सुनटनर्तक अवतार और बुध शुक्र रहस्य क्या?

By पं. नरेंद्र शर्मा

हिमालय के सम्मुख अद्भुत तांडव पार्वती पाणिग्रहण और बुध शुक्र के संतुलन का संपूर्ण ज्योतिषीय रहस्य

सुनटनर्तक अवतार कथा और बुध शुक्र का रहस्य

सुनटनर्तक पूजन मुहूर्त और शास्त्रीय विधान

सनातन वैदिक परंपरा में देवाधिदेव भगवान शिव के परम मनोहारी नटराज और कला अधिपति स्वरूप के रूप में पूजित भगवान सुनटनर्तक का प्राकट्य प्रेम के संतुलन सौंदर्य के शोधन और दांपत्य मिलन का सर्वोच्च शिखर है। वैदिक ज्योतिष तथा आध्यात्मिक तत्व दर्शन के अंतर्गत वाणी कला बुद्धि और अभिनय के स्वामी बुध देव तथा सौंदर्य प्रेम दांपत्य सुख और आकर्षण के कारक शुक्र देव के दुर्लभ समन्वय को जाग्रत करने के लिए भगवान सुनटनर्तक की आराधना को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जब जातक की जन्म कुंडली में बुध अथवा शुक्र निर्बल होकर विवाह में बाधाएं मानसिक आकर्षण में न्यूनता दांपत्य जीवन में नीरसता अथवा कलात्मक अभिव्यक्ति में अवरोध उत्पन्न करते हैं तब सुनटनर्तक स्वरूप का ध्यान जीवन में आनंद रस और दिव्य सामंजस्य का संचार करता है। इस पावन अनुष्ठान की तिथि समय और शास्त्रीय घटकों का संपूर्ण विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।

शास्त्रीय आयामअनुष्ठान विवरण और ज्योतिषीय मान्यता
प्रमुख पावन तिथिप्रत्येक मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी प्रदोष व्रत अथवा सोमवार और महाशिवरात्रि
दैनिक पूजन समयसायंकालीन गोधूलि प्रदोष वेला अथवा संध्या काल
अधिष्ठाता स्वरूपएक हाथ में डमरू और दूसरे में त्रिशूल लिए नृत्य मग्न भगवान सुनटनर्तक शिव
ज्योतिषीय भाव व ग्रह संबंधपंचम भाव सप्तम भाव वाणी व बुद्धि कारक बुध और प्रेम कारक शुक्र देव
मुख्य पूजन सामग्रीशुद्ध इत्र श्वेत चंदन अक्षत बेलपत्र मदार पुष्प और कर्पूर
प्रधान वैदिक अनुष्ठानशिव तांडव स्तोत्र पाठ नटराज स्तुति और ॐ नमः शिवाय मंत्र जप
अपेक्षित फलविवाह बाधा निवारण दांपत्य माधुर्य कलात्मक सिद्धि और बुध शुक्र शांति

माता पार्वती की तपस्या और मर्यादा का विधान

शिव महापुराण की रुद्र संहिता के पावन प्रसंग के अनुसार सती के देहत्याग के पश्चात जब माता पार्वती ने पर्वतराज हिमालय और रानी मैना के घर जन्म लिया तब उन्होंने देवाधिदेव महादेव को पुनः पति रूप में पाने के लिए अत्यंत कठोर तपस्या आरंभ की। उन्होंने सहस्रों वर्षों तक शीत ग्रीष्म और वर्षा के भयानक थपेड़ों को सहते हुए केवल वायु और सूखे बेलपत्रों का भक्षण करके ऐसा भीषण तप किया जिससे तीनों लोकों की चेतना कंपायमान हो उठी। भगवान शिव ने सप्तर्षियों को भेजकर पार्वती के संकल्प की परीक्षा ली और जब माता पार्वती अपने संकल्प पर पर्वत की भांति अडिग रहीं तब आशुतोष महादेव ने स्वयं प्रकट होकर उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार करने का वरदान दिया।

