By पं. अमिताभ शर्मा
दो अवतारों के बीच भूला हुआ कार्मिक संबंध

हिंदू पौराणिक कथाओं में हर कर्म, यहां तक कि देवताओं के कर्म भी, कर्म का भार वहन करते हैं। भगवान राम और भगवान कृष्ण, भगवान विष्णु के दो अवतार, युगों से अलग हैं लेकिन नियति के एक अदृश्य धागे से जुड़े हुए हैं। यद्यपि दोनों धर्म की स्थापना के लिए पृथ्वी पर अवतरित हुए, भगवान राम के जीवन की एक घटना ने कई शताब्दियों बाद भगवान कृष्ण की मृत्यु का मंच तैयार किया। दो दिव्य अवतारों के बीच यह कम ज्ञात संबंध दर्शाता है कि कार्य और प्रभाव के ब्रह्मांडीय नियम किसी को नहीं छोड़ते, यहां तक कि स्वयं देवताओं को भी नहीं।
जब भी अच्छाई और बुराई के बीच संतुलन खतरनाक रूप से अंधकार की ओर झुकता है तो भगवान विष्णु अवतार लेते हैं। त्रेता युग में, वे रावण को पराजित करने और धार्मिकता स्थापित करने के लिए भगवान राम के रूप में प्रकट हुए। द्वापर युग में, वे ज्ञान और करुणा के माध्यम से मानवता का मार्गदर्शन करने के लिए भगवान कृष्ण के रूप में जन्मे। दोनों भूमिकाओं ने एक ही दैवीय मिशन की सेवा की, फिर भी उनकी कहानियां कर्म के माध्यम से एक दूसरे को पूर्ण करने के लिए नियत थीं।
भगवान विष्णु के दस प्रमुख अवतारों में राम और कृष्ण का स्थान विशेष है। राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है जो धर्म का पालन करते हुए हर परिस्थिति में मर्यादा का पालन करते हैं। कृष्ण को पूर्ण अवतार माना जाता है जिनमें षोडश कलाएं विद्यमान हैं जबकि राम में द्वादश कलाएं थीं। राम ने अपने उदाहरण से धर्म का पालन सिखाया जबकि कृष्ण ने भगवद गीता के माध्यम से ज्ञान का उपदेश दिया। दोनों अवतारों का उद्देश्य पृथ्वी पर धर्म की पुनर्स्थापना करना था लेकिन उनके तरीके अलग थे।
राम का अवतार त्रेता युग के अंत में हुआ जब धर्म तीन चौथाई मौजूद था। कृष्ण का अवतार द्वापर युग के अंत में हुआ जब धर्म आधा रह गया था। कृष्ण की मृत्यु के साथ कलियुग का आरंभ हुआ जब धर्म केवल एक चौथाई रह गया। यह संक्रमण ब्रह्मांडीय योजना का हिस्सा था और दोनों अवतारों की भूमिका इस योजना में महत्वपूर्ण थी।
अपने वनवास के दौरान, भगवान राम ने सुग्रीव के साथ गठबंधन किया, जो अपने भाई वाली द्वारा सिंहासन से हटा दिया गया था। वाली एक शक्तिशाली वानर राजा था। सुग्रीव को उसका राज्य पुनः प्राप्त करने में मदद करने के लिए, राम ने वाली को एक पेड़ के पीछे से बाण मारा। यद्यपि राम का कार्य वाली के नैतिक अपराधों के लिए दंड के रूप में उचित था, अपने भाई की पत्नी और राज्य को लेना, इसने निष्पक्षता और धर्म के बारे में बहस छेड़ दी।
जब राम का बाण वाली को लगा तो वाली ने राम से कई प्रश्न पूछे। उसने कहा कि एक क्षत्रिय होने के नाते राम को छिपकर बाण नहीं मारना चाहिए था। वाली ने पूछा कि उसने ऐसा क्या अपराध किया था जिसके लिए उसे इस प्रकार मारा गया। उसने यह भी कहा कि वह राम के राज्य का न तो शत्रु था और न ही उसने कभी राम के खिलाफ कोई अपराध किया था। वाली के इन प्रश्नों ने धर्म की जटिलता को उजागर किया।
