By पं. अमिताभ शर्मा
जानिए इच्छा मृत्यु का वरदान होने पर भी गंगापुत्र भीष्म के 58 दिनों के लंबे इंतजार का सत्य

सनातन धर्म के महान इतिहास और महाभारत के विशाल भचक्र में भीष्म पितामह का चरित्र त्याग, कर्तव्यनिष्ठा और अडिग प्रतिज्ञा का एक ऐसा शिखर है जिसकी तुलना किसी अन्य से नहीं की जा सकती है। अपने पूर्व जीवन में देवव्रत के नाम से विख्यात भीष्म को उनके पिता राजा शांतनु से इच्छामृत्यु का एक अत्यंत दुर्लभ वरदान प्राप्त था। कुरुक्षेत्र के उस विनाशकारी महायुद्ध के दसवें दिन जब अर्जुन के बाणों से उनका पूरा शरीर बिंध गया तब वे भूमि पर नहीं गिरे बल्कि बाणों की एक ऊंची शैया पर टिक गए। इस स्थिति में भी उन्होंने तुरंत अपने प्राणों का परित्याग करके मोक्ष प्राप्त करने का सरल मार्ग नहीं चुना। इसके स्थान पर उन्होंने पूरे 58 दिनों तक तीक्ष्ण बाणों की शैया पर लेटे रहकर असहनीय शारीरिक वेदना को सहन करने का एक विस्मयकारी निर्णय लिया। कोई भी साधारण मनुष्य यह विचार कर सकता है कि जब साक्षात मुक्ति उनके हाथों में थी तब उस परम ज्ञानी और महाप्रतापी योद्धा ने इस भयंकर कष्ट को क्यों चुना। इस रहस्यमयी कथा के पीछे केवल शारीरिक पीड़ा नहीं थी बल्कि इसके भीतर वैदिक धर्म, कर्मायन की गति, ज्योतिषीय काल गणना और ब्रह्मांडीय सिद्धांतों के गहरे सूत्र छिपे थे।
इस परम पावन और अलौकिक प्रसंग के अंतर्गत छिपे हुए काल चक्र और ज्योतिषीय योगों को गहराई से समझने के लिए भीष्म पितामह के उस अंतिम महात्याग के मुख्य आयामों को देखना आवश्यक है। नीचे दी गई तालिका में उनके इस निर्णय के मुख्य स्तंभों का संक्षिप्त विवरण दिया गया है।
| मुख्य वैदिक तत्व | ज्योतिषीय और आध्यात्मिक महत्व |
|---|---|
| इच्छामृत्यु वरदान का क्रियान्वयन | आत्मा की सर्वोपरिता और भौतिक शरीर पर पूर्ण विजय |
| उत्तरायण काल की प्रतीक्षा | सूर्य देव का मकर राशि में प्रवेश और मोक्ष द्वार का खुलना |
| शांति पर्व का दिव्य उपदेश | भावी पीढ़ियों के लिए राजधर्म, मोक्षधर्म और नीति का हस्तांतरण |
| शरशैया का आध्यात्मिक स्वरूप | संचित कर्मों का पूर्ण शोधन और मानवीय अहंकार का विसर्जन |
महाभारत के युद्ध का दसवां दिन कुरुक्षेत्र की भूमि पर एक अत्यंत युगांतकारी घटना को लेकर उपस्थित हुआ था। भीष्म पितामह को परास्त करना पांडवों की सेना के लिए पूर्णतः असंभव प्रतीत हो रहा था क्योंकि उनका गांडीवधारी अर्जुन के साथ भी युद्ध अत्यंत भयंकर स्तर पर पहुंच चुका था। तब भगवान श्री कृष्ण की रणनीतिक दूरदर्शिता के अनुसार अर्जुन ने शिखंडी को अपने रथ के आगे खड़ा किया। भीष्म पितामह अपने जीवन के सिद्धांतों और अटूट व्रतों से बंधे हुए थे कि वे कभी भी किसी महिला या महिला के रूप में जन्म लेने वाले व्यक्ति पर अपने दिव्य अस्त्रों का संधान नहीं करेंगे। जैसे ही शिखंडी उनके सम्मुख आकर खड़ा हुआ पितामह ने अपने धनुष को नीचे रख दिया और अस्त्रों का त्याग कर दिया।
