By पं. अमिताभ शर्मा
मित्रावरुण के कुंभ से प्राकट्य कामधेनु रक्षा और समुद्र पान

सनातन वैदिक परंपरा में महर्षि वशिष्ठ और महर्षि अगस्त्य को आत्मज्ञान, तपस्या और ब्रह्मांडीय संतुलन के सर्वोच्च आधार स्तंभ के रूप में पूजा जाता है। जब किसी जातक के जीवन में बौद्धिक जड़ता, अहंकार जनित बाधाएं, गुरु कृपा का अभाव अथवा पितृ दोष के कारण उन्नति अवरुद्ध हो जाती है तब इन दोनों दिव्य ऋषियों की साधना अचूक फल प्रदान करती है। यह अनुष्ठान मनुष्य की अंतरात्मा को जाग्रत कर उसके चित्त से तमोगुण का नाश करता है और आध्यात्मिक तेज का संचार करता है। इस विशिष्ट उपासना को संपन्न करने के लिए शास्त्रोक्त तिथियों, पवित्र सामग्रियों और शुद्ध आचरण के नियम विस्तार से बताए गए हैं।
| साधना अंग | वैदिक विधान और शास्त्रोक्त निर्देश |
|---|---|
| शुभ काल और तिथि | भाद्रपद शुक्ल पंचमी अर्थात ऋषि पंचमी अथवा शरद ऋतु में अगस्त्य तारा उदय काल |
| अधिष्ठाता देवता | भगवान मित्रावरुण, ब्रह्मर्षि वशिष्ठ और महर्षि अगस्त्य |
| सिद्ध बीज मंत्र | ॐ वशिष्ठाय नमः अथवा ॐ अगस्त्याय नमः |
| पूजन सामग्री | शुद्ध ताम्र पात्र, गंगाजल, कुश, श्वेत चंदन, तुलसी पत्र, दूर्वा, अक्षत और श्वेत पुष्प |
| आध्यात्मिक फल | ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति, अहंकार का विनाश, जल जनित रोगों का निवारण और बुद्धि शुद्धि |
इस साधना को प्रारंभ करने के लिए प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि नित्यकर्म से निवृत्त हो जाएं। स्वच्छ श्वेत वस्त्र धारण कर पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। पूजा वेदी पर तांबे का एक शुद्ध कलश स्थापित करें और उसके सम्मुख शुद्ध गोघृत का दीपक प्रज्वलित करें।
नियमित रूप से इस साधना का अनुष्ठान करने से बुद्धि का संशय समाप्त होता है और निर्णय क्षमता में अद्भुत स्पष्टता आती है। यह अनुष्ठान साधक को यह दिव्य संदेश देता है कि संसार का सबसे बड़ा बल शारीरिक अथवा सैन्य बल नहीं है बल्कि तपोबल और क्षमा का बल ही मनुष्य को अमर बनाता है।
वैदिक संहिताओं में वर्णित आख्यानों के अनुसार सृष्टि के संचालन में भगवान मित्र और वरुण का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। मित्र देव दिन, प्रकाश, सत्य और मैत्री के अधिष्ठाता हैं जबकि वरुण देव रात्रि, ब्रह्मांडीय जल और नैतिक नियमों के रक्षक हैं। एक बार देवराज इंद्र की सभा में अप्सरा उर्वशी उपस्थित हुई। उर्वशी का अलौकिक सौंदर्य और उसका लावण्य इतना सम्मोहक था कि उसे देखकर मित्र और वरुण दोनों देवता मुग्ध हो गए।
