यतिनाथ अवतार और सप्तम भाव क्या है?

By पं. नीलेश शर्मा

भील दंपति आहुक आहुका की परीक्षा नल दमयंती वरदान और सप्तम भाव की दांपत्य निष्ठा का संपूर्ण रहस्य

यतिनाथ अवतार कथा और सप्तम भाव का रहस्य

यतिनाथ पूजन विधान और गृहस्थ धर्म नियम

सनातन वैदिक परंपरा में देवाधिदेव भगवान शिव के अत्यंत करुणामयी और गृहस्थ धर्म के सर्वोच्च आदर्श स्वरूप के रूप में पूजित भगवान यतिनाथ का प्राकट्य अतिथि सत्कार दांपत्य निष्ठा और आत्मिक समर्पण का सर्वोच्च शिखर है। वैदिक ज्योतिष तथा आध्यात्मिक तत्व दर्शन के अंतर्गत जन्म कुंडली के सप्तम भाव के दांपत्य सुख जीवनसाथी के प्रति अटूट निष्ठा तथा नवम भाव के धर्म तत्व अतिथि देवो भव के पावन संकल्प को जाग्रत करने के लिए भगवान यतिनाथ की आराधना को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जब जातक की जन्म कुंडली में सप्तम भाव अथवा सप्तमेश पीड़ित होकर दांपत्य जीवन में कलह अविश्वास अलगाव अथवा वैवाहिक सुख में बाधाएं उत्पन्न कर रहा हो तब यतिनाथ स्वरूप का ध्यान संबंधों में प्राण फूंक देता है। इस पावन अनुष्ठान की तिथि समय और शास्त्रीय घटकों का संपूर्ण विवरण नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।

शास्त्रीय आयाम अनुष्ठान विवरण और ज्योतिषीय मान्यता
प्रमुख पावन तिथि प्रत्येक मास की शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी प्रदोष व्रत अथवा सोमवार
दैनिक पूजन समय प्रातः कालीन सूर्योदय वेला अथवा सायंकालीन गोधूलि प्रदोष काल
अधिष्ठाता स्वरूप शांत संन्यासी यति रूप धारी दण्ड और कमंडल लिए भगवान शिव
ज्योतिषीय भाव व ग्रह संबंध सप्तम भाव नवम भाव देवगुरु बृहस्पति और प्रेम कारक शुक्र देव
मुख्य पूजन सामग्री शुद्ध गंगाजल श्वेत चंदन अक्षत बेलपत्र श्वेत पुष्प और पंचामृत
प्रधान वैदिक अनुष्ठान शिव पंचाक्षर मंत्र जप यतिनाथ स्तुति और अतिथि सेवा सत्कार
अपेक्षित फल दांपत्य कलह शांति अखंड वैवाहिक निष्ठा और पूर्व जन्म के ऋणों की शुद्धि

भील दंपति आहुक आहुका की पावन अतिथि निष्ठा

शिव महापुराण की शतरुद्र संहिता में वर्णित परम पावन इतिहास के अनुसार प्राचीन काल में अर्बुदाचल पर्वत अर्थात वर्तमान माउंट आबू के घने और सुरम्य वनों में आहुक नामक एक परम धर्मनिष्ठ भील अपनी पतिव्रता पत्नी आहुका के साथ निवास करता था। आहुक भील जाति का राजा था किंतु उसका जीवन अत्यंत सात्विक सरल और भगवान शिव की भक्ति से परिपूर्ण था। दोनों पति पत्नी वन में एक छोटी सी तृण कुटिया बनाकर रहते थे और कंद मूल फल तथा वन संपदा से अपना जीवन यापन करते थे।

यद्यपि वे वनवासी थे और सांसारिक दृष्टि से निर्धन प्रतीत होते थे किंतु उनका अंतःकरण धर्म की अगाध संपदा से संपन्न था। उनके जीवन का एक अटूट और परम पवित्र नियम था कि वे प्रतिदिन अपनी कुटिया में आने वाले किसी भी अतिथि का सत्कार किए बिना स्वयं भोजन ग्रहण नहीं करते थे। वे अतिथि को साक्षात नारायण का स्वरूप मानते थे। माता आहुका अपने पति के प्रत्येक धर्म कार्य में छाया की भांति साथ देती थीं और उनके मन में अपने पति के प्रति अगाध प्रेम और समर्पण का भाव था।

