हनुमान जी द्वारा पर्वत उठाने का रहस्य

By पं. सुव्रत शर्मा

जानिए लक्ष्मण के प्राणों की रक्षा हेतु महाबली द्वारा द्रोणाचार्य पर्वत उठाने का वास्तविक आध्यात्मिक सत्य

हनुमान जी द्वारा पर्वत उठाने का रहस्य ज्योतिषीय विश्लेषण

सामग्री तालिका

सनातन धर्म की पावन वैचारिक चेतना और वैदिक दर्शन के विशाल वांग्मय में महाबली हनुमान जी का स्वरूप अदम्य बल, निश्छल भक्ति, निस्सीम साहस और अद्वितीय सामर्थ्य का एक ऐसा जाज्वल्यमान प्रतीक है जिसकी महिमा चराचर ब्रह्मांड में व्याप्त है। भचक्र के समस्त ज्योतिषीय विन्यासों और उच्च आध्यात्मिक साधनाओं का अंतिम लक्ष्य मनुष्य के भीतर छिपी हुई उसी सुप्त आंतरिक शक्ति को जाग्रत करना है जिसे सामान्यतः लोग विस्मृत कर देते हैं। लंका की वह ऐतिहासिक रणभूमि उस समय अत्यंत गंभीर और संकटपूर्ण परिस्थिति से घिरी हुई थी। मेघनाद के शक्ति बाण के प्रहार से राजकुमार लक्ष्मण अचेत पड़े थे, उनकी सांसें अत्यंत धीमी हो रही थीं और नाड़ी की गति मंद पड़ती जा रही थी। सुदूर हिमालय के आंचल में द्रोणाचार्य पर्वत पर साक्षात संजीवनी बूटी चंद्रमा की शीतल किरणों के नीचे मंद-मंद चमक रही थी। परंतु रात्रि का समय अत्यंत तीव्र गति से बीत रहा था और सूर्योदय से पूर्व उस दिव्य औषधि को लाना अनिवार्य था। संपूर्ण वानर सेना में यह प्रश्न शांति से गूंज रहा था कि कौन सा ऐसा वीर है जो क्षणभर में विशाल महासागर को लांघकर उस अज्ञात पर्वत शिखर से बूटी खोजकर भोर होने से पहले वापस लौट सकेगा। उस विकट परिस्थिति में केवल एक ही नाम सामने आया, केवल एक ही महाबाहु ने नक्षत्रों की ओर छलांग लगाई और वह महानायक केवल बूटी ही नहीं बल्कि पूरे द्रोणाचार्य पर्वत को ही अपनी हथेली पर उठाकर वापस लौट आया। इस अलौकिक कृत्य के पीछे कर्मायन के अकाट्य नियम और चेतना के रूपांतरण का एक अत्यंत गहरा ज्योतिषीय और दार्शनिक विज्ञान छिपा है।

इस पावन प्रसंग के आध्यात्मिक महत्व और महाबली हनुमान जी की अमोघ शक्तियों को गहराई से समझने के लिए नीचे दी गई तालिका का अवलोकन करना आवश्यक है जो इस अलौकिक घटनाक्रम के मुख्य आयामों का एक स्पष्ट विश्लेषण प्रस्तुत करती है।

मुख्य आध्यात्मिक घटक सूक्ष्म दार्शनिक स्वरूप ज्योतिषीय एवं आत्मिक संबंध
रुद्र तत्व का अंश असीमित शारीरिक और आत्मिक बल सूर्य देव का साक्षात आत्मतेज और पूर्ण निर्भयता
अष्ट सिद्धियों का आधिपत्य शरीर के आकार को इच्छानुसार बदलना चंद्रमा की चंचलता पर नियंत्रण और राहु के भ्रम का नाश
वायु तत्व का पूर्ण संतुलन अत्यंत तीव्र वेग और अबाधित गति बुध की कुशाग्र बुद्धि और मंगल का अदम्य साहस
निष्काम भक्ति योग अहंकार का पूर्ण विसर्जन और शरणागति केतु के माध्यम से मोक्ष मार्ग और लक्ष्य की सिद्धि
प्रकृति के साथ सामंजस्य चेतना द्वारा जड़ पदार्थों को प्रभावित करना देवगुरु बृहस्पति का सर्वोच्च विवेक और अनुग्रह