किंतु सनातन धर्म की मर्यादा का नियम यह है कि विवाह केवल दो व्यक्तियों का व्यक्तिगत निर्णय नहीं होता अपितु वह दो कुलों और समाज की सहमति से संपन्न होने वाला पवित्र संस्कार है। देवाधिदेव महादेव यद्यपि संपूर्ण ब्रह्मांड के स्वामी हैं किंतु वे लोक मर्यादा का उल्लंघन कभी नहीं करते। भगवान शिव ने विचार किया कि वे सीधे विवाह का प्रस्ताव लेकर नहीं जाएंगे अपितु माता पार्वती के पिता पर्वतराज हिमालय और माता मैना के हृदय को जीतकर पूर्ण सामाजिक और पारिवारिक सम्मान के साथ पार्वती का पाणिग्रहण करेंगे।

इसी पावन संकल्प के साथ देवाधिदेव महादेव ने अपनी योगमाया से एक अत्यंत विस्मयकारी और अलौकिक लीला की रचना की। उन्होंने एक ऐसे नर्तक का रूप धारण किया जिसकी सुंदरता और कला के सम्मुख स्वर्ग की समस्त अप्सराएं और गंधर्व भी लज्जित हो जाएं।

राजसभा में सुनटनर्तक का आगमन और तांडव नृत्य

पर्वतराज हिमालय के भव्य राजमहल में जब प्रातः कालीन सभा सजी हुई थी और चारों ओर गंधर्वों के वाद्य बज रहे थे तभी राजसभा के मुख्य द्वार पर एक अत्यंत सुंदर युवा संन्यासी नर्तक का प्रवेश हुआ। उनके एक हाथ में दिव्य नाद उत्पन्न करने वाला डमरू था और दूसरे हाथ में चमकता हुआ त्रिशूल था। उनके मस्तक पर जटाएं अत्यंत सुंदर रूप से बंधी हुई थीं उनके कानों में कुंडल झूल रहे थे और उनके शरीर पर दिव्य भस्म की सुगंध फैल रही थी। वह रूप साक्षात सुनटनर्तक का था।

राजसभा में उपस्थित सभी राजा मुनि और दरबारी उस नर्तक के अनुपम सौंदर्य को देखकर स्तब्ध रह गए। सुनटनर्तक ने बिना किसी औपचारिकता के अपने डमरू पर एक अत्यंत मधुर और ब्रह्मांडीय ताल बजाई। उस डमरू के डम डम नाद से संपूर्ण हिमालय पर्वत गूंज उठा। इसके पश्चात भगवान शिव ने अपने पावन चरणों को थिरकाते हुए ऐसा अलौकिक और मुग्धकारी नृत्य आरंभ किया जिसे देखकर काल की गति भी ठहर गई।

  • भगवान शिव का वह नृत्य केवल शारीरिक थिरकन नहीं था अपितु वह संपूर्ण सृष्टि के सृजन पालन और संहार का साक्षात प्रदर्शन था।
  • कभी उनके चरणों की गति इतनी तीव्र हो जाती कि वह प्रलयंकारी तांडव का रूप ले लेती और कभी उनके अंग संचालन में ऐसा लास्य रस प्रवाहित होता कि वातावरण में असीम प्रेम और शांति छा जाती।
  • उनके चेहरे के हाव भाव और नयनों के संकेतों से नवरसों की ऐसी पावन धारा बही कि कठोर से कठोर पाषाण हृदय भी पिघल गए।
  • रानी मैना और राजा हिमालय उस नृत्य के आनंद में इतने विह्वल हो गए कि उनकी आंखों से प्रेमाश्रुओं की अविरल धारा बहने लगी।
  • संपूर्ण राजसभा अपनी सुध बुध खोकर उस नृत्य के सम्मोहन में लीन हो गई और प्रत्येक व्यक्ति को अपने अंतःकरण में असीम परमानंद की अनुभूति होने लगी।

भिक्षा में पार्वती की मांग और लीला विस्तार

जब भगवान सुनटनर्तक ने अपने नृत्य का समापन किया तब पर्वतराज हिमालय अपनी राजसी गरिमा को भूलकर उस नर्तक के चरणों में झुक गए। रानी मैना ने उस नर्तक की कला से परम संतुष्ट होकर कहा कि हे दिव्य नर्तक आज तक तीनों लोकों में किसी ने ऐसा आनंददायी नृत्य नहीं देखा है। हम तुम्हारी कला से अत्यंत प्रसन्न हैं अतः तुम जो चाहो उपहार मांग लो।

