By पं. अभिषेक शर्मा
रामायण से निकले पांच गहरे पेरेंटिंग सिद्धांत जो बच्चों में आत्मविश्वास, जिम्मेदारी और मजबूत मूल्य विकसित करने में मदद कर सकते हैं

आज की पीढ़ी के माता पिता के लिए पालन पोषण कई बार थकाने वाला अनुभव बन जाता है। काम का दबाव, रिश्तों की जटिलता, बच्चों की पढ़ाई और भविष्य की चिंता, साथ में इंटरनेट और सोशल मीडिया से आती ढेर सारी सलाह। ऐसे में यह स्वाभाविक है कि मन पूछे कि क्या कोई सरल और भरोसेमंद दिशा अभी भी बची है।
यहीं रामायण एक शांत, पर गहरी रोशनी की तरह सामने आती है। यह केवल देवताओं और युद्ध की कथा नहीं बल्कि परिवार, रिश्तों, वचन, पालन पोषण और मानवीय मूल्यों की जीवंत पाठशाला है। राम, सीता, दशरथ, कौशल्या और अन्य पात्रों के व्यवहार में ऐसे संकेत छिपे हैं जिन्हें आज का मनोविज्ञान भी स्वस्थ पेरेंटिंग के मूल नियम मानता है।
रामायण में राजा दशरथ ने राम को केवल उपदेश देकर धर्म नहीं सिखाया। राम ने अपने पिता को रोजमर्रा के जीवन में जैसे देखा, वैसा ही आचरण अपने भीतर धारण किया। राजधर्म हो, वचन निभाने की बात हो या प्रजा के प्रति करुणा, सब पहले दशरथ के व्यवहार में दिखा, फिर राम के स्वभाव में खिला।
आज भी बच्चे शब्दों से कम, दृश्य उदाहरणों से अधिक सीखते हैं।
यही सब बच्चे के अवचेतन में “सामान्य” व्यवहार के रूप में बैठ जाता है।
रामायण यही सिखाती है कि माता पिता खुद एक जीवित पाठ्यपुस्तक हैं, जिसे बच्चा रोज बिना छुट्टी के पढ़ रहा होता है।
राम के वनवास का प्रसंग सतह पर देखें तो बहुत कठोर लगता है। पर भीतर से देखें तो यह
का एक गहरा उदाहरण है।
यहां अनुशासन दंड के रूप में नहीं बल्कि प्रेम और समझ के साथ दिखाई देता है। राम के चारों ओर
रहा, भले ही परिस्थितियां कठिन थीं।
आधुनिक भाषा में कहें तो बच्चों के लिए अनुशासन की जड़ भय नहीं, समझ और सुरक्षा होनी चाहिए।
रामायण यह भाव देती है कि कठोरता की जरूरत हो सकती है, पर उसके केंद्र में प्रेम और करुणा बनी रहनी चाहिए।
रामायण में धर्म यानी कर्तव्य बार बार मुख्य सूत्र के रूप में उभरता है। राम के लिए
सभी जिम्मेदारियां थीं, जिन्हें निभाने से उनका चरित्र गढ़ा।
बचपन से छोटे छोटे कर्तव्य मिलने पर बच्चे के भीतर यह समझ पनपती है कि वह भी घर और समाज का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
ये छोटे काम भी बच्चे के भीतर
का बीज बोते हैं।
| उम्र का चरण | उपयुक्त जिम्मेदारी | भीतर बनने वाला गुण |
|---|---|---|
| 4 से 6 वर्ष | खिलौने समेटना, अपनी बोतल रखना | स्वावलंबन, व्यवस्था की आदत |
| 7 से 10 वर्ष | मेज लगाना, छोटे कामों में मदद | सहयोग, परिवार भावना |
| 11 से 14 वर्ष | छोटे खर्च का हिसाब, किसी एक काम की नियमित देखरेख | उत्तरदायित्व, योजना की समझ |
| 15 वर्ष से आगे | स्वयं का समय प्रबंधन, पढ़ाई और घर के काम का संतुलन | आत्मअनुशासन, निर्णय क्षमता |
रामायण में दिखता है कि जिम्मेदारी जब प्रेम के साथ दी जाती है, तो वह बोझ नहीं बल्कि चरित्र निर्माण का साधन बनती है।
राम, सीता और उनके परिवार के बीच का प्रेम केवल सुखद दिनों तक सीमित नहीं रहा। वनवास, वियोग, युद्ध, अपमान - हर मोड़ पर रिश्तों की डोर कसौटी पर कसी गई, पर भीतर का स्नेह बना रहा।
जब बच्चा यह महसूस करता है कि
तो उसके भीतर एक गहरा आंतरिक सुरक्षा भाव बनता है। यही भाव आगे चलकर
का आधार बनता है।