उन दोनों का यह निष्कपट दांपत्य प्रेम और अतिथि धर्म तीनों लोकों में प्रशंसित होने लगा। तब देवाधिदेव भगवान शिव ने विचार किया कि संसार को यह दिखाना आवश्यक है कि वास्तविक धर्म बाह्य आडंबरों में नहीं अपितु हृदय की निष्कपट भावना और त्याग में निवास करता है। भगवान शिव ने आहुक और आहुका की उस निष्ठा की परीक्षा लेने का विचार किया जो काल के थपेड़ों से भी परे थी।

संन्यासी यतिनाथ का आगमन और आत्म बलिदान की परीक्षा

एक दिन जब संध्या वेला ढल चुकी थी और वन में घनघोर अंधकार छा गया था तब मूसलाधार वर्षा और भयानक गर्जना के मध्य एक अत्यंत शांत और तेजस्वी संन्यासी उस भील की कुटिया के द्वार पर पहुंचे। उनके हाथ में दण्ड और कमंडल था उनके मस्तक पर भस्म का त्रिपुंड दमक रहा था और उनकी दृष्टि में असीम करुणा थी। वे साक्षात भगवान शिव थे जिन्होंने यतिनाथ का रूप धारण किया था।

द्वार पर पधारे संन्यासी को देखकर आहुक और आहुका के आनंद की कोई सीमा न रही। उन्होंने अत्यंत आदरपूर्वक यतिनाथ के चरण पखारे उन्हें कुटिया के भीतर बैठाया और वन के मीठे फल तथा शीतल जल अर्पित किया। भोजन के उपरांत जब रात्रि विश्राम का समय आया तब एक अत्यंत विषम और गंभीर संकट उपस्थित हो गया।

  • भील दंपति की वह कुटिया अत्यंत छोटी थी जिसमें केवल दो व्यक्तियों के ही सोने का स्थान था।
  • बाहर घने वन में मूसलाधार वर्षा हो रही थी और हिंसक पशुओं की भयानक गर्जनाएं गूंज रही थीं।
  • आहुक ने अपनी पत्नी से विचार विमर्श किया कि यदि वे दोनों कुटिया में सोते हैं तो अतिथि धर्म का घोर उल्लंघन होगा।
  • आहुका ने प्रस्ताव दिया कि वह स्वयं और अतिथि कुटिया में रहें तथा आहुक बाहर सोएं किंतु आहुक ने अपनी पत्नी को बाहर संकट में छोड़ना उचित नहीं समझा।
  • अंततः आहुक ने अपने अतिथि यतिनाथ को कुटिया के भीतर सुरक्षित सुलाया और स्वयं हाथ में धनुष बाण लेकर कुटिया के बाहर पहरा देने लगे।

पूरी रात भीषण वर्षा होती रही और आहुक अत्यंत सजग होकर अपने अतिथि की रक्षा हेतु बाहर खड़े रहे। रात्रि के अंतिम प्रहर में जब अंधकार अत्यंत गहरा था तब वन के एक अत्यंत भयानक और हिंसक पशु ने पीछे से आकर आहुक पर प्राणघातक आक्रमण कर दिया। आहुक ने अपने प्राणों की बातिल भर भी चिंता किए बिना केवल यह ध्यान रखा कि अतिथि की निद्रा में कोई बाधा न पहुंचे। उस हिंसक पशु ने आहुक को अपना ग्रास बना लिया और वे वीरगति को प्राप्त होकर भूमि पर गिर पड़े।

चिता प्रवेश और साक्षात भगवान शिव का प्राकट्य

प्रातः काल जब सूर्य की प्रथम किरणें फूटीं और वर्षा शांत हुई तब यतिनाथ रूपी भगवान शिव कुटिया से बाहर आए। माता आहुका जब अपने पति को देखने बाहर निकलीं तो उन्होंने देखा कि उनके पति का क्षत विक्षत निष्प्राण शरीर रक्त से लथपथ भूमि पर पड़ा हुआ था। उस दारुण दृश्य को देखकर आहुका के पैरों तले से पृथ्वी खिसक गई।

