वृषभ अवतार और पाताल रहस्य क्या है?

By पं. नरेंद्र शर्मा

पाताल में विष्णु पुत्रों का दमन नारायण का मोह भंग और स्थिर पृथ्वी तत्व का संपूर्ण ज्योतिषीय रहस्य

वृषभ अवतार कथा और पाताल लोक का रहस्य

वृषभेश्वर पूजन विधान और ज्योतिषीय नियम

सनातन वैदिक परंपरा में देवाधिदेव भगवान शिव के अत्यंत तेजस्वी और दृढ़ संहारक स्वरूप के रूप में पूजित भगवान वृषभेश्वर का प्राकट्य तामसिक वासनाओं के दमन पाताल लोक के उपद्रव की शांति और अमोघ आत्मिक संतुलन का सर्वोच्च शिखर है। वैदिक ज्योतिष तथा तत्व विज्ञान के अंतर्गत भचक्र की द्वितीय राशि वृषभ के स्थिर पृथ्वी तत्व को जाग्रत करने तथा छाया ग्रह राहु और कर्म दंडाधिकारी शनि देव के कारण उत्पन्न होने वाले अंधकारमय मानसिक विकारों को नष्ट करने के लिए भगवान वृषभ की आराधना को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जब जातक की जन्म कुंडली में पाताल और अधोलोक का कारक राहु अथवा भोग कारक शुक्र अत्यधिक पीड़ित होकर अनियंत्रित कामुकता कुलघाती प्रवृत्तियों और दिशाहीनता का निर्माण करते हैं तब वृषभेश्वर महादेव का ध्यान चेतना को दृढ़ता और परम पवित्रता प्रदान करता है। इस पावन अनुष्ठान की तिथि समय और शास्त्रीय घटकों का संपूर्ण विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।

शास्त्रीय आयाम अनुष्ठान विवरण और ज्योतिषीय मान्यता
प्रमुख पावन तिथि प्रत्येक मास की त्रयोदशी प्रदोष व्रत अथवा सोमवार और महाशिवरात्रि
दैनिक पूजन समय सायंकालीन प्रदोष वेला अथवा दोपहर का अभिजित मुहूर्त
अधिष्ठाता स्वरूप महाविशाल श्वेत वृषभ रूप में वज्र समान सींगों वाले भगवान शिव
ज्योतिषीय राशि व ग्रह संबंध स्थिर पृथ्वी तत्व की वृषभ राशि कर्म कारक शनि और छाया ग्रह राहु
मुख्य पूजन सामग्री शुद्ध गंगाजल दूर्वा श्वेत पुष्प बेलपत्र भस्म और कच्चा गाय का दूध
प्रधान वैदिक अनुष्ठान वृषभेश्वर स्तोत्र पाठ शिव पंचाक्षर मंत्र जप और ॐ नमो वृषभाय नमः
अपेक्षित फल तामसिक विकारों का नाश काम विजय कुल रक्षा और मानसिक स्थिरता

पाताल लोक में नारायण का मोह

शिव महापुराण के शतरुद्र संहिता में वर्णित अत्यंत विस्मयकारी और रहस्यमयी कथा के अनुसार जब क्षीरसागर मंथन के पश्चात अमृत वितरण संपन्न हुआ तब देवराज इंद्र और देवताओं ने अमृत पीकर अमरत्व प्राप्त किया। पराजित और कुपित होकर जब असुर भागे तब भगवान श्री हरि विष्णु ने उनका पीछा किया और वे पाताल लोक की अतल गहराइयों में प्रवेश कर गए। वहां पाताल में भगवान विष्णु ने समस्त प्रमुख असुरों का संहार कर दिया।

असुरों के संहार के पश्चात पाताल लोक में स्थित अत्यंत रूपवती और मायावी असुर कन्याओं ने भगवान विष्णु की सेवा आरंभ की। असुर कन्याओं के उस गहन मायावी आकर्षण और पाताल लोक के तमोगुणी वातावरण के प्रभाव से साक्षात जगतपालक भगवान विष्णु योगमाया के वशीभूत होकर वहां रमण करने लगे। वे अपने वैकुंठ धाम और सृष्टि के पालन के परम कर्तव्य को विस्मृत करके लंबे कालखंड तक पाताल लोक में ही निवास करने लगे।

