माँ तारा अवतार और गुरु रहस्य क्या?

By पं. नरेंद्र शर्मा

समुद्र मंथन में विषपान शिव रक्षा और देवगुरु बृहस्पति के तारक तेज का संपूर्ण वैदिक ज्योतिषीय रहस्य

माँ तारा अवतार कथा और गुरु ग्रह रहस्य

तारा पूजन मुहूर्त और शास्त्रीय अनुष्ठान विधान

सनातन वैदिक परंपरा और शाक्त तंत्र दर्शन में आद्याशक्ति भगवती महामाया के दस महाविद्या स्वरूपों में द्वितीय और समस्त संकटों से पार लगाने वाली करुणामयी माता के रूप में पूजित भगवती तारा का प्राकट्य ब्रह्मांडीय पोषण वाक् सिद्धि और मोक्ष का सर्वोच्च शिखर है। वैदिक ज्योतिष तथा तत्व विज्ञान के अंतर्गत ज्ञान धर्म नीति और समृद्धि के अधिपति देवगुरु बृहस्पति के समस्त दोषों को शांत करने तथा जीवन में व्याप्त घोर आर्थिक दरिद्रता अज्ञान और वाणी के अवरोधों को समूल नष्ट करने के लिए माँ तारा की आराधना को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जब जातक की जन्म कुंडली में देवगुरु बृहस्पति नीच राशि मकर में स्थित होकर अथवा राहु के साथ गुरु चांडाल योग बनाकर ज्ञानहीनता ऋण संकट आजीविका में पतन अथवा संताहीनता का कष्ट दे रहे हों तब अक्षोभ्य शिव को मस्तक पर धारण करने वाली माँ तारा की शरण में जाने से अक्षय ज्ञान और अतुल्य ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तारा जयंती और इस पावन साधना की तिथि समय तथा शास्त्रीय घटकों का संपूर्ण विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।

शास्त्रीय आयाम अनुष्ठान विवरण और ज्योतिषीय मान्यता
प्रमुख पावन तिथि चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि तारा जयंती अथवा प्रत्येक मास की शुक्ल अष्टमी व गुरुवार
दैनिक पूजन समय अर्धरात्रि का निशीथ काल अथवा प्रातः कालीन ब्रह्म मुहूर्त
अधिष्ठाता स्वरूप नील वर्ण चतुर्भुजा खड्ग कैंची खप्पर और नीलकमल धारिणी माँ तारा
ज्योतिषीय ग्रह व भाव संबंध द्वितीय भाव नवम भाव ज्ञान कारक देवगुरु बृहस्पति और पुनर्वसु नक्षत्र
मुख्य पूजन सामग्री नीलकमल पुष्प अक्षत श्वेत चंदन केसर युक्त खीर शुद्ध गाय का घी और धूप
प्रधान वैदिक अनुष्ठान तारा कवच पाठ नीलसरस्वती स्तोत्र और ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं फट् जप
अपेक्षित फल गुरु चांडाल दोष शांति वाक् सिद्धि घोर दरिद्रता निवारण और अकूत धन प्राप्ति

समुद्र मंथन का कालकूट और हलाहल विष

श्रीमद्भागवत महापुराण और ब्रह्मांड पुराण के पावन आख्यानों के अनुसार प्राचीन काल में जब देवताओं और असुरों ने अमरत्व प्रदान करने वाले अमृत कलश की प्राप्ति हेतु क्षीरसागर का विशाल समुद्र मंथन आरंभ किया तब सर्वप्रथम क्षीरसागर के गर्भ से प्रलयंकारी कालकूट विष प्रकट हुआ जिसे हलाहल विष भी कहा जाता है। उस विष का ताप इतना भयंकर और संहारक था कि उसकी ज्वालाओं से समस्त दिशाएं जलने लगीं। आकाश मंडल में अंधकार छा गया और उस विषैले धुएं से तीनों लोकों के समस्त प्राणी मूर्छित होकर गिरने लगे।

