By पं. संजीव शर्मा
देवताओं के घमंड का नाश सूखे तिनके की परीक्षा और सूर्य मंगल के अहंकार शमन का संपूर्ण वैदिक रहस्य

सनातन वैदिक परंपरा में देवाधिदेव भगवान शिव के परम प्रकाशमान और निरहंकार स्वरूप के रूप में पूजित भगवान यक्षेश्वर का प्राकट्य मानवीय और दैवीय अहंकार के विसर्जन सर्वव्यापी ईश्वरीय सत्ता की स्वीकृति और चेतना के परम शोधन का सर्वोच्च शिखर है। वैदिक ज्योतिष तथा उपनिषद दर्शन के अंतर्गत सौरमंडल के अधिपति भगवान सूर्य देव के सत्ता जनित अहंकार तथा पराक्रम के कारक मंगल देव के बाहुबल के दंभ को शांत करने के लिए भगवान यक्षेश्वर की आराधना को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जब जातक की जन्म कुंडली में सूर्य और मंगल अत्यधिक पीड़ित होकर झूठा दंभ पद प्रतिष्ठा की हानि दूसरों का अनादर अथवा भीषण पराजय का योग निर्मित करते हैं तब भगवान यक्षेश्वर का ध्यान साधक को अमोघ विनम्रता और आत्म ज्ञान प्रदान करता है। इस पावन अनुष्ठान की तिथि समय और शास्त्रीय घटकों का संपूर्ण विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।
| शास्त्रीय आयाम | अनुष्ठान विवरण और ज्योतिषीय मान्यता |
|---|---|
| प्रमुख पावन तिथि | प्रत्येक मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा प्रदोष व्रत अथवा सोमवार |
| दैनिक पूजन समय | प्रातः कालीन ब्रह्म मुहूर्त अथवा दोपहर का अभिजित मुहूर्त |
| अधिष्ठाता स्वरूप | अनिर्वचनीय दिव्य ज्योति स्वरूप महातेजस्वी यक्ष रूप धारी भगवान शिव |
| ज्योतिषीय भाव व ग्रह संबंध | प्रथम भाव नवम भाव आत्मा कारक सूर्य देव और पराक्रम कारक मंगल |
| मुख्य पूजन सामग्री | शुद्ध गंगाजल श्वेत चंदन अक्षत कुश का तिनका बेलपत्र और कपूर |
| प्रधान वैदिक अनुष्ठान | केनोपनिषद स्वाध्याय शिव पंचाक्षर मंत्र जप और ॐ यक्षेश्वराय नमः पाठ |
| अपेक्षित फल | अहंकार जनित दोषों का नाश सूर्य मंगल शांति और ईश्वरीय कृपा की प्राप्ति |
सामवेद के अत्यंत पावन और दार्शनिक ग्रंथ केनोपनिषद के तृतीय खंड में वर्णित इतिहास के अनुसार एक बार देवों और असुरों के मध्य एक प्रलयंकारी संग्राम हुआ। उस भीषण युद्ध में साक्षात परब्रह्म परमेश्वर की कृपा और अमोघ शक्ति के प्रभाव से देवताओं को विजय प्राप्त हुई और असुर सेना पराजित होकर पाताल में छिप गई। उस विजय के पश्चात स्वर्ग लोक में उत्सव का आयोजन हुआ और अमृत का पान किया गया।
किंतु काल की गति अत्यंत विचित्र होती है। उस महान विजय के पश्चात समस्त देवताओं के अंतःकरण में घोर अहंकार प्रविष्ट हो गया। देवराज इंद्र अग्नि देव वायु देव और अन्य लोकपाल यह विचार करने लगे कि यह विजय केवल उनके अपने अस्त्र शस्त्रों बाहुबल और व्यक्तिगत पराक्रम के कारण प्राप्त हुई है। वे यह विस्मृत कर बैठे कि उनकी अपनी कोई स्वतंत्र शक्ति नहीं है अपितु उनके भीतर कार्य करने वाली प्राण शक्ति साक्षात जगदाधार महादेव की ही है।
