वेदव्यास अवतार और बुध गुरु रहस्य क्या?

By पं. संजीव शर्मा

वेदों का चतुर्धा विभाजन अठारह पुराण और बुध गुरु के समन्वय का संपूर्ण वैदिक ज्योतिषीय रहस्य

भगवान वेदव्यास अवतार कथा और बुध गुरु रहस्य

व्यास पूजन मुहूर्त और शास्त्रीय अनुष्ठान विधान

सनातन वैदिक परंपरा में भगवान श्री हरि विष्णु के सत्रहवें ज्ञानात्मक अवतार और समस्त वांग्मय के परम अधिष्ठाता के रूप में पूजित महर्षि वेदव्यास का प्राकट्य बुद्धि प्रज्ञा साहित्य और धर्म संस्थापना का सर्वोच्च शिखर है। वैदिक ज्योतिष के अंतर्गत लेखन वाणी विश्लेषण और बुद्धि के स्वामी बुध देव तथा आत्म ज्ञान धर्म वेदांत और उच्च अध्यापन के अधिपति देवगुरु बृहस्पति के दुर्लभ समन्वय को जाग्रत करने के लिए भगवान वेदव्यास की आराधना को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जब जातक की जन्म कुंडली में बुध अथवा गुरु ग्रह निर्बल होकर लेखन में अवरोध स्मरण शक्ति का ह्रास शोध कार्यों में असफलता अथवा वाणी दोष उत्पन्न करते हैं तब व्यास नारायण की शरण में जाने से अमोघ बौद्धिक बल और सरस्वती कृपा की प्राप्ति होती है। इस पावन साधना की तिथि समय और शास्त्रीय घटकों का संपूर्ण विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।

शास्त्रीय आयाम अनुष्ठान विवरण और ज्योतिषीय मान्यता
प्रमुख पावन तिथि आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि व्यास पूर्णिमा व गुरु पूर्णिमा
दैनिक पूजन समय प्रातः कालीन ब्रह्म मुहूर्त अथवा सूर्योदय वेला
अधिष्ठाता स्वरूप जटाजूट धारी कृष्ण वर्ण भूर्जपत्र और लेखनी धारण किए हुए महर्षि व्यास
ज्योतिषीय भाव व ग्रह संबंध तृतीय भाव पंचम भाव नवम भाव दशम भाव बुध देव और देवगुरु बृहस्पति
मुख्य पूजन सामग्री श्वेत चंदन तुलसी दल पीले पुष्प लेखनी ग्रंथ पंचामृत और पीत वस्त्र
प्रधान वैदिक अनुष्ठान गुरु गीता पाठ विष्णु सहस्रनाम अध्ययन और ॐ नमो भगवते बादरायणाय जप
अपेक्षित फल लेखन सिद्धि बौद्धिक प्रखरता शोध में सफलता और गुरु बुध दोष शांति

यमुना के द्वीप पर पावन प्राकट्य

द्वापर युग के उत्तरार्ध में जब मानव चेतना धीरे धीरे संकुचित हो रही थी तब एक ऐसी दिव्य विभूति के अवतरण की आवश्यकता अनुभव की गई जो वेदों के अगाध ज्ञान को व्यवस्थित कर आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रख सके। वैदिक इतिहास के अनुसार एक बार सप्तर्षियों में वंदनीय महर्षि पराशर तीर्थाटन करते हुए यमुना नदी के तट पर पहुंचे। वहां यमुना पार कराने के लिए धीवर राज की परम सुंदरी और तपस्विनी कन्या सत्यवती उपस्थित थीं जिन्हें मत्स्यगंधा भी कहा जाता था क्योंकि उनके शरीर से मछली जैसी गंध आती थी।