देवराज इंद्र वरुण अग्नि और समस्त देवता उस भयानक ताप को सहन करने में असमर्थ हो गए। जब सृष्टि का अस्तित्व ही समाप्त होने की कगार पर पहुंच गया तब समस्त देवता और ऋषि मुनि भगवान विष्णु के साथ देवाधिदेव महादेव की शरण में कैलाश पर्वत पहुंचे। देवताओं ने आशुतोष शिव के पावन चरणों में गिरकर प्रार्थना की कि हे त्रिलोकीनाथ केवल आप ही इस संहारक विष को अपनी देह में धारण करके इस संपूर्ण चराचर जगत की रक्षा कर सकते हैं।

शरणागत रक्षक भगवान शिव ने समस्त लोकों के कल्याण हेतु बिना एक क्षण का विलंब किए उस प्रलयंकारी हलाहल विष को अपनी हथेली में समेटा और एक ही घूंट में पी गए। उस संहारक विष के प्रभाव को अपने भीतर समाहित करते हुए भगवान शिव ने उसे अपनी उदर गुहा में नहीं जाने दिया अपितु अपने कंठ में ही रोक लिया जिससे उनका कंठ नीला पड़ गया और वे संपूर्ण ब्रह्मांड में नीलकंठ के नाम से विख्यात हुए।

मातृत्व का दुग्ध पान और अक्षोभ्य शिव

यद्यपि भगवान शिव ने उस विष को अपने कंठ में रोक लिया था किंतु कालकूट विष का अग्नि तत्व इतना तीव्र था कि वह देवाधिदेव महादेव के संपूर्ण शरीर को भीतर से जलाने लगा। भगवान शिव का शरीर तपने लगा उनके मस्तिष्क में प्रलयंकारी अग्नि भड़क उठी और असहनीय दाह के कारण वे अचेत होकर गिर पड़े। संपूर्ण ब्रह्मांड में यह देखकर हाहाकार मच गया क्योंकि जिस सत्ता के आधार पर समस्त जगत टिका हुआ था वही सत्ता विष की ज्वाला में मूर्छित हो चुकी थी।

उस संकट की घड़ी में आद्याशक्ति भगवती महामाया ने समस्त लोकों के स्वामी की रक्षा हेतु एक अत्यंत दिव्य करुणामयी और वात्सल्यमयी स्वरूप धारण किया जिसे शास्त्रों में माँ तारा कहा गया है। भगवती तारा ने एक अलौकिक माता का रूप लिया और अचेत पड़े भगवान शिव को अपनी गोद में एक नवजात अबोध बालक की भांति उठा लिया।

माता तारा ने अपने मातृत्व के अगाध वात्सल्य से भगवान शिव को अपने स्तनों से अमृतमयी दुग्ध का पान कराया। माता के उस पावन दुग्ध में समस्त ब्रह्मांड की शीतलता और अमृत तत्व समाहित था।

  • जैसे ही वह दिव्य दुग्ध भगवान शिव के कंठ में पहुंचा वैसे ही कालकूट विष की समस्त संहारक अग्नि शांत हो गई।
  • भगवान शिव का शारीरिक दाह समाप्त हो गया उनकी चेतना पुनः लौट आई और उनका चित्त परमानंद में लीन हो गया।
  • जिस प्रकार एक माता अपने रोते हुए बालक को दूध पिलाकर संकट से उबार लेती है उसी प्रकार भगवती ने महादेव को काल के मुख से तार लिया।
  • भगवान शिव और संपूर्ण जगत को उस विषैले सागर से पार लगाने अर्थात तारने के कारण ही वे संपूर्ण संसार में माँ तारा और तारिणी के नाम से अमर हुईं।

जब भगवान शिव पूर्ण स्वस्थ होकर उठे तब उन्होंने कृतज्ञता पूर्वक माता तारा के इस परम वात्सल्य भाव को नमन किया। भगवान शिव ने उस विष की तनिक भी क्षोभ न उत्पन्न करने वाली शांत अवस्था को धारण किया इसलिए वे अक्षोभ्य शिव कहलाए। भगवान शिव ने माता तारा के मस्तक पर एक दिव्य मणि के समान अपना स्थायी वास बना लिया। यही कारण है कि शाक्त आगम में माँ तारा की मूर्ति के मस्तक पर सदा अक्षोभ्य रूपी शिव लिंग अथवा शिव विग्रह सुशोभित रहता है जो यह दर्शाता है कि ज्ञान और वैराग्य सदा शक्ति के संरक्षण में ही स्थिर रहते हैं।

