सुब्रह्मण्य अवतार और सर्प दोष क्या?

By पं. संजीव शर्मा

वासुकी रक्षा कुक्के धाम सर्प संस्कार और राहु केतु के कालसर्प दोष निवारण का संपूर्ण वैदिक रहस्य

भगवान सुब्रह्मण्य अवतार कथा और सर्प दोष निवारण

सुब्रह्मण्य षष्ठी मुहूर्त और शास्त्रीय विधान

सनातन वैदिक परंपरा और स्कंद पुराण के अंतर्गत दक्षिण भारत के सह्याद्रि खंड में साक्षात देवाधिदेव भगवान शिव और माता पार्वती के पावन आत्मज तथा देव सेनापति भगवान सुब्रह्मण्य का प्राकट्य समस्त सर्प कुल की रक्षा कालसर्प दोष के निवारण और राहु केतु के क्रूर प्रभावों को शांत करने का सर्वोच्च शिखर है। वैदिक ज्योतिष तथा तत्व विज्ञान के अंतर्गत मोक्ष कारक छाया ग्रह केतु और भोग कारक छाया ग्रह राहु के सर्प रूपी पाश को काटने तथा पंचम भाव बुद्धि व संतान भाव के समस्त पितृ दोषों को भस्म करने हेतु भगवान सुब्रह्मण्य की आराधना को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जब जातक की जन्म कुंडली में समस्त सात ग्रह राहु और केतु के मध्य फंसकर कालसर्प योग का निर्माण कर रहे हों अथवा पंचम भाव व अष्टम भाव में नाग दोष स्थित होकर संतान प्राप्ति में बाधा अकाल मृत्यु का भय निरंतर मानसिक अशांति अथवा भयानक स्वप्न उत्पन्न कर रहा हो तब कर्नाटक के पवित्र पश्चिमी घाटों में स्थित कुक्के सुब्रह्मण्य धाम के अधिष्ठाता भगवान सुब्रह्मण्य की शरण में जाने से अमोघ शांति और वंश वृद्धि की प्राप्ति होती है। मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि सुब्रह्मण्य षष्ठी जिसे चंपा षष्ठी भी कहा जाता है अथवा प्रत्येक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी और मंगलवार के पावन अनुष्ठान का संपूर्ण शास्त्रीय विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।

शास्त्रीय आयाम अनुष्ठान विवरण और ज्योतिषीय मान्यता
प्रमुख पावन तिथि मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी चंपा षष्ठी अथवा प्रत्येक मास की षष्ठी
दैनिक पूजन समय प्रातः कालीन सूर्योदय वेला अथवा सायं गोधूलि प्रदोष काल
अधिष्ठाता स्वरूप नागराज वासुकी को अपनी गोद में आश्रय दिए हुए मोर पर विराजमान भगवान सुब्रह्मण्य
ज्योतिषीय ग्रह व भाव संबंध पंचम भाव अष्टम भाव नवम भाव छाया ग्रह राहु केतु और सेनापति मंगल
मुख्य पूजन सामग्री शुद्ध गाय का कच्चा दूध अक्षत लाल कनेर पुष्प चंदन भस्म और चांदी के सर्प
प्रधान वैदिक अनुष्ठान सुब्रह्मण्य भुजंगम पाठ सर्प सूक्त पाठ और ॐ सुब्रह्मण्याय नमः जप
अपेक्षित फल कालसर्प योग शांति नाग दोष मुक्ति संतान सुख की प्राप्ति और भय नाश

गरुड़ का प्रकोप और नागराज वासुकी की पुकार

श्रीमद्भागवत महापुराण और महाभारत के आदि पर्व में वर्णित अत्यंत पावन इतिहास के अनुसार कश्यप ऋषि की दो पत्नियां कद्रू और विनता थीं। कद्रू से सहस्रों नागों का जन्म हुआ और विनता के गर्भ से पक्षीराज गरुड़ का प्राकट्य हुआ। एक बार दोनों सौतों के मध्य उच्चैःश्रवा घोड़े की पूंछ के रंग को लेकर एक शर्त लगी जिसमें कद्रू ने अपने पुत्र सर्पों की सहायता से छल पूर्वक विनता को अपनी दासी बना लिया।