किंतु धन्य थीं माता आहुका जिन्होंने अपने मुख से शोक का एक भी शब्द नहीं निकाला और न ही अपने अतिथि को कोई दोष दिया। उन्होंने यतिनाथ से अत्यंत विनम्र स्वर में कहा कि हे पूज्य यति आज हमारे सौभाग्य से हमारा अतिथि धर्म पूर्ण हुआ क्योंकि मेरे पति ने अतिथि की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति दी है। इसके उपरांत आहुका ने अपने पति के शरीर के साथ सती होने का दृढ़ संकल्प लिया। उन्होंने वन से चंदन और लकड़ियां एकत्र करके एक भव्य चिता का निर्माण किया।

जब आहुका अपने पति के मस्तक को अपनी गोद में रखकर प्रज्वलित चिता में प्रवेश करने लगीं तब यतिनाथ के रूप में खड़े भगवान शिव का अंतःकरण द्रवित हो उठा। उसी क्षण प्रज्वलित चिता की ज्वालाएं शीतल हो गईं और चिता के मध्य से साक्षात नीलकंठ भगवान शिव अपने चतुर्भुज दिव्य रूप में प्रकट हो गए। उनके एक हाथ में त्रिशूल दूसरे में डमरू तीसरे में वरद मुद्रा और चौथे में अभय मुद्रा सुशोभित थी।

भगवान शिव ने अपने करकमलों से आहुका को उठाया और आहुक के निष्प्राण शरीर पर अमृतमयी दृष्टि डाली। उस दिव्य दृष्टि के स्पर्श से आहुक उसी क्षण जीवित होकर उठ बैठे। भगवान शिव ने अत्यंत प्रसन्न होकर कहा कि हे निष्पाप दंपति तुम्हारे इस त्याग और निष्काम अतिथि धर्म ने मुझे पराजित कर दिया है। भगवान शिव ने उन्हें अमर वरदान देते हुए कहा कि आगामी जन्म में आहुक परम प्रतापी चक्रवर्ती राजा नल के रूप में जन्म लेंगे और आहुका विदर्भ देश की परम सुंदरी और पतिव्रता राजकुमारी दमयंती के रूप में जन्म लेंगी। भगवान शिव ने यह भी वचन दिया कि वे स्वयं हंस के रूप में प्रकट होकर उन दोनों के अमर प्रेम का मिलन कराएंगे और वे दोनों संसार में आदर्श दांपत्य के प्रतीक बनेंगे।

सप्तम और नवम भाव का ज्योतिषीय मर्म

वैदिक ज्योतिष के महानतम ग्रंथ बृहत् पराशर होरा शास्त्र में जन्म कुंडली के प्रत्येक भाव के आध्यात्मिक और भौतिक आयामों का गहरा विवेचन मिलता है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से भगवान यतिनाथ की यह पावन लीला जन्म कुंडली के सप्तम भाव और नवम भाव के सर्वोत्तम समन्वय का प्रतिनिधित्व करती है।

जन्म कुंडली का सप्तम भाव जिसे जाया भाव अथवा कलत्र भाव कहा जाता है सीधे तौर पर दांपत्य जीवन जीवनसाथी के प्रति समर्पण निष्ठा और वैवाहिक सुख का केंद्र है। इस भाव के नैसर्गिक कारक ग्रह प्रेम और सौंदर्य के स्वामी शुक्र देव हैं। दूसरी ओर कुंडली का नवम भाव जिसे धर्म भाव कहा जाता है जातक के उच्च संस्कारों पुण्य कर्मों और अतिथि सत्कार का स्थान है जिसके कारक ज्ञान के अधिपति देवगुरु बृहस्पति हैं।

  • जब सप्तम भाव का संबंध नवम भाव से बनता है तो जातक को ऐसा जीवनसाथी प्राप्त होता है जो केवल शारीरिक आकर्षण से नहीं बल्कि आत्मिक धर्म से जुड़ा होता है।
  • आहुक और आहुका का प्रसंग यह दर्शाता है कि सच्चा दांपत्य वही है जहां दोनों साथी एक दूसरे के धर्म पालन में सहायक बनते हैं।
  • यदि कुंडली में सप्तम भाव पर राहु अथवा मंगल का पाप प्रभाव हो तो व्यक्ति स्वार्थी बन जाता है और दांपत्य में त्याग की भावना समाप्त हो जाती है जिससे विवाह टूट जाता है।
  • भगवान यतिनाथ की आराधना सप्तम भाव के समस्त पाप प्रभावों को भस्म कर देती है और जीवनसाथी के भीतर त्याग व समर्पण की भावना जाग्रत करती है।

क्या दांपत्य कलह और अलगाव से मुक्ति संभव है?