उस पाताल प्रवास के दौरान भगवान विष्णु और उन असुर कन्याओं के संयोग से अनेक अत्यंत बलशाली और पराक्रमी पुत्रों का जन्म हुआ। यद्यपि वे भगवान नारायण के वीर्य से उत्पन्न हुए थे किंतु माता के असुर कुल और पाताल के तामसिक परिवेश के कारण उन पुत्रों के भीतर घोर आसुरी स्वभाव और अहंकार का समावेश हो गया।

  • विष्णु के वे उद्दंड पुत्र शारीरिक शक्ति में इतने अजेय थे कि उन्होंने पाताल लोक को अपने अधीन कर लिया।
  • अहंकार में अंध होकर उन्होंने पाताल से बाहर निकलकर भूलोक के ऋषियों के आश्रमों और यज्ञों को विध्वंस करना आरंभ कर दिया।
  • उन्होंने स्वर्ग लोक पर आक्रमण करके देवताओं को उनके पदों से च्युत कर दिया और संपूर्ण ब्रह्मांड में त्राहि त्राहि मचा दी।
  • कोई भी देवता अथवा अस्त्र उन उद्दंड बालकों को परास्त करने में सक्षम नहीं था क्योंकि उनके भीतर साक्षात भगवान विष्णु का तेज विद्यमान था।

जब तीनों लोकों में हाहाकार मच गया और धर्म की संपूर्ण व्यवस्था नष्ट होने की कगार पर पहुंच गई तब परमपिता ब्रह्मा जी देवराज इंद्र और समस्त देवगण कैलाश पर्वत पर पहुंचे। उन्होंने देवाधिदेव महादेव के पावन चरणों में साष्टांग प्रणाम किया और करुण पुकार करते हुए निवेदन किया कि हे त्रिलोकीनाथ भगवान विष्णु के पाताल मोह और उनके उद्धत पुत्रों के अत्याचार से इस संपूर्ण सृष्टि की रक्षा करें।

महाविशाल वृषभ का प्राकट्य और युद्ध

देवताओं की करुण प्रार्थना सुनकर भगवान शिव ने विचार किया कि जब सृष्टि के संरक्षक स्वयं मोह के बंधन में बंध जाएं तब केवल संहारक शक्ति ही उस आवरण को तोड़ सकती है। भगवान शिव ने समस्त लोकों के कल्याण हेतु साक्षात वृषभ अवतार धारण किया।

भगवान शिव का वह वृषभ स्वरूप इतना विशाल और तेजस्वी था जिसकी कल्पना भी साधारण मन नहीं कर सकता। उनका शरीर विशाल हिम पर्वत के समान श्वेत था उनके खुर पृथ्वी को चीरने वाले वज्र के समान कठोर थे और उनकी पूंछ आकाश में फहराते हुए प्रलयकालीन मेघों जैसी प्रतीत हो रही थी। उनके मस्तक पर दो अत्यंत तीक्ष्ण और विशाल सींग सुशोभित थे जो सूर्य और चंद्रमा के समान दमक रहे थे। जब भगवान वृषभ ने अपनी पहली हुंकार भरी तो उस सिंहनाद जैसी भयंकर गर्जना से दसों दिशाएं दहल उठीं और पाताल लोक की नींव हिल गई।

भगवान वृषभ ने तीव्र वेग से पाताल लोक में प्रवेश किया। उनके खुरों के प्रहार से पाताल की शिलाएं चूर्ण होने लगीं। पाताल पहुंचते ही उन्होंने अपने तीक्ष्ण सींगों और वज्र समान खुरों से भगवान विष्णु के उन अहंकारी और उपद्रवी पुत्रों पर प्रहार करना आरंभ कर दिया।