जब पक्षीराज गरुड़ बड़े हुए और उन्हें अपनी माता की इस दासता का ज्ञान हुआ तो उनके अंतःकरण में सर्पों के प्रति भीषण प्रतिशोध और वैमनस्य की ज्वाला धधक उठी। गरुड़ ने अमृत कलश लाकर अपनी माता को दासता से मुक्त तो करा लिया किंतु उस दिन से गरुड़ और सर्प कुल के मध्य एक अंतहीन और रक्तरंजित शत्रुता का आरंभ हो गया।

पक्षीराज गरुड़ भगवान श्री हरि विष्णु के वाहन बनकर परम पराक्रमी हो चुके थे। वे प्रतिदिन पाताल लोक और पृथ्वी के वनों से सहस्रों सर्पों का शिकार करने लगे। गरुड़ के विशाल पंखों की फड़फड़ाहट मात्र से संपूर्ण पाताल लोक थर थर कांपने लगता था और उनके तीक्ष्ण चोंच व पंजों से कोई भी विषैला सर्प अपने प्राण नहीं बचा पाता था।

जब सर्प कुल के अस्तित्व पर ही संकट मंडराने लगा तब नागों के परम प्रतापी राजा नागराज वासुकी अत्यंत भयभीत और व्याकुल हो उठे। वासुकी समुद्र मंथन के समय मंदराचल पर्वत की रस्सी बनकर भगवान की सेवा कर चुके थे और वे भगवान शिव के परम भक्त थे।

वासुकी अपने प्राणों की रक्षा हेतु कैलास पर्वत पर पहुंचे और उन्होंने देवाधिदेव भगवान शिव के पावन चरणों में गिरकर विलाप करना आरंभ किया। वासुकी ने कहा कि हे त्रिलोकीनाथ पक्षीराज गरुड़ के संहारक प्रकोप से समस्त नाग जाति का विनाश होने जा रहा है अतः आप कृपा करके हमारी रक्षा करें।

  • भगवान शिव ने नागराज वासुकी की करुण पुकार सुनकर उन्हें अत्यंत वात्सल्य से देखा।
  • भगवान शिव ने कहा कि हे वासुकी गरुड़ श्री हरि का वाहन है अतः उसका मार्ग साधारण रीति से नहीं रोका जा सकता।
  • देवाधिदेव ने वासुकी को आदेश दिया कि तुम तत्काल दक्षिण भारत के पश्चिमी घाटों में स्थित कुमार पर्वत की सुरम्य गुफाओं में जाकर शरण लो।
  • भगवान शिव ने भविष्यवाणी की कि तारकासुर का वध करने के पश्चात मेरा तेजस्वी पुत्र कार्तिकेय वहां पहुंचेगा और वही तुम्हें गरुड़ के प्रकोप से अभय दान प्रदान करेगा।

क्या शरणागत वासुकी को मिला अभयदान?

भगवान शिव की आज्ञा शिरोधार्य कर नागराज वासुकी अपने समस्त परिजनों और प्रमुख सर्पों के साथ कर्नाटक के उस घने अरण्य में पहुंचे जिसे आज कुक्के के नाम से जाना जाता है। वासुकी ने वहां एक अत्यंत गोपनीय गुफा जिसे बिलाद्वार कहा जाता है उसमें प्रवेश कर भगवान शिव के पुत्र के आगमन की प्रतीक्षा में घोर तपस्या आरंभ कर दी।