तीन दिव्य स्वरूप उग्रतारा नीलसरस्वती और एकजटा

शाक्त तंत्र दर्शन के अंतर्गत भगवती तारा की आराधना तीन प्रमुख रूपों में की जाती है जो साधक की विभिन्न भौतिक और आध्यात्मिक कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं।

  • उग्रतारा यह देवी का वह अत्यंत तेजस्वी और संहारक रूप है जो अपने हाथों में तीक्ष्ण खड्ग और नरमुंड धारण करता है। यह रूप साधक को भयंकर दुर्घटनाओं शत्रुओं के प्राणघातक षड्यंत्रों असाध्य रोगों और जीवन मरण के घोर संकटों से तत्काल मुक्ति दिलाता है।
  • नीलसरस्वती यह देवी का वह विद्या प्रदाता स्वरूप है जो बुद्धि वाणी काव्य रचना और शास्त्रों के गूढ़ ज्ञान का अधिष्ठाता है। जो साधक विद्या अध्ययन लेखन अनुसंधान अथवा वक्तृत्व कला में शिखर पर पहुंचना चाहते हैं उनके लिए नीलसरस्वती साधना साक्षात सरस्वती का वरदान सिद्ध होती है।
  • एकजटा यह माता तारा का वह योगिनी स्वरूप है जो साधक के चित्त को एकाग्र कर उसे समाधि और कुंडलिनी जागरण की ओर ले जाता है। एक ही जटा धारण करने वाली यह देवी मन के समस्त भटकावों को समेटकर आत्मा को ब्रह्म ज्ञान प्रदान करती हैं।

देवगुरु बृहस्पति और वाक् सिद्धि का ज्योतिषीय मर्म

वैदिक ज्योतिष के महानतम ग्रंथ बृहत् पराशर होरा शास्त्र में जन्म कुंडली के नवम भाव और द्वितीय भाव का संबंध सीधे तौर पर व्यक्ति के ज्ञान धर्म और वाणी से माना गया है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से दसमहाविद्याओं में माँ तारा सीधे तौर पर देवगुरु बृहस्पति की सर्वोच्च अधिष्ठात्री महाशक्ति हैं।

देवगुरु बृहस्पति सौरमंडल के सबसे विशाल और सबसे शुभ ग्रह हैं जो बुद्धि उच्च ज्ञान धर्म वसीयत संतान और धन के नैसर्गिक कारक हैं। जब किसी जातक की जन्म कुंडली में गुरु ग्रह पीड़ित होता है तो व्यक्ति को अज्ञान घेर लेता है उसकी निर्णय क्षमता भ्रष्ट हो जाती है और वह अपने ही मुख से ऐसे शब्द बोलता है जिससे उसके सारे संबंध और व्यापार नष्ट हो जाते हैं। कुंडली का द्वितीय भाव वाणी और संचित धन का केंद्र होता है तथा नवम भाव भाग्य और उच्च धर्म का स्थान होता है।

जब कुंडली में गुरु राहु के साथ बैठकर गुरु चांडाल योग निर्मित करता है अथवा मकर राशि में नीच का हो जाता है तो जातक घोर आर्थिक दरिद्रता का शिकार हो जाता है। माँ तारा साक्षात तारक ब्रह्म की शक्ति हैं जिनका ध्यान करने से गुरु ग्रह का तारक तेज जाग्रत होता है। प्राचीन काल में महर्षि वशिष्ठ ने तिब्बत और कामाख्या के समीप इसी तारा साधना के बल पर अमोघ वाक् सिद्धि प्राप्त की थी जिसके पश्चात उनके मुख से निकला प्रत्येक शब्द साक्षात सत्य में परिणत हो जाता था। तारा साधना साधक की जिह्वा पर साक्षात सरस्वती को स्थापित कर देती है और उसके घर में कुबेर के समान अखंड धन का प्रवाह आरंभ हो जाता है।

क्या आर्थिक दरिद्रता और वाणी दोष तारा साधना से मिटते हैं?