उन दोनों देवताओं के अंतःकरण में एक ही समय दिव्य आकर्षण का संचार हुआ और उनका अमोघ वीर्य स्खलित हो गया। देवताओं के उस परम तेजस्वी वीर्य को भूमि पर गिरने से बचाने के लिए एक स्वर्ण आभा से युक्त दिव्य कुंभ अर्थात मिट्टी के पवित्र कलश में सुरक्षित स्थापित किया गया। वह कलश केवल एक साधारण पात्र नहीं था अपितु समस्त ब्रह्मांडीय शक्तियों को धारण करने वाला एक दिव्य गर्भ था।
उस पवित्र कुंभ के भीतर देवताओं का वह तेज घनीभूत हुआ और कुछ काल पश्चात उससे दो परम तेजस्वी बालकों का प्राकट्य हुआ।
उस कुंभ से सबसे पहले जो बालक बाहर आए वे परम शांत, ब्रह्म तेज से संपन्न और तपस्या की मूर्ति थे। वे समस्त ज्ञान और आत्मसंयम के स्वामी बने इसलिए उनका नाम वशिष्ठ रखा गया जिसका अर्थ होता है सबसे अधिक वश में रहने वाला और परम ऐश्वर्यशाली। इसके उपरांत उसी कलश से दूसरे बालक का प्राकट्य हुआ जिनका कद छोटा था किंतु उनका तेज मध्याह्न के सूर्य के समान प्रज्वलित था। कलश से उत्पन्न होने के कारण उनका नाम कुंभज अथवा अगस्त्य पड़ा।
इन दोनों महामुनियों ने जन्म लेते ही संपूर्ण दिशाओं को अपने आलोक से प्रकाशित कर दिया। देवताओं ने आकाश से पुष्प वर्षा की और यह घोषणा की कि ये दोनों भाई पृथ्वी पर वैदिक धर्म, सदाचार और ब्रह्म ज्ञान की शाश्वत ध्वजा फहराएंगे।
महर्षि वशिष्ठ ने जन्म के उपरांत हिमालय के शांत वनों में कठोर तपस्या की और ब्रह्मर्षि का सर्वोच्च पद प्राप्त किया। ब्रह्मा जी के मानस पुत्रों के समान तेजस्वी होने के कारण उन्हें इक्ष्वाकु वंश अर्थात सूर्यवंश के प्रधान कुलगुरु का पद सौंपा गया। उन्होंने राजा हरिश्चंद्र, सगर, दिलीप, रघु, दशरथ और मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम जैसे चक्रवर्ती सम्राटों को धर्म, राजनीति और आत्मविद्या की दीक्षा दी। श्रीराम को दिया गया उनका आध्यात्मिक उपदेश संसार में योग वाशिष्ठ के नाम से अमर है।
महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में देवलोक की दिव्य कामधेनु गाय और उनकी पुत्री नंदिनी निवास करती थीं। यह गौ माता समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली और साक्षात धर्म की प्रतिमूर्ति थीं। एक बार कान्यकुब्ज के प्रतापी राजा कौशिक अपनी विशाल चतुरंगिणी सेना के साथ शिकार खेलते हुए महर्षि वशिष्ठ के तपोवन में पहुंचे। महर्षि ने राजा और उनकी संपूर्ण सेना का स्वागत किया और कामधेनु के प्रभाव से पलक झपकते ही समस्त सैनिकों के लिए 56 प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजनों की व्यवस्था कर दी।
इस अलौकिक चमत्कार को देखकर राजा कौशिक के मन में लोभ उत्पन्न हो गया। उन्होंने विचार किया कि ऐसी दिव्य गाय तो किसी सम्राट के राजमहल में होनी चाहिए, एक वनवासी तपस्वी के पास इसका क्या प्रयोजन। राजा कौशिक ने महर्षि से कामधेनु को राजकोष के बदले में मांगा किंतु वशिष्ठ जी ने स्पष्ट मना कर दिया कि यह गाय बिकाऊ नहीं है अपितु आश्रम के दैनिक यज्ञों का आधार है।