उधर तारकासुर और उसके आसुरी बंधुओं का संहार करने के पश्चात भगवान कार्तिकेय अपनी सेना के साथ दक्षिण भारत के सह्याद्रि पर्वतमाला पर पधारे। जब भगवान कुमार पर्वत के पावन शिखर पर पहुंचे तो उन्होंने वहां गुफा के भीतर अत्यंत भयभीत अवस्था में नागराज वासुकी को कांपते हुए देखा।

नागराज वासुकी ने भगवान कार्तिकेय के पावन चरणों में साष्टांग दंडवत प्रणाम किया और अपने अश्रुओं से उनके चरणों का अभिषेक करते हुए गरुड़ से अपने कुल की रक्षा की भीख मांगी।

भगवान कार्तिकेय का हृदय शरणागत वासुकी के प्रति अगाध करुणा से भर गया। उन्होंने वासुकी को उठाकर अपने वक्ष से लगा लिया और उन्हें अपनी गोद में बैठाकर अभय दान दिया।

उसी समय आकाश में प्रलयंकारी अंधकार छा गया और पक्षीराज गरुड़ अपने विशाल पंखों को फैलाए हुए वासुकी का शिकार करने हेतु वहां आ धमके। गरुड़ ने जब देखा कि वासुकी एक बालक की गोद में बैठा है तो उन्होंने वासुकी पर झपट्टा मारने का प्रयास किया।

  • भगवान कार्तिकेय ने अपने नेत्रों से एक अत्यंत प्रचंड दिव्य तेज प्रस्फुटित किया जिससे गरुड़ के पंख जलने लगे और उनकी शक्ति क्षीण हो गई।
  • गरुड़ ने आश्चर्यचकित होकर उस बालक को देखा और उन्हें साक्षात यह बोध हुआ कि यह कोई साधारण बालक नहीं अपितु स्वयं देवाधिदेव शिव के तेज स्वरूप भगवान सुब्रह्मण्य हैं।
  • पक्षीराज गरुड़ ने तत्काल अपने पंख समेट लिए और वे भगवान सुब्रह्मण्य के चरणों में नतमस्तक हो गए।
  • भगवान सुब्रह्मण्य ने गरुड़ को आदेश दिया कि हे गरुड़ वासुकी और इसके सर्प कुल ने मेरी शरण ग्रहण की है अतः आज से तुम इस पावन क्षेत्र में किसी भी सर्प को अपना ग्रास नहीं बनाओगे।
  • भगवान ने नागराज वासुकी से कहा कि तुम सदा मेरे विग्रह के भीतर मेरे साथ प्रतिष्ठित रहोगे और जो भी मनुष्य तुम्हारी पूजा करेगा वह समस्त सर्प दोषों से मुक्त हो जाएगा।

कुक्के धाम और सर्प संस्कार का तात्विक मर्म

कर्नाटक राज्य के दक्षिण कन्नड़ जिले में पश्चिमी घाट की सुरम्य पहाड़ियों के मध्य स्थित कुक्के सुब्रह्मण्य मंदिर सनातन धर्म का वह सर्वोच्च जागृत तीर्थ है जहां नागराज वासुकी और भगवान सुब्रह्मण्य एक ही वेदी पर संयुक्त रूप से विराजमान हैं। इस पावन तीर्थ के समीप से कलकल बहती हुई कुमारधारा नदी निकलती है जिसके विषय में मान्यता है कि तारकासुर वध के पश्चात भगवान कार्तिकेय ने अपने शक्ति वेल को इसी पावन जल में धोया था।

कुक्के धाम में की जाने वाली दो तांत्रिक और वैदिक पूजाएं संपूर्ण विश्व में अद्वितीय और अमोघ फलदायी मानी जाती हैं जिन्हें आश्लेषा बलि और सर्प संस्कार कहा जाता है।

