By पं. नरेंद्र शर्मा
तारकासुर वध शिव अग्नि तेज शरवण प्राकट्य और सेनापति मंगल कृतिका नक्षत्र का संपूर्ण रहस्य

सनातन वैदिक परंपरा और स्कंद पुराण के पावन दर्शन में देवाधिदेव भगवान शिव और माता पार्वती के द्वितीय पुत्र तथा देव सेनापति के रूप में पूजित भगवान कार्तिकेय स्कंद का प्राकट्य अदम्य पराक्रम शौर्य नेतृत्व और आसुरी शक्तियों के समूल नाश का सर्वोच्च शिखर है। वैदिक ज्योतिष तथा तत्व विज्ञान के अंतर्गत सौरमंडल के सेनापति मंगल ग्रह के अदम्य युद्ध कौशल रक्त साहस और भूमि तत्व तथा सूर्य देव के आधिपत्य वाले प्रखर कृतिका नक्षत्र के दिव्य समन्वय को जाग्रत करने के लिए भगवान स्कंद की आराधना को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जब जातक की जन्म कुंडली में मंगल ग्रह नीच राशि कर्क में स्थित होकर अथवा राहु व शनि से आक्रांत होकर भयंकर अंगारक योग मांगलिक दोष रक्त विकार कायरता अथवा प्रशासनिक विफलता उत्पन्न कर रहा हो तब छह मुख वाले भगवान कार्तिकेय की शरण में जाने से अमोघ विजय और शत्रुओं पर विजय की प्राप्ति होती है। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि स्कंद षष्ठी जिसे दक्षिण भारत में सूरसंहारम् भी कहा जाता है अथवा प्रत्येक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि और मंगलवार के पावन अनुष्ठान का संपूर्ण शास्त्रीय विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।
| शास्त्रीय आयाम | अनुष्ठान विवरण और ज्योतिषीय मान्यता |
|---|---|
| प्रमुख पावन तिथि | कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी स्कंद षष्ठी अथवा प्रत्येक मंगलवार व षष्ठी |
| दैनिक पूजन समय | प्रातः कालीन सूर्योदय वेला अथवा मध्याह्न काल |
| अधिष्ठाता स्वरूप | छह मुख वाले मयूर पर विराजमान शक्ति वेल और कुक्कुट ध्वज धारिणी भगवान स्कंद |
| ज्योतिषीय ग्रह व भाव संबंध | प्रथम भाव तृतीय भाव षष्ठ भाव दशम भाव सेनापति मंगल और कृतिका नक्षत्र |
| मुख्य पूजन सामग्री | लाल कनेर पुष्प शुद्ध रक्त चंदन पंचामृत गुड़ से बनी मीठी खीर और तिल का तेल |
| प्रधान वैदिक अनुष्ठान | स्कंद षष्ठी कवचम् पाठ सुब्रह्मण्य अष्टकम और ॐ शरवणभवाय नमः जप |
| अपेक्षित फल | मंगल दोष शांति शत्रु शमन अदम्य साहस नेतृत्व सिद्धि और रक्त विकारों से मुक्ति |
शिव पुराण के अत्यंत पावन कुमार खंड के अनुसार प्राचीन काल में वज्रांग नामक दैत्य के कुल में तारकासुर नामक एक अत्यंत महत्वाकांक्षी और पराक्रमी असुर का जन्म हुआ। तारकासुर ने तीनों लोकों पर अपना एकछत्र आधिपत्य स्थापित करने हेतु मदराचल पर्वत की गुफाओं में जाकर सहस्रों वर्षों तक परमपिता ब्रह्मा जी की अत्यंत कठोर और दुष्कर तपस्या की।
उसकी भीषण तपस्या से संतुष्ट होकर जब ब्रह्मा जी प्रकट हुए तब तारकासुर ने अमरता का वरदान मांगा। ब्रह्मा जी ने कहा कि जो जन्मा है उसका अंत निश्चित है अतः तुम कोई अन्य वरदान मांगो। तारकासुर ने बड़ी धूर्तता से विचार किया कि सती के आत्मदाह के पश्चात देवाधिदेव भगवान शिव घोर समाधि में लीन हैं और वे कभी पुनर्विवाह नहीं करेंगे। अतः उसने वरदान मांग लिया कि उसकी मृत्यु केवल और केवल भगवान शिव के औरस पुत्र के हाथों ही संभव हो सके।
