By पं. नीलेश शर्मा
महाभारत के महानायक के चार विवाह और पुरुषार्थ का सत्य

महाभारत के महानायक अर्जुन को केवल एक महान धनुर्धर और भगवान श्रीकृष्ण के अनन्य सखा के रूप में याद किया जाता है। परंतु बहुत कम लोग जानते हैं कि अर्जुन का वैवाहिक जीवन अत्यंत विस्तृत और गहरा था। उनकी चार पत्नियां थीं जिनके नाम द्रौपदी, उलूपी, चित्रांगदा और सुभद्रा हैं। सनातन संस्कृति और वैदिक ज्योतिष में इन चार विवाहों को केवल सामाजिक या राजनीतिक गठबंधन नहीं माना जाता है। यह चार विवाह कालपुरुष की कुंडली के चार प्रमुख स्तंभों, पुरुषार्थों और विशेष आध्यात्मिक ऊर्जाओं के मिलन को दर्शाते हैं। इस रहस्य को गहराई से समझने पर जीवन के कई कूट सत्य उजागर होते हैं।
प्रत्येक विवाह अर्जुन के जीवन की एक विशेष दिशा, एक विशेष परीक्षा और एक विशेष आत्मिक विकास को दर्शाता है। जब हम इस यात्रा का अध्ययन करते हैं तो हमें ज्ञात होता है कि एक श्रेष्ठ मनुष्य बनने के लिए प्रकृति के विभिन्न तत्वों और ऊर्जाओं के साथ सामंजस्य बिठाना कितना आवश्यक है।
| देवी (पत्नी) | उनका मूल स्वरूप | उत्पन्न संतान | जागृत होने वाला पुरुषार्थ | ज्योतिषीय तत्व |
|---|---|---|---|---|
| द्रौपदी | पांचाल राजकुमारी (यज्ञवेदी से उत्पन्न) | श्रुतकीर्ति | धर्म | अग्नि तत्व |
| उलूपी | नागराज कौरव्य की पुत्री | इरावान् | काम | जल तत्व |
| चित्रांगदा | मणिपुर की राजकुमारी | बभ्रुवाहन | अर्थ | पृथ्वी तत्व |
| सुभद्रा | यादव राजकुमारी (श्रीकृष्ण की बहन) | अभिमन्यु | मोक्ष | वायु तत्व |
अर्जुन का प्रथम विवाह स्वयंवर की अत्यंत कठिन परीक्षा को पार करने के बाद देवी द्रौपदी के साथ हुआ था। द्रौपदी का जन्म किसी गर्भ से नहीं बल्कि राजा द्रुपद के यज्ञकुंड की दिव्य अग्नि से हुआ था। ज्योतिषीय दृष्टिकोण से द्रौपदी का स्वरूप अग्नि तत्व और सूर्य की प्रखर ऊर्जा से जुड़ा है। जब अर्जुन ने मत्स्य भेदन करके द्रौपदी का वरण किया तो वह उनके जीवन में धर्म पुरुषार्थ की शुरुआत थी। अग्नि पवित्रता और रूपांतरण का प्रतीक है। द्रौपदी पांडवों के जीवन में वही अग्नि लेकर आईं जिसने उनके जीवन के सारे मैल को धोकर उन्हें शुद्ध कर दिया।
पांडवों के बीच हुए समझौते के कारण द्रौपदी पांचों भाइयों की सामान्य पत्नी बनीं। इस कारण अर्जुन को एक विशेष मर्यादा का पालन करना था। जब अर्जुन ने एक ब्राह्मण के गोधन की रक्षा के लिए अनजाने में युधिष्ठिर और द्रौपदी के एकांत कक्ष में प्रवेश किया तो उन्होंने नियम के अनुसार बारह वर्ष के कठिन वनवास को सहर्ष स्वीकार किया। यह घटना दर्शाती है कि धर्म की रक्षा के लिए व्यक्तिगत सुखों और प्राथमिकताओं का त्याग कैसे किया जाता है। द्रौपदी से अर्जुन को श्रुतकीर्ति नामक पुत्र प्राप्त हुआ जिसने कुरुक्षेत्र के युद्ध में अपनी वीरता दिखाई। द्रौपदी का पूरा जीवन ही एक यज्ञ की तरह था जिसमें उन्होंने अपने सुखों की आहुति देकर धर्म की स्थापना में सहयोग किया।