  • सर्प संस्कार पूजा वास्तव में पूर्व जन्म अथवा वर्तमान जीवन में जाने अनजाने में किसी सर्प की हत्या करने अथवा उसके अंडों को नष्ट करने से उत्पन्न सर्प हत्या दोष के प्रायश्चित हेतु की जाती है।
  • इस अनुष्ठान में जातक अपने मृत पूर्वजों के समान ही सर्प का शास्त्रीय विधि से पिंडदान और तर्पण संपन्न करता है जिससे सर्प की आत्मा शांत होकर जातक के कुल को आशीर्वाद देती है।
  • आश्लेषा बलि पूजा प्रत्येक मास की आश्लेषा नक्षत्र के दिन की जाती है जिसमें आटे और हल्दी से विशाल सर्प मंडल बनाकर वैदिक मंत्रों से नागराज वासुकी और अष्टकुल नागों को आहुतियां दी जाती हैं।
  • जो भक्त कुमारधारा नदी में स्नान कर गीले वस्त्रों में कुक्के सुब्रह्मण्य के दर्शन करता है उसके शरीर से चर्म रोग कुष्ठ रोग और रक्त के समस्त विकार स्वतः समाप्त हो जाते हैं।
  • इस मंदिर के प्रांगण में स्थित गरुड़ स्तंभ यह सिद्ध करता है कि भगवान की आज्ञा से गरुड़ आज भी वहां शांत रहकर मंदिर की रक्षा करते हैं और किसी सर्प को कष्ट नहीं पहुंचाते।

राहु केतु और कालसर्प दोष का ज्योतिषीय मर्म

वैदिक ज्योतिष के महान आधार ग्रंथ बृहत् पराशर होरा शास्त्र में छाया ग्रहों के सूक्ष्म कर्म बंधनों का अत्यंत गूढ़ विश्लेषण मिलता है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से भगवान सुब्रह्मण्य सीधे तौर पर छाया ग्रह राहु और छाया ग्रह केतु के अधिष्ठाता नियंत्रक हैं।

पौराणिक समुद्र मंथन के समय जब स्वरभानु नामक असुर ने छल से अमृत पान किया था तब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उसका मस्तक काट दिया था। उसका सिर राहु कहलाया जो सर्प का मुख है और उसका धड़ केतु कहलाया जो सर्प की पूंछ है।

जब किसी जातक की जन्म कुंडली में समस्त सातों मुख्य ग्रह सूर्य चंद्रमा मंगल बुध गुरु शुक्र और शनि राहु और केतु के मध्य एक ही ओर आ जाते हैं तब भयंकर कालसर्प दोष का निर्माण होता है।

  • कालसर्प दोष के कारण जातक का जीवन एक विषैले चक्रव्यूह में फंस जाता है जहां कठोर परिश्रम के बाद भी अंतिम समय में असफलता हाथ लगती है।
  • जन्म कुंडली का पंचम भाव बुद्धि संतान और पूर्व जन्म के पुण्यों का स्थान होता है।
  • जब पंचम भाव में राहु स्थित होता है अथवा केतु की दृष्टि होती है तो भयंकर नाग दोष और पुत्र दोष बनता है जिससे जातक को संतान प्राप्ति में भारी कष्ट गर्भपात अथवा संतानहीनता का संताप झेलना पड़ता है।
  • जन्म कुंडली का अष्टम भाव आयु गुप्त रोगों और अचानक आने वाले संकटों का स्थान है जहां राहु केतु की उपस्थिति जातक को सर्प भय और अकाल मृत्यु की चिंता देती है।
  • भगवान सुब्रह्मण्य सेनापति मंगल के स्वामी हैं और मंगल के पराक्रम से ही राहु केतु का यह विषैला जाल काटा जा सकता है।
  • सुब्रह्मण्य स्वामी की शरण में जाने से जन्म कुंडली के पंचम और अष्टम भाव के समस्त सर्प दोष जलकर भस्म हो जाते हैं।

क्या सर्प दोष साधना से संतान सुख और वंश वृद्धि होती है?

