दशानन रावण के अज्ञात अनकहे रहस्य

By पं. नरेंद्र शर्मा

जानिए महापंडित रावण के प्रकांड ज्ञान और ज्योतिषीय रहस्यों का पूर्ण सत्य

रावण के अज्ञात रहस्य ज्योतिष और रावण संहिता का सत्य

सनातन धर्म के इतिहास और रामायण की पावन गाथा में जब भी रावण का नाम लिया जाता है तो जनमानस के मस्तिष्क में एक ऐसे क्रूर राक्षस राज की छवि उभरती है जिसने माता सीता का हरण किया और जिसका वध भगवान श्री राम के हाथों हुआ। परंतु वैदिक ज्योतिष और पौराणिक संहिताओं के अनुसार रावण का व्यक्तित्व केवल इस एक घटना तक सीमित नहीं था। वह एक परम प्रतापी सम्राट होने के साथ-साथ प्रकांड विद्वान, वेदों का ज्ञाता, अद्वितीय शिवभक्त, कुशल आयुर्वेदाचार्य और महान ज्योतिषाचार्य भी था। उसके दस सिर केवल शारीरिक बनावट के सूचक नहीं थे बल्कि वे छह शास्त्रों और चार वेदों के अगाध ज्ञान के साक्षात प्रतीक थे।

रावण का जीवन विरोधाभासों और गहन रहस्यों से भरा हुआ था जो उसके चरित्र को अत्यंत विस्मयकारी बनाते हैं। एक कुशल वीणा वादक होने से लेकर भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए शिव तांडव स्तोत्र की रचना करने तक उसके जीवन के अनेक ऐसे पहलू हैं जिनसे अधिकांश लोग सर्वथा अपरिचित हैं। ज्योतिषीय दृष्टि से रावण का जीवन ग्रहों की गतियों को नियंत्रित करने की मानवीय पराकाष्ठा का एक ऐसा उदाहरण है जिसे आज तक कोई दूसरा जीव दोहरा नहीं सका। इस अत्यंत विस्तृत लेख में रावण के जीवन से जुड़े उन गुप्त सत्यों और सूत्रों का उद्घाटन किया जा रहा है जो उसकी बुद्धिमत्ता, भक्ति, अपार शक्ति और उसके पतन के गूढ़ कारणों को स्पष्ट करते हैं।

इस अलौकिक योद्धा और विद्वान के जीवन के विविध आयामों को एक ही स्थान पर समझने के लिए उसके व्यक्तित्व के मुख्य विभाजन को देखना आवश्यक है। नीचे दी गई तालिका में उसके जीवन के मूलभूत वर्गीकरण को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है।

रावण के जीवन के आयाम मुख्य ज्योतिषीय और आध्यात्मिक तत्व
वंश और जन्म संरचना ऋषि विश्रवा और कैकसी के पुत्र, ब्रह्मर्षि पुलस्त्य के पोते
अगाध ज्ञान संपदा चार वेद, छह शास्त्र और चौंसठ कलाओं में पूर्ण प्रवीणता
सर्वोपरि साधना भगवान शिव के प्रति अनन्य अनुराग और घोर तपस्या
शासन और ऐश्वर्य सोने की लंका पर आधिपत्य और नवग्रहों को बंदी बनाना
अंतिम जीवन पाठ मृत्यु के समय लक्ष्मण को राजनीति और नीति का उपदेश

प्रारंभिक जीवन, जटिल वंश परंपरा और जन्म का रहस्य

रावण का जन्म सनातन काल की एक अत्यंत विशिष्ट और जटिल वंश परंपरा के अंतर्गत हुआ था जिसने उसके भीतर देवत्व और दानवत्व दोनों प्रवृत्तियों का एक साथ समावेश किया।

  • रावण परम प्रतापी महर्षि विश्रवा और दैत्य राजपुत्री कैकसी की संतान था।
  • उनके दादा साक्षात ब्रह्मर्षि पुलस्त्य थे जो सृष्टिकर्ता भगवान ब्रह्मा के दस मानस पुत्रों में से एक परम पवित्र ऋषि थे।
  • इस प्रकार पैतृक पक्ष से रावण एक उच्च कुल का ब्राह्मण था जबकि मातृपक्ष से उसके भीतर दैत्य कुल के संस्कार और बल का प्रवाह था।
  • जन्म के समय उसका वास्तविक नाम दशानन रखा गया था क्योंकि वह दस सिरों की अद्भुत मानसिक ऊर्जा के साथ उत्पन्न हुआ था।
  • दशानन के अतिरिक्त उसके दो भाई कुंभकर्ण और विभीषण थे तथा एक बहन शूर्पणखा थी जिनके साथ उसने अपना बाल्यकाल व्यतीत किया।