विभिन्न देवताओं के अमोघ आशीर्वादों से निर्मित अलौकिक विग्रह

बजरंगबली का भौतिक और आध्यात्मिक अस्तित्व संपूर्ण देवलोक की सामूहिक इच्छाशक्ति और आशीर्वाद का एक अत्यंत पवित्र परिणाम था। वे साक्षात भगवान शिव के ग्यारहवें रुद्र अवतार थे जिसके कारण उनके भीतर असीमित बल और संहारक शक्तियों का वास था।

  • अपने पिता पवन देव से उन्होंने वायु के समान अबाधित गति, अत्यंत तीव्र वेग और सीमाओं से मुक्त होने की स्वतंत्रता प्राप्त की थी।
  • सौरमंडल के राजा सूर्य देव ने उन्हें शास्त्रों का पूर्ण ज्ञान, प्रखर बुद्धि और अपने तेज का सौंवा भाग प्रदान किया था।
  • अग्नि देव ने उन्हें अग्नि से अभय रहने का वरदान दिया था तथा देवराज इंद्र के वज्र का प्रहार भी उनकी देह को खंडित नहीं कर सकता था।

ब्रह्मांड के इतिहास में बहुत ही कम ऐसे जीव उत्पन्न हुए हैं जिनकी उत्पत्ति के समय इतनी अधिक ब्रह्मांडीय ऊर्जाओं का एक साथ पवित्र समन्वय हुआ हो। इन सभी आशीर्वादों ने मिलकर हनुमान जी को एक ऐसी अपराजेय स्थिति में पहुंचा दिया था जहां मृत्यु या समय का कोई भी लौकिक नियम उन पर लागू नहीं हो सकता था। उनका यह स्वरूप साक्षात ईश्वर की उस दिव्य करुणा का जीवंत विग्रह था जो संकट के समय धर्म की रक्षा के लिए प्रकट होती है।

अष्ट सिद्धियों और नवनिधियों पर पूर्ण योगिक नियंत्रण का सामर्थ्य

हनुमान जी केवल शारीरिक रूप से बलवान नहीं थे बल्कि वे सनातन संस्कृति के सबसे उच्च कोटि के अष्टांग योग के ज्ञाता और महायोगी भी थे। माता सीता द्वारा दिए गए अमोघ वरदान के कारण वे अष्ट सिद्धियों के पूर्ण स्वामी थे जो उन्हें प्रकृति के सभी भौतिक नियमों से पूरी तरह मुक्त कर देती थीं।

अणिमा सिद्धि के बल पर वे स्वयं को एक अत्यंत छोटे अणु के रूप में परिवर्तित कर सकते थे जबकि महिमा सिद्धि उन्हें अपने शरीर को गगनचुंबी और पर्वतों से भी विशाल बनाने का सामर्थ्य प्रदान करती थी। गरिमा सिद्धि के माध्यम से वे अपने भार को इतना अधिक बढ़ा सकते थे कि साक्षात लंकापति रावण भी उनकी पूंछ को हिलाने में असमर्थ हो गया था और लघिमा सिद्धि उन्हें वायु से भी हल्का बना देती थी। जब द्रोणाचार्य पर्वत पर पहुँचकर वे कालनेमी के छल और सूर्योदय के भय के कारण संजीवनी बूटी की पहचान नहीं कर सके तो उन्होंने अपनी इन्हीं योगिक शक्तियों का उपयोग किया। उन्होंने अपने स्वरूप का विस्तार किया, पर्वत के मूल आधार को अपनी पकड़ में लिया और उसे पूरी सुगमता के साथ हवा में उठा लिया जैसे कोई मनुष्य कमल के पुष्प को उठाता है।

