By पं. अमिताभ शर्मा
शक्ति, अहंकार और भक्ति के बीच भीम और हनुमान की अनोखी कथा

महाभारत का नाम लेते ही भीम की छवि सामने आ जाती है। गदा धारण किए, अपार शारीरिक बल से भरे, अन्याय के विरुद्ध खड़े योद्धा के रूप में भीम को याद किया जाता है। दूसरी ओर रामायण की परंपरा में हनुमान अटूट भक्ति, सेवा और अद्भुत शक्ति के प्रतीक हैं। कम लोग यह याद रखते हैं कि इन दोनों का एक अद्भुत मिलन हुआ था जिसने भीम के जीवन की दिशा को भीतर से बदल दिया।
दोनों ही वायु देव के पुत्र माने जाते हैं। एक तरफ भीम की वीरता और युद्ध कौशल है, दूसरी तरफ हनुमान की विनम्रता और ईश्वर के प्रति अटूट समर्पण। जब शक्ति और भक्ति आमने सामने आई तो जो कथा बनी, वह केवल पौराणिक प्रसंग नहीं रही बल्कि हर साधक के लिए दर्पण बन गई कि सच्ची ताकत किसे कहा जाए।
जंगलों और पर्वतों के बीच भीम का स्वभाव था कि वह अपनी सीमा जांचना चाहता था। महाभारत के प्रसंगों में भीम बार बार ऐसे अवसरों की ओर खिंचते दिखते हैं जहां वे किसी राक्षस, पशु या प्राकृतिक चुनौती का सामना कर सकें। यह उनका साहस भी था और भीतर कहीं अपनी शक्ति को और बढ़ाने की लालसा भी।
एक ऐसे ही समय भीम एक कठिन मार्ग से गुजर रहे थे। मार्ग संकरा था और बीच में एक वृद्ध वानर अपनी देह फैला कर लेटा दिखाई दिया। उसके विशाल से लगने वाले पूंछ के कारण आगे बढ़ना संभव नहीं था। भीम ने सोचा कि इतना तो सामान्य अवरोध है, जिसे हटाना उनके लिए बिल्कुल सरल होगा।
भीम ने बड़े सहज भाव से वानर से कहा कि वह अपनी पूंछ दूर कर दे ताकि मार्ग खुल जाए। वृद्ध वानर ने शांत स्वर में कहा कि वह स्वयं बहुत वृद्ध है, उठ नहीं सकता, यदि भीम चाहें तो उसकी पूंछ को थोड़ा किनारे कर दें। यह सुनकर भीम के भीतर का अहंकार हल्का सा मुस्कुराया।
उन्होंने सोचा कि जिसे पर्वत उठाने में कठिनाई नहीं होती, उसके लिए पूंछ हटाना कैसा काम होगा। पहले सामान्य प्रयास किया। फिर थोड़ा और बल लगाया। कुछ देर में पूरा जोर लगा दिया। आश्चर्य यह कि पूंछ हिली तक नहीं।
यह वही भीम थे जो राक्षसों को परास्त कर चुके थे, जिन्होंने अनेक युद्धों में अपनी क्षमता सिद्ध की थी, पर वहां एक सरल सी पूंछ भी उनके हाथों से नहीं उठ रही थी। मन में प्रश्न जागा कि इस वृद्ध वानर में ऐसा क्या रहस्य है जो सामान्य दिखने के बाद भी इतनी भारी प्रतीत हो रहा है।
जब बार बार प्रयास के बाद भी पूंछ न हिली, भीम को यह अनुभव होने लगा कि सामने वाला कोई साधारण प्राणी नहीं। अहंकार के स्थान पर विनम्रता आने लगी। उन्होंने folded हाथों से पूछा कि आप कौन हैं।
तब उस वानर ने अपना दिव्य रूप प्रकट किया। वही हनुमान जिनका नाम भीम ने बचपन से सुना था, जो रामायण के यशस्वी पात्र हैं, जिन्होंने लंका तक छलांग लगाई, पर्वत उठा कर लाए और जिनकी भक्ति की मिसाल दी जाती है।
