By पं. नीलेश शर्मा
कामदेव का पुनर्जीवन भंडासुर वध श्रीयंत्र की स्वामिनी और शुक्र ग्रह के राजयोग का संपूर्ण रहस्य

सनातन वैदिक परंपरा और शाक्त श्रीकुल आगम दर्शन में आद्याशक्ति भगवती महामाया के दस महाविद्या स्वरूपों में तृतीय और राजराजेश्वरी के रूप में पूजित भगवती ललिता महात्रिपुरसुंदरी का प्राकट्य ब्रह्मांडीय सौंदर्य परम चेतना काम विजय और मोक्ष का सर्वोच्च शिखर है। वैदिक ज्योतिष तथा तत्व विज्ञान के अंतर्गत सौंदर्य ऐश्वर्य कला प्रेम और दांपत्य सुख के अधिपति शुक्र देव के समस्त दोषों को शांत करने तथा जन्म कुंडली के पंचम भाव के पूर्व संचित पुण्य बुद्धि और मंत्र सिद्धि को जाग्रत करने के लिए माँ त्रिपुरसुंदरी की उपासना को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जब जातक की जन्म कुंडली में शुक्र ग्रह नीच राशि कन्या में स्थित होकर अथवा पाप ग्रहों से पीड़ित होकर जीवन में आकर्षण हीनता दांपत्य कलह आर्थिक अभाव अथवा संतान संबंधी चिंताएं उत्पन्न कर रहा हो तब श्रीचक्र स्वामिनी माँ षोडशी की शरण में जाने से समस्त 16 कलाओं की सिद्धि राजयोग और अकूत संपदा की प्राप्ति होती है। माघ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा ललिता जयंती और इस पावन साधना की तिथि समय तथा शास्त्रीय घटकों का संपूर्ण विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।
| शास्त्रीय आयाम | अनुष्ठान विवरण और ज्योतिषीय मान्यता |
|---|---|
| प्रमुख पावन तिथि | माघ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा ललिता जयंती अथवा प्रत्येक मास की शुक्ल त्रयोदशी व शुक्रवार |
| दैनिक पूजन समय | प्रातः कालीन ब्रह्म मुहूर्त अथवा सायंकालीन गोधूलि प्रदोष काल |
| अधिष्ठाता स्वरूप | बाल सूर्य के समान कांति वाली चतुर्भुजा पाश अंकुश इक्षु कोदंड और पुष्प बाण धारिणी षोडशी |
| ज्योतिषीय ग्रह व भाव संबंध | पंचम भाव सप्तम भाव सौंदर्य कारक शुक्र देव और पूर्व फाल्गुनी नक्षत्र |
| मुख्य पूजन सामग्री | कुमकुम अष्टगंध रक्त चंदन कमल पुष्प अक्षत केसर युक्त खीर और श्रीयंत्र |
| प्रधान वैदिक अनुष्ठान | श्री सूक्त पाठ ललिता सहस्रनाम और ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुरसुंदर्यै नमः जप |
| अपेक्षित फल | शुक्र दोष शांति 16 कलाओं की पूर्णता अखंड राजयोग और परम ऐश्वर्य |
ब्रह्मांड पुराण के अत्यंत पावन ललितोपाख्यान के अनुसार जब तारकासुर के संहार हेतु भगवान शिव के वीर्य से स्कंद के जन्म की आवश्यकता थी तब देवताओं ने देवाधिदेव महादेव की समाधि भंग करने के लिए कामदेव को भेजा था। कामदेव ने जब भगवान शिव पर अपने काम बाण का संधान किया तब महादेव के तृतीय नेत्र से प्रलयंकारी क्रोधाग्नि प्रस्फुटित हुई जिसने कामदेव को क्षणभर में भस्म कर दिया। कामदेव की उस भस्म को देखकर भगवान शिव के परम प्रिय गण चित्रकर्मा ने एक अत्यंत सुंदर बालक की आकृति निर्मित की और उसे देख भगवान शिव ने उस पर अपनी दृष्टि डाली।
उस पावन राख और शिव की तेजमयी दृष्टि से एक अत्यंत भयानक विशालकाय और महाबली दैत्य प्रकट हुआ। जब उसने जन्म लेते ही भगवान रुद्र की स्तुति की तब भगवान शिव ने प्रसन्न होकर कहा कि तूने अत्यंत सुंदर कार्य किया है अतः तेरा नाम भंडासुर होगा। भगवान शिव ने उसे सहस्रों वर्षों तक अजेय रहने और तीनों लोकों पर शासन करने का दुर्लभ वरदान प्रदान किया।