ब्रह्मा जी से यह अमोघ वरदान प्राप्त करते ही तारकासुर का आसुरी अहंकार दावानल की भांति भड़क उठा।
विवाह के पश्चात जब भगवान शिव और माता पार्वती के मिलन से एक अत्यंत प्रचंड दिव्य तेज प्रस्फुटित हुआ तब उस अलौकिक ऊर्जा के ताप से संपूर्ण ब्रह्मांड तपने लगा। पृथ्वी और देवता उस तेज को सहन करने में असमर्थ हो गए। समस्त देवताओं की प्रार्थना पर अग्नि देव ने पक्षी का रूप धारण कर उस अमोघ शिव तेज को अपने भीतर समाहित कर लिया।
अग्नि देव स्वयं समस्त पदार्थों को भस्म करने वाले परम पावन देवता हैं किंतु देवाधिदेव भगवान शिव के उस अमोघ वीर्य के प्रचंड ताप को अग्नि देव भी अधिक समय तक धारण न कर सके। उनका शरीर झुलसने लगा और वे व्याकुल होकर त्राहिमाम करने लगे।
भगवान शिव के आदेश पर अग्नि देव ने उस दिव्य तेज को परम पावन पतित पावनी गंगा जी की शीतल जलधारा में प्रवाहित कर दिया। किंतु गंगा जी की पवित्र धाराएं भी उस ब्रह्मांडीय अग्नि के ताप से उबलने लगीं। तब गंगा जी ने उस तेज को हिमालय की गोद में स्थित शरवण अर्थात सरकंडों के एक विशाल और पवित्र वन में स्थापित कर दिया।
शरवण के उस पावन सरोवर में जैसे ही वह दिव्य तेज स्थापित हुआ वह छह परम तेजस्वी और अलौकिक नवजात शिशुओं के रूप में रूपांतरित हो गया। उसी समय वहां आकाश मार्ग से गुजरती हुई छह दिव्य कृतिका नक्षत्र देवियां जल पीने हेतु सरोवर के तट पर पहुंचीं।
स्कंद का शाब्दिक अर्थ होता है जो तेज स्खलित होकर एकत्र हुआ हो। भगवान कार्तिकेय बाल्यकाल से ही अनुपम युद्ध कलाओं और असीम ज्ञान के स्वामी बने। उन्होंने बालपन में ही देवर्षि नारद और स्वयं परमपिता ब्रह्मा जी को ओंकार का वह परम रहस्य समझाया जिसे ब्रह्मा जी भी पूरी तरह प्रकट नहीं कर सके थे।
जब बालक स्कंद सात वर्ष के हुए तब समस्त देवताओं ने उन्हें अपना परम रक्षक मानकर उनका भव्य राज्याभिषेक किया। क्षीरसागर के तट पर समस्त देवताओं ने मिलकर उन्हें देव सेनापति के सर्वोच्च पद पर प्रतिष्ठित किया।
उस पावन अवसर पर देवताओं ने कुमार कार्तिकेय को अपने अपने सबसे शक्तिशाली दिव्य अस्त्र शस्त्र भेंट किए।
देवताओं की विशाल सेना का नेतृत्व करते हुए सेनापति स्कंद ने तारकासुर की राजधानी पर आक्रमण कर दिया। तारकासुर अपनी विशाल सेना और अपने दो परम बलशाली भाइयों सिंहमुख और सुरपद्मन के साथ युद्ध भूमि में उतरा।
असुरों ने मायावी अंधकार पर्वतों की वर्षा और विषैली गैसों से देवताओं को त्रस्त कर दिया किंतु भगवान स्कंद ने अपने एक ही बाण से संपूर्ण आसुरी माया को छिन्न भिन्न कर दिया। जब तारकासुर और कार्तिकेय के मध्य द्वंद्व युद्ध आरंभ हुआ तब दोनों के अस्त्रों के टकराने से प्रलयंकारी गड़गड़ाहट होने लगी।
तारकासुर ने जब देखा कि बालक स्कंद उस पर भारी पड़ रहे हैं तब उसने क्रौंच पर्वत के भीतर छिपकर अपनी आसुरी शक्तियों का विस्तार करना आरंभ किया। क्रौंच पर्वत आसुरी माया से अभिमंत्रित था और उसके भीतर जो भी प्रवेश करता था वह उसी में समा जाता था।
भगवान स्कंद ने बिना किसी संकोच के माता पार्वती और पिता शिव का स्मरण किया और अपने दाहिने हाथ से उस अमोघ शक्ति वेल का संधान किया। वह शक्ति अस्त्र विद्युत की गति से घूमता हुआ गया और उसने क्रौंच पर्वत का सीना चीरते हुए उसके टुकड़े टुकड़े कर दिए।