क्रोधित होकर राजा कौशिक ने अपनी सेना को कामधेनु को बलपूर्वक बांधकर ले जाने का आदेश दिया। कामधेनु ने रोते हुए महर्षि से रक्षा की गुहार लगाई। महर्षि वशिष्ठ ने केवल इतना कहा कि मैं एक ब्राह्मण हूं और क्षमा मेरा धर्म है किंतु तुम अपनी रक्षा स्वयं करो। महर्षि का संकेत पाते ही कामधेनु के शरीर से लाखों पह्लव, यवन और बर्बर सैनिक उत्पन्न हो गए जिन्होंने राजा कौशिक की संपूर्ण सेना को मार भगाया।
यही राजा कौशिक आगे चलकर घोर तपस्या के बल पर महर्षि विश्वामित्र बने। विश्वामित्र ने ईर्ष्यावश महर्षि वशिष्ठ के 100 पुत्रों का वध करवा दिया किंतु महर्षि वशिष्ठ ने कभी प्रतिशोध नहीं लिया। जब विश्वामित्र का अहंकार पूरी तरह गल गया तब वशिष्ठ जी ने ही उन्हें अपने हृदय से लगाकर सर्वप्रथम 'ब्रह्मर्षि' कहकर पुकारा। यह वशिष्ठ जी की क्षमा और ब्रह्म ज्ञान की पराकाष्ठा थी।
कुंभ से जन्मे दूसरे भाई महर्षि अगस्त्य का जीवन शौर्य, अदम्य संकल्प और लोकमंगल की अद्भुत गाथा है। पौराणिक काल में उत्तर और दक्षिण भारत के मध्य स्थित विंध्याचल पर्वत के मन में सुमेरु पर्वत के प्रति ईर्ष्या उत्पन्न हो गई। सुमेरु पर्वत की परिक्रमा सूर्य और चंद्रमा करते थे जबकि विंध्याचल की नहीं। विंध्याचल ने अहंकार में आकर अपने आकार को आकाश की ओर इतना बढ़ाना आरंभ कर दिया कि उसने सूर्य और चंद्रमा का मार्ग पूरी तरह अवरुद्ध कर दिया।
चारों ओर अंधकार छा गया, ऋतुओं का चक्र रुक गया और पृथ्वी पर हाहाकार मच गया। समस्त देवता व्याकुल होकर महर्षि अगस्त्य की शरण में पहुंचे। अगस्त्य मुनि ने देवताओं को धैर्य बंधाया और अपनी पत्नी लोपामुद्रा के साथ दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान किया। जब विंध्याचल पर्वत ने अपने पूज्य गुरु अगस्त्य को आते देखा तो वह उनके चरणों में झुककर साष्टांग दंडवत हो गया।
महर्षि अगस्त्य ने विंध्याचल से कहा कि मैं दक्षिण दिशा में एक अत्यंत आवश्यक कार्य हेतु जा रहा हूं, जब तक मैं दक्षिण से लौटकर वापस न आऊं तब तक तुम इसी प्रकार झुके रहना। विंध्याचल ने वचन दे दिया। महर्षि अगस्त्य दक्षिण भारत में जाकर स्थायी रूप से बस गए और कभी उत्तर की ओर वापस नहीं लौटे। इस प्रकार विंध्याचल का अहंकार सदा के लिए झुक गया और सूर्य का मार्ग निष्कंटक हो गया।
इसके पश्चात एक अन्य संकट उपस्थित हुआ जब कालकेय और वृत्रासुर के साथी दैत्यों ने देवताओं से भयभीत होकर अथाह समुद्र की गहराइयों में शरण ले ली। वे राक्षस दिन के समय समुद्र में छिपे रहते थे और रात के अंधेरे में बाहर निकलकर धरती के ऋषियों, मुनियों और आश्रमों का संहार करते थे। देवताओं के अस्त्र समुद्र के जल के भीतर काम नहीं कर रहे थे।
