भीष्म पितामह और भगवान परशुराम का महायुद्ध

By पं. नीलेश शर्मा

जानिए इतिहास के उस एकमात्र युद्ध की गाथा

भीष्म पितामह और परशुराम का युद्ध: जानिए संपूर्ण कथा

सृष्टि के अनंत इतिहास में ऐसे बहुत कम अवसर आए हैं जब दो परम शक्तिशाली अजेय और दिव्य महायोद्धा आमने सामने खड़े हुए हों। ऐसा ही एक अत्यंत भीषण प्रलयंकारी और अलौकिक संग्राम द्वापर युग के संधिकाल में पवित्र कुरुक्षेत्र की भूमि पर लड़ा गया था। यह युद्ध किसी सामान्य साम्राज्य विस्तार की महत्वाकांक्षा के लिए नहीं था और न ही यह किसी व्यक्तिगत शत्रुता का परिणाम था। यह युद्ध धर्म कर्तव्य वचन मर्यादा और आत्मसम्मान की रक्षा के लिए लड़ा गया एक अद्वितीय वैचारिक और भौतिक संघर्ष था। एक ओर साक्षात भगवान विष्णु के छठे आवेशावतार परम प्रतापी महर्षि परशुराम थे जिन्होंने अपने प्रचंड पराक्रम से इक्कीस बार इस पृथ्वी को अत्याचारी और धर्मभ्रष्ट क्षत्रियों से विहीन कर दिया था। दूसरी ओर गंगापुत्र देवव्रत थे जिन्हें संपूर्ण जगत भीष्म पितामह के नाम से जानता था और जो अपनी अखंड प्रतिज्ञा के लिए त्रिलोक में विख्यात थे। भीष्म इतिहास के एकमात्र ऐसे अद्वितीय और महाबली योद्धा थे जो भगवान परशुराम के प्रचंड क्रोध और अदम्य मारक क्षमता के सामने न केवल अडिग खड़े रहे बल्कि उन्होंने इस महायुद्ध को एक ऐसे अभूतपूर्व मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया था जहां स्वयं देवताओं को हस्तक्षेप करना पड़ा।

भीष्म पितामह को अस्त्र शस्त्र और युद्ध कला की उच्च शिक्षा स्वयं भगवान परशुराम ने प्रदान की थी। गुरु और शिष्य का यह संबंध आध्यात्मिक रूप से अत्यंत पवित्र आदरणीय और गहरा था। परंतु नियति के क्रूर और विचित्र खेल के कारण एक ऐसा समय आया जब इन दोनों महाबलियों को कुरुक्षेत्र की पावन भूमि पर एक दूसरे के विरुद्ध शस्त्र उठाने पड़े। यह युद्ध केवल दो शरीर या दो धनुर्धरों का मिलन नहीं था बल्कि यह गुरु की आज्ञा और शिष्य के कर्तव्य के बीच का एक महान धर्मसंकट था। यह भीषण युद्ध पूरे तेईस दिनों तक बिना किसी निर्णय के निरंतर चलता रहा जिसमें दोनों योद्धाओं ने अपने जीवन की संपूर्ण ऊर्जा और दिव्य शक्तियों को झोंक दिया था। इस गाथा का आध्यात्मिक और ऐतिहासिक महत्व केवल इस बात में नहीं है कि भीष्म ने साक्षात भगवान के एक अवतार का सामना किया बल्कि इसमें वैदिक संस्कृति के गहन मूल्य क्षत्रिय धर्म की पराकाष्ठा और प्रारब्ध के खेल की सूक्ष्म व्याख्या छिपी हुई है।

इस महायुद्ध की तिथि और वैदिक विवरण

सनातन परंपरा और पौराणिक ग्रंथों में इस अलौकिक घटना का वर्णन महर्षि वेदव्यास रचित महाभारत के उद्योग पर्व और भीष्म पर्व में अत्यंत विस्तार से मिलता है। इस दिव्य संग्राम के मुख्य बिंदु ज्योतिषीय पक्ष और आध्यात्मिक पहलू इस प्रकार हैं।

