या का आलोक फैल गया।

सहस्र फणों पर पृथ्वी धारण का दिव्य भार क्या है?

शेषनाग की कठोर तपस्या और अगाध वैराग्य से संतुष्ट होकर स्वयं जगतपिता ब्रह्मा उनके सम्मुख प्रकट हुए। ब्रह्मा जी ने कहा कि हे नागराज, तुम्हारी इस निष्काम साधना से समस्त देवगण प्रसन्न हैं। तुम अपनी इच्छानुसार कोई भी दुर्लभ वरदान मांग लो।

शेषनाग ने हाथ जोड़कर अत्यंत विनम्रता से उत्तर दिया कि हे प्रभु, मुझे किसी सांसारिक सुख, ऐश्वर्य अथवा अमरत्व की कामना नहीं है। मेरी केवल यही प्रार्थना है कि मेरा चित्त निरंतर धर्म, सत्य, तप और परोपकार में लगा रहे। मेरे मन में कभी किसी प्राणी के प्रति ईर्ष्या, द्वेष अथवा कुटिलता का संचार न हो और मैं सर्वदा ईश्वर की सेवा में समर्पित रहूं।

उनकी इस निस्वार्थ भावना को देखकर ब्रह्मा जी अत्यंत गदगद हो गए। ब्रह्मा जी ने कहा कि तुम्हारी धर्मनिष्ठा अद्वितीय है। इस समय यह समस्त पृथ्वी अपने पर्वतों, वनों और अथाह समुद्रों के कारण अत्यंत अस्थिर होकर डगमगा रही है। इसके धरातल पर संतुलन नहीं है जिसके कारण समस्त प्राणी निरंतर भयभीत रहते हैं।

  • ब्रह्मा जी ने शेषनाग को आदेश दिया कि वे पाताल लोक में प्रवेश करें और इस चंचल पृथ्वी को अपने सिर पर धारण करें
  • शेषनाग ने ब्रह्मा जी की आज्ञा को शिरोधार्य किया और पाताल के सबसे निचले तल में जाकर स्थित हो गए
  • उन्होंने अपने 1000 फणों के मुकुट पर इस विशाल भूमंडल को एक सूक्ष्म राई के दाने की भांति अत्यंत सहजता से संभाल लिया
  • जब कभी शेषनाग अपनी थकावट मिटाने के लिए तनिक सा भी करवट बदलते हैं तभी भूतल पर भूकंप की तरंगें उत्पन्न होती हैं
  • ब्रह्मा जी ने उन्हें अमरता का वरदान दिया और कहा कि महाप्रलय के समय भी तुम्हारा कभी नाश नहीं होगा

इस प्रकार शेषनाग संपूर्ण संसार के आधार स्तंभ बने। उन्होंने दिखाया कि सच्चा बड़प्पन शक्ति का प्रदर्शन करने में नहीं अपितु सृष्टि के भार को शांतिपूर्वक वहन करने में निहित है।

क्षीरसागर में विष्णु शय्या और अनन्य सखा भाव

पाताल में पृथ्वी को धारण करने के उपरांत भगवान श्रीहरि विष्णु ने शेषनाग की अनन्य निष्ठा और पवित्रता से प्रसन्न होकर उन्हें अपना सनातन सखा स्वीकार किया। भगवान विष्णु जब क्षीरसागर के अनंत जल विस्तार में योगनिद्रा में लीन होते हैं तब शेषनाग ही उनकी दिव्य शय्या का रूप धारण करते हैं। वे अपनी देह की कोमल कुंडलियों को भगवान के बैठने और शयन करने हेतु एक परम सुखद आसन बना देते हैं।

इतना ही नहीं, शेषनाग अपने सहस्र फणों को फैलाकर भगवान विष्णु के मस्तक पर एक विशाल छत्र के रूप में तान देते हैं ताकि प्रभु के ध्यान में कोई विघ्न न आए। जब महाप्रलय उपस्थित होता है और संपूर्ण नाम रूप जलमग्न होकर नष्ट हो जाते हैं तब भी जो शेष रह जाता है वही शेष कहलाता है। उनका एक नाम अनंत है जिसका न कोई आदि है और न कोई अंत।

क्षीरसागर में भगवान विष्णु और शेषनाग का यह संबंध स्वामी और सेवक के द्वैत से परे अद्वैत प्रेम का अद्वितीय प्रतीक है। वे केवल शय्या ही नहीं बनते अपितु भगवान के प्रत्येक कार्य में उनके सहायक बनते हैं। जब जब भगवान विष्णु धर्म की रक्षा हेतु मृत्यु लोक में अवतरित होते हैं तब तब शेषनाग भी उनके साथ किसी न किसी रूप में अवतार ग्रहण करते हैं।