  • भगवान वृषभ ने अपने सींगों की नोक से विष्णु पुत्रों को हवा में उछालकर पाताल की चट्टानों पर पटक दिया।
  • उन उद्धत पुत्रों ने अपने समस्त आसुरी अस्त्रों से वृषभ रूपी शिव पर आक्रमण किया किंतु भगवान के वज्र देह पर उन अस्त्रों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
  • एक एक करके भगवान वृषभ ने अपने सींगों के प्रलयंकारी प्रहार से भगवान विष्णु के समस्त तामसिक और अहंकारी पुत्रों का संहार कर दिया।
  • अधर्म के उस बल को समाप्त करके भगवान वृषभ ने पाताल लोक में पुनः शांति और धर्म की मर्यादा स्थापित की।

क्या नारायण का मोह भंग हुआ?

जब भगवान विष्णु ने देखा कि उनके समस्त प्रिय पुत्र एक विशाल बैल द्वारा मारे जा चुके हैं तब उनका चित्त भीषण क्रोध से प्रज्वलित हो उठा। वे उस समय भी मोह के गहरे आवरण में थे और यह पहचान न सके कि यह वृषभ कोई साधारण पशु नहीं अपितु साक्षात देवाधिदेव महादेव हैं।

भगवान विष्णु ने अपना दिव्य शार्ङ्ग धनुष उठाया और सुदर्शन चक्र हाथ में लेकर उस महाविशाल वृषभ पर भीषण आक्रमण कर दिया। पाताल लोक की अतल गहराइयों में भगवान विष्णु और वृषभ रूपी भगवान शिव के मध्य एक प्रलयंकारी और विस्मयकारी संग्राम आरंभ हुआ। भगवान विष्णु ने अपने तीक्ष्ण बाणों से वृषभ पर प्रहार किया किंतु भगवान वृषभ ने अपने सींगों के एक ही झटके से उनके समस्त बाणों को खंडित कर दिया।

अंत में भगवान वृषभ ने आगे बढ़कर अपने दोनों विशाल सींगों के मध्य भगवान विष्णु को अत्यंत दृढ़ता से जकड़ लिया और उन्हें धरती से ऊपर उठाकर अपने वक्षस्थल पर दबा लिया। उस दिव्य स्पर्श से एक ऐसा अलौकिक आध्यात्मिक स्पंदन उत्पन्न हुआ जिसने भगवान विष्णु के अंतःकरण पर छाए हुए तमोगुण और मोह के घने अंधकार को एक ही क्षण में भस्म कर दिया।

भगवान विष्णु की योगनिद्रा और मोह का आवरण तत्काल फट गया। उन्होंने अपनी आंखें खोलीं और अपने सम्मुख खड़े देवाधिदेव महादेव के पावन स्वरूप को पहचान लिया। भगवान विष्णु अत्यंत लज्जित और कृतज्ञ होकर हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे। उन्होंने कहा कि हे महादेव आपने आज मुझे पाताल के घोर अज्ञान और मोह के दलदल से बाहर निकालकर सृष्टि के पालन के धर्म को पुनः स्थापित किया है। भगवान विष्णु ने पाताल लोक का परित्याग किया और देवताओं की जय जयकार के मध्य वे पुनः अपने परम धाम वैकुंठ लोक को लौट गए।

पृथ्वी तत्व और वृषभ राशि का ज्योतिषीय रहस्य

वैदिक ज्योतिष के कालपुरुष चक्र में द्वितीय राशि वृषभ राशि है जो स्थिर पृथ्वी तत्व की साक्षात प्रतीक है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से भगवान शिव का वृषभ अवतार पाताल लोक की अधोगामी ऊर्जा और पृथ्वी तत्व की स्थिरता का सर्वोच्च आध्यात्मिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

पाताल लोक को ज्योतिष में मानव चेतना के सबसे निचले तल अर्थात अवचेतन मन और मूलाधार चक्र का प्रतीक माना जाता है जहाँ काम क्रोध वासना और तामसिक विकार दबे रहते हैं। भगवान विष्णु का असुर कन्याओं के मोह में फंसना यह दर्शाता है कि जब चेतना सांसारिक भोगों और काम वासना में अत्यधिक लिप्त हो जाती है तो बड़े से बड़े ज्ञानी पुरुष का विवेक भी लुप्त हो जाता है।