आत्मसंदेह और मानसिक संकोच से सर्वथा मुक्त अखंड चेतना

मानव जीवन की सबसे बड़ी चुनौती और असफलता का मुख्य कारण संकट के समय उत्पन्न होने वाला आत्मसंदेह, मानसिक संकोच और निर्णयों में होने वाली देरी है। बड़े से बड़े पराक्रमी योद्धा भी विकट परिस्थितियों में कई बार असमंजस के चक्रव्यूह में फंस जाते हैं और बहुमूल्य समय को नष्ट कर देते हैं। परंतु हनुमान जी का मन गांडीव धनुष की उस तनी हुई डोरी के समान था जो सदैव स्थिर, एकाग्र और अपने लक्ष्य के प्रति पूरी तरह से समर्पित रहती थी।

उनके भीतर असफलता का कोई अज्ञात भय या झिझक कभी प्रवेश ही नहीं कर सकी। जब उन्हें यह ज्ञात हुआ कि बूटी की पहचान करने में समय नष्ट हो रहा है और वहां राजकुमार लक्ष्मण के प्राण संकट में हैं तो उन्होंने किसी तार्किक दुविधा में पड़ने के बजाय तत्काल निर्णय लिया। यह मानसिक निश्चलता ही उनके भीतर की शारीरिक और आध्यात्मिक शक्ति को एक अत्यंत प्रखर वेग प्रदान करती थी। जहां कोई भी संशय या नकारात्मक विचार उनके संकल्प को छू भी नहीं पाता था वहां संपूर्ण ब्रह्मांड की अदृश्य शक्तियां स्वतः ही उनके कार्य को सिद्ध करने के लिए उनके साथ खड़ी हो जाती थीं।

निष्काम भक्ति की वह ऊर्जा जो शारीरिक बल से कहीं अधिक शक्तिशाली है

महाबली हनुमान जी के इन विस्मयकारी और अलौकिक कृत्यों का वास्तविक इंजन उनकी शारीरिक मांसपेशियां या वरदान नहीं थे बल्कि उनके हृदय में प्रवाहित होने वाली निश्छल और निष्काम भक्ति थी। भगवान श्री राम के प्रति उनका अनुराग इतना अधिक प्रगाढ़ और सघन था कि उनके शब्दकोश में व्यक्तिगत सीमा या असंभव जैसे शब्दों का कोई अस्तित्व ही नहीं रह गया था।

वैदिक अध्यात्म यह सिखाता है कि जब कोई जीवात्ता अपने अहंकार का पूरी तरह विसर्जन करके परमात्मा के चरणों में पूर्ण शरणागति प्राप्त कर लेती है तो मानवीय सीमाओं के सभी बंधन स्वतः ही छिन्न-भिन्न हो जाते हैं। वह विशाल पर्वत केवल हनुमान जी की भुजाओं के बल से नहीं उठा था बल्कि वह तो उस अनन्य दास के पावन संकल्प के सामने नतमस्तक हो गया था जिसका हृदय केवल अपने आराध्य की आज्ञा का पालन करने के लिए धड़कता था। जब भक्ति की ऊर्जा कर्मायन के सिद्धांतों के साथ मिलती है तो वह भौतिक विज्ञान के सभी नियमों को पूरी तरह से निष्प्रभावी कर देती है और असंभव दिखने वाले कार्य भी अत्यंत सुगमता से संपन्न हो जाते हैं।