राजा हिमालय ने स्वर्ण रत्न हाथी घोड़े और कई नगरों की जागीरें देने का प्रस्ताव रखा। किंतु भगवान सुनटनर्तक ने मंद मुस्कान के साथ अपने सिर को हिलाया और कहा कि मुझे इस नश्वर धन संपत्ति स्वर्ण अथवा जागीरों की कोई आवश्यकता नहीं है। यदि आप वास्तव में मेरी कला से प्रसन्न हैं और मुझे भिक्षा देना चाहते हैं तो मुझे अपनी कन्या पार्वती को भिक्षा के रूप में प्रदान कर दीजिए।

सुनटनर्तक के मुख से यह मांग सुनते ही राजसभा में सन्नाटा छा गया। रानी मैना का हृदय क्रोध और शोक से भर गया। उन्होंने सोचा कि यह कैसा धूर्त और निर्लज्ज नर्तक है जो संपूर्ण राज्य के ऐश्वर्य को ठुकराकर मेरी राजकन्या का हाथ मांग रहा है। रानी मैना ने अत्यंत कटु स्वर में उस नर्तक को राजमहल से बाहर निकालने का आदेश दिया।

किंतु भगवान शिव तो लीला के स्वामी हैं। जैसे ही पहरेदार उस नर्तक को पकड़ने आगे बढ़े वैसे ही सुनटनर्तक ने अपनी योगमाया का चमत्कार दिखाया। वे एक ही क्षण में पर्वतराज को साक्षात चतुर्भुज भगवान विष्णु के रूप में दिखाई दिए अगले ही पल वे ब्रह्मा जी के रूप में दिखे और अंत में वे अपने त्रिशूल डमरू और गंगाधारी साक्षात देवाधिदेव महादेव के स्वरूप में प्रकट होकर अंतर्धान हो गए।

राजा हिमालय का विवेक तत्काल जाग्रत हो गया। वे समझ गए कि यह कोई साधारण नर्तक नहीं अपितु स्वयं देवाधिदेव महादेव थे जो अपनी भावी पत्नी का वरण करने और हमारा उद्धार करने पधारे थे। रानी मैना का भी समस्त मोह और संशय दूर हो गया और उन्होंने अत्यंत प्रसन्नतापूर्वक भगवान शिव के साथ अपनी पुत्री पार्वती के पाणिग्रहण का निर्णय स्वीकार कर लिया।

बुध और शुक्र के दुर्लभ समन्वय का ज्योतिषीय मर्म

वैदिक ज्योतिष के महानतम ग्रंथ बृहत् पराशर होरा शास्त्र में ग्रहों के परस्पर नैसर्गिक गुणों और उनके शुभ योगों का विस्तृत विवेचन मिलता है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से भगवान शिव का सुनटनर्तक नटराज स्वरूप सीधे तौर पर बुध ग्रह और शुक्र ग्रह के परम सात्विक संतुलन का प्रतिनिधित्व करता है।

बुध ग्रह को ज्योतिष में बुद्धि वाणी तर्क कला नृत्य संगीत और सूक्ष्म हाव भाव का अधिपति माना जाता है। किसी भी कला में प्रवीण होना डमरू के तालबद्ध नाद को समझना और अपनी शारीरिक मुद्राओं से भावों को व्यक्त करना बुध का नैसर्गिक प्रभाव है। दूसरी ओर शुक्र ग्रह को संपूर्ण ब्रह्मांड में आकर्षण रूप लावण्य प्रेम दांपत्य सुख विवाह और सौंदर्य का कारक माना गया है।

  • जब किसी जातक की जन्म कुंडली में बुध और शुक्र एक साथ युति बनाते हैं अथवा एक दूसरे से शुभ दृष्टि संबंध रखते हैं तब अत्यंत शुभ लक्ष्मी नारायण योग अथवा गंधर्व योग का निर्माण होता है।
  • सुनटनर्तक शिव का यह स्वरूप सिखाता है कि जब बुद्धि का बुध और प्रेम का शुक्र आपस में मिलते हैं तब जीवन में कला और दांपत्य का सर्वोच्च आनंद प्रकट होता है।
  • यदि कुंडली में केवल शुक्र बली हो और बुध निर्बल हो तो व्यक्ति वासनाओं में भटक जाता है और यदि केवल बुध बली हो तो वह अत्यधिक शुष्क और तार्किक बन जाता है जिससे प्रेम का अभाव हो जाता है।
  • सुनटनर्तक की यह लीला दोनों ग्रहों का वह अमृतमयी संगम है जहां कला ईश्वर को पाने का साधन बन जाती है और प्रेम लोक कल्याण का आधार बन जाता है।

क्या विवाह बाधा और मानसिक नीरसता दूर होती है?

