By पं. अमिताभ शर्मा
हनुमद रामायण की गुप्त कथा और उसके आध्यात्मिक संदेश

रामायण का नाम आते ही अधिकतर मन में आदिकवि वाल्मीकि की छवि उभरती है। वही जिन्होंने तप के बाद “राम” के नाम को “मरा” जप से खोजा, वही जिन्होंने रत्नाकर से वाल्मीकि बनने की यात्रा की और फिर रामकथा को अमर कर दिया। लेकिन लोक-कथा एक और रहस्य भी फुसफुसाती है - कि वाल्मीकि से पहले भी एक रामायण लिखी गई थी और वह किसी साधारण कवि ने नहीं, स्वयं हनुमान ने लिखी थी।
कहते हैं इस “हनुमद रामायण” की काव्य गहराई इतनी अद्भुत थी कि उसे देखकर महान ऋषि भी स्वयं को छोटा महसूस कर सकते थे। फिर भी आज हमारे हाथ में वाल्मीकि रामायण है, हनुमान की लिखी रामायण नहीं। यह कैसे हुआ और इस कथा में हमारे लिए क्या संदेश छिपा है, यही समझने की कोशिश है।
कथा के अनुसार, लंका-विजय के बाद और अयोध्या लौटने से पहले या बाद के किसी कालखंड में, हनुमान एकांत में हिमालय क्षेत्र चले गए। भीतर राम नाम की धुन थी, बाहर गहन शांति। कहते हैं इसी भाव में उन्होंने रामकथा को शब्द देने का मन बनाया।
कुछ लोक मान्यताओं में कहा जाता है कि उन्होंने केले के पत्तों पर रामायण लिखी, कहीं उल्लेख मिलता है कि उन्होंने पहाड़ों की चट्टानों पर अपने नखों से श्लोक उकेरे। माध्यम चाहे जो हो, भाव एक ही था - यह लिखना किसी प्रतिस्पर्धा या यश के लिए नहीं था, यह एक भक्त की अपने आराध्य के लिए निजी भेंट थी। जैसे कोई अपने प्रिय के लिए डायरी में चुपचाप कुछ लिखता है, वैसे ही हनुमान ने यह रामायण रची।
यह कल्पना ही मन को छू लेती है - जिस हनुमान ने अपने सीने में राम-सीता का दर्शन कराया, वही यदि उनकी लीला को कविता में बाँधते हैं, तो वह शब्द कितने जीवंत होंगे।
अब कथा का दूसरा पात्र आते हैं - वाल्मीकि। एक दिन वह उस पर्वतीय क्षेत्र में पहुंचे, जहां हनुमान की लिखी रामायण थी। जो भी स्वरूप आप मानो - पत्ते, पत्थर या कोई और माध्यम - लोककथा कहती है कि वाल्मीकि ने जब उसे पढ़ा, तो वे चकित रह गए।
हानि-लाभ, यश-अपयश से परे रहने वाले ऋषि भी उसके सौंदर्य से अभिभूत हो गए। उनके मन में एक मिश्रित भाव आया - प्रसन्नता भी कि हनुमान जैसी आत्मा ने ऐसी लीला रची और संकोच भी कि उनकी अपनी रामायण तुलना में फीकी न लगने लगे। मनुष्य हो या ऋषि, तुलना का भाव सूक्ष्म रूप से कहीं न कहीं उठ ही जाता है।
यहीं कहानी एक मोड़ लेती है और हनुमान का असली स्वरूप सामने आता है।
हनुमान जिस सहजता से पर्वत उठाते हैं, उसी सहजता से अपना गौरव भी त्याग देते हैं। कथा कहती है कि जब उन्हें यह एहसास हुआ कि इस रामायण के रहते वाल्मीकि की रामायण के मूल्यांकन में कमी महसूस हो सकती है, तो उन्होंने बिना क्षण भर सोचे अपनी ही कृति को नष्ट कर दिया।
कहीं कहा जाता है कि उन्होंने केले के पत्तों वाली रामायण फाड़कर समुद्र में बहा दी, कहीं वर्णन है कि उन्होंने पत्थरों पर खुदे श्लोकों को मिटा दिया। जो भी प्रतीक मानें, सार यह है - उन्होंने अपने लिखे ग्रंथ को संसार की नजरों से हटा लिया, ताकि वाल्मीकि की रामायण ही मानवता के लिए मार्गदर्शक बन सके।
यहाँ एक गहरी बात छुपी है - हनुमान को अपनी रचना से प्रेम था, पर उससे अधिक प्रेम उन्हें उस उद्देश्य से था जिसके लिए रामकथा संसार में आई थी। उन्हें नाम नहीं चाहिए था, उन्हें चाहते थे कि कथा लोगों तक पहुँचे, चाहे किसके नाम से पहुँचे। यह स्तर का ईगो-लेस क्रिएशन आज कलाकार, लेखक, क्रिएटर, सबको भीतर तक झकझोर सकता है।
लोककथा यह भी कहती है कि हनुमान की रामायण पूरी तरह समाप्त नहीं हुई। कुछ अंश समय की धूल में छुपे तो सही, स्मृति में कहीं न कहीं उनकी गूँज रह गई। कुछ परंपराएं कहती हैं कि कालिदास जैसे कवि को कभी हनुमान की रामायण का एक श्लोक मिला, जिसकी गहराई और काव्य सौंदर्य को वे स्वयं भी पार न कर सके।