त्रेतायुग में लक्ष्मण अवतार और उर्मिला का महात्याग

त्रेतायुग में जब भगवान श्रीहरि विष्णु ने मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के रूप में अयोध्या के सूर्यवंश में जन्म लिया तब उनके सनातन सखा शेषनाग उनके छोटे भाई लक्ष्मण के रूप में अवतरित हुए। लक्ष्मण का संपूर्ण जीवन त्याग, सेवा और अगाध भ्रातृ प्रेम की पराकाष्ठा है। जब श्रीराम को 14 वर्षों का वनवास मिला तब लक्ष्मण ने राजमहल के समस्त सुखों, वैभव और अपनी नवविवाहिता पत्नी को त्यागकर प्रभु के पीछे वन की ओर प्रस्थान किया।

वनवास के 14 वर्षों के दौरान लक्ष्मण ने एक ऐसा अखंड व्रत निभाया जिसकी तुलना संपूर्ण ब्रह्मांड में नहीं मिलती। उन्होंने निद्रा देवी से यह प्रार्थना की कि वे 14 वर्षों तक उन्हें स्पर्श न करें ताकि वे दिन रात जागकर अपने अग्रज श्रीराम और माता सीता की सुरक्षा में पहरा दे सकें। निद्रा देवी ने उनकी यह शर्त स्वीकार की किंतु कहा कि उनके हिस्से की नींद किसी अन्य को लेनी होगी।

तब लक्ष्मण की परम तपस्विनी पत्नी देवी उर्मिला ने अपने पति के इस धर्म संकल्प को पूर्ण करने के लिए वह संपूर्ण भार अपने ऊपर ले लिया। उर्मिला ने अयोध्या के राजमहल में 14 वर्षों तक निरंतर शयन कर उस त्याग को साधा जो लक्ष्मण के जागने का आधार बना। लक्ष्मण ने निद्रा को जीत लिया था इसलिए उन्हें गुडाकेश कहा गया।

  • लक्ष्मण जी ने वनवास काल में एक क्षण के लिए भी अपनी आंखें बंद नहीं कीं और धनुष बाण लिए निरंतर पहरा दिया
  • उन्होंने रावण के अजेय पुत्र मेघनाद का वध किया जिसे यह वरदान प्राप्त था कि उसका अंत केवल वही कर सकता है जिसने 14 वर्षों तक अन्न जल और निद्रा का नियमपूर्वक संयम किया हो
  • लक्ष्मण जी का क्रोध वास्तव में धर्म की रक्षा के लिए प्रकट होने वाला सात्विक तेज था जो अधर्मियों को भस्म कर देता था
  • वे श्रीराम के केवल अनुज नहीं थे अपितु उनकी बाह्य चेतना और सुरक्षा का अभेद्य कवच थे
  • जब माता सीता का हरण हुआ तब लक्ष्मण जी ने पर्वत की भांति अडिग रहकर अपने बड़े भाई को संभाला और लंका विजय का मार्ग प्रशस्त किया

लक्ष्मण का यह चरित्र हमें सिखाता है कि निस्वार्थ सेवा वही है जिसमें व्यक्ति अपना अस्तित्व पूरी तरह अपने आराध्य के चरणों में विलीन कर दे।

ज्योतिष में कुण्डलिनी शक्ति और शेषनाग का गहरा संबंध

वैदिक ज्योतिष और तंत्र विज्ञान के गहन रहस्यों में शेषनाग का संबंध मानव शरीर के भीतर सुप्त पड़ी दिव्य महाशक्ति कुण्डलिनी से जोड़ा गया है। जिस प्रकार शेषनाग पाताल के अंधकार में स्थित होकर पूरी पृथ्वी का भार वहन करते हैं उसी प्रकार मानव शरीर के सबसे निचले चक्र अर्थात मूलाधार चक्र में कुण्डलिनी शक्ति साढ़े तीन फेरे लगाकर सर्प रूप में सोई रहती है।

तत्व ज्योतिषीय एवं यौगिक प्रभाव
प्रधान ग्रह संबंध केतु जो मोक्ष और वैराग्य का स्वामी है तथा राहु जो सूक्ष्म ऊर्जा का प्रतीक है
नक्षत्र आधिपत्य आश्लेषा नक्षत्र जिसके अधिष्ठाता सर्प हैं और उत्तराभाद्रपद जिसके देवता अहिर्बुध्न्य हैं
शरीर में केंद्र मूलाधार चक्र से सहस्रार चक्र तक रीढ़ की हड्डी के मध्य स्थित सुषुम्ना नाड़ी
आध्यात्मिक शक्ति सहस्र दल कमल जो शेषनाग के 1000 फणों का साक्षात आध्यात्मिक स्वरूप है
कुंडली भाव संबंध अष्टम भाव जो गुप्त ऊर्जा का है और द्वादश भाव जो मोक्ष तथा शयन सुख का है