आधुनिक युग में अनेक युवक और युवतियां विवाह में निरंतर होने वाले विलंब और योग्य जीवनसाथी न मिल पाने के कारण मानसिक संताप से घिरे रहते हैं। इसके अतिरिक्त कई लोग अपने वैवाहिक जीवन में प्रेम के अभाव और नीरसता के कारण अलगाव की स्थिति तक पहुंच जाते हैं। इसका मुख्य ज्योतिषीय कारण कुंडली के पंचम भाव प्रेम और सप्तम भाव विवाह का दूषित होना अथवा शुक्र और बुध का पाप ग्रहों से पीड़ित होना है।

भगवान सुनटनर्तक की साधना जातक के आभा मंडल को दिव्य आकर्षण और सात्विक ऊर्जा से परिपूर्ण करती है। जिस प्रकार भगवान शिव ने अपने नृत्य से पर्वतराज हिमालय और रानी मैना के समस्त संशयों को पिघला दिया था उसी प्रकार यह साधना जातक के विवाह मार्ग में आने वाली समस्त सामाजिक पारिवारिक और ज्योतिषीय बाधाओं को समाप्त कर देती है। जो व्यक्ति कला अभिनय संगीत अथवा लेखन के क्षेत्र में हैं उनके लिए सुनटनर्तक का ध्यान उनकी रचनात्मक शक्ति को असीम विस्तार प्रदान करता है।

बुध शुक्र दोष शांति और शीघ्र विवाह के अचूक उपाय

यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में विवाह का योग न बन रहा हो योग्य रिश्ते आकर टूट जाते हों अथवा दांपत्य जीवन में कलह बनी रहती हो तो शास्त्रों में इसके निवारण हेतु अत्यंत प्रभावी वैदिक उपाय बताए गए हैं।

  • प्रत्येक सोमवार और शुक्रवार को सायंकाल के समय स्नान के उपरांत पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें और शिवलिंग पर शुद्ध जल व सुगंधित इत्र अर्पित करते हुए ॐ सुनटनर्तकाय नमः अथवा ॐ नमः शिवाय मंत्र का 108 बार शांत मन से जाप करें।
  • नियमित रूप से सायंकाल के समय महर्षि वेदव्यास रचित शिव तांडव स्तोत्र अथवा नटराज स्तुति का सस्वर पाठ करें जिससे वाणी और शरीर में सात्विक आकर्षण का संचार होता है।
  • शीघ्र विवाह की कामना रखने वाले जातकों को प्रत्येक सोमवार को माता पार्वती और भगवान शिव का संयुक्त पूजन करके उन्हें पीले और श्वेत पुष्पों की संयुक्त माला अर्पित करनी चाहिए।
  • प्रत्येक शुक्रवार को किसी निर्धन सुहागिन स्त्री अथवा कन्या को श्वेत वस्त्र मिश्री खीर अथवा श्रृंगार की सामग्री आदरपूर्वक दान करें जिससे शुक्र ग्रह अत्यंत बलवान होता है।
  • जातक को अपनी शारीरिक अवस्था और योग्य ज्योतिर्विद के परामर्श के अनुसार छह मुखी अथवा चार मुखी नेपाली रुद्राक्ष चांदी के तार में पिरोकर गले में धारण करना चाहिए जो बुध और शुक्र के दोषों को शांत करता है।
  • प्रत्येक बुधवार को गाय को हरी घास अथवा हरा पालक खिलाएं और शुक्रवार को गाय को ताजी रोटी पर शुद्ध घी और गुड़ रखकर खिलाएं जिससे विवाह की समस्त रुकावटें दूर होती हैं।