आधुनिक युग में अनेक दंपत्ति समस्त आधुनिक चिकित्सा परीक्षणों के सामान्य आने के उपरांत भी संतान सुख से वंचित रह जाते हैं। कई बार महिलाओं को बारंबार गर्भपात का असहनीय दुख झेलना पड़ता है अथवा गर्भ ठहरता ही नहीं है। इसके अतिरिक्त अनेक लोगों को स्वप्न में निरंतर काले नाग दिखाई देते हैं जो उन्हें डसते हैं अथवा वे स्वयं को किसी गहरे कुएं में गिरते हुए देखते हैं।

वैदिक तत्व दर्शन के अनुसार यह स्थिति सीधे तौर पर सर्प शाप अथवा कालसर्प दोष का प्रत्यक्ष प्रमाण है। जब किसी पूर्व जन्म में जातक अथवा उसके पूर्वजों ने किसी निर्दोष सर्प को लाठी से पीटकर मार डाला हो अथवा उसके बिल को आग लगा दी हो तो उस सर्प का अंतिम श्वास कुल को संतानहीनता का शाप दे जाता है।

भगवान सुब्रह्मण्य साक्षात नागराज वासुकी के रक्षक हैं और उनके आदेश के बिना कोई भी नाग किसी मनुष्य को कष्ट नहीं दे सकता।

जब कोई पीड़ित दंपत्ति कुक्के सुब्रह्मण्य धाम जाकर अथवा अपने घर पर ही सुब्रह्मण्य षष्ठी के दिन सर्प शांति का संकल्प लेता है तब वासुकी और सुब्रह्मण्य की संयुक्त कृपा से वह प्राचीन कर्म बंधन कट जाता है। यह साधना गर्भाशय की समस्त नकारात्मक ऊर्जा को समाप्त कर स्वस्थ और दीर्घायु संतान की प्राप्ति कराती है जिससे कुल का वंश दीपक पुनः प्रज्वलित हो उठता है।

कालसर्प शांति और सुब्रह्मण्य कृपा के अचूक उपाय

यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में कालसर्प योग हो नाग दोष के कारण संतान में विलंब हो रहा हो अथवा निरंतर भयानक स्वप्न आते हों तो शास्त्रों में भगवान सुब्रह्मण्य की प्रसन्नता हेतु अत्यंत प्रामाणिक वैदिक उपाय बताए गए हैं।

  • प्रत्येक मंगलवार अथवा शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को प्रातः काल स्नान के उपरांत पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें और भगवान सुब्रह्मण्य व नागराज वासुकी के चित्र के सम्मुख शुद्ध गाय के घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  • भगवान सुब्रह्मण्य को ताजे लाल कनेर के पुष्प शुद्ध कच्चा दूध और लाल चंदन अर्पित करें तथा पावन षडाक्षर मंत्र ॐ शरवणभवाय नमः अथवा ॐ सुब्रह्मण्याय नमः का कम से कम 108 बार शांत मन से जाप करें।
  • कालसर्प दोष और राहु केतु के संताप से मुक्ति पाने हेतु प्रतिदिन प्रातः काल स्नान के उपरांत आदि शंकराचार्य विरचित पावन सुब्रह्मण्य भुजंगम अथवा कंद षष्ठी कवकम् का शुद्ध उच्चारण के साथ पाठ करें।
  • संतान प्राप्ति में आ रही बाधाओं को समाप्त करने हेतु तांबे अथवा चांदी के दो छोटे नाग नागिन का जोड़ा बनवाकर उसे कच्चे दूध से स्नान कराएं और किसी पावन नदी अथवा शिवलिंग पर अर्पित करें।
  • जातक को अपनी शारीरिक अवस्था और योग्य ज्योतिर्विद के परामर्श के अनुसार तीन मुखी अथवा आठ मुखी नेपाली रुद्राक्ष चांदी के तार में पिरोकर मंगलवार अथवा षष्ठी के दिन धारण करना चाहिए।
  • प्रत्येक मंगलवार अथवा आश्लेषा नक्षत्र के दिन किसी शिव मंदिर में जाकर शिवलिंग पर तांबे के लोटे से शुद्ध जल और कच्चा दूध अर्पित करें तथा निर्धनों को तिल और गुड़ का दान करें।

