By पं. नीलेश शर्मा
सुंदरकांड का अर्थ, रामायण में स्थान, हनुमान से संबंध, सुंदरकांड पाठ की विधि और सुंदरकांड के प्रमुख लाभ की गहराई से व्याख्या

रामायण के अनगिनत प्रसंगों में एक अध्याय ऐसा है जो सीधे मन के भीतर भरोसा और साहस भर देता है। वही अध्याय है सुंदरकांड। भक्तों के लिए यह केवल कथा नहीं है बल्कि एक ऐसा मार्गदर्शन है जो कठिन समय में भी भीतर की ताकत जगाता है।
सुंदरकांड मूल रूप से महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित संस्कृत रामायण का पांचवां सर्ग है। इसी आधार पर गोस्वामी तुलसीदास ने अवधी भाषा में रामचरितमानस की रचना की और उसके पांचवें कांड का नाम भी सुंदरकांड ही रखा। इस अध्याय में हनुमान जी की लंका यात्रा, माता सीता की खोज, पराक्रम, विनम्रता और बुद्धिमत्ता का विस्तार से वर्णन है, इसलिए इसे रामायण का हृदय भी कहा जाता है।
बहुत से साधक यह भी पूछते हैं कि सुंदरकांड क्या है और इसे अलग महत्व क्यों दिया गया है। इसका उत्तर केवल शास्त्र में नहीं, उसके प्रभाव में छिपा है। जो व्यक्ति अपने जीवन में भय, चिंता या बाधाओं का सामना कर रहा हो, उसके लिए यह अध्याय एक मानसिक और आध्यात्मिक कवच की तरह काम कर सकता है।
सुंदरकांड की कथा में कई सुंदर अर्थ छिपे हैं। नाम के पीछे भी दो प्रमुख मत प्रचलित हैं।
एक मत के अनुसार हनुमान जी माता सीता की खोज करते हुए लंका पहुँचते हैं और वहाँ उन्हें अशोक वाटिका में सीता जी का दर्शन होता है। वह अशोक वाटिका सुंदर पर्वत पर बताई जाती है, इसलिए इस प्रसंग वाले अध्याय को सुंदरकांड कहा गया।
दूसरे मत में हनुमान जी की माता अंजनी का प्रसंग आता है। कहा जाता है कि माता अपने बालक हनुमान को प्रेम से "सुंदरा" कहकर पुकारती थीं। हनुमान जी के वही सुशील, वीर और सुंदर चरित्र का विस्तृत वर्णन जिस अध्याय में है, उसका नाम ही सुंदरकांड रख दिया गया।
दोनों ही दृष्टि से सुंदरकांड हनुमान जी के स्वरूप को सुंदर, तेजस्वी और करुणामय रूप में सामने लाता है। इसी कारण रामायण सुंदरकांड को अलग से पढ़ने और सुनने की परंपरा बन गई।
सुंदरकांड केवल कथा नहीं है। यह उस क्षण से जुड़ा है जब भगवान श्री राम से माता सीता बिछुड़ी थीं और सम्पूर्ण सेना चिंता में थी। ऐसे समय में हनुमान जी अकेले समुद्र पार करके लंका पहुँचते हैं, सीता जी को आश्वासन देते हैं और वापस लौटकर राम जी को संदेश देते हैं।
इस पूरे प्रसंग में हनुमान जी की गुणों की एक ऐसी श्रृंखला देखने को मिलती है जो सामान्य जीवन में भी आदर्श बन सकती है। उनके भीतर अद्भुत शक्ति है, पर वे विनम्र हैं। बुद्धि तीव्र है, पर अहंकार नहीं है। लक्ष्य स्पष्ट है, पर धैर्य भी बना रहता है।
जब कोई व्यक्ति हनुमान सुंदरकांड का पाठ करता है, तो केवल कथा नहीं दोहराता। वह जीवन में साहस, निष्ठा, सेवाभाव और दृढ़ता जैसे गुणों को भी जागृत करने का प्रयास करता है। यही कारण है कि सुंदरकांड को कलियुग में हनुमान उपासना का एक सरल और सशक्त साधन माना गया है।