वरदान प्राप्त करते ही भंडासुर के भीतर का आसुरी अहंकार जाग उठा। उसने शुक्राचार्य को अपना गुरु बनाया और दैत्यों की एक विशाल सेना एकत्र करके स्वर्ग लोक पर आक्रमण कर दिया। उसने समस्त देवताओं को स्वर्ग से निष्कासित कर दिया और इंद्र की अमरावती के समान ही पाताल में शून्याक नामक एक भव्य नगरी का निर्माण किया। भंडासुर के अत्याचारों से तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। उसने समस्त यज्ञों को बंद करा दिया देवताओं के तेज को हर लिया और संपूर्ण पृथ्वी पर धर्म का नाश कर दिया।
जब भंडासुर के अत्याचार असहनीय हो गए तब देवराज इंद्र और समस्त देवता महर्षि नारद के परामर्श पर हिमालय की शरण में पहुंचे। देवताओं ने भंडासुर से रक्षा हेतु एक अत्यंत गुप्त और महाकठिन महायाग आरंभ किया जिसे शास्त्रों में महाकामेष्टि यज्ञ कहा गया है। देवताओं ने अपने संपूर्ण ऐश्वर्य अपने अंगों और अपनी प्राण चेतना की आहुति उस पावन यज्ञ की अग्नि में समर्पित कर दी।
देवताओं के उस अखंड आत्मोत्सर्ग और निष्काम भक्ति से संतुष्ट होकर उस महायज्ञ के चिदग्नि कुंड से एक अत्यंत दिव्य तेजस्वी और अलौकिक प्रकाश पुंज प्रकट हुआ। उस ज्योतिर्मय प्रकाश के मध्य से साक्षात भगवती ललिता महात्रिपुरसुंदरी का प्राकट्य हुआ।
उनका रूप इतना मनोहारी और दिव्य था कि संपूर्ण ब्रह्मांड का सौंदर्य भी उनके सम्मुख तुच्छ प्रतीत हो रहा था। वे सदा 16 वर्ष की नित्य युवती के रूप में सुशोभित थीं इसलिए उन्हें षोडशी कहा गया। उनके शरीर की कांति प्रातः कालीन उदित होते हुए सहस्र सूर्यों के समान अरुणाभ थी। उनके चार पावन हाथों में चार अत्यंत गोपनीय आयुध सुशोभित थे।
समस्त देवताओं ने हाथ जोड़कर साष्टांग प्रणाम करते हुए भगवती राजराजेश्वरी की स्तुति की। भगवान शिव ने कामेश्वर रूप में प्रकट होकर भगवती के साथ पाणिग्रहण किया और उन्हें संपूर्ण ब्रह्मांड की साम्राज्ञी के रूप में प्रतिष्ठित किया।
भगवती ललिता त्रिपुरसुंदरी ने भंडासुर के संहार हेतु अपनी दिव्य सेना के साथ प्रस्थान किया। देवी जिस दिव्य रथ पर सवार थीं उसे चक्रराज रथ कहा जाता है जो साक्षात श्रीचक्र अर्थात श्रीयंत्र का साकार रूप था। उस रथ में 9 मंजिलें थीं जो श्रीयंत्र के 9 आवरणों का प्रतिनिधित्व करती थीं।
युद्ध भूमि में भगवती के साथ उनकी प्रधान मंत्रिणी भगवती श्यामला मातंगी गेयचक्र रथ पर और प्रधान सेनापति भगवती वाराही दण्डिनी किरिचक्र रथ पर सवार थीं। भंडासुर ने अपने भाइयों विशुक्र और विषंग के साथ मिलकर एक अत्यंत प्रलयंकारी आसुरी सेना के साथ आक्रमण किया।
जेष्ठ पर्वतों के समीप कई दिनों तक भीषण युद्ध चला। भगवती वाराही ने अपने हल और मूसल से भंडासुर के भाई विषंग का वध किया और भगवती मातंगी ने अपने बाणों से विशुक्र का अंत किया। अंत में जब भंडासुर ने महामोह और अंधकार के भयानक अस्त्र चलाए तब भगवती ललिता ने अपने चक्रराज रथ से कामेश्वर अस्त्र का संधान किया। उस अमोघ अस्त्र के तेज ने भंडासुर की शून्याक नगरी सहित भंडासुर को क्षणभर में भस्म कर दिया और धर्म की पुनः स्थापना की।