महर्षि विश्रवा के सानिध्य में रहकर रावण ने बाल्यावस्था में ही समस्त वेदों, उपनिषदों और गुप्त विद्याओं का अत्यंत गहन अध्ययन संपन्न कर लिया था। उसके भीतर की बौद्धिक क्षमता इतनी तीव्र थी कि वह किसी भी गूढ़ रहस्य को एक ही बार में पूरी तरह आत्मसात कर लेता था।

अगाध ज्ञान, प्रकांड विद्वता और ज्योतिषीय ग्रंथों की रचना

रावण केवल युद्ध कला में ही निपुण नहीं था बल्कि वह अपने युग का सबसे बड़ा वैज्ञानिक, चिकित्सक और खगोलशास्त्री भी माना जाता था। ज्योतिष शास्त्र के क्षेत्र में उसका योगदान आज भी अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

वह चारों वेदों का ज्ञाता था और उसने वैदिक ऋचाओं के सूक्ष्म रहस्यों को पूरी तरह से डिकोड कर लिया था। इसके साथ ही उसने मानव जीवन पर ग्रहों के प्रभाव को समझने के लिए रावण संहिता नामक एक अत्यंत प्रामाणिक ज्योतिष ग्रंथ की रचना की। इस ग्रंथ में ग्रहों की युतियों, गोचर और भाग्य को बदलने वाले अत्यंत गुप्त उपायों का वर्णन मिलता है।

चिकित्सा के क्षेत्र में रावण ने रावण उदर विज्ञान और अर्क प्रकाश जैसी औषधीय संहिताओं का निर्माण किया जो आयुर्वेद की दृष्टि से अमूल्य मानी जाती हैं। उसे चौंसठ प्रकार की विद्याओं और ललित कलाओं में पूर्ण महारत हासिल थी। उसके दस सिर वास्तव में ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद और शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद, ज्योतिष नामक छह वेदांगों के सामूहिक ज्ञान के जीवंत प्रतीक थे। जब वह किसी विषय पर शास्त्रार्थ करता था तो देवगुरु बृहस्पति भी उसकी तार्किक क्षमता को देखकर विस्मित हो जाते थे।

अनन्य शिव भक्ति, अलौकिक साधनाएं और वरदान की प्राप्ति

दशानन रावण के जीवन का सबसे उज्ज्वल और आध्यात्मिक पक्ष उसकी भगवान शिव के प्रति अटूट और घोर भक्ति थी। उसने महादेव को प्रसन्न करने के लिए ऐसी तपस्या की जिसकी कल्पना भी साधारण जीव के लिए संभव नहीं है।

एक बार भगवान शिव को प्रभावित करने के लिए उसने अपनी दिव्य योग शक्ति के बल पर साक्षात कैलाश पर्वत को ही अपनी भुजाओं पर उठा लिया था। जब महादेव ने अपने पैर के अंगूठे से पर्वत को थोड़ा दबाया तो रावण का हाथ पर्वत के नीचे दब गया। उस असहनीय पीड़ा के क्षण में भी उसने अपने आंतरिक संगीत और भक्ति के प्रभाव से तत्काल शिव तांडव स्तोत्र की रचना की। इस स्तोत्र के छंदों और ध्वनियों की प्रखरता से प्रसन्न होकर स्वयं महादेव ने उसे रावण नाम दिया जिसका अर्थ होता है वह व्यक्ति जिसकी गर्जना से ब्रह्मांड कांप उठे।

अपनी भक्ति को प्रमाणित करने के लिए रावण ने यज्ञ की अग्नि में एक-एक करके अपने नौ सिर काट कर भगवान शिव को अर्पित कर दिए थे। जब वह अपना दसवां सिर काटने लगा तब महादेव ने प्रकट होकर उसका हाथ थाम लिया और उसे पुनः दसों सिर वापस प्रदान कर दिए। इसके पश्चात रावण ने ब्रह्मा जी की घोर तपस्या करके ब्रह्मांड में अजेय होने का अमोघ वरदान प्राप्त किया। इस वरदान के अनुसार कोई भी देवता, गंधर्व, यक्ष, नाग या राक्षस उसका वध नहीं कर सकता था। उसने मनुष्य और वानर को अत्यंत तुच्छ समझकर उनके हाथों अपनी मृत्यु से सुरक्षा का वरदान नहीं मांगा था और यही भूल अंततः उसकी नियति बनी।

