By पं. संजीव शर्मा
स्वर्ण हल से प्राकट्य अचल पातिव्रत्य पृथ्वी तत्व और दांपत्य निष्ठा का संपूर्ण वैदिक रहस्य

सनातन वैदिक परंपरा और रामायण महाकाव्य के पावन दर्शन में आद्याशक्ति भगवती महालक्ष्मी के परम पावन त्यागमयी और अचल पातिव्रत्य स्वरूप के रूप में पूजित माता सीता का प्राकट्य संपूर्ण ब्रह्मांड में सहनशीलता पृथ्वी तत्व के संतुलन और नारी गरिमा का सर्वोच्च शिखर है। वैदिक ज्योतिष तथा तत्व विज्ञान के अंतर्गत भचक्र की समस्त पृथ्वी तत्व राशियों वृषभ कन्या और मकर के शोधन मन के स्वामी चंद्र देव की अगाध मानसिक सहनशीलता को जाग्रत करने तथा जन्म कुंडली के सप्तम भाव वैवाहिक सुख व दांपत्य निष्ठा और चतुर्थ भाव गृह सुख व भूमि संपदा के समस्त अमंगल दोषों को शांत करने के लिए माता जानकी की उपासना को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जब जातक की जन्म कुंडली में पाप ग्रहों के प्रभाव से दांपत्य जीवन में निरंतर अलगाव कलह संदेह अथवा अकारण वियोग की परिस्थितियां निर्मित हो रही हों तब पृथ्वी सुता माँ सीता की शरण में जाने से दांपत्य जीवन में अटूट प्रेम और मानसिक स्थिरता की प्राप्ति होती है। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि सीता नवमी अथवा जानकी जयंती और इस पावन साधना की तिथि समय तथा शास्त्रीय घटकों का संपूर्ण विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।
| शास्त्रीय आयाम | अनुष्ठान विवरण और ज्योतिषीय मान्यता |
|---|---|
| प्रमुख पावन तिथि | वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी सीता नवमी जानकी जयंती अथवा प्रत्येक मास की शुक्ल नवमी |
| दैनिक पूजन समय | मध्याह्न काल अथवा प्रातः कालीन ब्रह्म मुहूर्त |
| अधिष्ठाता स्वरूप | श्रीराम के वामांग में स्थित कमल नयनी सौम्य पद्मासना भूमि सुता माँ जानकी |
| ज्योतिषीय ग्रह व भाव संबंध | सप्तम भाव चतुर्थ भाव मन कारक चंद्र देव पृथ्वी तत्व और रोहिणी व हस्त नक्षत्र |
| मुख्य पूजन सामग्री | शुद्ध पीली चुनरी कमल पुष्प सुहाग सामग्री गाय का कच्चा दूध अक्षत और चावल की खीर |
| प्रधान वैदिक अनुष्ठान | जानकी स्तोत्र पाठ श्री जानकी चालीसा और ॐ श्रीं सीतायै नमः अथवा राम सीता युगल मंत्र जप |
| अपेक्षित फल | दांपत्य कलह व वियोग शांति अचल पातिव्रत्य पृथ्वी तत्व संतुलन और अखंड सौभाग्य |
वाल्मीकि रामायण और पद्म पुराण के अत्यंत पावन इतिहास के अनुसार त्रेतायुग के कालखंड में विदेह राज जनक के पावन राज्य मिथिला में एक बार भयानक प्राकृतिक आपदा उपस्थित हो गई। संपूर्ण राज्य में लगातार कई वर्षों तक वर्षा की एक बूंद भी नहीं गिरी जिससे चारों ओर भयंकर अकाल और सूखा पड़ गया। नदियां और सरोवर सूखकर पाषाण बन गए भूमि में गहरी दरारें पड़ गईं और राज्य की प्रजा अन्न तथा जल की एक एक बूंद के लिए तड़पने लगी।
अपनी प्रजा के इस दारुण संताप को देखकर परम ज्ञानी और विदेह राजा जनक का हृदय अत्यंत द्रवित हो उठा। उन्होंने राज्य के समस्त मूर्धन्य ऋषियों और कुल पुरोहितों को एकत्र कर इस अकाल से मुक्ति का शास्त्रीय उपाय पूछा। समस्त ऋषियों ने वेदों और शास्त्रों का मंथन करके राजा जनक को परामर्श दिया कि यदि स्वयं प्रजापालक राजा अपने हाथों से खेत में हल चलाकर पृथ्वी की अर्चना करे तो मेघ देव इंद्र अवश्य प्रसन्न होंगे और भूमि की उर्वरा शक्ति लौट आएगी।