यही क्षण था जब भीम को यह भी बताया गया कि दोनों ही वायु देव के पुत्र हैं। एक रूप में वे छोटे और बड़े भाई जैसे हैं। हनुमान ने स्नेह से भीम की ओर देखा और संकेत दिया कि यह मिलन केवल शक्ति प्रदर्शन के लिए नहीं बल्कि भीतरी परिवर्तन के लिए हुआ है।
भारतीय कथाओं में वंश परंपरा केवल शारीरिक जन्म तक सीमित नहीं बल्कि देवताओं की कृपा और आशीर्वाद से भी जुड़ी मानी जाती है।
भीम और हनुमान के संदर्भ में यह कहा जाता है
इस प्रकार दोनों के बीच दैविक भ्रातृत्व का भाव भी स्थापित होता है। यह केवल शक्ति की परंपरा नहीं बल्कि यह संकेत है कि एक ही तत्व से जन्मा बल दो रूपों में सामने आ सकता है
हनुमान इस मिलन में भीम को यह समझाने आए थे कि यदि शक्ति को सही दिशा न मिले तो वह केवल अहंकार बढ़ा सकती है, पर यदि शक्ति भक्ति से जुड़ जाए तो वही शक्ति रक्षा और कल्याण का माध्यम बनती है।
जब भीम ने स्वीकार किया कि वे पूंछ तक नहीं हिला पा रहे हैं तब उनके भीतर का अहंकार पिघलने लगा। हनुमान ने समझाया कि केवल मांसपेशियां ही बल का प्रमाण नहीं।
सच्ची शक्ति में कुछ और तत्व भी अनिवार्य हैं
हनुमान ने संकेत किया कि यदि वे चाहें तो अपनी पूंछ से ही भीम जैसे अनेक योद्धाओं को रोक सकते हैं, पर यह उनका स्वभाव नहीं। उनका स्वभाव सेवा और संरक्षण है, प्रदर्शन नहीं। इसी के साथ उन्होंने भीम को यह समझाया कि युद्धभूमि में केवल बाहरी बल काफी नहीं, भीतर की स्थिरता और ईश्वर में विश्वास भी उतना ही आवश्यक है।
भीम के मन की विनम्रता देखकर हनुमान प्रसन्न हुए। उन्होंने भीम को आशीर्वाद दिया कि कुरुक्षेत्र के युद्ध में वे भीम के रथ के ध्वज पर उपस्थित रहेंगे। इससे दो संकेत स्पष्ट हुए
कुरुक्षेत्र की कल्पना करते समय जब अर्जुन के रथ पर हनुमान के ध्वज का स्मरण आता है, तो समझ में आता है कि पांडवों के पक्ष में केवल मनुष्य शक्ति नहीं, देव शक्ति, भक्ति और धर्म की संयुक्त उपस्थिति भी थी।
भीम और हनुमान की इस कथा को यदि केवल शक्ति परीक्षण की घटना माना जाए तो उसका अर्थ छोटा हो जाएगा। इसमें कई स्तरों पर गहरे संकेत हैं।
हनुमान की पूंछ को हिलाने में असमर्थता यह दिखाती है कि
पूंछ यहां अहं के प्रतीक की तरह भी देखी जाती है। जब तक मन में यह भाव रहे कि “मैं ही सब कर सकता हूं” तब तक साधक आगे नहीं बढ़ता। जैसे ही यह स्वीकार करता है कि कुछ शक्तियां उससे बड़ी हैं, वहीं से वास्तविक साधना का आरंभ होता है।
वायु का प्रकृति में काम है
भीम और हनुमान दोनों में गति और प्राण शक्ति प्रचुर मात्रा में है, पर हनुमान उसे नियंत्रित, संयमित और ईश्वर केंद्रित बनाए रखते हैं। यह संदेश भीम के लिए और साधक के लिए समान रूप से महत्त्वपूर्ण है कि भीतर की शक्ति को स्थिर दृष्टि के साथ जोड़ना आवश्यक है।
| पक्ष | भीम | हनुमान |
|---|---|---|
| वंश | वायु देव से कृपा प्राप्त पांडव पुत्र | वायु पुत्र, राम भक्त |
| मुख्य पहचान | गदा युद्ध, शारीरिक बल, वीरता | भक्ति, सेवा, बुद्धिमत्ता और शक्ति |
| प्रारंभिक दृष्टि | बाहरी बल पर अधिक भरोसा | आत्म समर्पण और विनम्रता पर भरोसा |