कर्माशय के बंधनों से पूर्ण मुक्ति और स्वधर्म का साक्षात पालन

इस संसार का प्रत्येक जीव चाहे वह कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो वह अपने पूर्व संचित कर्मों और कर्माशय के बंधनों से पूरी तरह बंधा रहता है जो उसकी योग्यताओं और सीमाओं को निर्धारित करते हैं। परंतु हनुमान जी का प्रत्येक कृत्य पूरी तरह से निष्काम, फल की आसक्ति से मुक्त और केवल धर्म की स्थापना के लिए समर्पित था।

  • इस उच्च आत्मिक स्थिति के कारण उन्हें एक विशेष आध्यात्मिक अनासक्ति प्राप्त थी जहां प्रकृति के कठोर नियम उनके सामने शिथिल हो जाते थे।
  • जब कोई व्यक्ति बिना किसी व्यक्तिगत स्वार्थ या यश की लिप्सा के समष्टिगत कल्याण के लिए कार्य करता है तो संपूर्ण ब्रह्मांड की सकारात्मक शक्तियां उसके संकल्प को पूरा करने के लिए एक चक्रव्यूह की भांति कार्य करती हैं।
  • उस पावन क्षण में साक्षात नियति ने भी हनुमान जी के संकल्प के सामने अपना मार्ग बदल लिया था।
  • यही कारण था कि वे उस विशाल पर्वत को उठाकर बिना किसी थकावट या बाधा के लंका की रणभूमि तक पहुँचने में पूरी तरह सफल रहे।

उनका यह चरित्र हमें यह अमूल्य शिक्षा प्रदान करता है कि जब मनुष्य अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज और धर्म के लिए शस्त्र उठाता है या कर्म करता है तो उसकी आंतरिक शक्ति अनंत गुना बढ़ जाती है।

वायु तत्व पर पूर्ण आधिपत्य और ब्रह्मांडीय श्वास की गति का विज्ञान

पवनपुत्र होने के कारण हनुमान जी का जन्म से ही प्रकृति के पंचमहाभूतों में से सबसे गतिशील और शक्तिशाली तत्व अर्थात वायु तत्व पर पूर्ण नियंत्रण था। वैदिक ज्योतिष और विज्ञान में वायु को अत्यंत चंचल, अदृश्य परंतु अदम्य शक्ति का संवाहक माना गया है जो पूरी पृथ्वी को क्षणभर में चक्रवात के रूप में झकझोरने का सामर्थ्य रखती है।

हनुमान जी के भीतर यही वायु तत्व अपने उच्चतम और शुद्धतम स्वरूप में विद्यमान था जो उन्हें अत्यंत तीव्र गति से उड़ने और सीमाओं को लांघने की अद्भुत क्षमता प्रदान करता था। वायु जब शांत होती है तो जीवन देती है और जब वह उग्र होती है तो बड़े-बड़े पर्वतों को भी उखाड़ फेंकने का बल रखती है। हनुमान जी ने अपनी इसी आंतरिक वायु ऊर्जा को एकाग्र करके उस विशाल पर्वत को उसके मूल स्थान से उखाड़ दिया था। उनका यह वेग खगोलीय गतियों के समान था जिसे संसार की कोई भी भौतिक बाधा कभी रोक नहीं सकती थी। ज्योतिष शास्त्र में बुध की कुशाग्र बुद्धि जब मंगल के पराक्रम और वायु तत्व के साथ मिलती है तो मनुष्य के भीतर ऐसी ही अदम्य कार्यक्षमता का जन्म होता है।

जड़ प्रकृति का चेतन सहयोग और पर्वत राज की सहर्ष स्वीकृति

सनातन धर्म की सूक्ष्म दार्शनिक दृष्टि में इस पृथ्वी पर विद्यमान पर्वत, नदियां और वनस्पति केवल कोई मृत या जड़ पदार्थ नहीं हैं बल्कि वे भी अपनी एक विशिष्ट चेतना से युक्त जीवंत सत्ताएं हैं। द्रोणाचार्य पर्वत का वह विशिष्ट शिखर कोई साधारण मिट्टी का ढेर नहीं था बल्कि वह गंधमादन पर्वत का एक अत्यंत पवित्र और जाग्रत भाग था।