सुब्रह्मण्य साधना और सर्प पूजा के शास्त्रीय नियम

क्या अवश्य करें किन गलतियों से सर्वथा दूर रहें
प्रतिदिन प्रातः काल उठकर भगवान सुब्रह्मण्य और कुलदेवता का स्मरण करें कभी भी किसी जीवित सर्प को अकारण मारने अथवा प्रताड़ित करने की भूल न करें
षष्ठी के दिन वट अथवा पीपल वृक्ष की जड़ में कच्चा दूध और जल अर्पित करें मंगलवार और षष्ठी के दिन काले अथवा गहरे नीले वस्त्र धारण करने से बचें
साधना के दिनों में पूर्ण स्वच्छता ब्रह्मचर्य और सात्विक फलाहार का पालन करें तामसिक भोजन मदिरा मांस और नशीले पदार्थों से सर्वथा दूर रहें
अपने जीवन में सत्य परोपकार और जीव दया की भावना को सर्वोच्च स्थान दें नाग पंचमी अथवा षष्ठी के दिन भूमि की गहरी खुदाई करने अथवा जुताई से बचें
पूजा में शुद्ध तांबे के बर्तन गाय का कच्चा दूध और रक्त चंदन का ही प्रयोग करें बिना स्नान किए अथवा अशुद्ध अवस्था में पूजा के स्थान पर जाने से सर्वथा बचें

शरणागत रक्षण और सर्प चेतना का परम रूपांतरण

भगवान सुब्रह्मण्य का पावन अवतार संपूर्ण मानव जाति को यह सनातन शिक्षा प्रदान करता है कि जब जीव संसार के समस्त भयों से त्रस्त होकर परमात्मा की शरण में निष्कपट भाव से गिर पड़ता है तब ईश्वर उसे अपनी गोद में उठाकर अभय दान प्रदान करते हैं। नागराज वासुकी की रक्षा यह सिद्ध करती है कि विषैले से विषैला प्राणी भी यदि ईश्वर के चरणों में समर्पित हो जाए तो उसका विष अमृत में बदल जाता है और वह परमात्मा का पावन आभूषण बन जाता है। कुक्के सुब्रह्मण्य का पावन धाम हमें यह स्मरण कराता है कि प्रकृति के समस्त जीव जंतु चाहे वे नाग हों अथवा पक्षी सब एक ही परमात्मा की संतान हैं और उनके प्रति किया गया अपराध हमारे ही जीवन में रुकावट बनकर खड़ा हो जाता है। राहु और केतु की सर्प चेतना जब भगवान सुब्रह्मण्य के ज्ञान से आलोकित होती है तब मनुष्य की कुण्डलिनी शक्ति मूलाधार से उठकर सहस्रार में भगवान शिव से एकाकार हो जाती है। भगवान सुब्रह्मण्य का नित्य स्मरण मनुष्य के जीवन से समस्त कालसर्प दोषों नाग दोषों संतानहीनता और ग्रह संतापों को समाप्त करके उसे अखंड वंश वृद्धि आत्मिक शांति और अंततः परम मोक्ष की प्राप्ति कराता है।

FAQ

भगवान कार्तिकेय को कुक्के में सुब्रह्मण्य के रूप में क्यों पूजा जाता है? भगवान कार्तिकेय ने कुक्के के पावन वन में गरुड़ के प्रकोप से नागराज वासुकी को अपनी गोद में आश्रय देकर उनके प्राणों की रक्षा की थी इसलिए वे समस्त सर्पों के रक्षक सुब्रह्मण्य कहलाए।

कुक्के सुब्रह्मण्य तीर्थ किस भारतीय राज्य में और किस नदी के तट पर स्थित है? कुक्के सुब्रह्मण्य तीर्थ कर्नाटक राज्य के पश्चिमी घाटों में स्थित है और यह पवित्र कुमारधारा नदी के पावन तट पर विराजमान है।