भले यह बात ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित न हो, पर भाव यह संकेत करता है कि दिव्यता से निकली किसी भी रचना की ऊर्जा पूर्णत: लुप्त नहीं होती। वह किसी न किसी रूप में, किसी न किसी माध्यम से, आने वाले कवियों, संतों और भक्तों को प्रेरित करती रहती है। जैसे कोई महान संगीत सुना जाए, भले उसका रिकॉर्डिंग न बचे, उसके सुर आगे की पीढ़ी के संगीतकार की उँगलियों में उतर जाते हैं।
हमारे लिए यह याद रखने जैसा है कि आध्यात्मिक रचना का असली मूल्य लाइक्स, व्यूज़ या प्रसिद्धि नहीं, उस vibration में है जो वह हमारे और दूसरों के भीतर जगाती है।
हनुमान की रामायण की कथा आज के समय में खास इसलिए भी प्रासंगिक है, क्योंकि 20-40 की उम्र में हममें से कई लोग:
यह स्वाभाविक है। पर कहानी पूछती है - अगर तुम्हारे सामने एक चुनाव आए, जहाँ:
तो तुम क्या चुनोगे।
हनुमान का उत्तर साफ है - जहाँ बड़े हित की बात हो, वहाँ अपना गौरव पीछे रखा जा सकता है। इसका मतलब यह नहीं कि हर बार खुद को मिटा देना ही सही है बल्कि यह कि हर निर्णय में ईगो और उद्देश्य में फर्क पहचानना जरूरी है। कभी-कभी सबसे बड़ा “विन” यह होता है कि तुम जानते हो तुम क्या कर सकते थे, फिर भी शांत हो कर वही चुना जो सही था, भले वह दिखने में “छोटा” लगे।
हनुमान की रामायण की कथा भक्ति की एक अत्यंत परिपक्व अवस्था दिखाती है। इसमें कुछ खास बातें उभरती हैं:
जब करियर, सोशल मीडिया, रिज़्यूमे और नेटवर्किंग के बीच हम खुद को साबित करने की भागदौड़ में फंस जाते हैं तब हनुमान की यह कहानी धीमे से याद दिलाती है - जो सबसे गहरी चीजें हम करते हैं, वे अक्सर शोर में नहीं, शांति में जन्म लेती हैं और बहुत बार केवल ईश्वर को ही दिखाई देती हैं।
बहुत से लोग पूछते हैं - “क्या हनुमान ने सचमुच रामायण लिखी थी।” ऐतिहासिक प्रमाण के स्तर पर यह लोककथा है, कोई मिल चुका ग्रंथ नहीं। पर आध्यात्मिक साहित्य में हर कथा दो स्तर पर काम करती है - बाहर की घटना और भीतर का संकेत।
बाहर की घटना सत्य हो या न हो, भीतर का संकेत बहुत सच हो सकता है:
हनुमान की यह “खोई हुई रामायण” शायद हमें यही सिखाने के लिए है - कि कुछ महाकाव्य इतिहास में दर्ज होते हैं और कुछ प्रभु के हृदय में।
1. क्या हनुमान द्वारा लिखी रामायण का कोई वास्तविक ग्रंथ मिला है?
नहीं। इसे लोककथा माना जाता है। कोई प्रमाणित ग्रंथ उपलब्ध नहीं, लेकिन कथा का आध्यात्मिक संदेश बहुत गहरा है।
2. यदि हनुमान की रामायण इतनी श्रेष्ठ थी, तो उसे नष्ट क्यों किया गया होगा?
कथा का भाव है कि हनुमान ने वाल्मीकि के योगदान को प्रमुख रखने और अपने ईगो को शून्य करने के लिए ऐसा किया। यह विनम्रता की पराकाष्ठा दिखाने वाला संकेत है।
3. क्या इसका मतलब है कि वाल्मीकि की रामायण कमतर है?
बिल्कुल नहीं। वाल्मीकि रामायण ही वह आधार है जो आज तक धर्म, आस्था और जीवन के मार्गदर्शन के रूप में खड़ी है। हनुमान की कथा उसे अस्वीकार नहीं बल्कि और सम्मान देती है।
4. इस कहानी से आज के क्रिएटिव लोग और प्रोफेशनल क्या सीख सकते हैं?
कि असली क्रिएटिविटी नकल या प्रतियोगिता नहीं, अंदर से आए हुए सत्य की अभिव्यक्ति है। और कई बार सबसे बड़ा maturity यह है कि हम जानते हुए भी अपने ईगो को पीछे रख दें, अगर बड़े उद्देश्य की मांग हो।
5. अगर हनुमान की रामायण कभी देखने को न मिले, तो उसकी कथा का क्या लाभ?
यही तो सुंदरता है - हर चीज जो मूल्यवान हो, उसे “हाथ में पकड़ना” जरूरी नहीं। कुछ कथाएँ केवल दिल में जगह बनाने के लिए आती हैं, ताकि हम अपने अहंकार, भक्ति और काम के उद्देश्य पर थोड़ा और सच्चाई से नज़र डाल सकें।
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