विवरण वैदिक ज्योतिषीय और पौराणिक तथ्य
मुख्य योद्धा भगवान परशुराम (दीक्षा गुरु) और गंगापुत्र भीष्म (परम शिष्य)
युद्ध का मुख्य कारण काशीराज की ज्येष्ठ पुत्री अंबा के विवाह और सम्मान का विवाद
संग्राम की अवधि पूरे तेईस दिनों तक बिना किसी विश्राम के निरंतर भीषण युद्ध
भीष्म की दिव्य शक्ति पिता शांतनु से प्राप्त इच्छा मृत्यु का वरदान और अष्ट वसुओं का अंश
परशुराम की शक्ति भगवान शिव से प्राप्त दिव्य परशु अमरत्व और अनंत तपोबल
वैदिक ज्योतिषीय योग ग्रहों की अत्यंत उग्र स्थिति और कुरुक्षेत्र का विशेष नक्षत्र प्रभाव
युद्ध का अंतिम परिणाम पितरों और देवताओं के हस्तक्षेप से युद्ध विराम (सम्मानजनक बराबरी)

युद्ध की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और अंबा का प्रतिशोध

इस भयंकर और विनाशकारी युद्ध के बीज उस समय बोए गए थे जब भीष्म पितामह ने अपने हस्तिनापुर के सिंहासन के उत्तराधिकारी और अनुज विचित्रवीर्य के विवाह के लिए काशी के राजा की तीन पुत्रियों अंबा अंबिका और अंबालिका का स्वयंवर से बलपूर्वक हरण कर लिया था। भीष्म के इस पराक्रम से संपूर्ण सभा चकित रह गई थी। परंतु हस्तिनापुर पहुंचने पर ज्येष्ठ पुत्री अंबा ने अत्यंत संकोच और दृढ़ता के साथ भीष्म को बताया कि वह पहले ही सौभदेश के राजा शाल्व को अपना मन समर्पित कर चुकी हैं और मन ही मन उन्हें अपना पति मान चुकी हैं। जब भीष्म को इस सत्य का ज्ञान हुआ तो उन्होंने क्षत्रिय मर्यादा और नारी सम्मान का ध्यान रखते हुए अंबा को पूरे राजकीय सम्मान के साथ राजा शाल्व के पास वापस भेज दिया।

परंतु नियति को कुछ और ही स्वीकार था। राजा शाल्व ने दूसरे पुरुष द्वारा बलपूर्वक हरी गई स्त्री को अपनी रानी के रूप में स्वीकार करने से स्पष्ट मना कर दिया। उन्होंने अंबा के प्रेम को ठुकरा दिया जिससे अंबा का हृदय टूट गया। वह अत्यंत असहाय क्रोधित और अपमानित बोध करती हुई पुनः भीष्म के पास लौटी। अंबा ने भीष्म से कहा कि चूंकि आपकी वजह से मेरा विवाह राजा शाल्व से नहीं हो सका इसलिए अब आपको ही मुझसे विवाह करना होगा। भीष्म अपनी अखंड ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा और हस्तिनापुर की रक्षा के वचन से बंधे हुए थे इसलिए उन्होंने अंबा के इस विवाह प्रस्ताव को अत्यंत विनम्रतापूर्वक परंतु दृढ़ता से अस्वीकार कर दिया।

अंबा का क्रोध अब प्रतिशोध की ज्वाला में बदल चुका था। उसने पृथ्वी के कई राजाओं से सहायता मांगी परंतु भीष्म के भय से कोई भी राजा भीष्म के विरुद्ध खड़ा होने को तैयार नहीं हुआ। अंततः न्याय न मिलने पर अंबा न्याय की गुहार लेकर महर्षि परशुराम की शरण में महर्षि के आश्रम पहुंची। परशुराम जी अपनी शरणागत शिष्या के कष्ट और आंसुओं को देखकर अत्यंत द्रवित हो उठे। उन्होंने अपने प्रिय शिष्य भीष्म को संदेश भेजा और आदेश दिया कि वे या तो अंबा से विवाह करके उसे न्याय प्रदान करें अन्यथा अपने गुरु के साथ युद्ध करने के लिए तत्पर हो जाएं। भीष्म ने संदेश पाकर अपने गुरु के चरणों में मस्तक झुकाया परंतु अपनी भीषण प्रतिज्ञा को भंग करने से साफ मना कर दिया। परिणाम स्वरूप गुरु और शिष्य के बीच एक अनिवार्य युद्ध का मार्ग प्रशस्त हुआ।