ऋषियों के परामर्श को शिरोधार्य करके राजा जनक ने एक अत्यंत दुर्लभ और शुद्ध स्वर्ण हल का निर्माण कराया। राजा जनक ने साधारण किसान के वस्त्र धारण किए और वे संपूर्ण प्रजा के साथ मिथिला की यज्ञ भूमि पर हल जोतने पहुंचे। राजा जनक जब गहरी निष्ठा और मंत्रोच्चार के साथ उस सूखी कठोर भूमि पर हल चला रहे थे तब अचानक उनके हल का अगला नुकीला भाग जिसे संस्कृत में सीता कहा जाता है वह भूमि के भीतर किसी ठोस वस्तु से टकराकर ठिठक गया।
जब सैनिकों ने उस स्थान की मिट्टी को अत्यंत सावधानी से हटाया तो वहां पृथ्वी के गर्भ से एक अत्यंत सुंदर दिव्य और रत्नों से जड़ी हुई पावन संदूकची प्रकट हुई। राजा जनक ने जब उस पेटिका को खोला तो संपूर्ण ब्रह्मांड एक दिव्य प्रकाश से आलोकित हो उठा। उस पेटिका के भीतर एक अत्यंत मनोहारी नवजात कन्या कमल के पुष्प पर लेटी हुई मंद मुस्कान बिखेर रही थी।
बाल्यकाल से ही माता सीता का तेज करोड़ों सूर्यों के समान दैदीप्यमान था। एक बार खेल ही खेल में बालिका सीता ने भगवान शिव के उस महाप्रचंड पिनाक धनुष को अपने बाएं हाथ से उठा लिया था जिसे सहस्रों बलशाली योद्धा मिलकर भी हिलाने में असमर्थ थे। यह देखकर राजा जनक ने प्रतिज्ञा ली थी कि जो वीर पुरुष इस शिव धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा देगा उसी के साथ जानकी का पाणिग्रहण होगा।
जब माता सीता विवाह योग्य हुईं तब मिथिला में एक भव्य सीता स्वयंवर का आयोजन हुआ जिसमें लंकापति रावण बाणासुर और आर्यावर्त के समस्त प्रतापी राजा सम्मिलित हुए। कोई भी राजा उस शिव धनुष को हिला तक न सका। अंत में महर्षि विश्वामित्र की आज्ञा पाकर मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने उस दिव्य धनुष को एक ही हाथ से उठाकर जैसे ही प्रत्यंचा खींची वह महाधनुष तड़ाक से टूट गया। माता सीता ने मंद मुस्कान के साथ भगवान श्री राम के गले में जयमाला अर्पित कर उनका वरण किया जिसके पश्चात संपूर्ण ब्रह्मांड में उत्सव मनाया गया।
विवाह के पश्चात जब अयोध्या में माता कैकेयी के वचनों के कारण भगवान श्री राम को 14 वर्ष का वनवास मिला तब माता सीता ने राजमहल के समस्त ऐश्वर्य रत्नजड़ित वस्त्राभूषण और सुख सुविधाओं को एक ही क्षण में त्याग दिया। उन्होंने वल्कल वस्त्र धारण किए और अपने प्रभु के चरणों के साथ वन की ओर प्रस्थान किया। माता सीता ने चित्रकूट दंडकारण्य और पंचवटी के भयानक वनों में कंकड़ पत्थरों पर चलकर अपने पति के चरणों की सेवा की।
पंचवटी में जब रावण की कपट योजना के अंतर्गत मारीच ने स्वर्ण मृग का रूप धारण किया तब एक अत्यंत विषम परिस्थिति में लंकापति रावण एक भिक्षुक के वेश में आया और उसने छलपूर्वक माता सीता का हरण कर लिया। रावण ने माता सीता को लंका की अशोक वाटिका में राक्षसियों के कड़े पहरे में रखा। रावण ने उन्हें अनेक प्रकार के प्रलोभन और प्राणघातक भय दिखाए किंतु माता सीता ने तिनके की ओट लेकर रावण को तुच्छ कीट के समान तिरस्कृत कर दिया।
अयोध्या लौटने के पश्चात भगवान श्री राम का राज्याभिषेक हुआ और चारों ओर रामराज्य का अमृत बरसने लगा। किंतु लोक मर्यादा और एक साधारण धोबी के मिथ्या लांछन के कारण भगवान राम को अत्यंत भारी मन से माता सीता का परित्याग करना पड़ा। गर्भवती अवस्था में भी माता सीता ने अपने पति के प्रति तनिक भी कटुता नहीं रखी और वे महर्षि वाल्मीकि के पावन आश्रम में रहने लगीं।