धार्मिक मान्यताओं और कथाओं के अनुसार जब हनुमान जी ने उस पर्वत को उठाने का प्रयास किया तो पर्वत राज ने आदि शक्ति के उस ग्यारहवें रुद्र अवतार के दिव्य उद्देश्य को तत्क्षण पहचान लिया था। वह कोई बलपूर्वक किया गया दमन या विजय नहीं थी बल्कि वह तो एक पवित्र और निष्कपट भक्त के महान अभियान के प्रति प्रकृति की अपनी सहर्ष स्वीकृति और सहयोग था। यदि जड़ प्रकृति और उस पर्वत की चेतना का आंतरिक सहयोग हनुमान जी को प्राप्त नहीं होता तो संसार का कोई भी शारीरिक बल उसे उसके मूल स्थान से कभी विस्थापित नहीं कर सकता था। यह प्रसंग हमें यह शिक्षा देता है कि जब मनुष्य का हृदय पूरी तरह से पवित्र होता है तो जड़ प्रकृति भी उसकी दासी बनकर उसके कार्यों को सिद्ध करने में सहयोग करने लगती है।

काल चक्र के विशाल मानचित्र पर पूर्व निर्धारित ब्रह्मांडीय भूमिका

श्रीमद्भगवद्गीता और रामायण के गूढ़ सिद्धांत यह स्पष्ट करते हैं कि यह संपूर्ण सृष्टि एक पूर्व निर्धारित खगोलीय विधान और काल चक्र के अनुसार गतिमान रहती है जहां प्रत्येक महान आत्मा को अपनी निश्चित भूमिका का निर्वहन करना पड़ता है। लक्ष्मण जी का अचेत होना, संजीवनी बूटी का न मिलना और हनुमान जी द्वारा पूरा पर्वत उठाना यह कोई आकस्मिक घटनाएं नहीं थीं बल्कि यह तो समय के विशाल मानचित्र पर पहले से ही अंकित एक दिव्य पटकथा का मुख्य हिस्सा थीं।

इतिहास के पन्नों में यह दृश्य केवल हनुमान जी के लिए ही सुरक्षित रखा गया था और इसीलिए संपूर्ण वानर सेना में से किसी अन्य वीर ने इस कार्य को करने का प्रयास तक नहीं किया। ब्रह्मांडीय व्यवस्था का यह अटूट नियम है कि जिस आत्मा को जिस महान कार्य को पूरा करने के लिए चुना जाता है उसे उस कार्य को सिद्ध करने के लिए आवश्यक समस्त शक्तियां, वरदान और परिस्थितियां स्वतः ही प्राप्त हो जाती हैं। हनुमान जी केवल उस ईश्वरीय इच्छा के एक पवित्र माध्यम थे जिन्होंने अपनी इस भूमिका को पूरी गरिमा और मर्यादा के साथ निभाकर इतिहास में अमरता प्राप्त की।

द्रोणाचार्य पर्वत के इस अलौकिक प्रसंग में छिपा मानवीय जीवन पाठ

बजरंगबली द्वारा पूरे पर्वत को उठा लेने की यह अलौकिक घटना केवल उनकी शारीरिक शक्ति को सिद्ध करने के लिए नहीं रची गई थी बल्कि इसके भीतर आज के आधुनिक मानव के लिए एक अत्यंत व्यावहारिक व्यावहारिक जीवन पाठ छिपा हुआ है। वह विशाल पर्वत वास्तव में उन असंभव दिखने वाली विकट समस्याओं, अचानक आने वाले संकटों और जीवन की उन चुनौतियों का साक्षात प्रतीक है जो मनुष्य के सम्मुख कई बार खड़ी हो जाती हैं।