वनवास के दौरान जब अर्जुन गंगा नदी के तट पर आत्मशुद्धि के लिए साधना कर रहे थे तब नागराज कौरव्य की पुत्री उलूपी ने उन्हें देखा। उलूपी अर्जुन के तेज और स्वरूप पर मोहित हो गईं और उन्हें जल मार्ग से नीचे पाताल लोक ले गईं। उलूपी एक विधवा नागकुमारी थीं जिन्होंने अर्जुन से अपनी इच्छा पूर्ति की प्रार्थना की। वह अर्जुन के गुणों और उनकी वीरता से इतनी प्रभावित थीं कि उन्होंने अपने लोक की सीमाओं को छोड़कर अर्जुन को अपना सब कुछ मान लिया।
शुरुआत में अर्जुन ने अपने ब्रह्मचर्य के व्रत का हवाला देकर मना कर दिया। तब उलूपी ने एक अत्यंत तार्किक और ज्योतिषीय तर्क दिया कि अर्जुन का व्रत केवल द्रौपदी के संदर्भ में था और किसी संकट में पड़े व्यक्ति की इच्छा पूरी करना क्षत्रिय का परम कर्तव्य है। यदि एक क्षत्रिय अपनी शरण में आए किसी याचक को निराश करता है तो वह अपने धर्म से विमुख हो जाता है। उलूपी के इस आग्रह को स्वीकार कर अर्जुन ने उनसे विवाह किया।
ज्योतिष में नाग लोक और पाताल लोक का संबंध राहु, केतु और जल तत्व की गहरी अचेतन ऊर्जाओं से होता है। उलूपी के साथ यह मिलन काम पुरुषार्थ का प्रतीक है जहां काम वासना को वासना न रखकर एक आध्यात्मिक कर्तव्य के रूप में रूपांतरित किया गया। जल तत्व भावनाओं और गहरे रहस्यों का कारक है। उलूपी ने अर्जुन को जल के भीतर अजेय होने का वरदान दिया। इस विवाह से इरावान् नामक अत्यंत पराक्रमी पुत्र का जन्म हुआ जिसने महाभारत के युद्ध में अपने प्राणों का महान बलिदान दिया था।
अपनी यात्रा को आगे बढ़ाते हुए अर्जुन भारत के पूर्वी भाग में स्थित सुंदर और समृद्ध मणिपुर राज्य पहुंचे। वहां के राजा चित्रवाहन की एक ही संतान थीं जिनका नाम चित्रांगदा था। राजा ने अपनी पुत्री को एक पुत्र की भांति युद्ध कला, राजनीति और शासन संचालन में निपुण बनाया था। वह केवल महलों में रहने वाली राजकुमारी नहीं थीं बल्कि सीमाओं पर जाकर शत्रुओं से लोहा लेने वाली वीरांगना थीं। अर्जुन चित्रांगदा के इसी निर्भीक और स्वाभिमानी स्वरूप को देखकर उनकी ओर आकर्षित हुए।
राजा चित्रवाहन ने अर्जुन के सामने एक बहुत कठिन शर्त रखी। उनके राजवंश में सदियों से केवल एक ही संतान होने का नियम था। इसलिए उन्होंने कहा कि चित्रांगदा से उत्पन्न होने वाला पुत्र मणिपुर का उत्तराधिकारी बनेगा और वह कभी मणिपुर से बाहर नहीं जाएगा। वह पांडव वंश का नाम नहीं अपनाएगा बल्कि मणिपुर के सिंहासन को संभालेगा। अर्जुन ने इस शर्त को सहर्ष स्वीकार किया और तीन वर्ष तक मणिपुर में रहकर वैवाहिक सुख भोगने के बाद वह आगे बढ़ गए।
यह विवाह कालपुरुष कुंडली के अर्थ पुरुषार्थ और पृथ्वी तत्व को दर्शाता है। चित्रांगदा कोई कोमल राजकुमारी नहीं बल्कि भूमि की रक्षक थीं। पृथ्वी तत्व स्थिरता, संपत्ति और भौतिक व्यवस्था का प्रतीक है। उनसे उत्पन्न पुत्र बभ्रुवाहन ने आगे चलकर मणिपुर का शासन संभाला। बभ्रुवाहन इतना शक्तिशाली था कि उसने बाद में एक युद्ध में अपने पिता अर्जुन को भी परास्त कर दिया था। यह कथा सिखाती है कि जब अर्थ और कर्तव्य का सही संतुलन होता है तो संतान पिता से भी अधिक सामर्थ्यवान बनती है। अर्जुन ने यहां अपने पिता होने के अहंकार को छोड़कर भूमि के नियम का सम्मान किया।