इस अत्यंत दुर्लभ क्षण का लाभ उठाते हुए अर्जुन ने पितामह के पूरे शरीर को अपने तीक्ष्ण बाणों से पूरी तरह से भेद दिया। बाणों की संख्या इतनी अधिक थी कि जब वे रथ से नीचे गिरे तो उनका पवित्र शरीर भूमि को स्पर्श नहीं कर सका और वह बाणों की नोक पर ही हवा में अधर में टिक गया। वह दृश्य जितना करुण और हृदयविदारक था उतना ही विस्मयकारी और अलौकिक भी था क्योंकि संसार के सबसे शक्तिशाली सेनापति ने स्वयं को धर्म की बलिवेदी पर मौन रहकर अर्पित कर दिया था।
इस गूढ़ प्रश्न का उत्तर पाने के लिए हमें उन आध्यात्मिक कारणों का विश्लेषण करना होगा जो भीष्म पितामह की चेतना को उस भौतिक शरीर में बनाए रखने के लिए उत्तरदायी थे।
उनका यह अभूतपूर्व धैर्य यह सिद्ध करता है कि एक महान आत्मज्ञानी पुरुष के लिए उसका अपना सुख और मुक्ति भी लोक कल्याण के सामने अत्यंत तुच्छ हो जाती है।
वैदिक ज्योतिष और सनातन परंपरा में सौरमंडल के राजा सूर्य देव की गति का मनुष्य के प्राणों के उत्क्रमण पर अत्यंत गहरा और सीधा प्रभाव माना गया है। हिंदू शास्त्रों के अनुसार वर्ष को दो मुख्य भागों में विभाजित किया गया है जिन्हें उत्तरायण और दक्षिणायन कहा जाता है। भीष्म पितामह जिस समय बाणशैया पर गिरे थे उस समय सूर्य देव दक्षिणायन की स्थिति में चल रहे थे जो कि पितरों का मार्ग माना जाता है और इस अवधि में प्राण त्यागने वाले जीव को पुनर्जन्म के चक्र से पूर्ण मुक्ति मिलने में बाधा आती है। इसके विपरीत जब सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं तो उस संक्रमण काल को उत्तरायण कहा जाता है जिसे देव मार्ग माना गया है।
वैदिक काल गणना के अनुसार उत्तरायण के समय आकाश मंडल का द्वार खुला रहता है और इस पवित्र काल में शरीर का परित्याग करने वाली महान आत्माएं सीधे ब्रह्मलोक को प्राप्त करती हैं और उन्हें इस संसार में पुनः जन्म नहीं लेना पड़ता है। भीष्म पितामह ने अपनी दिव्य योग शक्ति के बल पर अपने प्राणों को अपनी भृकुटी के मध्य रोक कर रखा और सूर्य के मकर संक्रांति में प्रवेश करने की प्रतीक्षा करते रहे। उनका यह लंबा इंतजार संपूर्ण मानव जाति के लिए इस बात का साक्षात प्रमाण था कि एक संयमी मनुष्य अपनी इच्छाशक्ति के बल पर ब्रह्मांडीय काल चक्र को भी अपनी प्रतीक्षा करने के लिए विवश कर सकता है।
बाणशैया पर लेटे रहने के उन कठिन 58 दिनों के दौरान भीष्म पितामह ने केवल मौन रहकर कष्ट नहीं भोगा बल्कि उन्होंने संसार को ज्ञान का वह महासागर प्रदान किया जो आज भी महाभारत के शांति पर्व और अनुशासन पर्व के रूप में सुरक्षित है। जब कुरुक्षेत्र का युद्ध समाप्त हो गया और पांडवों की विजय हुई तब भगवान श्री कृष्ण स्वयं महाराज युधिष्ठिर को पितामह के समीप लेकर आए थे क्योंकि युधिष्ठिर का मन युद्ध के विनाश को देखकर अत्यंत शोक और पश्चाताप से भरा हुआ था। कृष्ण जानते थे कि भीष्म के अतिरिक्त इस संसार में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जो युधिष्ठिर के मानसिक संताप को शांत कर सके।