कालदर्शी महर्षि पराशर ने अपनी दिव्य ज्योतिषीय दृष्टि से देखा कि आकाश मंडल में एक अत्यंत दुर्लभ और अलौकिक खगोलीय लग्न उपस्थित हुआ है। उस विशिष्ट क्षण में गर्भधारण होने पर साक्षात जगतपालक भगवान श्री हरि विष्णु का एक ऐसा अंशावतार जन्म लेगा जो संपूर्ण विश्व के ज्ञान का वर्गीकरण करेगा। महर्षि पराशर ने सत्यवती से यह परम गोपनीय रहस्य साझा किया। सत्यवती ने संकोच व्यक्त करते हुए कहा कि दिन के उजाले में और तट पर उपस्थित लोगों के सम्मुख यह संभव नहीं है। तब महर्षि पराशर ने अपने तपोबल से यमुना के उस क्षेत्र में घने कुहासे का आवरण रच दिया और सत्यवती को वरदान दिया कि उनका कौमार्य अक्षत रहेगा तथा उनके शरीर से निकलने वाली गंध एक योजन तक सुगंध फैलाने वाली कस्तूरी गंध में बदल जाएगी।

उस पावन संयोग से यमुना नदी के एक शांत द्वीप पर एक अत्यंत तेजस्वी और श्याम वर्ण बालक का जन्म हुआ। द्वीप पर जन्म लेने के कारण उनका नाम द्वैपायन पड़ा और उनके कृष्ण वर्ण के कारण उन्हें कृष्ण द्वैपायन कहा गया। वे कोई साधारण बालक नहीं थे। जन्म लेते ही उन्होंने अपनी माता सत्यवती से कहा कि जब भी आप किसी संकट में मुझे स्मरण करेंगी मैं तत्काल उपस्थित हो जाऊंगा। इसके उपरांत वे तपस्या हेतु बदरिकाश्रम के घने वनों की ओर प्रस्थान कर गए जहां बदरी अर्थात बेर के वृक्षों के नीचे तप करने के कारण वे बादरायण के नाम से भी विख्यात हुए।

वेदों का चतुर्धा विभाजन और पुराणों की रचना

प्राचीन काल में वेद एक ही विशाल ज्ञान राशि के रूप में विद्यमान थे। कलियुग के आगमन को देखकर महर्षि कृष्ण द्वैपायन ने विचार किया कि आगामी युग में मनुष्यों की औसत आयु घटकर केवल 100 वर्ष रह जाएगी उनकी शारीरिक शक्ति क्षीण होगी और उनकी स्मरण शक्ति अत्यंत दुर्बल हो जाएगी। ऐसी स्थिति में किसी भी सामान्य मनुष्य के लिए उस विशाल वेद राशि का अध्ययन करना असंभव हो जाएगा। इसलिए उन्होंने उस एक वेद को चार स्वतंत्र संहिताओं में विभक्त कर दिया। वेदों का यह वैज्ञानिक और व्यवस्थित विभाजन करने के कारण ही वे संपूर्ण संसार में वेदव्यास के नाम से अमर हुए।

महर्षि वेदव्यास ने इस ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए अपने 4 परम योग्य शिष्यों को इन संहिताओं का दायित्व सौंपा।

  • महर्षि पैल को उन्होंने ऋग्वेद का ज्ञान प्रदान किया जिसमें स्तुतियों और देवताओं की प्रार्थनाओं का संग्रह है।
  • महर्षि वैशंपायन को उन्होंने यजुर्वेद की शिक्षा दी जिसमें यज्ञ कर्मकांड और आहुतियों के नियम समाहित हैं।
  • महर्षि जैमिनि को उन्होंने सामवेद का दायित्व सौंपा जिसमें संगीत गायन और दिव्य ऋचाओं का स्वर विस्तार है।
  • महर्षि सुमंतु को उन्होंने अथर्ववेद प्रदान किया जिसमें आयुर्वेद समाज व्यवस्था और लौकिक विज्ञान का भंडार है।
  • सूत जी अर्थात रोमहर्षण को उन्होंने इतिहास और पुराणों के संरक्षण का कार्य सौंपा।