बाद में जब भागीरथ द्वारा गंगा जी को पृथ्वी पर लाया गया तब गंगा के पावन जल से समुद्र को पुनः भरा गया। दक्षिण भारत में महर्षि अगस्त्य ने तमिल भाषा के प्रथम व्याकरण अगस्त्यम की रचना की और सिद्ध आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति की नींव रखी।
महाभारत और रामायण दोनों में अगस्त्य जी का योगदान अविस्मरणीय है। लंका युद्ध के समय जब भगवान श्रीराम रावण के साथ युद्ध करते हुए मानसिक रूप से क्लांत अनुभव कर रहे थे तब महर्षि अगस्त्य युद्ध भूमि में प्रकट हुए। उन्होंने श्रीराम को भगवान सूर्य की आराधना का परम गोपनीय आदित्य हृदय स्तोत्र प्रदान किया जिसके पाठ से श्रीराम ने असीम ऊर्जा प्राप्त कर रावण का वध संपन्न किया।
वैदिक ज्योतिष और खगोल शास्त्र में महर्षि वशिष्ठ और अगस्त्य का स्थान अत्यंत पवित्र और वैज्ञानिक महत्व का माना गया है। आकाशगंगा के उत्तरी गोलार्ध में सात तारों का जो समूह दिखाई देता है उसे सप्तऋषि मंडल कहा जाता है। इस मंडल में वशिष्ठ जी छठे स्थान पर स्थित हैं। वशिष्ठ तारे के ठीक समीप एक अत्यंत सूक्ष्म तारा दिखाई देता है जिसे उनकी परम पतिव्रता पत्नी अरुंधति का रूप माना जाता है।
| ज्योतिषीय तत्व | वशिष्ठ और अगस्त्य का खगोलीय स्वरूप |
|---|---|
| आकाशीय स्थिति | वशिष्ठ उत्तरी आकाश के सप्तऋषि में और अगस्त्य दक्षिणी आकाश में स्थित |
| आधुनिक खगोल नाम | वशिष्ठ को मिजार और अगस्त्य को कैनोपस तारा कहा जाता है |
| ऋतु चक्र प्रभाव | अगस्त्य तारे का उदय शरद ऋतु में संपूर्ण भूमंडलीय जल को शुद्ध करता है |
| ग्रह कारकत्व | वशिष्ठ देवगुरु बृहस्पति के समान ज्ञान और अगस्त्य सूर्य व केतु के समान तपोबल |
| आध्यात्मिक शक्ति | ब्रह्म विद्या, मन की शांति, रोग मुक्ति और अज्ञान का नाश |
सनातन विवाह पद्धति में वर और वधू को अरुंधति और वशिष्ठ तारे के दर्शन कराने की अनिवार्य परंपरा है। यह दर्शन दांपत्य जीवन में परस्पर समर्पण, अटूट निष्ठा और संतुलन की प्रेरणा देता है।
वहीं दक्षिणी आकाश में चमकने वाला अगस्त्य तारा जिसे आधुनिक विज्ञान में कैनोपस कहता है, वह आकाश का दूसरा सबसे चमकीला तारा है। महर्षि वराहमिहिर ने अपनी वृहत्संहिता में लिखा है कि जब शरद ऋतु में अगस्त्य तारे का उदय होता है तब वर्षा ऋतु के कारण दूषित और विषैला हुआ पृथ्वी का संपूर्ण जल स्वतः निर्मल और अमृत तुल्य हो जाता है।
ज्योतिष शास्त्र यह प्रमाणित करता है कि आकाश के ये दिव्य तारे केवल भौतिक पिंड नहीं हैं बल्कि वे ऋषियों की उस अमिट चेतना के केंद्र हैं जो ब्रह्मांड को निरंतर सकारात्मक ऊर्जा प्रदान कर रहे हैं।
मित्रावरुण के वीर्य से कुंभ के भीतर दोनों ऋषियों का जन्म होना केवल एक कथा नहीं है बल्कि यह योग विज्ञान का सबसे गूढ़ रहस्य है। हठयोग और प्राणायाम में कुंभक का अर्थ श्वास को भीतर अथवा बाहर रोकना होता है। मानव शरीर स्वयं एक पार्थिव कुंभ अर्थात मिट्टी का घड़ा है। जब मनुष्य अपनी प्राण वायु और अपान वायु को अपने भीतर स्थिर करता है तब उसके भीतर ब्रह्म चेतना का जन्म होता है।