अर्जुन के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण और अंतिम विवाह भगवान श्रीकृष्ण की बहन सुभद्रा के साथ हुआ था। अपनी तीर्थयात्रा के अंतिम चरण में अर्जुन द्वारका पहुंचे। वहां उन्होंने रैवतक पर्वत पर एक उत्सव के दौरान सुभद्रा को देखा। सुभद्रा केवल सुंदर ही नहीं थीं बल्कि उनके भीतर यादव वंश का दिव्य विवेक और तेज समाहित था। बलराम जी सुभद्रा का विवाह दुर्योधन से करना चाहते थे जो कि अर्जुन के परम विरोधी थे। दुर्योधन की शक्ति और उनके गदा युद्ध से प्रभावित होकर बलराम जी इस गठबंधन के पक्ष में थे।
जब अर्जुन ने श्रीकृष्ण से मार्गदर्शन मांगा तो योगेश्वर ने एक बहुत ही कूटनीतिक सलाह दी। उन्होंने कहा कि शूरवीर क्षत्रियों के लिए स्वयंवर में भाग्य आजमाने से बेहतर है कि वह बलपूर्वक कन्या का हरण कर लें क्योंकि स्वयंवर का परिणाम अनिश्चित होता है। श्रीकृष्ण की सहमति से अर्जुन ने सुभद्रा का हरण किया। जब द्वारका के सैनिक क्रोधित होकर अर्जुन के पीछे भागे तो सुभद्रा ने स्वयं रथ के घोड़ों की रास संभाली थी। यह दर्शाता है कि सुभद्रा केवल एक मूक दर्शक नहीं बल्कि अर्जुन की सच्ची सहगामी थीं। उनके भीतर भी वही अदम्य साहस था जो एक महान नायक की पत्नी में होना चाहिए।
ज्योतिष शास्त्र में श्रीकृष्ण साक्षात नारायण हैं और उनकी बहन सुभद्रा माया और भक्ति का साक्षात स्वरूप हैं। सुभद्रा से विवाह करना अर्जुन के लिए मोक्ष पुरुषार्थ और वायु तत्व के संतुलन जैसा था। वायु तत्व विस्तार और स्वतंत्रता का प्रतीक है। सुभद्रा से ही कुल के दीपक अभिमन्यु का जन्म हुआ। यद्यपि अभिमन्यु कुरुक्षेत्र के चक्रव्यूह में वीरगति को प्राप्त हो गए परंतु उनके पुत्र परीक्षित ने ही आगे चलकर पांडव वंश को जीवित रखा। इसी वंश से कलयुग की शुरुआत में धर्म की रक्षा हुई। सुभद्रा का प्रेम और उनका समर्पण अर्जुन के जीवन को पूर्णता की ओर ले गया।
यदि इन चारों विवाहों को ध्यान से देखा जाए तो यह अर्जुन की आत्मा की एक संपूर्ण यात्रा है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार किसी भी मनुष्य का जीवन तब तक पूर्ण नहीं होता जब तक वह अपने चारों पुरुषार्थों को संतुलित नहीं कर लेता। यह यात्रा दर्शाती है कि एक पूर्ण पुरुष बनने के लिए मनुष्य को समाज, अवचेतन मन, भौतिक संसार और अंत में ईश्वर की इच्छा के साथ एकाकार होना पड़ता है।
महाभारत में अर्जुन को नर और श्रीकृष्ण को नारायण कहा गया है। नर यानी मनुष्य जब तक प्रकृति के इन चारों रूपों से नहीं जुड़ता तब तक वह नारायण को पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं कर सकता। अर्जुन की चारों पत्नियां अलग-अलग दिशाओं और संस्कृतियों से थीं जो यह बताती हैं कि एक संपूर्ण व्यक्तित्व के निर्माण के लिए हर प्रकार के जीवन अनुभवों से गुजरना आवश्यक है। जीवन की विविधता को स्वीकार करना ही सच्ची आध्यात्मिकता है।
क्या अर्जुन ने यह चारों विवाह केवल अपनी व्यक्तिगत इच्छा के लिए किए थे?