रामायण यह एहसास कराती है कि बिना शर्त प्रेम कमजोरी नहीं बल्कि बच्चों को अंदर से मजबूत बनाने वाला सबसे बड़ा सहारा है।
रामायण में राम का सबसे बड़ा परिचय केवल एक महान योद्धा या सफल राजा के रूप में नहीं बल्कि
से भरे मानव रूप में मिलता है। आज की तेज रफ्तार दुनिया में अक्सर पूरा ध्यान
पर चला जाता है, जबकि चरित्र निर्माण को बाद में याद किया जाता है।
यदि बच्चा बहुत ज्ञान रखे, पर
तो आगे चलकर संबंध, करियर और स्वयं के भीतर की शांति तीनों प्रभावित होते हैं।
रामायण यह संदेश देती है कि ज्ञान और मूल्य जब साथ चलते हैं, तभी जीवन सच्चे अर्थों में संपूर्ण बनता है।
| सिद्धांत | रामायण में उदाहरण | आज के माता पिता के लिए संकेत |
|---|---|---|
| स्वयं उदाहरण बनना | दशरथ का वचन पालन, राम का अनुकरण | जो मूल्य सिखाना चाहते हैं, पहले स्वयं जिएं |
| प्रेम से अनुशासन | वनवास में भी परिवार का स्नेह | नियम के पीछे का कारण समझाएं, डर कम रखें |
| जिम्मेदारी से चरित्र निर्माण | राम का राजधर्म, भाइयों की भूमिकाएं | उम्र अनुसार छोटे काम और कर्तव्य सौंपें |
| बिना शर्त प्यार | कठिन समय में भी स्नेहपूर्ण संबंध | गलती पर भी प्रेम बना रहे, केवल व्यवहार पर बात |
| ज्ञान के साथ मूल्य | सत्य, नम्रता, करुणा से भरा आचरण | केवल पढ़ाई नहीं, चरित्र की भी निरंतर चर्चा |
क्या रामायण की सीख आज के आधुनिक बच्चों पर लागू हो सकती है
हां, क्योंकि मूल मानवीय जरूरतें - सुरक्षा, प्रेम, सम्मान, मार्गदर्शन - समय से परे हैं। स्क्रीन, स्कूल और भाषा बदल सकती है, पर बच्चे आज भी माता पिता के उदाहरण, बिना शर्त प्यार और स्पष्ट मूल्यों से ही सबसे ज्यादा सीखते हैं।
अगर माता पिता खुद ही अधीर या गुस्से वाले हों तो कहां से शुरुआत करें
सबसे पहले अपने ही व्यवहार को बिना दोष भावना के देखना मददगार होता है। छोटे स्तर पर शुरुआत की जा सकती है - जैसे दिन में केवल एक परिस्थिति चुनकर उसमें थोड़ा अधिक धैर्य रखने का अभ्यास। बच्चों से यह कहना भी ईमानदारी का हिस्सा है कि “कभी कभी गुस्सा आ जाता है, पर उसे भी सीखकर संभाला जा सकता है।”
अनुशासन और दोस्ती के बीच संतुलन कैसे रखा जाए
केवल दोस्त बन जाने से बच्चा सीमा नहीं सीखता और केवल कठोर अनुशासन से बच्चा खुलकर बात नहीं कर पाता। रामायण दिखाती है कि प्रेम भरा संबंध भी सीमा दे सकता है। नियम स्पष्ट हों, पर भाषा सम्मानजनक हो। “ना” कहना भी सीख हो, पर तिरस्कार के साथ नहीं, समझ के साथ।
बच्चों को जिम्मेदारी देते समय यह डर रहता है कि वे परेशान न हो जाएं, क्या करें
जिम्मेदारी का स्तर उम्र और स्वभाव के अनुसार तय करना जरूरी है। यदि काम थोड़ा चुनौतीपूर्ण हो, पर असंभव न हो, तो बच्चा उसे पूरा करके गर्व महसूस करता है। यदि बच्चा थक जाए, तो उसकी भावनाएं सुनकर आवश्यकता अनुसार काम को हल्का किया जा सकता है, पर जिम्मेदारी पूरी तरह हटाना हमेशा समाधान नहीं होता।
रामायण की कहानियां बच्चों से किस उम्र से साझा करना उचित है
बहुत छोटी उम्र से ही सरल रूपांतरण और चित्रों के माध्यम से कहानियां सुनाई जा सकती हैं। जैसे जैसे उम्र बढ़े, वैसे वैसे कथाओं के नैतिक और भावनात्मक स्तर पर चर्चा गहरी की जा सकती है। महत्वपूर्ण यह है कि कहानी केवल सुनाई न जाए बल्कि बाद में बच्चे से पूछा भी जाए कि उसे इसमें क्या अच्छा लगा और क्यों।
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