आधुनिक युग में मनुष्य की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वह कठोर परिश्रम करने के उपरांत भी आर्थिक तंगी और ऋण के जाल से मुक्त नहीं हो पाता। अनेक योग्य व्यक्ति अपनी बात को सही ढंग से प्रस्तुत न कर पाने के कारण साक्षात्कारों व्यापारिक बैठकों अथवा सार्वजनिक मंचों पर असफल हो जाते हैं। वाणी का यह दोष और निरंतर बनी रहने वाली दरिद्रता वस्तुतः गुरु और द्वितीय भाव के दूषित होने का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

भगवती तारा साक्षात नीलसरस्वती हैं जो साधक के कंठ में स्थित विशुद्ध चक्र को जाग्रत करती हैं। जिस प्रकार माता तारा ने समुद्र मंथन के हलाहल विष को शांत करके भगवान शिव को नवजीवन दिया था उसी प्रकार वे साधक के जीवन में चल रहे आर्थिक विष और असफलताओं के घोर ताप को अपने मातृत्व की कृपा से शांत कर देती हैं। जो जातक नियमित रूप से तारा स्तोत्र का पाठ करता है उसके भीतर की हिचकिचाहट और वाणी दोष समाप्त हो जाते हैं और उसके जीवन में धन आगमन के नए मार्ग स्वतः प्रशस्त होने लगते हैं।

देवगुरु बृहस्पति शांति और तारा कृपा के वैदिक उपाय

यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में देवगुरु बृहस्पति निर्बल हों गुरु चांडाल योग बन रहा हो विद्या में रुकावटें आ रही हों अथवा व्यापार में भारी आर्थिक घाटा हो रहा हो तो शास्त्रों में माँ तारा की प्रसन्नता हेतु अत्यंत प्रामाणिक उपाय बताए गए हैं।

  • प्रत्येक गुरुवार अथवा चैत्र शुक्ल नवमी के दिन प्रातः काल स्नान के उपरांत पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें और माँ तारा के चित्र अथवा यंत्र के सम्मुख शुद्ध गाय के घी का दीपक जलाकर पावन बीज मंत्र ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं फट् अथवा ॐ तारे तुत्तारे तुरे स्वाहा का 108 बार शांत मन से जाप करें।
  • अपने भीतर वाक् सिद्धि और तीव्र बुद्धि जाग्रत करने हेतु प्रतिदिन प्रातः काल महर्षि वशिष्ठ विरचित नीलसरस्वती स्तोत्र अथवा तारा अष्टकम का सस्वर पाठ करें।
  • प्रत्येक गुरुवार को किसी प्राचीन शिव मंदिर अथवा शक्तिपीठ में जाकर शिवलिंग और माँ तारा को पीले पुष्प नीलकमल और केसर युक्त खीर का भोग अर्पित करें।
  • अपने गुरु आध्यात्मिक शिक्षकों और विद्वान ब्राह्मणों का नित्य प्रातः काल चरण स्पर्श करके आशीर्वाद लें क्योंकि गुरुजनों का सम्मान करने से देवगुरु बृहस्पति अत्यंत बलवान होते हैं।
  • जातक को अपनी शारीरिक अवस्था और योग्य ज्योतिर्विद के परामर्श के अनुसार पांच मुखी अथवा ग्यारह मुखी नेपाली रुद्राक्ष पीले रेशमी धागे में पिरोकर गुरुवार के दिन धारण करना चाहिए।
  • प्रत्येक गुरुवार को गाय को भीगी हुई चने की दाल हल्दी और गुड़ मिलाकर खिलाएं तथा निर्धन विद्यार्थियों को पुस्तकें कापियां और पीले वस्त्र आदरपूर्वक दान करें।