वाल्मीकि आश्रम में माता सीता ने दो परम तेजस्वी पुत्रों लव और कुश को जन्म दिया और उन्हें संपूर्ण वेदों धनुर्विद्या और मर्यादा के उच्च संस्कार प्रदान किए। वर्षों पश्चात जब भगवान श्री राम का अश्वमेध यज्ञ संपन्न हो रहा था तब लव और कुश ने उस यज्ञ के अश्व को बांध लिया और अंततः वे अयोध्या की राजसभा में पहुंचे जहां उन्होंने संपूर्ण रामायण का गान किया।
भगवान श्री राम ने जब अपने पुत्रों और माता सीता को पहचाना तब उन्होंने लोक मर्यादा की रक्षा हेतु माता सीता से एक बार पुनः अपनी पवित्रता की शपथ लेने का अनुरोध किया। उस समय माता सीता के आत्मसम्मान और पातिव्रत्य की पराकाष्ठा प्रकट हुई। माता सीता ने दोनों हाथ जोड़कर अपने नेत्र बंद कर लिए और अपनी जन्मदात्री माता पृथ्वी का स्मरण किया।
वैदिक ज्योतिष के आधार ग्रंथ बृहत् पराशर होरा शास्त्र में भचक्र के समस्त तत्वों और ग्रहों के आत्मिक गुणों का अत्यंत सूक्ष्म विवेचन मिलता है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से माता सीता का पावन स्वरूप सीधे तौर पर पृथ्वी तत्व और मन के स्वामी चंद्र देव की अगाध सहनशीलता का प्रतिनिधित्व करता है।
भचक्र की 12 राशियों में से तीन राशियां वृषभ कन्या और मकर पृथ्वी तत्व की राशियां मानी जाती हैं। पृथ्वी तत्व स्थिरता धैर्य पोषण अचल निष्ठा और क्षमा का साक्षात प्रतीक है। जिस प्रकार पृथ्वी अपने सीने पर हल चलाए जाने पर्वतों के भारी भार और मनुष्यों के समस्त आघातों को शांत भाव से सहन करती है उसी प्रकार माता सीता ने जीवन भर समस्त संतापों को हंसते हुए सहन किया।
दूसरी ओर चंद्र ग्रह को ज्योतिष में मन चित्त मातृत्व और भावनाओं का स्वामी माना जाता है। माता सीता का मन चंद्रमा की भांति पूर्णतः निष्कलंक शीतल और गंगाजल के समान पवित्र था।
आधुनिक युग में पारिवारिक जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि दांपत्य संबंधों में धैर्य और सहनशीलता का सर्वथा अभाव होता जा रहा है। छोटे छोटे विवाद भयंकर अहंकार के टकराव में बदल जाते हैं जिसके कारण सुखी वैवाहिक जीवन भी न्यायालय और तलाक की चौखट तक पहुंच जाता है। संदेह और अविश्वास की ज्वाला हंसते खेलते परिवारों को नष्ट कर देती है।
माता सीता साक्षात अचल पतिव्रत धर्म और पावन निष्ठा की अधिष्ठात्री देवी हैं। जिस प्रकार माता सीता ने रावण के महाबल के सम्मुख भी अपने राम के प्रति निष्ठा का तनिक भी त्याग नहीं किया उसी प्रकार जो स्त्री अथवा पुरुष नियमित रूप से जानकी स्तोत्र का पाठ करते हैं उनके अंतःकरण में अटूट दांपत्य प्रेम और विश्वास की स्थापना होती है।
यह स्तोत्र विवाह में आने वाली अकारण बाधाओं को समाप्त करता है और यदि पति पत्नी के मध्य वियोग अथवा कलह चल रही हो तो यह साधना उनके मध्य पुनः प्रेम और सम्मान का संचार कर देती है। जो कन्याएं उत्तम चरित्रवान और मर्यादा पालक वर की कामना करती हैं उनके लिए माता जानकी की पूजा साक्षात कल्पवृक्ष के समान सिद्ध होती है।
यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में सप्तम भाव का स्वामी निर्बल हो विवाह में निरंतर रुकावटें आ रही हों दांपत्य जीवन में वियोग अथवा तलाक की नौबत आ गई हो तो शास्त्रों में माता सीता की प्रसन्नता हेतु अत्यंत प्रामाणिक वैदिक उपाय बताए गए हैं।