राम ने वाली को समझाया कि उसने अपने छोटे भाई सुग्रीव की पत्नी रूमा को अपने पास रखकर धर्म का उल्लंघन किया था। यह महापाप था। राम ने कहा कि वे इक्ष्वाकु वंश के राजकुमार हैं और उनका कर्तव्य है कि वे धर्म की रक्षा करें। वाली ने अंततः राम के दैवीय उद्देश्य को स्वीकार करते हुए अपनी नियति को स्वीकार कर लिया। फिर भी, उसकी आत्मा उस क्षण की प्रतिध्वनि अपने अगले जन्म में ले गई।
वाली वध की घटना ने धर्म की जटिलता को दर्शाया। एक ओर राम ने धर्म की रक्षा के लिए वाली को मारा क्योंकि उसने अपने भाई की पत्नी को रखा था। दूसरी ओर, छिपकर बाण मारना क्षत्रिय धर्म के विरुद्ध माना जाता है। यह घटना बताती है कि कभी कभी धर्म की रक्षा के लिए नियमों को तोड़ना पड़ता है। राम ने बड़े धर्म की रक्षा के लिए छोटे नियम को तोड़ा।
कई शताब्दियों बाद, कर्म का चक्र एक बार फिर घूमा। द्वापर युग में, वाली का पुनर्जन्म जरा के रूप में हुआ, जो वन में रहने वाला एक विनम्र शिकारी था। कृष्ण के साथ अपने दैवीय संबंध से अनजान, जरा जल्द ही युगों पहले स्थापित कर्म के संतुलन को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला था।
जरा एक साधारण व्याध था जो जंगल में शिकार करके अपना जीवन यापन करता था। वह एक धर्मात्मा व्यक्ति था लेकिन अपने पूर्व जन्म के बारे में कुछ नहीं जानता था। वह नहीं जानता था कि वह पूर्व जन्म में वानर राजा वाली था और भगवान राम से कैसे जुड़ा हुआ था। यह अज्ञानता ही उसे ब्रह्मांडीय योजना का निमित्त बनने वाली थी।
हिंदू दर्शन में कर्म का नियम अटल है। हर कर्म का फल मिलता है चाहे वह इस जन्म में हो या अगले जन्म में। वाली ने अपने पूर्व जन्म में राम के हाथों मृत्यु प्राप्त की थी। यद्यपि राम ने धर्म की रक्षा के लिए यह कार्य किया था, फिर भी कर्म का संतुलन आवश्यक था। जरा के रूप में वाली का पुनर्जन्म इसी संतुलन का हिस्सा था।
यह समझना महत्वपूर्ण है कि यह घटना किसी बदले की भावना से नहीं बल्कि ब्रह्मांडीय संतुलन को बनाए रखने के लिए हुई। वाली ने राम के दैवीय उद्देश्य को स्वीकार किया था और कोई शाप नहीं दिया था। फिर भी कर्म का नियम यह मांग करता है कि प्रत्येक कार्य का प्रतिकार्य हो। जरा इस प्रतिकार्य का माध्यम बना।
जैसे ही कृष्ण का पार्थिव मिशन समाप्ति के निकट पहुंचा, वे एकांत में चले गए और एक पीपल के पेड़ के नीचे ध्यान में लीन हो गए। दूर से, जरा ने कृष्ण के चमकते पैर को हिरण की आंख समझ लिया और अपना बाण चलाया। बाण ने भगवान के पैर में वैसे ही प्रहार किया जैसे एक बार राम के बाण ने वाली को मारा था। कार्मिक चक्र पूर्ण हुआ।
कृष्ण की मृत्यु से पहले, यादव वंश का विनाश हो चुका था। कुरुक्षेत्र युद्ध के बाद, गांधारी ने कृष्ण को शाप दिया था कि जैसे उसके सौ पुत्रों की मृत्यु हुई, वैसे ही कृष्ण भी अपने पूरे कुल का विनाश देखेंगे। यह शाप सत्य हुआ जब यादवों में आपसी कलह हुई और वे एक दूसरे को मारने लगे। कृष्ण ने अपने पूरे वंश का विनाश देखा।