मित्र देव जाग्रत अवस्था और सूर्य स्वर के प्रतीक हैं जबकि वरुण देव सुप्त चेतना और चंद्र स्वर के प्रतीक हैं। जब पिंगला और इड़ा नाड़ी का मिलन सुषुम्ना रूपी कुंभ में होता है तब वशिष्ठ जैसी शांति और अगस्त्य जैसा तद्युगीन पराक्रम उत्पन्न होता है।
वशिष्ठ हमें यह सिखाते हैं कि संसार में रहते हुए भी अपने चित्त को कैसे कामधेनु बनाया जाए जहां किसी वस्तु का अभाव न रहे। वे क्षमा और सहनशीलता की पराकाष्ठा हैं। दूसरी ओर अगस्त्य यह संदेश देते हैं कि जब धर्म और समाज पर संकट आए तब ज्ञान को केवल पोथियों में बंद नहीं रखना चाहिए बल्कि विंध्याचल जैसे भीषण अवरोधों को भी झुका देना चाहिए। इन दोनों भाइयों का समन्वय ही सनातन जीवन शैली का परम आदर्श है जहां शांति और शक्ति एक दूसरे के पूरक बनकर निवास करते हैं।
महर्षि वशिष्ठ और महर्षि अगस्त्य का प्राकट्य मानव इतिहास को यह अमर दिशा निर्देश देता है कि बाह्य परिस्थितियां मनुष्य का भविष्य निर्धारित नहीं करतीं। एक मिट्टी के साधारण कलश से उत्पन्न होकर भी उन्होंने अपने तपोबल से संपूर्ण ब्रह्मांड को दिशा दी।
वशिष्ठ की कुलगुरु परंपरा हमें राष्ट्र निर्माण और आदर्श शासन व्यवस्था का मार्ग दिखाती है जबकि अगस्त्य का समुद्र पान हमें अपनी आंतरिक बुराइयों को एक घूंट में समाप्त करने की प्रेरणा देता है। जब भी मनुष्य अपने जीवन में भटकाव अनुभव करे तब उसे आकाश में स्थित इन दिव्य ऋषियों का स्मरण करना चाहिए। उनकी पावन स्मृति मात्र से हृदय के विकार धुल जाते हैं और आत्मा अपने मूल स्वरूप को पहचान कर परमानंद की ओर अग्रसर हो जाती है।
महर्षि वशिष्ठ और अगस्त्य के माता पिता कौन थे? वे दोनों भगवान मित्र और वरुण के दिव्य तेज से अप्सरा उर्वशी के निमित्त एक पवित्र कुंभ अर्थात कलश से प्रकट हुए थे।
महर्षि वशिष्ठ किस राजवंश के कुलगुरु थे? महर्षि वशिष्ठ इक्ष्वाकु वंश अर्थात भगवान श्रीराम के सूर्यवंश के प्रधान कुलगुरु और आध्यात्मिक मार्गदर्शक थे।
महर्षि अगस्त्य ने विंध्याचल पर्वत को क्यों झुकाया था? विंध्याचल पर्वत सूर्य और चंद्रमा का मार्ग रोक रहा था, अतः संसार में प्रकाश बनाए रखने हेतु अगस्त्य जी ने उसे सदा के लिए झुका दिया।
आदित्य हृदय स्तोत्र का उपदेश किसने और किसे दिया था? लंका युद्ध के समय महर्षि अगस्त्य ने भगवान श्रीराम को रावण पर विजय प्राप्त करने हेतु आदित्य हृदय स्तोत्र का उपदेश दिया था।
अगस्त्य तारे के उदय का प्रकृति पर क्या प्रभाव पड़ता है? शरद ऋतु में अगस्त्य तारे का उदय होते ही पृथ्वी का संपूर्ण दूषित जल प्राकृतिक रूप से शुद्ध, निर्मल और आरोग्यकारी हो जाता है।
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