देवताओं के भीतर पनप रहे इस आत्मघाती दंभ को देखकर देवाधिदेव महादेव के मन में करुणा जाग्रत हुई। भगवान शिव जानते थे कि अहंकार ज्ञान का सबसे बड़ा शत्रु है और जिस देवता अथवा मनुष्य के भीतर अहंकार प्रविष्ट हो जाता है उसका पतन अवश्यंभावी होता है। अतः देवताओं के कल्याण और उनके झूठे दंभ को भस्म करने हेतु भगवान शिव ने एक अत्यंत विस्मयकारी और अलौकिक लीला की रचना की।
देवताओं की उस विशाल सभा के समीप अचानक एक ऐसा दिव्य और अकल्पनीय प्रकाश प्रकट हुआ जिसकी उपमा संपूर्ण ब्रह्मांड में नहीं थी। वह स्वरूप साक्षात यक्ष अवतार था। वह यक्ष न तो मनुष्य था न देवता था और न ही कोई गंधर्व था। उसका तेज करोड़ों मध्याह्न के सूर्यों से भी अधिक प्रखर था और उसकी दिव्य उपस्थिति से संपूर्ण अंतरिक्ष आलोकित हो उठा।
देवता उस अद्भुत सत्ता को देखकर भय और विस्मय से भर गए। वे समझ न सके कि यह कौन सी अलौकिक शक्ति है जो उनके सामने निर्भय होकर खड़ी थी। तब देवराज इंद्र ने सबसे पहले अग्नि देव को भेजा और कहा कि हे जातवेदा तुम समस्त पदार्थों को भस्म करने वाले हो तुम जाकर पता लगाओ कि यह विशालकाय और तेजस्वी प्राणी कौन है।
अग्नि देव अत्यंत गर्व से भरकर उस यक्ष के समीप पहुंचे। यक्ष ने शांत भाव से पूछा कि तुम कौन हो और तुम्हारी शक्ति क्या है। अग्नि देव ने अभिमान में भरकर उत्तर दिया कि मैं अग्नि हूं संपूर्ण संसार मुझे जातवेदा के नाम से जानता है और मैं इस पृथ्वी और आकाश के समस्त चराचर जगत को एक ही क्षण में भस्म करने का सामर्थ्य रखता हूं।
भगवान यक्ष ने मंद मुस्कान के साथ अपने सामने भूमि पर एक अत्यंत सूखा घास का तिनका रख दिया। यक्ष ने कहा कि हे अग्नि देव यदि तुम्हारे भीतर ऐसी शक्ति है तो मेरे सामने रखे इस सूखे तिनके को जलाकर दिखाओ।
इसके पश्चात देवराज इंद्र ने वायु देव को भेजा। वायु देव तीव्र आंधी और चक्रवात का रूप धारण करके यक्ष के सम्मुख पहुंचे। यक्ष ने पुनः वही प्रश्न किया कि तुम्हारी शक्ति क्या है। वायु देव ने अहंकार में भरकर कहा कि मैं मातborderरिश्वा हूं और मैं इस संपूर्ण ब्रह्मांड के पर्वतों और ग्रहों को अपनी एक ही श्वास से उखाड़कर फेंक सकता हूं।
भगवान यक्ष ने पुनः उसी सूखे तिनके की ओर संकेत किया और कहा कि हे वायु देव तुम इस तिनके को अपनी शक्ति से उड़ाकर दिखाओ। वायु देव ने प्रलयंकारी झंझावात उत्पन्न किया। संपूर्ण दिशाएं थरथराने लगीं और पर्वत डोलने लगे किंतु वह सूखा तिनका अपनी जगह से तिल भर भी नहीं हिला। वायु देव की समस्त शक्ति क्षीण हो गई और वे भी नतमस्तक होकर सभा में लौट आए।
अग्नि और वायु जैसे महाबली देवताओं की यह दुर्गति देखकर देवराज इंद्र का सिंहासन डोल गया। इंद्र ने विचार किया कि जिस सत्ता के सम्मुख अग्नि और वायु पंगु हो गए हैं उससे मैं स्वयं निपटूंगा। इंद्र अपने ऐरावत हाथी पर सवार होकर हाथ में संहारक वज्र लिए प्रचंड वेग से उस यक्ष की ओर बढ़े।
इंद्र के भीतर स्वर्ग के सम्राट होने का अहंकार चरम पर था। किंतु जैसे ही इंद्र उस यक्ष के समीप पहुंचे वैसे ही वह दिव्य यक्ष स्वरूप पलक झपकते ही अंतर्धान हो गया। इंद्र के सामने केवल अनंत और शून्य आकाश शेष रह गया। इंद्र का सारा क्रोध और दंभ एक ही क्षण में वाष्प बनकर उड़ गया। वे हक्के बक्के होकर उस निर्जन स्थान पर खड़े रह गए।