वेदों का विभाजन करने के पश्चात भी महर्षि व्यास रुके नहीं। वे जानते थे कि जनसामान्य वेदों की गूढ़ भाषा को सहजता से नहीं समझ सकता। अतः उन्होंने स्त्री शूद्र और सामान्य जनों के कल्याण हेतु 18 महापुराणों और 18 उपपुराणों की रचना की। इसके अतिरिक्त उन्होंने 100000 श्लोकों से युक्त महाभारत जैसे महाकाव्य का सृजन किया जिसे पंचम वेद कहा जाता है। महाभारत के लेखन हेतु स्वयं बुद्धि के देवता भगवान श्री गणेश लिपिबद्ध करने के लिए उपस्थित हुए थे। महर्षि व्यास ने ज्ञान मीमांसा के सर्वोच्च ग्रंथ ब्रह्म सूत्र की रचना की जो वेदांत दर्शन का मूल आधार बना। अंत में जब उनका मन अशांत था तब देवर्षि नारद के परामर्श पर उन्होंने श्रीमद्भागवत महापुराण की रचना की जिसमें भगवान की प्रेममयी लीलाओं का गान कर उन्होंने परम तृप्ति प्राप्त की।

बुध और गुरु के दुर्लभ समन्वय का ज्योतिषीय रहस्य

वैदिक ज्योतिष के आधार ग्रंथ बृहत् पराशर होरा शास्त्र में ग्रहों के आत्मिक और बौद्धिक प्रभाव का विस्तृत विवेचन मिलता है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से महर्षि वेदव्यास का स्वरूप सीधे तौर पर बुध ग्रह और देवगुरु बृहस्पति के परम सात्विक समन्वय का प्रतिनिधित्व करता है।

बुध देव को ज्योतिष में बुद्धि लेखन विश्लेषण संकलन वर्गीकरण और ग्रंथ रचना का कारक माना जाता है। किसी भी विशाल विषय को छोटे छोटे खंडों में व्यवस्थित करना और उसे लिपिबद्ध करना बुध का नैसर्गिक गुण है। दूसरी ओर देवगुरु बृहस्पति आत्म ज्ञान वेदांत धर्म दर्शन और उच्च अध्यापन के अधिष्ठाता हैं। जब कुंडली में केवल बुध बली होता है तो व्यक्ति चतुर लेखक अथवा गणितज्ञ बन सकता है किंतु उसमें आध्यात्मिक गहराई नहीं होती। जब केवल गुरु बली होता है तो व्यक्ति उच्च कोटि का दार्शनिक बन सकता है किंतु वह अपने ज्ञान को लिखित रूप में संकलित करने में आलस्य कर सकता है।

जब कुंडली में बुध और गुरु एक साथ युति बनाते हैं अथवा एक दूसरे पर दृष्टि डालते हैं तब सरस्वती योग का निर्माण होता है। महर्षि वेदव्यास इसी योग के साक्षात विग्रह हैं। उनके भीतर बुध का वर्गीकरण कौशल था जिसने वेदों को चार भागों में बांटा और गुरु का वह अगाध वेदांत ज्ञान था जिसने ब्रह्म सूत्र और उपनिषदों के रहस्यों को उद्घाटित किया। जब किसी जातक की कुंडली में तृतीय भाव जो लेखन का है पंचम भाव जो बुद्धि का है और नवम भाव जो उच्च दर्शन का है आपस में जुड़ते हैं तब व्यक्ति में व्यास जैसी साहित्यिक प्रतिभा का उदय होता है।

क्या लेखन और पत्रकारिता में व्यास साधना से सफलता मिलती है?