धार्मिक ग्रंथों में हनुमान जी को शनि के कष्ट से रक्षक माना गया है। कथा मिलती है कि जब शनि देव हनुमान जी पर संकट लाने आये तो उनकी कथा से प्रभावित होकर स्वयं शनि ने वचन दिया कि जो भी हनुमान जी की भक्ति करेगा, उस पर शनि का प्रकोप कम रहेगा।
इसी संदर्भ में सुंदरकांड को शनि दोष से राहत देने वाला महत्वपूर्ण उपाय माना जाता है। जब किसी की जन्मकुंडली में शनि से जुड़े योग, साढ़ेसाती, ढैया या अशुभ स्थिति चल रही हो, तो अनेक विद्वान मंगलवार या शनिवार को श्रद्धा के साथ सुंदरकांड पाठ की सलाह देते हैं।
यह बात भी याद रखने योग्य है कि केवल पाठ कर लेने से जीवन बदल जाना सुनिश्चित नहीं होता। सुंदरकांड का अर्थ समझकर, हनुमान जी के आचरण को जीवन में अपनाकर और अपने कर्म में सुधार लाकर जब पाठ किया जाता है तब उसका प्रभाव गहरा हो सकता है।
कई जिज्ञासु यह प्रश्न भी करते हैं कि सुंदरकांड में कितने श्लोक होते हैं। वाल्मीकि रामायण के सुंदरकांड में सर्गों और श्लोकों की संख्या अलग गन्थों में थोड़े अंतर के साथ मिलती है, पर मोटे तौर पर यह अध्याय सैकड़ों श्लोकों के माध्यम से हनुमान जी के पराक्रम को चित्रित करता है।
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस के सुंदरकांड में चौपाइयाँ, दोहे और छंद मिलकर एक भावमय प्रवाह बनाते हैं। यह संरचना साधारण गृहस्थ के लिए भी सुलभ है, इसलिए सुंदरकांड श्लोक और चौपाइयों का पाठ जनमानस में अधिक प्रचलित रूप में दिखता है।
यदि कोई व्यक्ति नियमित रूप से सुंदरकांड पढ़ना चाहता है, तो सबसे पहले अपनी सुविधा के अनुसार एक मान्य ग्रन्थ चुन ले। नियम के साथ उसी ग्रन्थ से पाठ करना मन को स्थिर करता है और श्लोकों का अर्थ भी धीरे धीरे खुलने लगता है।
सुंदरकांड पाठ के लाभ तब अधिक स्पष्ट दिखते हैं जब विधि और भावना दोनों साथ चलें। धार्मिक परंपरा में मंगलवार और शनिवार को विशेष रूप से सुंदरकांड पाठ के लिए शुभ माना गया है, हालांकि इच्छानुसार किसी भी दिन श्रद्धा से पाठ किया जा सकता है।
पाठ की सामान्य विधि को सरल रूप में इस तरह समझा जा सकता है।
पाठ में सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बाहरी कर्मकांड से भी अधिक भीतरी श्रद्धा है। जब व्यक्ति हनुमान जी के गुणों को याद रखते हुए सुंदरकांड पढ़ता है तब अध्याय के वाक्य केवल होंठों से नहीं, भीतर से भी गुजरते हैं।
अक्सर लोग केवल चमत्कार की दृष्टि से पूछते हैं कि सुंदरकांड के लाभ क्या हैं। जबकि इसके प्रभाव को दो स्तरों पर समझा जा सकता है। एक बाहरी फल, दूसरा भीतर की स्थिति।
आध्यात्मिक दृष्टि से सुंदरकांड भगवान श्री राम और हनुमान जी की कृपा से साधक को सुरक्षा, मार्गदर्शन और आशीर्वाद की भावना देता है। निराशा के समय यह अध्याय सहारा बनता है और यह भरोसा जगाता है कि ईश्वरीय सहायता कहीं न कहीं सक्रिय है।
मनोवैज्ञानिक स्तर पर सुंदरकांड पाठ से आत्मविश्वास बढ़ सकता है। हनुमान जी के साहस, धैर्य और बुद्धिमत्ता से व्यक्ति प्रेरणा लेता है। जीवन की समस्याओं को देखकर भागने के बजाय, उन्हें धैर्य और संयम से सामना करने की भावना मजबूत हो सकती है।