कालसर्प दोष और नाग दोष में क्या मूलभूत अंतर होता है? कालसर्प दोष तब बनता है जब कुंडली के समस्त सातों ग्रह राहु और केतु के मध्य आ जाते हैं जबकि नाग दोष पंचम भाव में राहु अथवा सर्प हत्या के शाप से बनता है जो संतान में बाधा देता है।

कुक्के धाम में कालसर्प और नाग दोष शांति हेतु कौन से दो प्रमुख अनुष्ठान किए जाते हैं? कुक्के धाम में सर्प हत्या दोष निवारण हेतु सर्प संस्कार पूजा और राहु केतु दोष शांति हेतु आश्लेषा नक्षत्र में आश्लेषा बलि पूजा संपन्न की जाती है।

संतान प्राप्ति और सर्प दोष मुक्ति हेतु भगवान सुब्रह्मण्य का कौन सा मंत्र सर्वोत्तम है? संतान सुख और सर्प दोषों के समूल नाश हेतु प्रतिदिन ॐ शरवणभवाय नमः अथवा ॐ सुब्रह्मण्याय नमः का 108 बार शांत मन से जाप करना सर्वोत्तम माना गया है।

पाएं अपनी सटीक कुंडली

कुंडली बनाएं

क्या आपको यह पसंद आया?

लेखक

पं. संजीव शर्मा

पं. संजीव शर्मा (63)


अनुभव: 20

इनसे पूछें: Family Planning, Career

इनके क्लाइंट: Punjab, Haryana, Delhi

इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें

ZODIAQ के बारे में

ज़ोडियाक (ZODIAQ) एक ऑनलाइन वैदिक ज्योतिष प्लेटफॉर्म है। जिन यूज़र्स को ज्योतिषीय सलाह की आवश्यकता है उन्हें ये अनुभवी ज्योतिषियों से जोड़ता है। हमारे यूज़र्स निशुल्क कुंडली भी बनाते हैं और कुंडली मिलान करते हैं। साथ ही ज़ोडियाक (ZODIAQ) ज्योतिषियों को भी कई उपयोगी सेवाएँ प्रदान करता है। ज्योतिषी ज़ोडियाक (ZODIAQ) की विभिन्न सुविधाओं का उपयोग कर अपने ग्राहकों को बेहतर सेवा प्रदान करते हैं।

यदि आप एक उपयोगकर्ता हैं

अनुभवी ज्योतिषियों से सलाह लें और उनका मार्गदर्शन प्राप्त करें। आप हमारे प्लेटफॉर्म से अनुभवी ज्योतिषियों द्वारा तैयार की गई हस्तलिखित जन्म पत्रिका और जीवन भविष्यवाणी रिपोर्ट भी मंगवा सकते हैं। सटीक कुंडली बनाएं, कुंडली मिलान करें और राशिफल व मुहूर्त की जानकारी प्राप्त करें। हमारी ऑनलाइन लाइब्रेरी का उपयोग करें जहां आपको सभी जरूरी ज्योतिषीय और आध्यात्मिक जानकारी एक जगह मिलेगी।

यदि आप एक ज्योतिषी हैं

अपने ग्राहकों के लिए सटीक कुंडली बनाएं और एक बार में 5 लोगों तक का कुंडली मिलान करें। ज़ोडियाक (ZODIAQ) की मदद से अपने ग्राहकों के लिए विस्तृत जन्म पत्रिका रिपोर्ट तैयार करें। क्लाइंट डायरेक्टरी में ग्राहकों का विवरण सेव करके किसी भी समय उन्हें एक्सेस करें। हर दिन आपने कितने लोगों को परामर्श दिया यह ट्रैक कर के अपनी प्रोडक्टिविटी बढ़ाएं।

WELCOME TO

ZODIAQ

Right Decisions at the right time with ZODIAQ