तीक्ष्ण बाणों की चुभन के बीच भी पितामह ने अत्यंत शांत और गंभीर वाणी में युधिष्ठिर को राजधर्म की बारीकियां समझाईं। उन्होंने बताया कि एक राजा का अपनी प्रजा के प्रति क्या कर्तव्य होता है, न्याय की स्थापना किस प्रकार की जानी चाहिए और विकट परिस्थितियों में किस तरह दंड नीति का प्रयोग होना चाहिए। इसी पावन संवाद के अंतर्गत उन्होंने दान का महत्व, सत्य की शक्ति, ईश्वर के प्रति अटूट भक्ति और मोक्ष प्राप्ति के मार्ग का सविस्तार वर्णन किया। यदि भीष्म पितामह तुरंत अपने प्राण त्याग देते तो लोक कल्याण का यह अद्भुत और परम पावन वैचारिक कोष सदा के लिए लुप्त हो जाता।
भीष्म पितामह का यह निर्णय संपूर्ण मानवता के लिए एक महान आध्यात्मिक प्रेरणा भी है कि यह भौतिक शरीर भले ही नश्वर हो और कष्टों से घिर जाए परंतु मनुष्य की अंतरात्मा और उसका मन सदैव अजेय रह सकता है। बाणों की तीक्ष्ण नोक जब उनके मांस और रक्त को भेद रही थी तब भी उनके चेहरे पर एक अलौकिक शांति और सौम्यता बनी हुई थी। उन्होंने अपनी अदम्य इच्छाशक्ति और उच्च योग साधना के बल पर उस असहनीय शारीरिक पीड़ा को भी पूरी तरह से परास्त कर दिया था।
यह प्रसंग प्रत्येक साधक और कर्मवीर को यह संदेश देता है कि जीवन की कठिन से कठिन परिस्थितियां और शारीरिक व्याधियां भी आपके आत्मिक संकल्प को तब तक नहीं डिगा सकती हैं जब तक आप स्वयं हार स्वीकार नहीं कर लेते हैं। पितामह ने अपनी शरशैया को कष्ट का साधन बनाने के स्थान पर उसे ज्ञान और तपस्या के एक पवित्र ऊंचे सिंहासन में परिवर्तित कर दिया था जो आज भी समस्त संसार के लिए एक मार्गदर्शक प्रकाश स्तंभ की भांति कार्य कर रहा है।
वैदिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो भीष्म पितामह की वह बाणशैया केवल एक भौतिक घटना नहीं थी बल्कि वह कर्मायन के गहन सिद्धांतों का एक जीवंत प्रतीक थी। वे बाण वास्तव में इस संसार के कड़वे सत्यों, मनुष्य के जीवन में आने वाली कठिनाइयों और कर्मों की अचूक गति को प्रदर्शित कर रहे थे। भीष्म ने अपने जीवनकाल में हस्तिनापुर के सिंहासन की रक्षा करने की अपनी अखंड प्रतिज्ञा के कारण कई बार ऐसे निर्णय लिए थे जो पूरी तरह से धर्म के अनुकूल नहीं थे जैसे कि भरी सभा में द्रौपदी के चीरहरण के समय उनका मौन रहना।
यद्यपि वे स्वयं परम पवित्र थे परंतु उस पाप कर्म के समय मूकदर्शक बने रहने के कारण उनके भौतिक शरीर को इस प्रायश्चित रूपी शरशैया से गुजरना अनिवार्य था। उन्होंने प्रकृति के इस नियम को सहर्ष स्वीकार किया और अपने कष्टों को आत्मज्ञान की ऊर्जा में रूपांतरित कर दिया। उनका यह चरित्र हमें यह अमूल्य शिक्षा प्रदान करता है कि संसार का चाहे कितना भी बड़ा या प्रतापी महापुरुष क्यों न हो उसे अपने प्रत्येक कर्म का फल इसी पृथ्वी पर भोगना पड़ता है और इस नियम से कोई भी बच नहीं सकता है।