तभी उसी आकाश मंडल में एक अत्यंत दिव्य और अलौकिक प्रकाश प्रस्फुटित हुआ। उस स्वर्णिम ज्योति के मध्य साक्षात भगवती उमा हैमवती प्रकट हुईं। उनका सौंदर्य और तेज अवर्णनीय था। वे सोने के आभूषणों से सुसज्जित थीं और उनके मुख पर अगाध ज्ञान की आभा दमक रही थी।
इंद्र ने दोनों हाथ जोड़कर भगवती उमा के चरणों में साष्टांग प्रणाम किया और अत्यंत विनम्र स्वर में पूछा कि हे जगन्माता कृपया मुझे बताएं कि वह महातेजस्वी यक्ष कौन था जो हमारे अभिमान को चूर चूर करके अंतर्धान हो गया।
माता उमा ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया कि हे इंद्र वह कोई साधारण यक्ष नहीं था अपितु वह साक्षात परब्रह्म देवाधिदेव भगवान शिव थे। तुम देवताओं ने जो असुरों पर विजय प्राप्त की है वह तुम्हारे अपने बल से नहीं अपितु उन्हीं महादेव की शक्ति के प्रभाव से हुई है। तुम सब अज्ञानतावश उनकी दी हुई शक्ति को अपना पराक्रम मान बैठे थे। संपूर्ण ब्रह्मांड में पत्ता भी उनकी इच्छा के बिना नहीं हिल सकता।
माता उमा के इन ज्ञानमयी वचनों को सुनकर इंद्र के नेत्रों से अज्ञान का पर्दा हट गया। समस्त देवताओं ने अपने अहंकार की आहुति दी और साक्षात भगवान शिव तथा भगवती उमा की स्तुति करके पुनः धर्म का मार्ग अपनाया।
वैदिक ज्योतिष के आधार ग्रंथ बृहत् पराशर होरा शास्त्र में ग्रहों के आत्मिक और भौतिक प्रभाव का विस्तृत विवेचन मिलता है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से भगवान शिव का यक्ष अवतार सीधे तौर पर सूर्य देव और मंगल देव के अहंकार को शांत करने का परम आध्यात्मिक उपाय है।
सूर्य ग्रह को ज्योतिष में आत्मा पद प्रतिष्ठा राजा और उच्च अहंकार का प्रतीक माना गया है जिसका प्रतिनिधित्व देवराज इंद्र करते हैं। दूसरी ओर मंगल ग्रह अग्नि तत्व बाहुबल पराक्रम और आक्रामकता का स्वामी है जिसका प्रतिनिधित्व अग्नि देव करते हैं। जब किसी जातक की जन्म कुंडली में सूर्य और मंगल एक साथ लग्न भाव पंचम भाव अथवा दशम भाव में बैठते हैं तो जातक के भीतर अत्यधिक अहंकार जन्म लेता है।
मानव जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि व्यक्ति अपनी सफलताओं का श्रेय स्वयं लेता है किंतु अपनी असफलताओं का दोष दूसरों अथवा भाग्य पर मढ़ देता है। जब तक मनुष्य के भीतर कर्तापन का भाव रहता है तब तक वह कर्म के बंधनों में बंधा रहता है।
भगवान यक्ष की यह पावन कथा यह सिखाती है कि संसार में जो कुछ भी घटित हो रहा है वह सब उस परम चेतना की इच्छा से ही संचालित है। हम केवल निमित्त मात्र हैं। जिस दिन मनुष्य यह स्वीकार कर लेता है कि उसका बल उसकी बुद्धि और उसकी संपदा सब ईश्वर की दी हुई अमानत है उसी दिन उसके समस्त मानसिक संताप समाप्त हो जाते हैं। यक्ष साधना मनुष्य के भीतर के उस झूठे दंभ को समाप्त करती है जो उसे पतन की ओर ले जाता है और उसे हर परिस्थिति में शांत और संतुलित रहना सिखाती है।
यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में सूर्य राहु का ग्रहण योग बन रहा हो मंगल के कारण अत्यधिक क्रोध और अहंकार आता हो अथवा पद प्रतिष्ठा पर संकट मंडरा रहा हो तो शास्त्रों में इसके निवारण हेतु अत्यंत प्रामाणिक वैदिक उपाय बताए गए हैं।