इसके पश्चात उस दिव्य वेल ने तारकासुर की छाती को भेद दिया। तारकासुर का विशाल शरीर रक्त से लथपथ होकर भूमि पर गिर पड़ा और उसका अहंकार सदा के लिए शांत हो गया। संपूर्ण स्वर्ग लोक में देव दुंदुभियां बज उठीं और देवताओं ने पुष्प वर्षा करते हुए जय जयकार की।
वैदिक ज्योतिष के महान आधार ग्रंथ बृहत् पराशर होरा शास्त्र में ग्रहों और नक्षत्रों के सूक्ष्म सेनापति गुणों का अत्यंत गहरा विवेचन मिलता है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से भगवान स्कंद सीधे तौर पर मंगल ग्रह के अधिष्ठाता देवता हैं और भचक्र के तीसरे नक्षत्र कृतिका नक्षत्र के सर्वोच्च संरक्षक हैं।
कृतिका नक्षत्र का स्वामी अग्नि देव हैं और इसका प्रतीक चिन्ह ज्वाला अथवा तेज छुरी माना जाता है। कृतिका नक्षत्र मनुष्य के भीतर अशुद्धियों को जलाकर कुंदन की भांति शुद्ध करने की शक्ति रखता है।
मंगल ग्रह भचक्र में अग्नि तत्व पराक्रम बाहुबल रक्त अस्थि मज्जा सैन्य शक्ति पुलिस और अचल संपत्ति का अधिपति है। जब किसी जातक की जन्म कुंडली में मंगल ग्रह बली होता है तो व्यक्ति निडर साहसी कुशल रणनीतिकार और समाज का रक्षक बनता है।
शाक्त और कौमार तत्व दर्शन में भगवान स्कंद का षडानन स्वरूप मात्र एक शारीरिक चित्रण नहीं है अपितु वह योग शास्त्र और आत्मज्ञान का सर्वोच्च वैज्ञानिक रहस्य है।
भगवान के छह मुख मनुष्य की पांच ज्ञानेंद्रियों आंख कान नाक जीभ त्वचा और छठे तत्व मन का प्रतीक हैं। जब तक मनुष्य का मन और उसकी इंद्रियां अलग अलग दिशाओं में भटकती हैं तब तक वह संसार के विकारों से पराजित होता रहता है। भगवान स्कंद यह सिखाते हैं कि जब इन छह शक्तियों को एक दिशा में एकाग्र कर दिया जाता है तब मनुष्य अजेय बन जाता है।
आधुनिक युग में अनेक लोग अपने जीवन में अज्ञात भय आत्मविश्वास की भारी कमी रक्त जनित व्याधियों और शत्रुओं के षड्यंत्रों से निरंतर त्रस्त रहते हैं। इसके अतिरिक्त वैवाहिक जीवन में मांगलिक दोष का होना विवाह में अड़चनें और दांपत्य कलह का मुख्य कारण बनता है।
शास्त्रों में यह अकाट्य सत्य वर्णित है कि जो जातक निष्कपट भाव से भगवान स्कंद की शरण लेता है उसके जीवन से भय का नामोनिशान मिट जाता है। जिस प्रकार भगवान कार्तिकेय ने क्रौंच पर्वत जैसी अजेय बाधा को अपने एक ही प्रहार से नष्ट कर दिया था उसी प्रकार स्कंद साधना जातक के जीवन के समस्त अदृश्य अवरोधों को पल में भस्म कर देती है।
यह साधना विद्यार्थियों में एकाग्रता युवाओं में नेतृत्व क्षमता और सेना व पुलिस की तैयारी करने वाले साधकों में अदम्य साहस का संचार करती है। जो व्यक्ति प्रतिदिन सुब्रह्मण्य अष्टकम का पाठ करता है उसे न्यायालय में चल रहे मुकदमों में विजय मिलती है और उसकी संपत्ति सुरक्षित रहती है।
यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में मंगल ग्रह पीड़ित हो रक्त विकार सताते हों भूमि विवाद चल रहा हो अथवा मन में निरंतर कायरता बनी रहती हो तो शास्त्रों में भगवान स्कंद की प्रसन्नता हेतु अत्यंत प्रामाणिक वैदिक उपाय बताए गए हैं।
| क्या अवश्य करें | किन गलतियों से सर्वथा दूर रहें |
|---|---|