भंडासुर के वध के पश्चात भगवती ने भगवान शिव की ओर अपनी अमृतमयी दृष्टि डाली। उस दिव्य दृष्टि के प्रभाव से शिवजी के तृतीय नेत्र से भस्म हुए कामदेव पुनः जीवित हो उठे। भगवती ने कामदेव को स्थूल शरीर के स्थान पर सूक्ष्म और अनंग रूप प्रदान किया और आदेश दिया कि वे संसार में धर्म सम्मत प्रेम और सृष्टि के विस्तार के आधार बनें।
शाक्त आगम और श्रीविद्या साधना में श्रीयंत्र को संपूर्ण ब्रह्मांड का नक्शा और यंत्रराज माना गया है। श्रीयंत्र के केंद्र में एक बिंदु होता है जो साक्षात कामेश्वर और कामेश्वरी के अद्वैत मिलन का प्रतीक है।
श्रीयंत्र की संरचना 9 अंतर्ग्रथित त्रिकोणों से होती है जिसमें 4 त्रिकोण ऊपर की ओर मुख किए हुए शिव के प्रतीक हैं और 5 त्रिकोण नीचे की ओर मुख किए हुए शक्ति के प्रतीक हैं। इन त्रिकोणों के परस्पर मिलन से 43 अत्यंत शक्तिशाली त्रिकोणों का निर्माण होता है जो 8 पंखुड़ियों वाले कमल 16 पंखुड़ियों वाले कमल और तीन रेखाओं वाले भूपुर से घिरे रहते हैं।
माँ त्रिपुरसुंदरी को षोडशी इसलिए कहा जाता है क्योंकि वे चंद्रमा की समस्त 16 कलाओं की अधिष्ठात्री हैं। मानव जीवन में 16 कलाओं की पूर्णता का अर्थ है कि व्यक्ति के भीतर कोई भी अभाव शेष न रहे। उसे सांसारिक दृष्टि से अपार भोग धन और सम्मान प्राप्त हो तथा आध्यात्मिक दृष्टि से परम मोक्ष की प्राप्ति हो। जो साधक श्रीयंत्र के सम्मुख बैठकर ललिता सहस्रनाम का पाठ करता है उसके जीवन में साक्षात महालक्ष्मी और सरस्वती का स्थायी वास हो जाता है।
वैदिक ज्योतिष के आधार ग्रंथ बृहत् पराशर होरा शास्त्र में ग्रहों के आत्मिक और सांसारिक प्रभाव का गहरा विवेचन मिलता है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से माँ त्रिपुरसुंदरी सीधे तौर पर शुक्र ग्रह और जन्म कुंडली के पंचम भाव की सर्वोच्च अधिष्ठात्री देवी हैं।
शुक्र देव को ज्योतिष में सौंदर्य प्रेम आकर्षण ऐश्वर्य वाहन कला और संजीवनी विद्या का स्वामी माना गया है। जब कुंडली में शुक्र बली होता है तो व्यक्ति अत्यंत सुंदर आकर्षक धनवान और समाज में लोकप्रिय होता है। कुंडली का पंचम भाव बुद्धि विवेक पूर्व पुण्य विद्या प्रेम संबंधों और मंत्र सिद्धि का स्थान होता है।
संसार में प्रायः यह माना जाता है कि भोग और मोक्ष दोनों एक दूसरे के विरोधी हैं। जो व्यक्ति सांसारिक सुखों में लिप्त रहता है उसे मोक्ष नहीं मिलता और जो मोक्ष चाहता है उसे संसार का त्याग करना पड़ता है। किंतु माँ ललिता त्रिपुरसुंदरी की साधना इस धारणा को पूरी तरह खंडित करती है।
श्रीविद्या का मूल सिद्धांत ही भोग और मोक्ष का एक साथ समन्वय करना है। माँ ललिता अपने साधक को चक्रवर्ती राजा के समान समस्त सांसारिक वैभव वाहन स्वर्ण और सुंदर दांपत्य जीवन प्रदान करती हैं और अंत समय में उसे अपने पावन धाम मणिद्वीप में परम मोक्ष प्रदान करती हैं। जिस प्रकार कमल का पुष्प जल में रहकर भी जल से अछूता रहता है उसी प्रकार त्रिपुरसुंदरी का साधक संसार के समस्त ऐश्वर्य का आनंद लेते हुए भी भीतर से पूर्ण विरक्त और शिवमय बना रहता है।
यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में शुक्र ग्रह पीड़ित हो दांपत्य जीवन में नीरसता अथवा विवाद रहता हो कला व व्यापार में मंदी हो अथवा आर्थिक संकट घेरे रहता हो तो शास्त्रों में माँ त्रिपुरसुंदरी की प्रसन्नता हेतु अत्यंत प्रामाणिक उपाय बताए गए हैं।