आधुनिक युग में वैवाहिक संबंधों का सबसे बड़ा संकट यह है कि लोग विवाह को केवल एक सामाजिक अनुबंध मानते हैं और उसमें एक दूसरे से केवल अपेक्षाएं रखते हैं। जब दोनों पक्षों में अहंकार और स्वार्थ बढ़ जाता है तो छोटा सा विवाद भी न्यायालय और तलाक तक पहुंच जाता है।

भगवान यतिनाथ का चरित्र यह सिखाता है कि जब तक व्यक्ति अपने साथी के लिए त्याग करने को तैयार नहीं होता तब तक प्रेम अमर नहीं हो सकता। जिस प्रकार आहुक ने अतिथि के लिए अपने प्राण दिए और आहुका ने पति के साथ चिता में प्रवेश करने का साहस दिखाया वही निष्ठा जीवन में दिव्यता लाती है। जब कोई जातक वैवाहिक कलह से त्रस्त होकर यतिनाथ शिव की शरण में जाता है तो उसके अंतःकरण से अहंकार गल जाता है और दोनों के मध्य पूर्व जन्म के शुभ कर्म जाग्रत होकर प्रेम को पुनर्जीवित कर देते हैं।

दांपत्य सुख और सप्तम भाव शुद्धि के अचूक वैदिक उपाय

यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में सप्तम भाव में सूर्य राहु अथवा मंगल स्थित होकर दांपत्य जीवन को विषाक्त कर रहे हों विवाह में निरंतर विलंब हो रहा हो अथवा पति पत्नी के बीच अकारण विवाद बना रहता हो तो शास्त्रों में इसके निवारण हेतु अत्यंत प्रभावी वैदिक उपाय बताए गए हैं।

  • प्रत्येक सोमवार अथवा प्रदोष काल में किसी प्राचीन शिव मंदिर में जाकर शिवलिंग पर शुद्ध गंगाजल और कच्चे दूध से अभिषेक करें तथा भगवान यतिनाथ का ध्यान करते हुए ॐ नमः शिवाय अथवा ॐ यतिनाथाय नमः मंत्र का 108 बार शांत मन से जाप करें।
  • दांपत्य जीवन में मधुरता और अटूट निष्ठा बनाए रखने के लिए पति और पत्नी दोनों मिलकर प्रत्येक पूर्णिमा को सत्यनारायण कथा का श्रवण करें अथवा शिव पार्वती का संयुक्त पूजन करें।
  • घर में आने वाले प्रत्येक अतिथि का कभी भी अनादर न करें और भोजन के समय यदि कोई भिक्षुक अथवा जरूरतमंद द्वार पर आए तो उसे आदरपूर्वक भोजन कराएं जिससे नवम भाव का धर्म तत्व प्रबल होता है।
  • प्रत्येक शुक्रवार को किसी निर्धन सुहागिन स्त्री को सुहाग सामग्री इत्र और श्वेत मिष्ठान का दान करें जिससे कुंडली का शुक्र ग्रह अत्यंत बलवान होकर दांपत्य सुख प्रदान करता है।
  • जातक को अपनी शारीरिक अवस्था और योग्य ज्योतिर्विद के परामर्श के अनुसार दो मुखी अथवा गौरी शंकर नेपाली रुद्राक्ष चांदी के तार में पिरोकर गले में धारण करना चाहिए जो दांपत्य कलह को शांत करता है।
  • प्रतिदिन प्रातः काल भोजन बनाते समय प्रथम रोटी गौमाता के निमित्त निकालें और उस पर थोड़ा सा मक्खन व मिश्री रखकर गाय को खिलाएं जिससे परिवार में प्रेम और सामंजस्य बढ़ता है।