कुरुक्षेत्र का मैदान और तेईस दिनों का भयंकर संग्राम

जब भीष्म पितामह अपने विशाल और दिव्य रथ पर सवार होकर कुरुक्षेत्र के मैदान में पहुंचे तो महर्षि परशुराम वहां पहले से ही अपने अस्त्र शस्त्रों के साथ उपस्थित थे। युद्ध भूमि में कदम रखते ही भीष्म ने सबसे पहले अपने रथ से उतरकर अस्त्रों को भूमि पर रखा और पैदल चलकर अपने गुरु परशुराम के चरणों को स्पर्श किया। उन्होंने गुरु की धूल को अपने मस्तक पर लगाया और युद्ध के लिए विजय का आशीर्वाद मांगा। परशुराम जी अपने शिष्य की इस अगाध भक्ति और श्रेष्ठ संस्कारों को देखकर भीतर से गद्गद हो गए। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि देवव्रत एक गुरु के रूप में मेरा कल्याणकारी आशीर्वाद सदैव तुम्हारे साथ है परंतु एक योद्धा के रूप में मैं इस समय अपनी शरणागत अंबा के प्रति वचनबद्ध हूँ इसलिए मैं तुम्हें पराजित करने के लिए अपनी पूरी शक्ति का प्रयोग करूँगा।

इसके बाद दोनों योद्धा अपने अपने रथों पर आरूढ़ हुए और शंखनाद के साथ युद्ध का आरंभ हुआ। युद्ध के प्रारंभिक दिनों में दोनों ओर से अत्यंत उग्र और दिव्य अस्त्रों का प्रयोग किया गया। परशुराम जी ने अपने प्रचंड धनुष से भीष्म पर तीक्ष्ण और घातक बाणों की ऐसी वर्षा की जिससे आकाश ढक गया। भीष्म ने भी अपने गुरु से सीखी हुई संपूर्ण धनुर्विद्या का अद्भुत और अलौकिक प्रदर्शन करते हुए हर वार को हवा में ही काट दिया। जैसे जैसे दिन बीतते गए युद्ध की विभीषिका और अधिक भयावह होती चली गई। आकाश मंडल देवताओं गंधर्वों और यक्षों से भर गया जो इस अभूतपूर्व और अलौकिक द्वंद्व को देखने के लिए अत्यंत उत्सुक थे।

युद्ध के मध्य काल में महर्षि परशुराम ने अपने तपोबल से जागृत दिव्य बाणों से भीष्म के रथ के घोड़ों को मार गिराया और उनके सारथी को भी धराशायी कर दिया। परंतु गंगापुत्र भीष्म विचलित नहीं हुए और उन्होंने प्रत्येक बार एक नए वेग ऊर्जा और रथ के साथ युद्ध में वापसी की। भीष्म के तीखे बाणों के प्रहार से स्वयं साक्षात परशुराम भी कई बार रथ पर मूर्छित हुए। यह देखकर संपूर्ण ब्रह्मांड चकित रह गया क्योंकि इससे पहले किसी भी क्षत्रिय या योद्धा ने परशुराम जी को इस सीमा तक टक्कर नहीं दी थी। यह दृश्य इस बात का जीवंत प्रमाण था कि भीष्म का पराक्रम और संयम दिव्य स्तर का था।

क्या भीष्म पितामह ने प्रस्वापास्त्र का प्रयोग किया था?