आधुनिक युग में संचार लेखन पत्रकारिता और शोध का क्षेत्र अत्यंत प्रतिस्पर्धी हो चुका है। अनेक लेखक और शोधार्थी यह अनुभव करते हैं कि उनके पास विचार तो बहुत हैं किंतु वे उन्हें शब्दों में पिरो नहीं पाते। इसे आधुनिक भाषा में राइटर्स ब्लॉक कहा जाता है। इसका मुख्य ज्योतिषीय कारण कुंडली में बुध का अस्त वक्री या नीच राशि मीन में होना है अथवा तृतीय भाव पर राहु या शनि का पाप प्रभाव पड़ना है।

जब बुद्धि में भटकाव हो और व्यक्ति अपने विचारों को एक व्यवस्थित रूप न दे पा रहा हो तब महर्षि वेदव्यास का ध्यान एक दिव्य औषधि की भांति कार्य करता है। व्यास जी ने संपूर्ण महाभारत को बिना रुके बोला था और भगवान गणेश ने उसे लिखा था। यह घटना दर्शाती है कि व्यास साधना साधक के चित्त को अविरल विचार प्रवाह प्रदान करती है। जो छात्र शोध पत्र लिख रहे हैं जो लेखक पुस्तकें रच रहे हैं अथवा जो पत्रकार सत्य की प्रतिष्ठा के लिए कार्य कर रहे हैं उन्हें व्यास पूजन से अमोघ बौद्धिक स्पष्टता और समाज में सर्वोच्च सम्मान प्राप्त होता है।

बौद्धिक प्रखरता और ग्रंथ रचना सिद्धि के अचूक वैदिक उपाय

यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में बुध और गुरु निर्बल हों पढ़ाई और लेखन में मन न लगता हो अथवा करियर में बौद्धिक रुकावटें आ रही हों तो शास्त्रों में महर्षि वेदव्यास की प्रसन्नता हेतु अत्यंत दिव्य उपाय बताए गए हैं।

  • प्रतिदिन प्रातः काल स्नान के उपरांत पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें और हाथ में श्वेत पुष्प लेकर महर्षि वेदव्यास का ध्यान करते हुए ॐ नमो भगवते बादरायणाय नमः अथवा ॐ वेदव्यासाय नमः मंत्र का 108 बार शांत मन से जाप करें।
  • अध्ययन अथवा लेखन आरंभ करने से पूर्व अपने डेस्क पर महर्षि व्यास और भगवान गणेश का स्मरण करें तथा नित्य भूर्जपत्र अथवा श्वेत पत्र पर केसर की स्याही से ॐ लिखें।
  • आषाढ़ मास की पूर्णिमा व्यास पूर्णिमा गुरु पूर्णिमा के दिन अपने गुरु का पूजन करें और श्रीमद्भागवत अथवा महाभारत ग्रंथ का श्रद्धापूर्वक पूजन करके किसी पुस्तकालय में धार्मिक ग्रंथ दान करें।
  • प्रत्येक बुधवार और गुरुवार को गाय को भीगी हुई चने की दाल और हरी घास खिलाएं तथा निर्धन विद्यार्थियों को पुस्तकें कापियां और लेखनी पेन का आदरपूर्वक दान करें।
  • जातक को अपनी शारीरिक अवस्था और योग्य ज्योतिर्विद के परामर्श के अनुसार चार मुखी और पांच मुखी नेपाली रुद्राक्ष एक साथ पीले रेशमी धागे में पिरोकर गले में धारण करना चाहिए जो बुध और गुरु के दोषों को शांत करता है।
  • प्रतिदिन कम से कम 1 अध्याय श्रीमद्भागवत महापुराण अथवा महर्षि वेदव्यास रचित विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें जिससे मस्तिष्क की तंत्रिकाएं शांत होती हैं और स्मरण शक्ति बढ़ती है।