नियमित पाठ से कई लोग यह अनुभव करते हैं कि नकारात्मक विचार धीरे धीरे कम होते हैं और मन अधिक स्थिर महसूस करता है। घर के वातावरण में भी शांति, सौहार्द और सकारात्मकता की वृद्धि दिख सकती है।
ज्योतिषीय दृष्टि से सुंदरकांड को ग्रह दोषों से राहत के लिए एक प्रभावी उपाय माना जाता है। विशेष रूप से शनि, राहु, मंगल और कुछ हद तक केतु से जुड़े दोषों में हनुमान उपासना के साथ सुंदरकांड पाठ लाभकारी माना जाता है।
जब किसी व्यक्ति की जन्मपत्रिका में शनि की साढ़ेसाती या ढैया चल रही हो, या राहु के कारण मानसिक भ्रम और भय बढ़ रहे हों, तो श्रद्धा से सुंदरकांड पाठ करने से मन को सहारा मिलता है। इसके साथ ही व्यक्ति को अपने कर्म, विचार और संगति पर भी विशेष ध्यान देना होता है।
नीचे एक तालिका में सुंदरकांड पाठ और ग्रह दोष के बीच संबंध को सरल रूप में रखा जा सकता है।
| ग्रह दोष | सुंदरकांड की भूमिका | सावधानियाँ |
|---|---|---|
| शनि दोष | हनुमान जी के माध्यम से शनि का प्रकोप कम करने में सहारा | कर्म में ईमानदारी, आलस्य और अन्याय से दूरी |
| मंगल दोष | क्रोध और आवेग को संतुलित करने में मानसिक सहारा | विवाद, हिंसा और जल्दबाजी से बचाव |
| राहु दोष | भय और भ्रम को कम करने में मदद | गलत संगति, नशा और छल से दूरी |
| केतु से तनाव | अंदरूनी स्थिरता और विश्वास बढ़ाने में सहारा | अत्यधिक संदेह और कटुता से बचना |
सुंदरकांड पाठ को ज्योतिषीय उपाय के रूप में अपनाते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह केवल ग्रहों को शांत करने का साधन नहीं बल्कि अपने जीवन को अनुशासित और सात्विक बनाने की प्रेरणा भी है।
सुंदरकांड को नियमित रूप से पढ़ने या सुनने से मिलने वाले लाभ कई स्तरों पर दिखते हैं। कुछ मुख्य बिंदु इस प्रकार से समझे जा सकते हैं।
जब कोई व्यक्ति नियमित रूप से हनुमान सुंदरकांड का पाठ करता है, तो वह केवल बाहरी लाभ पर नहीं, अपने भीतर की गुणवत्ता पर भी ध्यान देने लगता है। यही दीर्घकालिक लाभ का आधार बनता है।
सुंदरकांड केवल स्तुति नहीं है। यह जीवन जीने के व्यावहारिक सूत्र भी देता है। हनुमान जी के हर कदम से एक शिक्षा निकलती है।
जब हनुमान जी माता सीता की खोज के लिए समुद्र पार करने निकलते हैं तब मार्ग में मैनाक पर्वत उठकर उनके लिए विश्राम और आतिथ्य का आमंत्रण देता है। हनुमान जी उसे प्रणाम करते हैं, स्पर्श करते हैं, पर रुकते नहीं। वे कहते हैं कि जब तक प्रभु श्री राम का कार्य पूरा न हो तब तक विश्राम उचित नहीं।
यह प्रसंग सिखाता है कि लक्ष्य प्राप्ति के मार्ग में सुख सुविधा का आकर्षण आएगा। पर जो साधक अपने ध्येय के प्रति प्रतिबद्ध रहता है, वही अंत तक सफल होता है। छोटी छोटी सुख सुविधाओं में उलझने से बड़ा उद्देश्य कमजोर पड़ जाता है।