  • वृषभ राशि का स्वभाव स्थिर सहनशील और धैर्यवान होता है किंतु जब इसका संतुलन बिगड़ता है तो यह अत्यधिक हठ कामुकता और आलस्य का केंद्र बन जाती है।
  • इस राशि के स्वामी शुक्र देव हैं जो भौतिक आकर्षण और सौंदर्य के कारक हैं जबकि पाताल लोक पर छाया ग्रह राहु का आधिपत्य माना जाता है।
  • जब कुंडली में शुक्र और राहु का संबंध बनता है तो व्यक्ति वासनाओं और अवैध आकर्षणों के जाल में फंसकर अपना मान सम्मान खो बैठता है।
  • भगवान शिव का वृषभ रूप यह सिखाता है कि जब हमारे भीतर दबी हुई काम वासनाएं उद्धत पुत्रों की भांति बाहर निकलकर जीवन को नष्ट करने लगें तब हमें शिव रूपी दृढ़ संकल्प और ब्रह्मचर्य के सींगों से उनका दमन करना चाहिए।

तामसिक विकारों के शमन के अचूक वैदिक उपाय

यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में वृषभ राशि पीड़ित हो कामुक विचारों के कारण मानसिक भटकाव रहता हो अथवा कुल में संतान पक्ष से अत्यधिक कष्ट और उपद्रव मिल रहे हों तो शास्त्रों में इसके निवारण हेतु अत्यंत प्रामाणिक वैदिक उपाय बताए गए हैं।

  • प्रत्येक सोमवार और त्रयोदशी तिथि को प्रातः काल स्नान के उपरांत पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें और शिवलिंग पर शुद्ध जल व कच्चा गाय का दूध अर्पित करते हुए ॐ नमो वृषभाय नमः अथवा ॐ नमः शिवाय मंत्र का 108 बार शांत मन से जाप करें।
  • अपने भीतर के तामसिक विकारों और वासनाओं को शांत करने हेतु प्रतिदिन प्रातः काल शिव पंचाक्षर स्तोत्र अथवा दारिद्र्य दहन शिव स्तोत्र का पाठ करें।
  • प्रत्येक सोमवार को देशी नंदी बैल को हरी दूर्वा हरा पालक और गुड़ अपने हाथों से खिलाएं तथा नंदी के मस्तक पर श्वेत चंदन का तिलक लगाएं जिससे शुक्र और राहु का अशुभ प्रभाव शांत होता है।
  • जन्म कुंडली में पाताल दोष अथवा कालसर्प दोष की शांति हेतु प्रत्येक शनिवार को काले तिल और सरसों का तेल किसी निर्धन व्यक्ति को दान करें और पीपल के वृक्ष की सात परिक्रमा करें।
  • जातक को अपनी शारीरिक अवस्था और योग्य ज्योतिर्विद के परामर्श के अनुसार छह मुखी अथवा दस मुखी नेपाली रुद्राक्ष चांदी के तार में पिरोकर गले में धारण करना चाहिए जो काम वासना पर नियंत्रण प्रदान करता है।
  • घर के मुख्य द्वार पर गोमूत्र का छिड़काव करें और प्रतिदिन संध्या समय कर्पूर व गूगल की धूप दें जिससे घर के भीतर व्याप्त समस्त तामसिक और नकारात्मक ऊर्जाएं भस्म हो जाती हैं।