कुरुक्षेत्र के उस ऐतिहासिक युद्ध के समाप्त होने के हजारों वर्ष बाद भी भीष्म पितामह की यह पावन कथा प्रत्येक न्यायप्रिय और सत्य के मार्ग पर चलने वाले मनुष्य के हृदय को आलोकित करती है। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि महानता केवल युद्धों को जीतने या भौतिक साम्राज्यों का निर्माण करने से सिद्ध नहीं होती है बल्कि महानता इस बात से तय होती है कि आप विकट से विकट संकट के समय में भी अपनी मर्यादा, गरिमा और धर्म के प्रति निष्ठा को किस प्रकार अक्षुण्ण बनाए रखते हैं।
भीष्म पितामह आज भी सनातन संस्कृति में राजधर्म और अध्यात्म के सबसे बड़े गुरु के रूप में जीवित हैं। जब तक यह संसार रहेगा और जब तक मनुष्य कर्तव्य और अधिकार के द्वंद्व के बीच फंसेगा तब तक बाणशैया पर लेटे हुए गंगापुत्र भीष्म का वह तेजस्वी स्वरूप उसे अपनी आत्मा की आवाज सुनने और सत्य के मार्ग पर अडिग रहने की निरंतर प्रेरणा देता रहेगा।
भीष्म पितामह को इच्छामृत्यु का वरदान किसने और क्यों दिया था
भीष्म पितामह को इच्छामृत्यु का यह दुर्लभ वरदान उनके पिता राजा शांतनु ने दिया था क्योंकि भीष्म ने अपने पिता की प्रसन्नता और सत्यवती के विवाह के लिए आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करने और हस्तिनापुर के सिंहासन की सेवा करने की अत्यंत कठिन भीष्म प्रतिज्ञा ली थी।
उत्तरायण काल क्या होता है और इसका आध्यात्मिक महत्व क्या है
जब सूर्य देव धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं तो उनका झुकाव उत्तर दिशा की ओर हो जाता है इस संक्रमण काल को उत्तरायण कहा जाता है शास्त्रों के अनुसार इस पावन काल में प्राण त्यागने वाली आत्मा को सीधे मोक्ष की प्राप्ति होती है।
भीष्म पितामह कितने दिनों तक बाणशैया पर लेटे रहे थे
महाभारत के युद्ध के दसवें दिन भीष्म पितामह अर्जुन के बाणों से बिंधकर शरशैया पर गिरे थे और वे कुल 58 दिनों तक उस अवस्था में रहे जब सूर्य देव उत्तरायण की स्थिति में आए तब माघ शुक्ल अष्टमी के दिन उन्होंने अपने भौतिक शरीर का परित्याग किया था।
बाणशैया पर लेटे हुए भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को क्या उपदेश दिया था
भीष्म पितामह ने महाराज युधिष्ठिर के मानसिक संताप और शोक को दूर करने के लिए उन्हें राजधर्म, आपद्धर्म, मोक्षधर्म और दानधर्म का विस्तृत उपदेश दिया था जिसे महाभारत के शांति पर्व और अनुशासन पर्व के रूप में संकलित किया गया है।
द्रौपदी चीरहरण के समय भीष्म पितामह का मौन रहना क्या दर्शाता है
वह मौन यह दर्शाता है कि जब कोई व्यक्ति धर्म के व्यापक स्वरूप को छोड़कर किसी राज्य के राजा या प्रतिज्ञा के संकीर्ण बंधन में बंध जाता है तो वह सही समय पर न्याय करने की अपनी क्षमता खो बैठता है और इसी कर्म के प्रायश्चित स्वरूप उन्हें बाणशैया प्राप्त हुई थी।
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