युद्ध अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच चुका था और तेईसवें दिन भीष्म पितामह ने यह भली भांति अनुभव किया कि महर्षि परशुराम को साधारण या पारंपरिक दिव्य अस्त्रों से पराजित करना सर्वथा असंभव है क्योंकि वे स्वयं अमर हैं और उनका तपोबल अनंत है। तब भीष्म ने अपनी आंखें बंद कीं और अपनी अंतर्दृष्टि से उस अत्यंत गुप्त और परम शक्तिशाली अस्त्र का स्मरण किया जो उन्हें उनके पूर्व जन्मों के संचित पुण्यों महर्षि वसिष्ठ की कृपा और अष्ट वसुओं के ज्ञान के कारण प्राप्त हुआ था। इस महाविनाशक अस्त्र का नाम प्रस्वापास्त्र था।

यह एक ऐसा अत्यंत विशिष्ट और मारक अस्त्र था जो साक्षात ब्रह्मा जी के मानस पुत्रों द्वारा निर्मित किया गया था। इस अस्त्र की विशेषता यह थी कि इसके प्रयोग से शत्रु की चेतना पूरी तरह से लुप्त हो जाती थी और वह युद्ध भूमि में ही एक गहरी और अनंत निद्रा में सो जाता था। भीष्म ने जैसे ही अपनी एकाग्रता से इस प्रस्वापास्त्र को अपने धनुष पर संधान किया संपूर्ण अंतरिक्ष और पृथ्वी डगमगाने लगी। चारों ओर तीव्र हवाएं चलने लगीं और समुद्र में उथल पुथल मच गई।

यदि भीष्म इस अस्त्र का प्रयोग भगवान परशुराम पर कर देते तो परशुराम जी युद्ध भूमि में चेतनाहीन होकर गिर जाते। यह भगवान के एक अवतार का घोर अपमान होता और सृष्टि का संतुलन भी बिगड़ सकता था। उसी क्षण समय की गति को रोकते हुए देवर्षि नारद आकाश मार्ग से प्रकट हुए और भीष्म की माता साक्षात देवी गंगा भी वहां अवतरित हुईं। उन्होंने अत्यंत व्याकुलता से भीष्म का हाथ पकड़ लिया और उन्हें इस महाविनाशक अस्त्र को चलाने से रोक दिया। उन्होंने भीष्म को अत्यंत प्रेम और ज्ञानपूर्वक समझाया कि महर्षि परशुराम तुम्हारे गुरु हैं और साक्षात नारायण के अंश हैं। गुरु पर इस प्रकार का चेतना हरने वाला अस्त्र चलाना सनातन धर्म और नैतिकता के सर्वथा विरुद्ध माना जाएगा। भीष्म ने देवताओं और अपनी माता की इस आज्ञा को शिरोधार्य किया और अत्यंत आदर के साथ उस अस्त्र को वापस अपने तर्कश में रख लिया।

इस अलौकिक महायुद्ध का अंतिम आध्यात्मिक परिणाम क्या रहा?

भीष्म द्वारा अपने अचूक अस्त्र को वापस लिए जाने के बाद भगवान परशुराम ने भी अपने दिव्य धनुष को भूमि पर रख दिया। वे भीष्म के इस अदम्य साहस क्षत्रिय धर्म के प्रति अटूट निष्ठा गुरुभक्ति और अंतिम क्षण में दिखाए गए नैतिक संयम को देखकर भीतर से अत्यंत प्रसन्न और संतुष्ट हुए। परशुराम जी ने कुरुक्षेत्र के मैदान में उपस्थित सभी देवगणों के सामने ऊंचे स्वर में यह स्वीकार किया कि इस संपूर्ण चराचर जगत में भीष्म को युद्ध भूमि में पराजित कर पाना किसी भी देवता मनुष्य या असुर के लिए संभव नहीं है।