वृषभ साधना और संयम के आवश्यक नियम

क्या अवश्य करें किन गलतियों से सर्वथा दूर रहें
प्रतिदिन प्रातः काल उठकर अपनी इंद्रियों पर आत्म नियंत्रण का संकल्प लें पराई स्त्री अथवा कामुक विचारों के प्रति अपने मन को कभी न भटकने दें
नंदी बैल और गोवंश की सदैव सेवा करें और उन्हें भरपेट भोजन दें किसी भी बैल गाय अथवा मूक पशु को लाठी से पीटने की भूल कदापि न करें
सोमवार और प्रदोष के दिन पूर्णतः सात्विक और बिना नमक का भोजन लें मदिरा मांसाहार और नशीले पदार्थों का सेवन करने से सर्वथा दूर रहें
अपनी संतान को सदैव धर्म सदाचार और मर्यादा की शिक्षा प्रदान करें संतान के अनुचित हठ और गलत आचरण का कभी भी समर्थन न करें
पूजा में शुद्ध भस्म श्वेत चंदन और ताजे बेलपत्र ही अर्पित करें बिना सोचे समझे किसी पर क्रोध अथवा शारीरिक बल का प्रयोग न करें

वासनाओं के दमन से आत्मिक स्थिरता

भगवान शिव का वृषभ अवतार संपूर्ण मानव जाति को यह सनातन शिक्षा प्रदान करता है कि सांसारिक आकर्षण चाहे कितना भी सुखद क्यों न प्रतीत हो यदि वह मनुष्य को उसके मूल कर्तव्य और धर्म से विमुख कर दे तो वह पतन का कारण बन जाता है। साक्षात भगवान विष्णु का पाताल मोह यह सिद्ध करता है कि माया की शक्ति अत्यंत प्रबल है और उससे बचने के लिए निरंतर शिव रूपी विवेक का जाग्रत रहना अनिवार्य है। जब मनुष्य अपने भीतर उठने वाले तामसिक विकारों को अनदेखा करने के स्थान पर वृषभ के समान प्रहार करके उन्हें कुचल देता है तब उसकी चेतना पाताल के अंधकार से निकलकर वैकुंठ के दिव्य प्रकाश की ओर अग्रसर होती है। भगवान वृषभेश्वर का नित्य स्मरण मनुष्य के भीतर सोए हुए नैतिक बल को जाग्रत करता है उसे समस्त प्रकार की वासनाओं और ग्रह दोषों से मुक्त करता है और उसे इस संसार में एक तेजस्वी शांत और धर्मनिष्ठ व्यक्तित्व बनाकर अंततः मोक्ष की प्राप्ति कराता है।

FAQ

भगवान शिव ने वृषभ अवतार किस मुख्य कारण से धारण किया था? भगवान शिव ने पाताल लोक में असुर कन्याओं के मोह में फंसे भगवान विष्णु के उद्धत पुत्रों के अत्याचार का दमन करने और विष्णु जी का मोह भंग करने हेतु वृषभ अवतार धारण किया था।

विष्णु पुत्रों ने तीनों लोकों में हाहाकार क्यों मचाया था? भगवान विष्णु के पाताल में जन्मे पुत्रों में माता के असुर कुल के कारण घोर तामसिक अहंकार आ गया था जिससे वे अजेय होकर तीनों लोकों के धर्म और आश्रमों को नष्ट करने लगे थे।

भगवान वृषभ ने भगवान विष्णु का मोह किस प्रकार भंग किया था? भगवान वृषभ ने अपने दोनों सींगों के मध्य भगवान विष्णु को कसकर अपने वक्षस्थल से लगा लिया था जिसके दिव्य आध्यात्मिक स्पर्श से विष्णु जी का समस्त तमोगुण और मोह क्षणभर में नष्ट हो गया था।

ज्योतिष में वृषभ अवतार का संबंध किस राशि और तत्व से है? ज्योतिष में वृषभ अवतार का सीधा संबंध भचक्र की द्वितीय राशि वृषभ स्थिर पृथ्वी तत्व और पाताल की अधोगामी ऊर्जा के संतुलन से माना जाता है।

तामसिक विकारों और अनियंत्रित कामुकता को शांत करने के लिए कौन सा मंत्र जपना चाहिए? तामसिक विकारों और मानसिक भटकाव को शांत करने हेतु प्रतिदिन प्रातः काल ॐ नमो वृषभाय नमः अथवा शिव पंचाक्षर मंत्र ॐ नमः शिवाय का 108 बार जाप करना सर्वोत्तम माना गया है।

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लेखक

पं. नरेंद्र शर्मा

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