तारा साधना और आचरण के आवश्यक शास्त्रीय नियम

क्या अवश्य करें किन गलतियों से सर्वथा दूर रहें
प्रतिदिन प्रातः काल उठकर अपनी वाणी में सत्य और मधुरता का संकल्प लें अपनी विद्या बुद्धि ज्ञान अथवा धन का कभी भी अहंकार न करें
माँ तारा को सदैव नीलकमल श्वेत चंदन और शुद्ध खीर का भोग लगाएं कभी भी किसी गुरु शिक्षक विद्वान अथवा ब्राह्मण का अनादर न करें
गुरुवार और अष्टमी तिथि को पूर्णतः सात्विक और शुद्ध भोजन ग्रहण करें तामसिक भोजन मदिरा और किसी भी प्रकार के नशीले पदार्थों से दूर रहें
अपनी वाणी का प्रयोग सदैव समाज के कल्याण और सत्य की स्थापना में करें अपनी जिह्वा से कभी किसी को अपशब्द अथवा झूठे वचन न कहें
पूजा में शुद्ध गंगाजल भस्म और शुद्ध सुगंधित धूप का ही प्रयोग करें बिना योग्य गुरु के मार्गदर्शन के श्मशान तारा साधना में न उलझें

अमोघ वात्सल्य और तारक चेतना का परम विस्तार

भगवती तारा का पावन अवतार संपूर्ण मानव जाति को यह सनातन शिक्षा प्रदान करता है कि जब संसार के समस्त उपाय और सांसारिक संबंध विफल हो जाएं तब केवल ईश्वरीय मातृत्व ही जीव का परम त्राण बनता है। भगवान शिव जैसी संहारक सत्ता को भी जब विष के ताप से मुक्ति पाने हेतु माता के आंचल की आवश्यकता पड़ी तो साधारण मनुष्य की क्या बिसात है। माँ तारा केवल एक देवी नहीं हैं अपितु वे इस संसार रूपी भवसागर से पार लगाने वाली वह परम तारक नौका हैं जिस पर सवार होकर अज्ञानी से अज्ञानी प्राणी भी मोक्ष के तट पर पहुंच जाता है। जब साधक अपने समस्त अहंकारों को त्यागकर एक बालक की भांति माँ तारा की शरण में जाता है तब उसके समस्त सांसारिक कष्ट क्षणभर में भस्म हो जाते हैं। माँ तारा का नित्य स्मरण मनुष्य के भीतर सोई हुई दिव्य प्रज्ञा को जाग्रत करता है उसे समस्त आर्थिक दरिद्रताओं और ग्रह दोषों से मुक्त करता है और उसे इस संसार में एक यशस्वी परम विद्वान और सम्मानित व्यक्तित्व बनाकर अंततः परम शांति की प्राप्ति कराता है।

FAQ

माँ तारा को तारिणी और तारा नाम किस कारण से प्राप्त हुआ? समुद्र मंथन के समय कालकूट विष पीकर अचेत हुए भगवान शिव को अपने मातृत्व के दुग्ध से नवजीवन देकर विष सागर से तारने के कारण भगवती को तारा कहा जाता है।

माँ तारा के मस्तक पर अक्षोभ्य शिव क्यों विराजमान हैं? विषपान के पश्चात शांत और निर्विकार हुए भगवान शिव ने माता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए उनके मस्तक पर वास किया इसलिए उन्हें अक्षोभ्य शिव कहा जाता है।

माँ तारा के तीन प्रमुख दिव्य स्वरूप कौन से हैं? माँ तारा के तीन प्रमुख स्वरूप उग्रतारा जो संकटों का नाश करती हैं नीलसरस्वती जो बुद्धि व वाणी देती हैं और एकजटा जो ध्यान व मोक्ष प्रदान करती हैं।

ज्योतिष में माँ तारा का संबंध किस प्रमुख ग्रह से माना जाता है? वैदिक ज्योतिष में माँ तारा का सीधा संबंध ज्ञान बुद्धि धर्म और धन के कारक ग्रह देवगुरु बृहस्पति से माना जाता है।

वाक् सिद्धि और घोर आर्थिक दरिद्रता से मुक्ति हेतु किस स्तोत्र का पाठ करना चाहिए? वाणी दोष दूर करने और आर्थिक दरिद्रता से मुक्ति पाने हेतु प्रतिदिन महर्षि वशिष्ठ विरचित नीलसरस्वती स्तोत्र और तारा कवच का पाठ करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

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लेखक

पं. नरेंद्र शर्मा

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