By पं. अमिताभ शर्मा
जानें वैशाख पूर्णिमा पर बुद्ध पूर्णिमा व्रत का महत्व, कथा और इससे मिलने वाले शुभ फल

वैशाख मास की शुक्ल पूर्णिमा बुद्ध पूर्णिमा के नाम से विख्यात है। इस पावन तिथि पर दान पुण्य से अपार पुण्य फल की प्राप्ति होती है। भगवान श्रीकृष्ण ने माता यशोदा को इस व्रत की विशेष महिमा स्वयं बताई। व्रत पालन से धन संपत्ति और संतान सुख की प्राप्ति निश्चित होती है। द्वापर युग की यह कथा जीवन कष्टों का नाश करने वाली है।
द्वापर युग में यशोदा माता ने भगवान श्रीकृष्ण से प्रार्थना की। ऐसा व्रत बताएं जो स्त्रियों को विधवा भय से मुक्त करे। सभी मनोकामनाएं पूर्ण करे। श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया। स्त्रियों को सौभाग्य और संतान सुख हेतु 32 पूर्णिमा व्रत करना चाहिए। यह व्रत भगवान शिव की कृपा प्रदान करता है। अचल सौभाग्य देता है। जीवन कष्ट नष्ट करता है।
यशोदा ने जिज्ञासा दिखाई। इस व्रत को मृत्युलोक में सबसे पहले किसने किया। श्रीकृष्ण ने प्राचीन कथा सुनाई। कातिका नामक समृद्ध नगरी में चंद्रहास राजा शासन करते थे। वहां धनेश्वर ब्राह्मण अपनी सुंदर गुणी पत्नी रूपवती संग निवास करते थे। धन धान्य की कोई कमी न थी। संतानहीनता ही सबसे बड़ा दुख था।
एक दिन महान योगी नगरी आए। सभी घरों से भिक्षा लेते। धनेश्वर के घर कभी नहीं जाते। धनेश्वर ने कारण पूछा। योगी ने कहा संतानहीन गृह का अन्न पतित होता है। यह सुनकर धनेश्वर अत्यंत दुखी हुए। संतान प्राप्ति का उपाय पूछा।
योगी ने देवी चंडी उपासना का मार्ग बताया। वन में जाकर व्रत साधना करें। धनेश्वर ने पत्नी को सूचित किया। वन तप के लिए प्रस्थान किया। सोलह दिन कठोर साधना। देवी चंडी ने स्वप्न में दर्शन दिया। संतान वरदान लेकिन आयु 16 वर्ष। पति पत्नी 32 पूर्णिमा व्रत करें। आटे के दीपक से शिव पूजन करें तो दीर्घायु होगी।
प्रातःकाल धनेश्वर ने आम वृक्ष पर सुंदर फल देखा। तोड़ न सके। श्री गणेश का स्मरण किया। कृपा से फल प्राप्त हुआ। घर लौटे। पत्नी रूपवती को दिया। स्नान शुद्धि के बाद फल ग्रहण। रूपवती गर्भवती हुईं।
समय पर सुंदर पुत्र जन्मा। नाम देवीदास रखा। चंद्रमा सम उज्ज्वल बुद्धिमान सुशील बालक। माता ने 32 पूर्णिमा व्रत आरंभ कर दिया। 16 वर्ष आयु नजदीक आने पर चिंता हुई। काशी विद्या अध्ययन हेतु भेजने की योजना। मामा को साथ भेजा। अल्पायु रहस्य किसी को न बताया।
मार्ग में गांव रुके। ब्राह्मण कन्या का विवाह था। कन्या ने देवीदास देखा। विवाह की इच्छा जताई। अल्पायु बताने पर भी तैयार। विवाह संपन्न। देवीदास ने पत्नी को अंगूठी रुमाल दिया। पुष्प वाटिका बनाएं। मृत्यु पर फूल मुरझाएंगे। जीवित रहने पर हरे हो जाएंगे।
काशी में पढ़ाई। एक रात्रि काल प्रेरित सर्प दंशने आया। 32 पूर्णिमा व्रत प्रभाव से विफल। स्वयं काल आया। प्राण हरने प्रयास। देवीदास बेहोश। भगवान शिव माता पार्वती प्रकट। माता ने प्रार्थना की। व्रत प्रभाव माता पुण्य से जीवनदान। शिव ने पुनर्जीवित किया।
पत्नी वाटिका देख रही। फूल न मुरझाए। आश्चर्य। फिर हरी हो गई। पति जीवित समझी। काशी से लौटे। ससुर खोज रहे थे। मामा पत्नी संग संयोग। सभी ने स्वागत किया। नगर लौटे। माता पिता हर्षित। भव्य उत्सव मनाया।
श्रीकृष्ण बोले। धनेश्वर को संतान रत्न दीर्घायु कुल रक्षा 32 पूर्णिमा व्रत से संभव। श्रद्धा पूर्वक व्रत करने से जन्म जन्म पाप नाश। सुख समृद्धि सौभाग्य प्राप्ति।
पूर्णिमा को स्नान। स्वच्छ वस्त्र धारण। शिव पूजन। आटे के दीपक जलाएं। फल दान। कथा पाठ। ब्राह्मण भोजन। संध्या आरती।
बुद्ध पूर्णिमा व्रत का मुख्य फल क्या है?
धन संपत्ति संतान सुख सौभाग्य प्राप्ति। श्रीकृष्ण ने यशोदा को बताया। 32 पूर्णिमा व्रत शिव कृपा प्रदान करता। जीवन कष्ट नष्ट। कथा पाठ विशेष फलदायी।
32 पूर्णिमा व्रत कब और कैसे करें?
लगातार 32 पूर्णिमा। प्रत्येक पूर्णिमा आटे दीपक शिव पूजन। फल ब्राह्मण दान। विधिपूर्वक संतान दीर्घायु सौभाग्य।
कथा में देवीदास को क्या संकट आया?
आयु 16 वर्ष निर्धारित। सर्प दंश काल प्रयास विफल। व्रत फल शिव जीवनदान। पुष्प वाटिका चमत्कार।
व्रत से धनेश्वर को क्या लाभ हुआ?
संतान प्राप्ति। पुत्र दीर्घायु। कुल रक्षा सुखी जीवन। श्रद्धा से सभी मनोकामनाएं पूर्ण।
पूजा विधि में क्या विशेष करें?
आटे के दीपक शिव पूजन अनिवार्य। फल दान कथा पाठ ब्राह्मण भोजन। संध्या आरती अवश्य।
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