स्वर्ण लंका का वैभवशाली साम्राज्य और कुशल प्रशासनिक व्यवस्था

रावण का शासन काल सोने की लंका के चरम उत्कर्ष और अभूतपूर्व समृद्धि का स्वर्ण युग माना जाता है। लंका की नगरी का निर्माण स्वयं देवशिल्पी विश्वकर्मा ने किया था।

शुरुआती समय में लंका पर रावण के सौतेले भाई और धन के देवता कुबेर का शासन था। परंतु रावण ने अपने पराक्रम के बल पर कुबेर को परास्त करके लंका की सत्ता अपने हाथों में ले ली और कुबेर के दिव्य पुष्पक विमान पर भी अपना अधिकार स्थापित कर लिया। रावण केवल एक क्रूर विजेता ही नहीं था बल्कि वह अपनी प्रजा के लिए एक अत्यंत कुशल और दूरदर्शी प्रशासक भी था। उसके राज्य में न्याय की व्यवस्था इतनी सुदृढ़ थी कि चोर और अपराधियों का कोई अस्तित्व नहीं रह गया था।

ज्योतिषीय दृष्टिकोण से रावण की शक्ति का सबसे बड़ा प्रमाण यह था कि उसने अपने बल से सूर्य, चंद्रमा, शनि और राहु सहित सभी नवग्रहों को बंदी बनाकर अपने सिंहासन की सीढ़ियों में डाल रखा था। जब उसके ज्येष्ठ पुत्र मेघनाद का जन्म होने वाला था तो रावण ने सभी ग्रहों को कुंडली के एकादश भाव अर्थात लाभ स्थान पर रहने का आदेश दिया ताकि उसका पुत्र अमर और अजेय हो सके। परंतु शनि देव ने अंतिम क्षण में अपनी दृष्टि बदल ली जिसके कारण मेघनाद की कुंडली में एक आंशिक दोष उत्पन्न हो गया। इस बात से क्रोधित होकर रावण ने शनि देव के पैर पर प्रहार किया था जिसके कारण शनि देव सदैव के लिए लंगड़े हो गए।

व्यक्तिगत जीवन, संगीत साधना और मंदोदरी का पावन चरित्र

रावण का व्यक्तिगत जीवन भी अत्यंत भव्य और मर्यादाओं के अनेक गुप्त सूत्रों से बंधा हुआ था। उसकी पटरानी मंदोदरी थीं जो पंचकन्याओं में से एक मानी जाती हैं और जो अपनी अगाध बुद्धिमत्ता, शील और धैर्य के लिए पूरे इतिहास में पूजनीय हैं।

मंदोदरी मयदानव की पुत्री थीं और उन्होंने हर विकट परिस्थिति में रावण को अधर्म के मार्ग पर जाने से रोकने का निरंतर प्रयास किया। मंदोदरी के अतिरिक्त रावण की अनेक अन्य पत्नियां भी थीं जिनसे उसे मेघनाद, अक्षय कुमार और अतिकाय जैसे अत्यंत पराक्रमी और पराक्रमी पुत्र प्राप्त हुए। रावण संगीत की कला में इतना अधिक निपुण था कि उसने एक विशेष वाद्य यंत्र का आविष्कार किया जिसे रावणहत्था कहा जाता है और जिसे आधुनिक वायलिन का पूर्वज माना जाता है। वह एकांत में वीणा बजाकर साक्षात नाद ब्रह्म की साधना करता था। यद्यपि वह एक राक्षस राज था परंतु जन्म से ब्राह्मण होने के कारण वह पूरी तरह से शाकाहारी था और अपनी दिनचर्या में त्रिकाल संध्या और वैदिक अनुष्ठानों का पूर्ण पालन करता था।

रामायण के युद्ध में रावण की भूमिका और अकाट्य श्राप का सच

रामायण के महायुद्ध की पृष्ठभूमि रावण द्वारा माता सीता के हरण से तैयार हुई थी जो कि उसके जीवन की सबसे बड़ी भूल और उसके विनाश का मुख्य कारण बनी। परंतु इस हरण के पीछे भी नियति के अनेक गुप्त विधान कार्य कर रहे थे।