नहीं। अर्जुन के सभी विवाह नियति और वैदिक कर्तव्यों से बंधे थे। द्रौपदी से विवाह धर्म की स्थापना के लिए था। उलूपी से विवाह एक संकट में पड़ी नागकन्या के अनुरोध पर हुआ था। चित्रांगदा से विवाह मणिपुर के राजवंश को आगे बढ़ाने के लिए और सुभद्रा से विवाह कुरुवंश के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए श्रीकृष्ण की इच्छा से हुआ था। इन विवाहों में व्यक्तिगत सुख से अधिक वैश्विक कल्याण की भावना छिपी थी।
अर्जुन की इन चारों पत्नियों में से किसका पुत्र पांडव वंश का उत्तराधिकारी बना?
अर्जुन की चौथी पत्नी सुभद्रा के पुत्र अभिमन्यु थे। अभिमन्यु के पुत्र राजा परीक्षित ही आगे चलकर हस्तिनापुर के सम्राट बने। इस प्रकार सुभद्रा का पुत्र वंश ही पांडव साम्राज्य का वास्तविक उत्तराधिकारी बना क्योंकि बाकी सभी पुत्र महाभारत के भीषण युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो गए थे। परीक्षित के माध्यम से ही द्वापर युग की सीख कलयुग तक पहुंची।
क्या द्रौपदी अर्जुन की अन्य पत्नियों से ईर्ष्या करती थीं?
शुरुआत में जब अर्जुन सुभद्रा को लेकर इंद्रप्रस्थ आए थे तो द्रौपदी को थोड़ा संकोच और रोष अवश्य हुआ था। परंतु सुभद्रा ने अपनी विनम्रता और सेवा भाव से द्रौपदी का दिल जीत लिया था। सुभद्रा ने हमेशा द्रौपदी को अपनी बड़ी बहन और महारानी के रूप में सम्मान दिया जिसके कारण दोनों के बीच बहुत गहरा प्रेम हो गया था। उन्होंने कभी भी आपस में मनमुटाव को बढ़ने नहीं दिया।
उलूपी ने अर्जुन को क्या विशेष वरदान दिया था?
नागकुमारी उलूपी ने अर्जुन की निष्ठा और धर्म से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया था कि जल के भीतर कोई भी जलचर जीव अर्जुन को कभी परास्त नहीं कर पाएगा और न ही जल में रहने वाले किसी जीव से अर्जुन को कोई भय होगा। यह वरदान अर्जुन के लिए कई युद्धों और यात्राओं में बहुत सहायक सिद्ध हुआ था। इसके साथ ही उलूपी ने अर्जुन को पाताल लोक के कई गुप्त रहस्यों से भी अवगत कराया था।
चित्रांगदा के राज्य मणिपुर का महाभारत युद्ध में क्या योगदान था?
चित्रांगदा के पुत्र बभ्रुवाहन ने अपने नाना के वचनानुसार मणिपुर का राज्य संभाला था। इसलिए वह कुरुक्षेत्र के युद्ध में सीधे तौर पर शामिल नहीं हुए थे। हालांकि युद्ध समाप्त होने के बाद जब अर्जुन ने अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा मणिपुर भेजा था तब बभ्रुवाहन और अर्जुन के बीच एक ऐतिहासिक युद्ध हुआ था जिसमें बभ्रुवाहन ने अर्जुन को मूर्छित कर दिया था। बाद में उलूपी की मदद से ही अर्जुन पुनः जीवित हुए थे।
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