सुनटनर्तक साधना और कला साधना के आवश्यक नियम

क्या अवश्य करेंकिन गलतियों से सर्वथा दूर रहें
प्रतिदिन प्रातः काल और सायंकाल भगवान शिव और माता पार्वती का स्मरण करेंअपनी कला सौंदर्य बुद्धि अथवा आकर्षण का कभी भी अहंकार न करें
कला नृत्य और संगीत का उपयोग सदैव ईश्वर की स्तुति हेतु करेंकला का प्रयोग कभी भी वासना अथवा अनैतिक आचरण को बढ़ावा देने में न करें
सोमवार और शुक्रवार के दिन पूर्णतः सात्विक और शुद्ध भोजन ग्रहण करेंतामसिक भोजन मदिरा और नशीले पदार्थों का सेवन सर्वथा वर्जित रखें
अपने माता पिता और ससुराल पक्ष के परिजनों का सदैव आदर करेंविवाह के मामलों में छल कपट अथवा झूठ का सहारा लेने से बचें
पूजा में शुद्ध श्वेत चंदन बेलपत्र और सुगंधित इत्र ही अर्पित करेंबिना कुंडली मिलान किए पन्ना अथवा हीरा रत्न पहनने की भूल न करें

नटराज स्वरूप से संपूर्ण जीवन का रूपांतरण

भगवान शिव का सुनटनर्तक अवतार संपूर्ण मानव जाति को यह सनातन शिक्षा प्रदान करता है कि जीवन का प्रत्येक क्षण एक दिव्य नृत्य के समान है। जहां सुख और दुख मिलन और विरह केवल इस ब्रह्मांडीय नाटक के विभिन्न पद संचालन हैं। जब मनुष्य अपने अहंकार को त्यागकर अपनी समस्त कलाओं और भावनाओं को ईश्वर के चरणों में समर्पित कर देता है तब उसका जीवन एक मधुर संगीत बन जाता है। पर्वतराज हिमालय के सम्मुख भगवान शिव का यह नृत्य यह प्रमाणित करता है कि जो सत्ता संपूर्ण सृष्टि का संहार करने में समर्थ है वही सत्ता जब प्रेम में झुकती है तो एक भिक्षुक बनकर पाणिग्रहण करने का विनम्र भाव धारण कर लेती है। बुध की विवेकपूर्ण कला और शुक्र का निष्कपट प्रेम जब शिव साधना से जुड़ते हैं तब जीवन में समस्त बाधाएं विलीन हो जाती हैं। भगवान सुनटनर्तक का नित्य स्मरण मनुष्य के जीवन से विवाह के समस्त अवरोधों को समाप्त करके उसे अखंड दांपत्य सुख कलात्मक सिद्धि और अंततः परम शांति की प्राप्ति कराता है।

FAQ

भगवान शिव ने सुनटनर्तक अवतार किस मुख्य कारण से धारण किया था? भगवान शिव ने पर्वतराज हिमालय और रानी मैना को अपनी दिव्य कला से मुग्ध कर लोक मर्यादा के अनुसार माता पार्वती का हाथ मांगने हेतु सुनटनर्तक रूप धारण किया था।

सुनटनर्तक रूप में भगवान शिव के हाथों में कौन से पावन आयुध थे? सुनटनर्तक रूप में भगवान शिव के एक हाथ में ब्रह्मांडीय नाद उत्पन्न करने वाला डमरू और दूसरे हाथ में चमकता हुआ त्रिशूल सुशोभित था।

ज्योतिष में सुनटनर्तक नटराज स्वरूप का संबंध किन ग्रहों से माना जाता है? वैदिक ज्योतिष में इस स्वरूप का सीधा संबंध कला व बुद्धि के स्वामी बुध देव और सौंदर्य व दांपत्य के कारक शुक्र देव के दुर्लभ समन्वय से माना जाता है।

शीघ्र विवाह और दांपत्य सुख हेतु किस स्तोत्र का पाठ सबसे लाभकारी है? शीघ्र विवाह और दांपत्य कलह से मुक्ति पाने हेतु नियमित रूप से शिव तांडव स्तोत्र और नटराज स्तुति का सस्वर पाठ करना अत्यंत लाभकारी माना गया है।

भगवान सुनटनर्तक ने पर्वतराज हिमालय से भिक्षा में क्या मांगा था? राजा हिमालय द्वारा स्वर्ण रत्न और नगरों का उपहार देने पर सुनटनर्तक ने उन समस्त भौतिक संपदाओं को ठुकराकर केवल उनकी कन्या पार्वती को भिक्षा में मांगा था।

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लेखक

पं. नरेंद्र शर्मा

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