रावण को अतीत में कुबेर के पुत्र नलकुबेर से एक अत्यंत कड़ा और अकाट्य श्राप मिला था। इस श्राप के अनुसार यदि रावण किसी भी स्त्री की इच्छा के विरुद्ध उसे स्पर्श करने या उसके साथ दुराचार करने का प्रयास करता तो उसी क्षण उसके मस्तक के सौ टुकड़े हो जाते। इसी श्राप के कारण रावण ने माता सीता को लंका की अशोक वाटिका में पूरे सम्मान के साथ रखा और कभी उन्हें छूने का दुस्साहस नहीं किया। युद्ध की शुरुआत से पहले उसके परम बुद्धिमान भाई विभीषण ने उसे बार-बार चेतावनी दी कि वह सीता को श्री राम को वापस सौंप दे और प्रभु की शरण में चला जाए। परंतु अपने प्रचंड अहंकार और काल के वशीभूत होने के कारण रावण ने विभीषण की बात को अनसुना कर दिया और उन्हें अपने राज्य से निष्कासित कर दिया। अंततः कुरुक्षेत्र के समान ही भयंकर उस लंका युद्ध में भगवान श्री राम ने अमोग ब्रह्मास्त्र का संधान करके रावण के नाभि कुंड में स्थित अमृत को सुखा दिया और उसका वध करके इस पृथ्वी को उसके आतंक से मुक्त कराया।

मृत्यु के क्षणों में लक्ष्मण को दिया गया परम नीति उपदेश

जब रावण युद्धभूमि में मरणासन्न स्थिति में पड़ा हुआ था तब भगवान श्री राम ने मर्यादा का एक ऐसा अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया जो केवल सनातन धर्म में ही संभव है। राम ने अपने छोटे भाई लक्ष्मण से कहा कि इस संसार से नीति, राजनीति और ज्ञान का एक बहुत बड़ा महासागर सदा के लिए समाप्त होने जा रहा है। तुम रावण के समीप जाओ और उसके चरणों के पास खड़े होकर जीवन और शासन के कुछ बहुमूल्य पाठ सीखो। लक्ष्मण जब रावण के चरणों के समीप विनीत भाव से खड़े हुए तो मरते हुए दशानन ने उन्हें तीन अत्यंत महत्वपूर्ण बातें बताईं जो आज भी प्रत्येक मनुष्य के लिए जीवन मंत्र की भांति हैं।

  • शुभ कार्य में कभी देरी नहीं करनी चाहिए: रावण ने कहा कि मैंने अपने जीवन में अनेक शुभ कार्य करने की सोची थी जैसे स्वर्ग तक सीढ़ी बनाना और समुद्र के खारे पानी को मीठा करना परंतु मैं उन्हें कल पर टालता रहा और वे कभी पूरे नहीं हो सके। इसलिए शुभ कार्य को तत्काल संपन्न करो और अशुभ कार्य को जितना हो सके टालते रहो।
  • शत्रु को कभी छोटा या तुच्छ मत समझो: रावण ने स्वीकार किया कि मैंने मनुष्य और वानर जाति को अत्यंत कमजोर समझा और उनसे अपनी सुरक्षा का वरदान नहीं मांगा जिसके कारण आज मेरी यह गति हुई है।
  • अपने जीवन का गुप्त रहस्य किसी को मत बताओ: उसने बताया कि मेरी नाभि में अमृत होने का रहस्य विभीषण को ज्ञात था और उसी के कारण आज मेरी मृत्यु संभव हो सकी। यदि यह रहस्य गुप्त रहता तो संसार की कोई शक्ति मुझे परास्त नहीं कर सकती थी।

रावण की पावन विरासत और आधुनिक समाज में उसकी मान्यता

आज भी रावण का चरित्र संपूर्ण विश्व में गहन शोध और वैचारिक विमर्श का एक अत्यंत प्रिय विषय बना हुआ है। भारत के उत्तर प्रदेश राज्य में ग्रेटर नोएडा के समीप स्थित बिसरख गांव को रावण का पैतृक जन्मस्थान माना जाता है। इस गांव में आज भी विजयादशमी के दिन रावण का पुतला नहीं जलाया जाता है बल्कि उसकी आत्मा की शांति के लिए विशेष वैदिक यज्ञ और पूजा अनुष्ठान किए जाते हैं। ठीक इसी प्रकार श्रीलंका के अनेक प्राचीन क्षेत्रों में रावण को एक महान दूरदर्शी सम्राट और जननायक के रूप में पूजा जाता है और वहां उसके कई ऐतिहासिक मंदिर भी स्थापित हैं। रावण का चरित्र संपूर्ण मानवता को यह शाश्वत शिक्षा देता है कि आपके पास चाहे कितना भी अगाध ज्ञान, अपार धन और असीमित शक्ति क्यों न हो यदि आपके भीतर अहंकार और वासना का वास है तो आपका पतन निश्चित है। वह एक ऐसा दर्पण है जो हमें दिखाता है कि शक्ति जब धर्म से अलग हो जाती है तो वह विनाश का कारण बन जाती है।