यादव वंश के विनाश के बाद, कृष्ण ने वन में एकांतवास किया। वे प्रभास तीर्थ के पास एक पीपल के पेड़ के नीचे ध्यान में बैठ गए। उनके पैर का तलवा चमक रहा था। उनका यह एकांतवास उनकी पार्थिव लीला के समापन की तैयारी थी। वे जानते थे कि उनका समय आ गया है और वे दिव्य धाम लौटने के लिए तैयार थे।
दूर से आते हुए जरा व्याध ने कृष्ण के पैर के तलवे को हिरण की आंख समझा और बाण चला दिया। बाण सीधे कृष्ण के पैर में लगा। कहा जाता है कि यह बाण उसी धातु से बना था जो कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न की मृत्यु के समय बची थी। यह दैवीय योजना का हिस्सा था। बाण लगने के बाद भी कृष्ण शांत रहे।
जब जरा को अपनी गलती का एहसास हुआ तो वह दौड़कर कृष्ण के पास आया। वह भयभीत था और क्षमा मांगने लगा। लेकिन कृष्ण ने मुस्कुराते हुए उसे सांत्वना दी। उन्होंने कहा कि यह सब पूर्व निर्धारित था और जरा केवल दैवीय न्याय का एक साधन था। कृष्ण ने जरा को आशीर्वाद दिया और अपने दिव्य धाम को प्रस्थान किया।
अपनी गलती का एहसास होने पर, जरा अपराध बोध से कांपते हुए कृष्ण के पास दौड़ा। लेकिन कृष्ण ने धीरे से मुस्कुराते हुए उसे सांत्वना दी, यह कहते हुए कि उनकी मुलाकात नियत थी और जरा केवल दैवीय न्याय का एक साधन था। जरा को क्षमा करके, कृष्ण ने विश्व को याद दिलाया कि दैवीय प्राणी भी कर्म के ब्रह्मांडीय नियम का सम्मान करते हैं, जहां प्रत्येक कार्य अपना सही समाधान पाता है।
कृष्ण की क्षमा यह दर्शाती है कि वे जानते थे कि जरा केवल एक माध्यम था। जरा का कोई व्यक्तिगत दोष नहीं था। यह ब्रह्मांडीय योजना का हिस्सा था। कृष्ण ने जरा को न केवल क्षमा किया बल्कि उसे आशीर्वाद भी दिया। उन्होंने कहा कि जरा को किसी प्रकार का पाप नहीं लगेगा क्योंकि यह सब पूर्व निर्धारित था। यह क्षमा की महानता को दर्शाता है।
कृष्ण की मृत्यु के साथ वह कर्म पूर्ण हुआ जो त्रेता युग में राम द्वारा वाली के वध से शुरू हुआ था। यह दर्शाता है कि कर्म का हिसाब हमेशा चुकता होता है चाहे कितना भी समय क्यों न लग जाए। राम ने धर्म की रक्षा के लिए वाली को मारा और कृष्ण ने उस कर्म के संतुलन को स्वीकार किया। दोनों ही घटनाओं में दैवीय योजना स्पष्ट है।
यह घटना यह भी दर्शाती है कि दैवीय प्राणी भी कर्म के नियम से बंधे हैं। भगवान विष्णु के अवतार होने के बावजूद, राम और कृष्ण दोनों ने कर्म के नियम का पालन किया। यह हिंदू दर्शन की गहराई को दर्शाता है जहां कोई भी कर्म के नियम से ऊपर नहीं है। यहां तक कि भगवान भी अपने कर्मों का फल भोगते हैं।
राम और कृष्ण के बीच का संबंध एक कालातीत सत्य सिखाता है, ब्रह्मांड में कोई कर्म विलुप्त नहीं होता। वही दैवीय हाथ जो जीवन देता है, संतुलन भी सुनिश्चित करता है। इस कहानी के माध्यम से, हिंदू दर्शन खूबसूरती से दर्शाता है कि कर्म जीवन काल से परे हैऔर धर्म, एक बार विचलित होने पर, हमेशा सद्भाव की ओर वापस अपना रास्ता खोज लेता है।
कर्म का सिद्धांत हिंदू दर्शन का केंद्र है। यह सिखाता है कि हर कार्य का परिणाम होता है। अच्छे कर्म का अच्छा फल और बुरे कर्म का बुरा फल मिलता है। लेकिन कर्म केवल इतना ही नहीं है। यह ब्रह्मांडीय संतुलन को भी बनाए रखता है। जब एक कार्य होता है तो उसका प्रतिकार्य भी होना चाहिए। राम और कृष्ण की कहानी यह संतुलन दर्शाती है।