| क्या अवश्य करें | किन गलतियों से सर्वथा दूर रहें |
|---|---|
| प्रतिदिन प्रातः काल उठकर अपनी माता और कुलदेवी का आदरपूर्वक नमन करें | स्त्रियों का कभी भी अनादर कटु वचन अथवा अपमान करने से बचें |
| श्रीयंत्र को सदैव स्वच्छ पवित्र और रेशमी लाल वस्त्र पर ही स्थापित करें | घर के पूजा स्थल पर खंडित अथवा अशुद्ध श्रीयंत्र कभी न रखें |
| शुक्रवार और पूर्णिमा के दिन पूर्णतः सात्विक और पवित्र भोजन ग्रहण करें | तामसिक भोजन मदिरा और किसी भी प्रकार के अनैतिक आचरण से दूर रहें |
| अपने जीवनसाथी के प्रति सदैव पूर्ण निष्ठा और प्रेम भाव बनाए रखें | पराई स्त्री अथवा कामुक विचारों के प्रति अपने मन को भटकने न दें |
| पूजा में शुद्ध कुमकुम रक्त चंदन कमल पुष्प और घी का दीपक जलाएं | बिना सोचे समझे किसी पर कटाक्ष करने अथवा झूठा दंभ भरने से बचें |
भगवती ललिता महात्रिपुरसुंदरी का पावन अवतार संपूर्ण मानव जाति को यह सनातन संदेश देता है कि सौंदर्य का वास्तविक स्रोत बाहर के नश्वर संसार में नहीं अपितु आत्मा के अंतःकरण में विद्यमान है। जब मनुष्य अपने भीतर की वासना रूपी भंडासुर को ज्ञान और विवेक के अंकुश से नष्ट कर देता है तब उसके भीतर साक्षात कामेश्वर और कामेश्वरी का दिव्य मिलन घटित होता है। श्रीयंत्र का प्रत्येक त्रिकोण हमें यह सिखाता है कि जीवन के प्रत्येक आयाम को किस प्रकार संतुलित और आनंदमय बनाया जाए। माँ त्रिपुरसुंदरी केवल संहारक नहीं हैं वे कामदेव को पुनर्जीवित करने वाली परम करुणामयी माता हैं जो हमारे भीतर के पवित्र प्रेम को अमर बना देती हैं। माँ षोडशी का नित्य स्मरण मनुष्य के जीवन से समस्त दरिद्रता शुक्र दोषों और अशांति को समाप्त करके उसे 16 कलाओं से युक्त पूर्ण पुरुषार्थ अखंड ऐश्वर्य और अंततः परम पद की प्राप्ति कराता है।
माँ त्रिपुरसुंदरी को षोडशी क्यों कहा जाता है? माँ त्रिपुरसुंदरी सदा 16 वर्ष की दिव्य युवती के रूप में सुशोभित रहती हैं और वे चंद्रमा की समस्त 16 कलाओं की स्वामिनी हैं इसलिए उन्हें षोडशी कहा जाता है।
भंडासुर का जन्म किस प्रकार हुआ था? भगवान शिव के तीसरे नेत्र से भस्म हुए कामदेव की पावन राख से शिवगण चित्रकर्मा द्वारा बनाई गई आकृति पर महादेव की दृष्टि पड़ने से भंडासुर का जन्म हुआ था।
माँ ललिता त्रिपुरसुंदरी के हाथों में कौन से चार दिव्य आयुध हैं? माँ ललिता के चार हाथों में गन्ने का धनुष जो मन का प्रतीक है 5 पुष्प बाण जो ज्ञानेंद्रियों के प्रतीक हैं पाश जो राग का प्रतीक है और अंकुश जो विवेक का प्रतीक है सुशोभित हैं।
ज्योतिष में माँ त्रिपुरसुंदरी का संबंध किस ग्रह और भाव से है? वैदिक ज्योतिष में माँ त्रिपुरसुंदरी का सीधा संबंध ऐश्वर्य व सौंदर्य के कारक शुक्र ग्रह और जन्म कुंडली के पंचम भाव पूर्व पुण्य व मंत्र सिद्धि से है।
श्रीयंत्र की पूजा से साधक को क्या फल प्राप्त होता है? श्रीयंत्र की नियमित पूजा और ललिता सहस्रनाम के पाठ से साधक को जीवन में समस्त 16 कलाओं की पूर्णता अखंड धन धान्य राजयोग और मोक्ष प्राप्त होता है।
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