FAQ

रावण संहिता क्या है और इसका ज्योतिष में क्या महत्व है
रावण संहिता रावण द्वारा रचित एक अत्यंत प्राचीन और प्रामाणिक ज्योतिष ग्रंथ है जिसमें ग्रहों की स्थिति भाग्य बदलने के अचूक तांत्रिक और वैदिक उपाय तथा धन प्राप्ति के गुप्त सूत्रों का विस्तृत वर्णन किया गया है।

क्या रावण वास्तव में एक शाकाहारी ब्राह्मण था
हां रावण जन्म से महर्षि विश्रवा का पुत्र होने के कारण एक उच्च कुल का ब्राह्मण था और वह पूरी तरह से शाकाहारी था जो नियमित रूप से वैदिक यज्ञ और वेदों का पाठ संपन्न करता था।

रावण को दस सिर होने का वास्तविक और सूक्ष्म अर्थ क्या है
रावण के दस सिर वास्तव में उसकी अगाध बुद्धिमत्ता के सूचक थे जो चार वेदों और छह वेदांगों शास्त्रों पर उसके पूर्ण आधिपत्य और मानसिक क्षमता को प्रदर्शित करते थे।

शनि देव को बंदी बनाने के बाद रावण ने उनके साथ क्या किया था
रावण ने शनि देव सहित सभी नवग्रहों को अपने सिंहासन की सीढ़ियों में उल्टा बांधकर रखा था और मेघनाद के जन्म के समय शनि देव द्वारा दृष्टि बदलने पर उसने उनके पैर पर प्रहार करके उन्हें लंगड़ा कर दिया था।

बिसरख गांव में रावण का पुतला क्यों नहीं जलाया जाता है
उत्तर प्रदेश के बिसरख गांव को रावण का जन्मस्थान माना जाता है और वहां के निवासी उसे अपने कुल का पूर्वज और एक महान विद्वान ब्राह्मण मानते हैं इसलिए वहां दशहरा मनाने के स्थान पर शोक और पूजा की जाती है।

पाएं अपनी सटीक कुंडली

कुंडली बनाएं

क्या आपको यह पसंद आया?

लेखक

पं. नरेंद्र शर्मा

पं. नरेंद्र शर्मा (63)


अनुभव: 20

इनसे पूछें: Family Planning, Career

इनके क्लाइंट: Punjab, Haryana, Delhi

इस लेख को परिवार और मित्रों के साथ साझा करें

ZODIAQ के बारे में

ज़ोडियाक (ZODIAQ) एक ऑनलाइन वैदिक ज्योतिष प्लेटफॉर्म है। जिन यूज़र्स को ज्योतिषीय सलाह की आवश्यकता है उन्हें ये अनुभवी ज्योतिषियों से जोड़ता है। हमारे यूज़र्स निशुल्क कुंडली भी बनाते हैं और कुंडली मिलान करते हैं। साथ ही ज़ोडियाक (ZODIAQ) ज्योतिषियों को भी कई उपयोगी सेवाएँ प्रदान करता है। ज्योतिषी ज़ोडियाक (ZODIAQ) की विभिन्न सुविधाओं का उपयोग कर अपने ग्राहकों को बेहतर सेवा प्रदान करते हैं।

यदि आप एक उपयोगकर्ता हैं

अनुभवी ज्योतिषियों से सलाह लें और उनका मार्गदर्शन प्राप्त करें। आप हमारे प्लेटफॉर्म से अनुभवी ज्योतिषियों द्वारा तैयार की गई हस्तलिखित जन्म पत्रिका और जीवन भविष्यवाणी रिपोर्ट भी मंगवा सकते हैं। सटीक कुंडली बनाएं, कुंडली मिलान करें और राशिफल व मुहूर्त की जानकारी प्राप्त करें। हमारी ऑनलाइन लाइब्रेरी का उपयोग करें जहां आपको सभी जरूरी ज्योतिषीय और आध्यात्मिक जानकारी एक जगह मिलेगी।

यदि आप एक ज्योतिषी हैं

अपने ग्राहकों के लिए सटीक कुंडली बनाएं और एक बार में 5 लोगों तक का कुंडली मिलान करें। ज़ोडियाक (ZODIAQ) की मदद से अपने ग्राहकों के लिए विस्तृत जन्म पत्रिका रिपोर्ट तैयार करें। क्लाइंट डायरेक्टरी में ग्राहकों का विवरण सेव करके किसी भी समय उन्हें एक्सेस करें। हर दिन आपने कितने लोगों को परामर्श दिया यह ट्रैक कर के अपनी प्रोडक्टिविटी बढ़ाएं।

WELCOME TO

ZODIAQ

Right Decisions at the right time with ZODIAQ