महर्षि परशुराम ने इसके बाद अंबा को अपने पास बुलाया और अत्यंत शांत स्वर में कहा कि पुत्री मैंने भीष्म को झुकाने और तुम्हें न्याय दिलाने का हर संभव प्रयास किया परंतु भीष्म अपने क्षत्रिय धर्म और अपनी ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा पर पूरी तरह से अटल रहे। उन्हें युद्ध में पराजित करना साक्षात काल के लिए भी संभव नहीं है इसलिए अब तुम्हें किसी अन्य मार्ग का चयन करना होगा। इस प्रकार यह ऐतिहासिक महायुद्ध बिना किसी योद्धा की हार या जीत के एक अत्यंत सम्मानजनक स्तर पर समाप्त हुआ। देवताओं ने आकाश से दोनों महायोद्धाओं पर पुष्पवर्षा की और इस धर्म संकट के शांतिपूर्ण समाधान की सराहना की। इसके तुरंत बाद भीष्म पितामह ने पुनः अपने गुरु परशुराम के चरणों की धूल को अपने मस्तक पर लगाया उनका स्नेहमयी आशीर्वाद प्राप्त किया और अत्यंत आदर के साथ हस्तिनापुर की ओर प्रस्थान किया।

FAQ

भीष्म पितामह और भगवान परशुराम के बीच युद्ध का मुख्य कारण क्या था?
यह ऐतिहासिक युद्ध काशी की राजकुमारी अंबा के सम्मान और प्रतिशोध के कारण हुआ था। भीष्म ने अपने भाई विचित्रवीर्य के लिए अंबा का हरण किया था परंतु अंबा के राजा शाल्व से प्रेम की बात जानकर उन्हें छोड़ दिया। शाल्व द्वारा अंबा को न अपनाने पर परशुराम ने भीष्म को अंबा से विवाह का आदेश दिया जिसे भीष्म ने अपनी प्रतिज्ञा के कारण मना कर दिया था।

भीष्म और परशुराम का यह भीषण संग्राम कितने दिनों तक चला था?
महाभारत के प्राचीन ग्रंथों और विवरणों के अनुसार कुरुक्षेत्र की पवित्र और ऐतिहासिक भूमि पर भीष्म पितामह और उनके गुरु भगवान परशुराम के बीच यह भयंकर और अलौकिक संग्राम पूरे तेईस दिनों तक बिना किसी रुकावट के निरंतर चलता रहा था।

प्रस्वापास्त्र क्या था और भीष्म ने गुरु परशुराम पर इसका प्रयोग क्यों टाल दिया?
प्रस्वापास्त्र एक अत्यंत दुर्लभ और गुप्त दिव्य अस्त्र था जो ब्रह्मांड के महापुरुषों द्वारा निर्मित था और यह शत्रु को गहरी अचेतन निद्रा में सुला देता था। भीष्म इसका प्रयोग करने वाले थे परंतु देवर्षि नारद और माता गंगा के समझाने पर गुरु के सम्मान की रक्षा के लिए उन्होंने इसे वापस ले लिया।

क्या भीष्म पितामह ने अपने गुरु भगवान परशुराम को युद्ध में पराजित कर दिया था?
नहीं इस महायुद्ध में किसी भी पक्ष की हार या जीत नहीं हुई थी। भीष्म ने प्रस्वापास्त्र का प्रयोग रोक दिया और महर्षि परशुराम ने भी भीष्म के अदम्य पराक्रम और अजेय स्थिति को देखकर युद्ध विराम की घोषणा कर दी जिसके कारण यह मुकाबला एक सम्मानजनक बराबरी पर समाप्त हुआ।

भीष्म पितामह को किसी भी युद्ध में पराजित करना क्यों सर्वथा असंभव था?
भीष्म पितामह को उनके पिता राजा शांतनु से इच्छा मृत्यु का परम वरदान प्राप्त था जिसका अर्थ था कि उनकी अनुमति के बिना काल भी उन्हें छू नहीं सकता था। इसके अतिरिक्त वे पूर्व जन्म के अष्ट वसुओं में से द्यौ नामक वसु के अवतार थे जिसके कारण उनका शारीरिक बल और अस्त्र कौशल पूरी तरह से अजेय था।

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पं. नीलेश शर्मा

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