बहुत से लोग इन समस्याओं को देखकर पूरी तरह से घबरा जाते हैं, कदम पीछे खींच लेते हैं या हार स्वीकार कर लेते हैं। परंतु हनुमान जी का यह चरित्र हमें यह अनुपम शिक्षा प्रदान करता है कि जब जीवन के मार्ग में संकट का पहाड़ खड़ा हो जाए और सफलता का कोई स्पष्ट रास्ता दिखाई न दे तो घबराने के स्थान पर अपनी पूरी आंतरिक शक्ति और विश्वास को एकाग्र करना चाहिए। यदि समस्या का समाधान आंशिक रूप से न मिले तो उस पूरी परिस्थिति को ही अपने नियंत्रण में लेकर कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ जाना चाहिए। उन्होंने यह कृत्य इसलिए संपन्न किया क्योंकि वे स्वयं को एक कर्ता नहीं बल्कि ईश्वर की इच्छा का केवल एक विनीत माध्यम मानते थे। जब मनुष्य अपने भीतर के इस आत्मसंदेह को पूरी तरह समाप्त करके पूर्ण समर्पण के साथ अपने धर्म का पालन करता है तो चराचर ब्रह्मांड की कोई भी शक्ति उसे अपने लक्ष्य को प्राप्त करने से कभी रोक नहीं सकती है।

FAQ

हनुमान जी ने संजीवनी बूटी की पहचान न होने पर पूरा पर्वत क्यों उठाया था
जब हनुमान जी द्रोणाचार्य पर्वत पर पहुंचे तो वहां अनेक चमत्कारी औषधियां चमक रही थीं और कालनेमी के छल के कारण समय अत्यंत कम बचा था राजकुमार लक्ष्मण के प्राणों की रक्षा हेतु बिना समय नष्ट किए उन्होंने पूरा पर्वत ही उठाना उचित समझा।

द्रोणाचार्य पर्वत को उठाने में हनुमान जी की किस मुख्य सिद्धि का उपयोग हुआ था
इस प्रसंग में मुख्य रूप से हनुमान जी की महिमा सिद्धि का उपयोग हुआ था जिसके बल पर उन्होंने अपने शरीर को अत्यंत विशाल बनाया और गरिमा तथा लघिमा सिद्धि के बल पर उस भारी पर्वत को वायु के समान हल्का करके हवा में उठा लिया।

ज्योतिष शास्त्र में कुंडली के किस दोष को दूर करने के लिए हनुमान जी की यह कथा सुनी जाती है
कुंडली में यदि मंगल ग्रह जनित भयंकर अंगारक दोष, शनि की साढ़ेसाती या राहु केतु के अशुभ प्रभाव के कारण कार्यों में अत्यधिक बाधाएं और दुर्घटनाएं हो रही हों तो हनुमान जी के इस प्रसंग का श्रवण करने से अदम्य साहस और सफलता मिलती है।

क्या द्रोणाचार्य पर्वत वर्तमान समय में भी इस पृथ्वी पर अस्तित्व में है
हां पौराणिक मान्यताओं के अनुसार उत्तराखंड के चमोली जिले में जोशीमठ के समीप स्थित द्रोणागिरी पर्वत को ही वह ऐतिहासिक पर्वत माना जाता है जिसका एक हिस्सा आज भी कटा हुआ दिखाई देता है और वहां के निवासी आज भी हनुमान जी की पूजा नहीं करते हैं।

इस कथा से आधुनिक युग के प्रबंधकों और युवाओं को क्या व्यावहारिक सीख मिलती है
इससे यह व्यावहारिक सीख मिलती है कि संकट के समय जब संसाधनों की कमी हो या निर्णय लेने में दुविधा उत्पन्न हो रही हो तो समय नष्ट करने के बजाय लीक से हटकर सोचना चाहिए और पूरी जिम्मेदारी के साथ समस्या का संपूर्ण समाधान प्रस्तुत करना चाहिए।

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लेखक

पं. सुव्रत शर्मा

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