| क्या अवश्य करें | किन गलतियों से सर्वथा दूर रहें |
|---|---|
| प्रतिदिन प्रातः काल उठकर अपने माता पिता और जीवनसाथी का आदरपूर्वक नमन करें | अपने जीवनसाथी पर कभी भी मिथ्या लांछन अथवा अकारण संदेह न करें |
| माता सीता को सदैव सुगंधित पुष्प कच्चा दूध और शुद्ध खीर का भोग अर्पित करें | किसी भी परिस्थिति में अपने पति अथवा पत्नी का सार्वजनिक अपमान न करें |
| सीता नवमी और पूर्णिमा के दिन पूर्णतः सात्विक और पवित्र भोजन ग्रहण करें | तामसिक भोजन मदिरा और किसी भी प्रकार के अनैतिक आचरण से सर्वथा दूर रहें |
| अपने चरित्र को सदैव गंगाजल के समान निष्कलंक और मर्यादा में रखें | पराई स्त्री अथवा पराये पुरुष के प्रति अपने मन को कभी भटकने न दें |
| पूजा में शुद्ध गाय के घी का दीपक और श्वेत चंदन का ही श्रद्धापूर्वक प्रयोग करें | घर की महिलाओं और कन्याओं पर कभी भी क्रोध अथवा अपशब्द बोलने से बचें |
भगवती सीता का पावन अवतार संपूर्ण मानव जाति को यह सनातन शिक्षा प्रदान करता है कि सच्चा प्रेम और धर्म केवल सुखों में साथ रहना नहीं है अपितु घोर से घोर विपत्ति में भी एक दूसरे की मर्यादा और सम्मान की रक्षा करना है। राजमहल के रेशमी वस्त्रों को त्यागकर वनों के कांटों पर चलना और अशोक वाटिका में मृत्यु के साए में रहकर भी मर्यादा का त्याग न करना यह सिद्ध करता है कि नारी की वास्तविक शक्ति उसके आत्मसम्मान और पातिव्रत्य में निहित है। पृथ्वी में समाहित होकर माता सीता ने यह अमर संदेश दिया कि जब संसार पवित्रता का मूल्य समझने में असमर्थ हो जाए तब आत्म सम्मान की रक्षा हेतु अपनी जड़ों में लौट जाना ही सर्वोच्च गरिमा है। पृथ्वी तत्व की स्थिरता और चंद्रमा की अगाध करुणा जब मनुष्य के जीवन में उतरती है तब उसके समस्त सांसारिक संताप समाप्त हो जाते हैं। माता जानकी का नित्य स्मरण मनुष्य के जीवन से समस्त दांपत्य संकटों ग्रह दोषों और कलह को समाप्त करके उसे अखंड सौभाग्य मानसिक शांति और अंततः मोक्ष की परम सिद्धि प्रदान कराता है।
माता सीता का प्राकट्य किस प्रकार और किस पावन स्थान पर हुआ था? माता सीता का प्राकट्य मिथिला में पड़े भीषण अकाल के समय राजा जनक द्वारा स्वर्ण हल से भूमि जोतते समय पृथ्वी के गर्भ से एक पावन मंजूषा पेटिका में हुआ था।
माता सीता को भूमि सुता और जानकी नाम क्यों दिया गया? पृथ्वी के गर्भ से कन्या रूप में प्रकट होने के कारण उन्हें भूमि सुता और विदेह राज जनक द्वारा पुत्री रूप में स्वीकार किए जाने के कारण जानकी कहा गया।
ज्योतिष में माता सीता का संबंध किस तत्व और ग्रह से माना जाता है? वैदिक ज्योतिष में माता सीता का सीधा संबंध पृथ्वी तत्व वृषभ कन्या मकर राशि तथा मन और अगाध सहनशीलता के कारक चंद्र देव से माना जाता है।
दांपत्य जीवन में सुख शांति और निष्ठा हेतु किस स्तोत्र का पाठ करना चाहिए? दांपत्य कलह वियोग शांति और वैवाहिक निष्ठा की रक्षा हेतु प्रतिदिन प्रातः काल महर्षि वाल्मीकि विरचित जानकी स्तोत्र का पाठ करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
माता सीता ने लंका विजय के पश्चात अग्नि परीक्षा क्यों दी थी? माता सीता ने संसार के अज्ञानी लोगों के संदेहों को मिटाने अपनी सनातन पवित्रता को सिद्ध करने और छाया सीता को विसर्जित करने हेतु अग्नि परीक्षा दी थी।
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