| प्रतिदिन प्रातः काल उठकर अपने अंतःकरण में निर्भयता और सत्य का संकल्प लें | अपने बाहुबल शारीरिक शक्ति अथवा पद का किसी निर्बल पर दुरुपयोग न करें |
| भगवान स्कंद को सदैव ताजे लाल पुष्प शुद्ध चंदन और गुड़ का भोग अर्पित करें | कभी भी कायरता दिखा कर अपने कर्तव्यों और धर्म के मार्ग से पीछे न हटें |
| मंगलवार और षष्ठी के दिन पूर्ण स्वच्छता ब्रह्मचर्य और सात्विक आहार लें | तामसिक भोजन मदिरा मांस और अत्यधिक तीखे गरिष्ठ पदार्थों से दूर रहें |
| अपने जीवन में अनुशासन समय की पाबंदी और नेतृत्व के गुणों का विकास करें | अपने मन में प्रतिशोध की अंधी ज्वाला पालने अथवा व्यर्थ विवाद बढ़ाने से बचें |
| पूजा में शुद्ध तांबे के बर्तन तिल का तेल और रक्त चंदन का ही प्रयोग करें | बिना स्नान किए अथवा अशुद्ध अवस्था में पूजा के स्थान पर जाने से बचें |
भगवान स्कंद का पावन अवतार संपूर्ण मानव जाति को यह सनातन शिक्षा प्रदान करता है कि धर्म की रक्षा हेतु शक्ति और विवेक का समन्वय अनिवार्य है। जब शिव का ज्ञान अग्नि के तेज और गंगा की पवित्रता से मिलता है तब स्कंद जैसी अजेय शक्ति का प्राकट्य होता है। तारकासुर का वध हमें यह सिखाता है कि अधर्म चाहे कितना भी बड़ा वरदान लेकर क्यों न खड़ा हो अंततः वह सत्य और धर्म के तीक्ष्ण वेल के सम्मुख टिक नहीं सकता। कृतिका नक्षत्र का तेज और मंगल का शौर्य जब मनुष्य के चरित्र में उतरता है तब वह केवल अपनी ही रक्षा नहीं करता अपितु संपूर्ण समाज का रक्षक बन जाता है। छह मुखों की एकाग्रता और शक्ति वेल की सूक्ष्मता हमें अपनी इंद्रियों को नियंत्रित कर जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त करने की प्रेरणा देती है। भगवान स्कंद का नित्य स्मरण मनुष्य के जीवन से समस्त कायरता रक्त दोषों और ग्रह संतापों को समाप्त करके उसे एक तेजस्वी निर्भीक और सम्मानित व्यक्तित्व बनाकर अंततः परम विजय की प्राप्ति कराता है।
भगवान कार्तिकेय का नाम स्कंद और षडानन क्यों पड़ा? भगवान शिव का तेज स्खलित होकर शरवण वन में एकत्र हुआ इसलिए वे स्कंद कहलाए और छह मुख धारण करने के कारण उन्हें षडानन कहा गया।
तारकासुर को क्या वरदान प्राप्त था जिसके कारण उसका वध कठिन था? तारकासुर को ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त था कि उसकी मृत्यु केवल भगवान शिव के औरस पुत्र के हाथों ही हो सकती है जो उस समय असंभव माना जाता था।
भगवान स्कंद का मुख्य अस्त्र शक्ति वेल किस बात का प्रतीक है? भगवान स्कंद का शक्ति वेल अमोघ प्रज्ञा तीक्ष्ण बुद्धि और अज्ञान के अंधकार को चीरने वाली आध्यात्मिक ज्ञान शक्ति का प्रतीक है।
ज्योतिष में भगवान स्कंद का संबंध किस प्रमुख ग्रह और नक्षत्र से है? वैदिक ज्योतिष में भगवान स्कंद का सीधा संबंध सौरमंडल के सेनापति मंगल ग्रह और 27 नक्षत्रों में से तीसरे कृतिका नक्षत्र से माना जाता है।
मंगल दोष शांति और शत्रुओं पर विजय हेतु किस मंत्र का जाप सर्वोत्तम है? मंगल के क्रूर प्रभावों को शांत करने और साहस पाने हेतु प्रतिदिन प्रातः काल ॐ शरवणभवाय नमः अथवा ॐ स्कंदाय नमः का 108 बार जाप करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
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