यतिनाथ साधना और गृहस्थ के शास्त्रीय नियम

क्या अवश्य करें किन गलतियों से सर्वथा दूर रहें
प्रतिदिन प्रातः काल और सायंकाल भगवान शिव और पार्वती का संयुक्त ध्यान करें अपने जीवनसाथी के साथ कभी भी छल कपट अथवा विश्वासघात न करें
घर आए अतिथि का सदैव मधुर वाणी और आदर के साथ सत्कार करें द्वार पर आए किसी भूखे अथवा भिक्षुक को कभी भी खाली हाथ न लौटाएं
सोमवार और प्रदोष के दिन पूर्णतः सात्विक और शुद्ध भोजन ग्रहण करें वैवाहिक जीवन में अपने व्यक्तिगत अहंकार को कभी भी प्रधान न बनने दें
अपने साथी के धर्म कर्म और आध्यात्मिक कार्यों में सदैव सहयोग दें क्रोध के आवेश में आकर अपने जीवनसाथी का कभी भी अपमान न करें
पूजा में श्वेत पुष्प बेलपत्र और शुद्ध गाय के घी का दीपक अर्पित करें बिना कुंडली मिलान किए कोई भी अशुभ रत्न धारण करने की भूल न करें

त्याग और सत्य निष्ठा से अमर प्रेम

भगवान शिव का यतिनाथ अवतार संपूर्ण मानव जाति को यह सनातन शिक्षा प्रदान करता है कि इस नश्वर संसार में भौतिक वस्तुओं और महलों का कोई स्थायी मूल्य नहीं है। एक छोटी सी तृण कुटिया में रहने वाले भील दंपति ने अपने त्याग से वह पावन पद प्राप्त कर लिया जो बड़े बड़े चक्रवर्ती राजाओं को भी दुर्लभ था। जब मनुष्य अपने स्वार्थ की संकीर्ण परिधि से बाहर निकलकर दूसरों के सुख के लिए अपने प्राणों तक को न्योछावर करने का साहस रखता है तब परमात्मा स्वयं उसके द्वार पर भिक्षुक बनकर आते हैं और उसे अपना साक्षात स्वरूप प्रदान कर देते हैं। सप्तम भाव की पूर्णता केवल भोग में नहीं अपितु एक दूसरे के प्रति अखंड समर्पण में है। भगवान यतिनाथ का नित्य स्मरण मनुष्य के जीवन से समस्त दांपत्य कलह को समाप्त करके उसे अटूट प्रेम अचल निष्ठा और पारिवारिक सुख प्रदान करता है जिससे वह इस संसार में एक धर्मनिष्ठ व्यक्तित्व बनकर अंततः शिव चरणों में स्थान प्राप्त करता है।

FAQ

भगवान शिव ने यतिनाथ अवतार किस मुख्य कारण से धारण किया था? भगवान शिव ने भील राजा आहुक और उनकी पत्नी आहुका के परम पवित्र अतिथि धर्म और दांपत्य निष्ठा की परीक्षा लेने हेतु यतिनाथ अवतार धारण किया था।

आहुक ने अपनी कुटिया में अतिथि को सुलाकर स्वयं बाहर पहरा क्यों दिया था? कुटिया अत्यंत छोटी थी जिसमें केवल दो लोगों के सोने का स्थान था अतः अतिथि धर्म की रक्षा हेतु आहुक ने संन्यासी को अंदर सुलाया और स्वयं बाहर पहरा दिया।

भगवान शिव ने आहुक और आहुका को अगले जन्म में क्या बनने का वरदान दिया था? भगवान शिव ने आहुक और आहुका के त्याग से प्रसन्न होकर उन्हें अगले जन्म में राजा नल और रानी दमयंती के रूप में जन्म लेने और अमर प्रेम का वरदान दिया था।

ज्योतिष में यतिनाथ अवतार का संबंध किन भावों से माना जाता है? वैदिक ज्योतिष में यतिनाथ अवतार का सीधा संबंध जन्म कुंडली के सप्तम भाव दांपत्य निष्ठा और नवम भाव अतिथि सत्कार व धर्म से माना जाता है।

दांपत्य जीवन के कलह और मतभेद शांत करने के लिए किस रुद्राक्ष को धारण करना चाहिए? दांपत्य जीवन में सामंजस्य और प्रेम बढ़ाने के लिए दो मुखी अथवा प्राकृतिक गौरी शंकर रुद्राक्ष धारण करना सर्वोत्तम माना गया है।

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लेखक

पं. नीलेश शर्मा

पं. नीलेश शर्मा (63)


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