अंततः, यह कहानी धर्म की विजय की कहानी है। राम ने धर्म की रक्षा के लिए वाली को मारा। कृष्ण ने कर्म के संतुलन को स्वीकार किया। दोनों ही कार्य धर्म की स्थापना के लिए थे। धर्म कभी नष्ट नहीं होता, वह केवल रूप बदलता है। राम और कृष्ण के माध्यम से धर्म ने अपना प्रकटीकरण किया।
यह कहानी यह भी दर्शाती है कि जीवन और मृत्यु एक चक्र है। वाली की मृत्यु और जरा के रूप में पुनर्जन्म, फिर कृष्ण की मृत्यु में उसकी भूमिका, यह सब इस चक्र का हिस्सा है। मृत्यु अंत नहीं है बल्कि एक नई शुरुआत है। आत्मा अमर है और शरीर बदलते रहते हैं।
महाभारत और विभिन्न पुराणों में कृष्ण की मृत्यु का वर्णन अलग अलग तरीके से किया गया है। कुछ में गांधारी के शाप को प्रमुख कारण बताया गया है। कुछ में यादव वंश के विनाश को। कुछ में युग परिवर्तन को। वाली और जरा का संबंध मुख्य रूप से लोक कथाओं में मिलता है। इसे कर्म के सिद्धांत को समझाने के लिए एक उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
दार्शनिक दृष्टि से, यह कहानी कर्म के सार्वभौमिक नियम को दर्शाती है। यह सिखाती है कि कोई भी कर्म से बच नहीं सकता, यहां तक कि भगवान भी नहीं। यह मानव जीवन में कर्म के महत्व को रेखांकित करती है। यह भी दर्शाती है कि हर कार्य का परिणाम होता है, चाहे वह कितने भी समय बाद क्यों न आए।
आध्यात्मिक रूप से, यह कहानी यह संदेश देती है कि हमें अपने कर्मों के प्रति जागरूक रहना चाहिए। हर कार्य को सोच समझकर करना चाहिए क्योंकि उसका परिणाम हमें भुगतना होगा। साथ ही, यह क्षमा के महत्व को भी दर्शाती है। कृष्ण ने जरा को क्षमा कर दिया जो हमें सिखाता है कि क्षमा करना महान गुण है।
क्या वाली वास्तव में जरा के रूप में पुनर्जन्म लिया?
यह मुख्य रूप से लोक कथाओं और बाद के साहित्य में पाया जाता है। मूल महाभारत में इसका स्पष्ट उल्लेख नहीं है। हालांकि, यह कर्म के सिद्धांत को समझाने के लिए एक शक्तिशाली उदाहरण है।
क्या राम ने कोई पाप किया था?
हिंदू दर्शन में, राम ने धर्म की रक्षा के लिए वाली को मारा। यह पाप नहीं था बल्कि धर्म का पालन था। हालांकि, हर कार्य का परिणाम होता है और कर्म का संतुलन आवश्यक है।
कृष्ण ने अपनी मृत्यु को क्यों स्वीकार किया?
कृष्ण जानते थे कि यह ब्रह्मांडीय योजना का हिस्सा है। उन्होंने अपनी पार्थिव लीला पूर्ण कर ली थी और दिव्य धाम जाने का समय आ गया था। उन्होंने कर्म के नियम को स्वीकार किया।
यह कहानी हमें क्या सिखाती है?
यह कहानी हमें सिखाती है कि कर्म सार्वभौमिक है, कोई भी इससे बच नहीं सकता। हर कार्य का परिणाम होता है। धर्म की रक्षा महत्वपूर्ण है। क्षमा करना महान गुण है।
क्या यह कहानी प्रमाणिक है?
यह कहानी हिंदू परंपरा का हिस्सा है। यह मुख्य रूप से लोक कथाओं में पाई जाती है। इसे कर्म के सिद्धांत को समझाने के लिए एक दार्शनिक उदाहरण के रूप में देखा जाना चाहिए।
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