मैनाक के बाद मार्ग में सुरसा राक्षसी हनुमान जी का रास्ता रोकती है और उन्हें अपना आहार बनाना चाहती है। हनुमान जी बुद्धिमानी से अपना आकार बड़ा और छोटा करते हुए सुरसा की शर्त पूरी करते हैं और अंत में बिना लड़ाई के उनके मुख से बाहर निकल जाते हैं।
यह प्रसंग सिखाता है कि हर बाधा को टकराव से हल करना जरूरी नहीं। कई समस्याएँ बुद्धिमत्ता और धैर्य से हल हो जाती हैं। व्यर्थ वाद विवाद में उलझने के बजाय समाधान केंद्रित दृष्टि अपनाना ही सुंदरकांड की व्यावहारिक शिक्षा है।
सुंदरकांड अंत तक आते आते यह भावना पैदा करता है कि जब व्यक्ति निष्ठा के साथ ईश्वर का काम, धर्म का मार्ग और दूसरों के हित को प्राथमिकता देता है तब ईश्वरीय आशीर्वाद अपने आप उसके जीवन में वर्षा की तरह बरसने लगता है।
हनुमान जी के गुण जैसे शक्ति, विनम्रता, निष्ठा, सेवा भाव और करुणा, यदि थोड़ा भी जीवन में उतारने का प्रयास किया जाए, तो सुंदरकांड का पाठ केवल अनुष्ठान नहीं, जीवन शैली बन सकता है। यही वह अवस्था है जहाँ शनि दोष से राहत, मानसिक शांति और समृद्धि, सब एक साथ जुड़ने लगते हैं।
जो साधक यह प्रश्न मन में लेकर आते हैं कि what is sundarakanda और इसे कहाँ से शुरू करें, उनके लिए सबसे सरल मार्ग यही है कि वे श्रद्धा, शांति और धैर्य के साथ सप्ताह में एक या दो दिन सुंदरकांड पाठ का संकल्प लें और हनुमान जी के गुणों को धीरे धीरे अपने व्यवहार में स्थान देना शुरू करें।
1. सुंदरकांड क्या है और किस ग्रन्थ का भाग है
सुंदरकांड रामायण का वह भाग है जिसमें हनुमान जी की लंका यात्रा, माता सीता की खोज और उनके पराक्रम का वर्णन है। यह वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस दोनों में पाँचवें कांड के रूप में प्रतिष्ठित है।
2. सुंदरकांड पाठ कब करना सबसे अच्छा माना जाता है
मंगलवार और शनिवार को प्रातःकाल स्नान के बाद, शुद्ध मन और शांत वातावरण में सुंदरकांड पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है। हालांकि श्रद्धा हो तो किसी भी दिन पाठ किया जा सकता है।
3. सुंदरकांड के पाठ से शनि दोष में कैसे राहत मिलती है
हनुमान जी के प्रति शनि देव की भावनात्मक कृतज्ञता के कारण, हनुमान उपासना और सुंदरकांड पाठ से शनि के दबाव में कमी का अनुभव हो सकता है। साथ ही व्यक्ति के कर्म और स्वभाव में सुधार भी आवश्यक होता है।
4. सुंदरकांड में कितने श्लोक या चौपाइयाँ होती हैं
वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस की संख्या पद्धति अलग होने के कारण श्लोकों और चौपाइयों की गणना अलग मिलती है, पर दोनों ही में सुंदरकांड विस्तृत रूप से हनुमान जी के गुणों का वर्णन करता है। साधक के लिए संख्या से अधिक महत्वपूर्ण भावना और नियमितता है।
5. सुंदरकांड पाठ शुरू करने से पहले क्या तैयारी करना आवश्यक है
शरीर की शुद्धि, स्थान की सफाई, भगवान श्री राम, सीता, लक्ष्मण और हनुमान जी की प्रतिमा या चित्र की स्थापना, दीप, प्रसाद और शांत मन। सबसे महत्वपूर्ण तैयारी श्रद्धा और धैर्य है, ताकि पाठ केवल औपचारिकता न रहकर अंदर तक उतरे।
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