| सीख | विनम्रता और भक्ति से बल पूर्ण होता है | शक्ति का प्रयोग संरक्षण और सेवा के लिए |
| युद्ध में उपस्थिति | कुरुक्षेत्र में प्रत्यक्ष योद्धा | ध्वज पर प्रतीक रूप में, अदृश्य सहायक |
आज के समय में भी यह प्रश्न चलता रहता है कि शक्ति किसे कहा जाए।
इन सबको देखकर अक्सर मन में यह भ्रम हो जाता है कि जिसने इन सब पर अधिकार पा लिया, उसके पास ही सच्ची ताकत है। भीम और हनुमान की यह मुलाकात फिर से याद दिलाती है कि
यदि क्षमता चरित्र से न जुड़ी हो, तो वही क्षमता अपने और दूसरों के लिए संकट का कारण बन सकती है। विनम्रता, धैर्य और ईश्वर पर भरोसा शक्ति को दिशा देते हैं। यह कथा उस संतुलन को सजीव रूप में दिखाती है।
जब हनुमान ध्वज पर और भीम रणभूमि में एक साथ उपस्थित मानें जाते हैं, तो यह संकेत भी मिलता है कि मनुष्य का सर्वोत्तम रूप वह है जहां
केवल भक्ति और कोई कर्म न हो, तो वह अधूरा रह जाता है। केवल शक्ति और कोई भक्ति न हो, तो वह असंतुलित बन जाती है।
महाभारत और रामायण दोनों की परंपराओं को जोड़ती यह कथा बताती है कि दो युगों के नायक भी अंततः एक ही बात पर सहमत हैं कि सच्ची विजय वहीं टिकती है जहां हृदय में ईश्वर के लिए स्थान बचा रहे।
1. क्या भीम और हनुमान सच में भाई माने जाते हैं
दोनों को वायु देव की कृपा से जन्मा माना जाता है, इसलिए परंपरा में उन्हें वायु पुत्र कहा गया है। इस संबंध के कारण हनुमान को भीम का बड़ा भाई समान सम्मान दिया जाता है और उनकी मुलाकात को दैविक पारिवारिक मिलन के रूप में भी देखा जाता है।
2. हनुमान ने अपनी शक्ति दिखाकर भीम को तुरंत क्यों नहीं पहचानने दिया
यदि हनुमान तुरंत दिव्य रूप दिखा देते तो भीम के भीतर छिपा अहंकार उजागर नहीं होता। पूंछ न हिला पाने के अनुभव ने भीम को भीतर से झकझोरा, जिसके बाद ही वे सच्चे अर्थ में सीख ग्रहण करने के लिए तैयार हुए।
3. ध्वज पर हनुमान की उपस्थिति का क्या आध्यात्मिक अर्थ है
ध्वज पर हनुमान की आकृति यह संकेत देती है कि जब भी योद्धा धर्म के पक्ष में खड़ा हो, तो उस पर भक्ति और दैवी संरक्षण की छाया भी बनी रहती है। यह हर साधक को स्मरण दिलाती है कि प्रयास मनुष्य करे, पर फल और दिशा का विश्वास ईश्वर पर रखे।
4. भीम को इस प्रसंग से सबसे बड़ी सीख क्या मिली
सबसे बड़ा पाठ यह था कि केवल शक्ति पर्याप्त नहीं। विनम्रता, संयम और ईश्वर में आस्था के बिना शक्ति अधूरी है। इस अनुभव के बाद भीम का आत्मविश्वास तो रहा, पर उसमें पहले जैसा अहंकार कम हो गया।
5. आज के साधक के लिए इस कथा का व्यावहारिक संदेश क्या है
संदेश यह है कि चाहे उपलब्धि कितनी भी बड़ी हो, भीतर यह भाव बना रहना चाहिए कि कुछ शक्ति हमसे बड़ी है। मार्गदर्शन के लिए नम्रता आवश्यक है। जब शक्ति सेवा, भक्ति और सजगता के साथ जुड़ती है, तभी वह जीवन में स्थायी सुख और संतुलन ला पाती है।
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