जब कोई साधक यम, नियम, प्राणायाम और ध्यान के माध्यम से अपने मन को स्थिर करता है तब यह सुप्त सर्पिणी शक्ति जाग्रत होकर सुषुम्ना मार्ग से ऊपर उठने लगती है। मूलाधार से उठकर जब यह शक्ति मस्तक के शीर्ष पर स्थित सहस्रार चक्र में पहुंचती है तब साधक को परमानंद और आत्मसाक्षात्कार की प्राप्ति होती है। सहस्रार चक्र में एक हजार पंखुड़ियां होती हैं जो शेषनाग के सहस्र फणों का ही सूक्ष्म प्रतीक हैं।

  • कुंडली में राहु और केतु के अक्ष को सर्प का मुख और पूंछ माना जाता है जो पूर्व जन्मों के संचित कर्मों को दर्शाते हैं
  • यदि जन्म पत्रिका में कालसर्प योग उपस्थित हो तो जातक के जीवन में प्रारंभिक संघर्ष अधिक रहता है किंतु शेषनाग की कृपा से वह महान ऊंचाइयों को छूता है
  • आश्लेषा नक्षत्र में जन्मे जातक अत्यंत तीव्र बुद्धि, सम्मोहन क्षमता और गूढ़ रहस्यों को जानने वाले होते हैं
  • शेषनाग की उपासना करने से रीढ़ की हड्डी, स्नायु तंत्र और वात रोगों से सहज मुक्ति मिलती है
  • जो व्यक्ति अपने जीवन में मानसिक तनाव से पीड़ित हैं उन्हें नियमित रूप से अनंत नारायण का ध्यान करना चाहिए

ज्योतिष शास्त्र यह स्पष्ट करता है कि सर्प ऊर्जा वस्तुतः भय का कारण नहीं है बल्कि वह रूपांतरण की वह प्रचंड ज्वाला है जो यदि सही दिशा में मुड़ जाए तो मनुष्य को देवत्व के पद पर प्रतिष्ठित कर देती है।

अखंड चेतना और शाश्वत स्थिरता का संदेश

भगवान शेषनाग का पावन अवतार हमें जीवन का सबसे गूढ़ दर्शन सिखाता है कि सेवा में कोई शर्त नहीं होनी चाहिए। वे सृष्टि के समस्त भार को अपने सिर पर उठाए हुए हैं किंतु उनके मुख पर लेशमात्र भी अहंकार अथवा पीड़ा का भाव नहीं है। वे भगवान विष्णु के नीचे शय्या बनकर बिछे हैं और ऊपर छत्र बनकर तने हैं।

उनका यह स्वरूप हमें बताता है कि संसार में जो जितना झुकता है और जो दूसरों के सुख के लिए स्वयं कष्ट सहता है वही वास्तव में पूज्य होता है। जब चारों ओर प्रलय का महाविनाश फैल रहा होता है तब भी शेषनाग अविचल रहते हैं। उनका स्मरण प्रत्येक मनुष्य को यह प्रेरणा देता है कि जीवन की भीषणतम आपदाओं, असफलताओं और आघातों के बीच भी हमें अपनी आत्मिक शांति और धैर्य को कभी डगमगाने नहीं देना चाहिए। जो आत्मा अपने भीतर स्थित ईश्वर को पहचान लेती है वह शेषनाग की भांति अनंत और अमर हो जाती है।

FAQ

शेषनाग के माता पिता कौन हैं? शेषनाग महर्षि कश्यप के ज्येष्ठ पुत्र हैं और उनकी माता कद्रू थीं जिन्होंने सर्प कुल को जन्म दिया था।

शेषनाग को पृथ्वी धारण करने का कार्य किसने सौंपा था? शेषनाग की कठोर तपस्या और धर्मनिष्ठा से प्रसन्न होकर स्वयं जगतपिता ब्रह्मा ने उन्हें पाताल में जाकर पृथ्वी को संभालने का आदेश दिया था।

त्रेतायुग में शेषनाग ने किस रूप में अवतार लिया था? त्रेतायुग में शेषनाग ने भगवान श्रीराम के छोटे भाई लक्ष्मण के रूप में अवतार लिया था जिन्होंने 14 वर्षों तक बिना सोए अखंड सेवा की।

शेषनाग का संबंध मानव शरीर के किस यौगिक चक्र से है? शेषनाग का संबंध मूलाधार चक्र में स्थित कुण्डलिनी शक्ति और मस्तक के सहस्रार चक्र से है जो सहस्र फणों का प्रतीक है।

अनंत देव की पूजा से किस ज्योतिषीय दोष का शमन होता है? अनंत देव की पूजा से कुंडली में उपस्थित कालसर्प दोष, राहु केतु की पीड़ा और मानसिक अस्थिरता का पूर्ण शमन होता है।

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लेखक

पं. सुव्रत शर्मा

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