| क्या अवश्य करें | किन गलतियों से सर्वथा दूर रहें |
|---|---|
| प्रतिदिन प्रातः काल उठकर अपनी सफलता के लिए ईश्वर को धन्यवाद दें | अपनी विद्या धन पद अथवा बाहुबल का कभी भी अहंकार न करें |
| संतों विद्वानों और अपने से बड़ों का सदैव आदरपूर्वक सम्मान करें | किसी भी निर्बल असहाय अथवा पराजित व्यक्ति का उपहास न उड़ाएं |
| सोमवार और प्रदोष के दिन पूर्णतः सात्विक और हल्का भोजन ग्रहण करें | तामसिक भोजन मदिरा और नशीले पदार्थों का सेवन सर्वथा वर्जित रखें |
| अपने जीवन में सेवा भाव और परोपकार को सर्वोच्च प्राथमिकता दें | अपनी उपलब्धियों का झूठा ढिंढोरा पीटने से सर्वथा दूर रहें |
| पूजा में शुद्ध गंगाजल भस्म और ताजे बेलपत्र ही शिवलिंग पर अर्पित करें | बिना सोचे समझे किसी पर क्रोध अथवा कठोर वचनों का प्रयोग न करें |
भगवान शिव का यक्ष अवतार संपूर्ण मानव जाति को यह सनातन संदेश देता है कि शक्ति का वास्तविक सौंदर्य उसकी विनम्रता में है। जब देवता जैसी अमर विभूतियां भी अहंकार के कारण एक तिनके के सम्मुख पंगु हो सकती हैं तो नश्वर मनुष्य अपने तुच्छ सामर्थ्य पर गर्व कैसे कर सकता है। सूखे तिनके की वह परीक्षा वास्तव में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए एक दिव्य दर्पण है जो यह दिखाती है कि परमात्मा के बिना सबसे बड़ा शूरवीर भी शून्य है। जब मनुष्य अपने भीतर के कर्तापन के अहंकार को यक्षेश्वर शिव के चरणों में समर्पित कर देता है तब उसका हृदय गंगाजल की भांति निर्मल हो जाता है। भगवान यक्षेश्वर का नित्य स्मरण मनुष्य के जीवन से समस्त ग्रह दोषों मिथ्या दंभ और पराजय के भय को समाप्त करके उसे एक शांत तेजस्वी और परम ज्ञानी व्यक्तित्व बनाकर अंततः मोक्ष की प्राप्ति कराता है।
भगवान शिव ने यक्ष अवतार किस मुख्य कारण से धारण किया था? भगवान शिव ने असुरों पर विजय पाने के पश्चात देवताओं के भीतर उत्पन्न हुए झूठे अहंकार का मान मर्दन करने हेतु यक्ष अवतार धारण किया था।
यक्ष अवतार की कथा किस उपनिषद में विस्तार से मिलती है? यक्ष अवतार और सूखे तिनके की यह पावन कथा सामवेद के सुप्रसिद्ध केनोपनिषद के तृतीय और चतुर्थ खंड में विस्तार से मिलती है।
अग्नि और वायु देव यक्ष के सामने क्यों पराजित हो गए थे? अग्नि देव यक्ष द्वारा रखे गए एक सूखे तिनके को जला नहीं सके और वायु देव अपनी पूरी शक्ति से भी उसे हिला नहीं सके इसलिए वे पराजित हो गए।
देवताओं को यक्ष के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान किसने कराया था? इंद्र के सामने जब यक्ष अंतर्धान हो गए तब साक्षात भगवती उमा हैमवती ने प्रकट होकर बताया कि वह यक्ष कोई और नहीं बल्कि परब्रह्म शिव थे।
ज्योतिष में यक्ष अवतार का संबंध किन ग्रहों के अहंकार से है? वैदिक ज्योतिष में यक्ष अवतार का सीधा संबंध आत्मा व सत्ता के कारक सूर्य देव और पराक्रम व क्रोधाग्नि के स्वामी मंगल देव के अहंकार को शांत करने से है।
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