व्यास साधना और स्वाध्याय के आवश्यक शास्त्रीय नियम

क्या अवश्य करें किन गलतियों से सर्वथा दूर रहें
प्रतिदिन प्रातः काल उठकर कुछ समय ग्रंथों के स्वाध्याय में लगाएं कभी भी पुस्तकों ग्रंथों अथवा अध्ययन सामग्री का अनादर न करें
पुस्तकों को सदैव स्वच्छ ऊंचे और आदरणीय स्थान पर रखें कभी भी पैरों के पास अथवा अशुद्ध बिस्तर पर रखकर पुस्तकें न पढ़ें
अपने ज्ञान और लेखन का प्रयोग सदैव समाज के कल्याण हेतु करें अपनी लेखनी से कभी किसी के विरुद्ध असत्य अथवा भ्रामक बातें न लिखें
बुधवार और गुरुवार को सात्विक और हल्का आहार ही ग्रहण करें अपने ज्ञान बौद्धिक प्रतिभा अथवा लेखकीय क्षमता का तनिक भी घमंड न करें
पूजा में श्वेत चंदन तुलसी पत्र और शुद्ध गाय के घी का दीपक जलाएं बिना सोचे समझे किसी आध्यात्मिक ग्रंथ की गलत व्याख्या करने से बचें

ज्ञान की अखंड ज्योति और सनातन चेतना का विस्तार

भगवान वेदव्यास का पावन अवतार केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं है अपितु वह सनातन धर्म की रीढ़ की हड्डी है। आज हम सनातन धर्म के जिस स्वरूप को देख रहे हैं वेद पुराण उपनिषद महाभारत और गीता वे सब महर्षि व्यास की लेखनी का ही पावन प्रसाद हैं। यदि व्यास जी ने वेदों का विभाजन न किया होता और पुराणों की रचना न की होती तो कलियुग के अंधकार में यह सारा ज्ञान लुप्त हो चुका होता। बुध की चतुर व्यवस्था और गुरु का परम सत्य जब एक साथ मिलते हैं तब मनुष्य का जीवन एक अमर ग्रंथ बन जाता है। महर्षि व्यास का नित्य स्मरण मनुष्य के भीतर सोई हुई प्रज्ञा को जाग्रत करता है उसे सांसारिक भ्रमों से मुक्त करता है और उसे इस संसार में एक यशस्वी सत्यनिष्ठ और सम्मानित व्यक्तित्व बनाकर अंततः परम पद की प्राप्ति कराता है।

FAQ

भगवान वेदव्यास के माता पिता कौन थे? भगवान वेदव्यास के पिता महान ज्योतिर्विद महर्षि पराशर थे और उनकी माता धीवर कन्या सत्यवती थीं।

महर्षि व्यास को कृष्ण द्वैपायन क्यों कहा जाता है? यमुना नदी के एक शांत द्वीप पर जन्म लेने के कारण उन्हें द्वैपायन और उनके श्याम वर्ण के कारण उन्हें कृष्ण कहा गया जिससे उनका नाम कृष्ण द्वैपायन पड़ा।

महर्षि वेदव्यास ने एक वेद को कितने भागों में विभाजित किया? महर्षि वेदव्यास ने एक ही वेद को 4 संहिताओं में विभाजित किया जिनके नाम ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद और अथर्ववेद हैं।

ज्योतिष में भगवान वेदव्यास का संबंध किन ग्रहों से माना जाता है? ज्योतिष में भगवान वेदव्यास का सीधा संबंध लेखन और बुद्धि के कारक बुध देव तथा वेदांत ज्ञान के अधिपति देवगुरु बृहस्पति के समन्वय से माना जाता है।

लेखन और शोध कार्यों में सफलता के लिए किस मंत्र का जाप करना चाहिए? लेखन और शोध में सफलता हेतु प्रतिदिन प्रातः काल ॐ नमो भगवते बादरायणाय नमः अथवा ॐ वेदव्यासाय नमः मंत्र का 108 बार जाप करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

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लेखक

पं. संजीव शर्मा

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